अंकिता कुलश्रेष्ठ की रचनाएं

मेरे श्याम

हाथ माखन होंठ मुरली, से सजाया आपने
नंद नंदन श्याम जग को है रिझाया आपने॥

ऐ मदन गोपाल सुनिए, मैं अकिंचन दीन हूँ
दीन हीनों को सदा ही, उर लगाया आपने॥

मैं दिवानी श्याम की हूँ, ये सभी को है पता
हंस रहे हैं लोग मुझपर, क्या रचाया आपने॥

प्यार मेरा आप ही हो, दूसरा कोई नहीं
गिर चुकी दुख कूप में थी, हाँ बचाया आपने॥

मैं न राधा और मीरा, मैं नहीं थी रुक्मिणी
नेह से मुझको भिगोया, पथ दिखाया आपने॥

आपकी ही भावना है, सब जगत मैं जो बसी
पाप से सबको बचाया, भव तराया आपने॥

सरहद पर सिंदूर

गाड़ी गुज़रीं अनगिनत, होता हृदय अधीर।
फ़ोन नहीं पिय का लगे, नैनन बहता नीर।।

गुमसुम बैठी सोचती,लेकर मन में आस।
जाने किस क्षण आ मिलें, मनभावन उर पास।।

पल-पल राह निहारती, प्रियतम घर से दूर।
मातृभूमि हित के लिए, सरहद पर सिंदूर।।

क्या होली-दीपावली, कैसे व्रत त्यौहार।
साजन बिन सूना लगे, घर-आँगन-संसार।।

सुई घड़ी की भागतीं, भागें धड़कन साथ।
ईश्वर तुमसे माँगती, अपने पिय का हाथ।।

रात भर बरसी मोहब्बत

चार दिन महबूब से नाराज़गी के बाद
रात भर बरसी मुहब्बत, तिश्नगी के बाद।

सर्द मौसम, सब्ज़ लम्हे, गुनगुना सा इश्क़
हो गईं धड़कन शराबी, दिल्लगी के बाद।

चख़ रहें हैं हम खुशी को स्वाद ले लेकर
खिल गई ज़ीनत हमारी सादगी के बाद।।

आपका आना, कि जैसे नूर का आना
हो गईं रोशन निगाहें, तीरगी के बाद।।

छा रही है ये ख़ुमारी, है सबब किसका
मिल गया साक़ी हमें आवारग़ी के बाद।

भूल बैठे हम खुदी को, है फ़िकर कैसी
मिल गया हमको ख़ुदा जब बंदगी के बाद।

गर चले जाएं जहां से हम युंही इक दिन
आपके दिल में रहेंगे ज़िंदगी के बाद।

बीत गया जब दिन

बीत गया जब दिन वैरागी
आई मधुरिम रात,
रीत गए हैं दिवस उजाले
आई श्यामल रात।

थका हुआ मन, थका हुआ तन
टूटे कुछ सपने
लिटा नींद की गोदी हमको
थपकी देती रात।

हमको भाती मौन साधकर
आती दुल्हन सी,
जड़े हुए हैं चांद – सितारे
चूनर ओढ़े रात।

दिन ले आता नए पुराने नित्य
अनगिनत बोझ
क्लांत हुए जीवन को ऊर्जा
देती प्रेमिल रात।

रूठी बैठी रही नयन से
बहता अविरल नीर,
लिए सजन को संग मनाने
पहुंची झिलमिल रात।

जग सारा सो जाता
सुधबुध खोकर मूंदे आंख,
जगकर सबको देखा करती
माँ के जैसी रात।

चाँद मेरा

चाँद तुम तो देख सकते आसमां से हर नज़ारा
चाँद मेरा दूर मुझसे रो रहा है क्या, बताओ

देखकर बतलाओ मुझको क्या तुम्हें वो ताकता है
डूबकर फिर आँसुओं में रातभर वो जागता है
दो दिलासा तुम उसे कुछ हे निशाकर!प्रार्थना है
ज्योत्सना संग इन्दु शीतल, मन वचन से वंदना है
है बहुत निश्छल, सलोना ,प्रियतम प्राणों से प्यारा
मधु-मिलन की स्मृतियों में सो रहा है क्या, बताओ

तुम जरा उसको ये कह दो ,चाँदनी उसकी मिली है
सोलह श्रृंगार करके नवकुसुम सी वो खिली है
चूड़ियाँ, महावर,सितारों से सजी चूनर सजाए
हाथ मेंहदी मांग कुमकुम भाल पर बिंदिया लगाए
किसलिए फिर अनमना सा हो रहा है वो बिचारा
प्रीति पर विश्वास उसका खो रहा है क्या, बताओ

हाँ,उसे जाकर ये कहना क्यों उदासी किसलिए दुख
एक ही आकाश के नीचे तो दोनों जी रहे हैं
एक ही तो है धरा और एक जैसी ही पवन है
एक ही चंदा की अनुपम चाँदनी को पी रहे हैं
हैं अभी कुछ दूरियां पर प्रेम है अनुपम हमारा
प्रेम कोई बीज दुख के बो रहा है क्या, बताओ

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