अंचित की रचनाएं

प्रेमिल रोजनामचों की इंदराजी

तुम्हारा मुझसे प्रेम करना है
ज़मीन का अपने जंगलों से प्रेम करना
और गिलहरी का अपने पेड़ से।

जिस बारिश से सब सराबोर कर देने की
उम्मीद होती है
वो धरती को कुछ दे पाती है
सबसे बेहतर तो,
एक निराशा का गीत।
मेरे हाथ धरती की देह और धरती की गंध
को एक साथ साटने की कोशिश करते रहते हैं
पहली बारिश से लेकर धरती के फिर सूख जाने तक
मैं कोशिश करता रहता हूँ और
हारता रहता हूँ।
इन विफलताओं के बीच ये कोरी कल्पना
बदस्तूर पीछा करती है कि
शायद ऐसी रातों को जो धुन मुझे सुनाई देती है
भूले भटके उसे तुम तक भी पहुँचा देते हैं बादल।

तुमने सुने हैं आसमान के गीत?
ऐसी ही रातों को
उत्तरी ध्रुव के नाविकों जैसे
घर लौट आते हैं सपने।
तुम बारिश जितनी तरल हो या कि
समंदर जितनी।
तुम रूस के पहाड़ों जितनी ऊँची हो या कि
मेरे किताबों की अलमारी जितनी।

मैंने तुमसे कभी प्रेम नहीं किया।
शायद,
तुम्हारे भीतर जो मैं रहता हूँ,
बस उस से प्रेम करता हूँ।

जिस तरह ध्वनि की तरंगें डूबती उतरती हैं,
तुम्हारी नेह में उठता डूबता हूँ मैं।
तुम्हारी गंध लग जाती है मेरी बायीं कलाई पर
जिसे सबकी नज़रें बचा कर सूंघ लेता हूँ कभी कभी।
कई दिनों तक मैं तुम रहता हूँ।

कई बार तुम मुझसे प्रेम नहीं करती।
ये निराश करता है और उलझा देता है।
कई बार और कई चीज़ों से बस इसीलिए नफरत हो जाती है
कि वह तुम्हें मुझसे ज़्यादा पसंद आ जाती हैं।

तुम जितना खुद के लिए हो
मैं चाहता हूँ
तुम उस से ज़्यादा मेरे लिए रहो
बस ज़िद है मेरी।

खुश होता हूँ
जब ये समझ जाता हूँ कि
मैंने कभी कोई कविता नहीं लिखी कविता के लिए.
मेरे हर गीत को तुमसे जुड़े बिना
तसल्ली नहीं होती।

मैं और तुम समय दिखाने वाली बड़ी घड़ी
की सूइयाँ हैं।
कभी बिलकुल पास एक दूसरे से सटे सटे
बीतते हुए.
कभी इतने दूर कि पहचान नहीं पाते एक दूसरे को।

समय बताने वाली हर घड़ी में एक बिंदु होता है
जहाँ से दोनों सूईयाँ हमेशा एक दूसरे से
जुड़ी रहती हैं।
मेरे बेतरतीबी से कटे और चबाये गए नाखूनों
के बीच फंसी उँगलियों की त्वचा
के दुखने
जैसा है
तुम्हारे नहीं होने का एहसास।

गुल हुई जाती है अफ़सुर्दा सुलगती हुई शाम

तुम इंतज़ार कर रही हो
जाने कब से।
गुज़ार देती हो पूरी-पूरी शाम।
जाने क्या-क्या है हमारे बीच।
पटरियाँ, नदियाँ, पहाड़,
सड़क, गाँव, लोग,
शहर और समय।
जाने क्या-क्या है हमारे बीच।
आसमान सूरज और सुई की तरह
चुभता हुआ वह अनजान फ़्लाइओवर
जिसके छोर अँधेरे में डूबे हुए हैं।
एक उम्र बीत गयी है
उन पीली रोशनियों में दिखते
सड़क के उत्थान से प्यार किये।
ना, अब मन नहीं करता।
चाहते हुए भी नहीं झाँक पाना अपने अन्दर
रूह पूरी रात करती रहे फोन
और इतनी गहरी नींद में होना कि
घंटों बाद भी पता ना चले।
चले जाते हुए अक्टूबर की आखिरी सुबह उठकर
पता चलता है खो देना किसे कहते हैं।
वो एक खामोश पल।
उस एक पल में जब अन्दर की खाली जगह इतनी बढ़ जाती है,
पूरा बाहर, एक बार में निगल जाता है अन्दर।
मैं क्षितिजों से दूर रहा हूँ हमेशा
दो बड़े पहाड़, युद्धरत, अपने-अपने दंभ में चूर।
मैंने अपने लिए खोजी घाटी की राह
और वहाँ पहाड़ी फूलों में मिली रूह की गंध।
जो एक बार घाटी का हो गया,
उसे कब और कहाँ आकर्षित कर पाए पहाड़?
तुम्हें किस पल में पाना है
और किस पल में खो देना है बेकार-सा सवाल है।
बिलकुल मेरे उन चुटकुलों जैसा
जिन्हें तुम सर झटक के रवाना कर देती हो
दूसरी दुनिया की ओर।
तुमको ये छोटे शब्द ना हमेशा जीवित रख पायेंगे
ना मेरी स्मृति में स्थिर।
जिन बड़ों ने अपनी पहली घाटियाँ खोयीं
आखिर बढे दूसरी ढलानों की ओर।
तुम इंतज़ार करती हो ये सोच कर कभी कभी
एक कमज़ोर दिल और सिगरेट खाए हुए फेफड़े
अकेले हो जाते हैं कभी कभी
और बहुत ढूँढने पर भी मिलती नहीं रूह।
कुछ अटका-अटका लगता रहता है शाम को
और रात कोशिश करती है
छिपकर आने की और वैसे ही चले जाने की।
दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी है इंतज़ार में बैठी लड़की,
लड़के के, युद्ध में गए लोगों के,
मौत के, मौसम के.
बाकी सब बातें फुजूल की बातें।

इंतज़ार

पेड़ की टहनियों से सर टिकाये
गौरया इंतज़ार करती है बारिश का
नदी बादलों का
और मजदूर शीत में,
गिर रहे मकान के बगल में
एक रुखड़ी दीवार के साथ जुड़े चार ईंटों में
लगाकर कुछ सीलन लगी लकडियाँ
इंतज़ार करता है आंच का।
लम्बी लाईन में लोग
बिल भरने, टिकट बुक करने
रजिस्ट्री जमा करने खड़े रहते हैं
अलग अलग जगह।
भीड़ आन्दोलनों का इंतज़ार करती है
फिर चुनावों का, फिर सरकारों का
फिर बिलों का, फिर उनके कानून बनने
उनके लागू होने का।
आदमी गुज़ार देता है पूरी-पूरी उम्र
सचिवालयों, अदालतों, पंसारियों के
आगे हाथ फैलाए करते हुए
इंतज़ार।
हर रात आखिरी बस के इंतज़ार में खड़ा रहता है
राजधानी के एक छोटे बस स्टॉप पर
अकेला रामआसरे।
सदी के पिछले छोर से ही
अंगूरों के लत्तर के पास कोई रोमियो खड़ा है
अयोध्या के शाह करते हैं लम्बा इंतज़ार
बारिशों के गुजरने का,
अशोक कलिंग युद्ध के बीत जाने का इंतज़ार करता है
बुद्ध तक जाने से पहले।
इतिहास इंतज़ार करता है कि
रेत उसके खाने में आये जल्दी।
आप जहाँ भी खड़े हो जाएँ
आपको बस इंतज़ार करते लोग दिखाई देंगे।
सब के सब कहीं न कहीं
किसी के आगे, किसी के पीछे
डकारते, पसिनाते, उबकाई लेते
या मुस्कुराते हुए करते रहते हैं
जाने किसका इंतज़ार ।
कवि एक हाथ की उँगलियों से
दुसरे हाथ की रेखाएँ गिनता हुआ
देखता हुआ हथेली के पीछे की झुर्रियाँ
इंतज़ार करता है
कि सामने सफ़ेद कागज़ पर
अपनी कलम से उतार सके
अपने समय के सच का फोटो स्टेट।
वक़्त आने पर
कागज़ के निचले हिस्से पर
छोड़ता है बस अपने हस्ताक्षर
और पूरे पन्ने पर बस झूठ।
जब आपने जीवन भर सीखा होगा
बस इंतज़ार करना
बारी आने पर लाज़मी है
हडबडा जाना।

अब मार ही डालो मुझे

I that was near your heart was removed therefrom
To lose beauty in terror, terror in inquisition.

–t.s. eliot, gerontian

आप कैसे शुरू करेंगे आखिरी कविता लिखना?
एक उम्र के बाद
सबसे अच्छा दोस्त होता है
नमक मिला गुनगुना पानी।
जब आप भूल चुके होते हैं प्रेम करने की गंभीरता,
बादलों से बरसने की ताकीद करना,
हर कविता में शब्दों से बस एक चेहरा बार-बार बनाना
और छुट्टी की शामों को बांसुरी बजाना।
पूरी की पूरी उम्र गुज़रती है
खोजते हुए, अलविदा कहने का सबसे सही मौका
और सबसे सही शब्द जो आकर भरे रहते हैं गले में।
बस आपकी खुरदरी उँगलियों से लिपटा रहता है
सब गुम गए दरख्तों का स्पंदन।
पुराने जूतों में लगी मिट्टी भर ही रिश्ता रह जाता है
कुएँ से और गर्मी की दोपहरों से।
उम्रदराज़ लोग
उठते हैं हर सुबह
उठाये हुए अपनी गर्दन पर
बीत गये दिनों का बोझ
और रोज़ सीखते भूलते हैं इंतज़ार करना
चाय के कप का, नयी दवाइयों का
और अपनी आवाज़ भी सही तरह से सुन पाने का।
एक उम्र के बाद
नींद से उठने का मन नहीं होता,
डर लगता है दूर हवा से आवाज़ कर रही खिड़की से,
बहुत दूर लगती है गुलमोहर की गंध
और आप प्रार्थना करते हैं बेहोशी के घंटों के लिए.
आप सर झुकाना चाहते हैं मसीहे के आगे
और पालना चाहते हैं भ्रम कि आप तो बस कठपुतली हैं।
वो बूढा थका आदमी
अपने कमरे में बैठा, कांपते हाथों से कवितायेँ लिखता हुआ
खुद को ये दिलासा देना चाहता है कि एक उम्र पहले,
उसी ने चुराई थी देवों से आग और उसी आग से उसने जला दी थी
एक पुरानी गिटार और कई फ़िज़ूल शब्द।
वो यकीन करना चाहता है कि
शताब्दियों पहले उसने ही उगाया था लड़की की देह से सूरज।
अपने पोपले मुंह से आत्मस्वीकृति के शब्द तक नहीं निकाल पाता।
बाहर आती है बस हवा और उसके सांस की बदबू
कि जिया वह वैसे ही जैसे सब जिए उम्मीद और निराशा में झूलते
एक बड़ी बस में लदा हुआ, बड़ों से सीखता छोटों को सिखाता
कि “पीछे के दरवाज़े से चढो और अगले से उतर जाना। नंबर याद रखना”
वो ताउम्र वह आदमी रहा जो एक पडोसी से लड़ता और दुसरे से दबता रहा।
उन बूढ़े थके आदमियों की भीड़ में से एक आदमी।
“मैं जो तुम्हारे दिल के करीब था, वहाँ से हटा दिया गया एक दिन,
सुन्दरता को भय में खोने और भय को जिज्ञासा में खो देने को।
मेरे सब जूनून हश्र हो गये और उनको रखने की क्या ज़रूरत थी
कि जो रहता है वह अपभ्रंशित हो जाता है।”
कैसे लिखा जाता है आखिरी कविता का अंत?

पिता

वो हमेशा अक्षम रहे बोलने में।
बिना बोले सब किये जाने की आदत
और दूसरों को बोलने देने की आदत ठेठ हो गयी समय के साथ।
माँ खीजती रहती है अक्सर
और गाहे बगाहे हमलोग भी किसी ना किसी मुद्दे की धौंस जमा देते हैं।
कैसे कोई आदमी इच्छा नहीं करता किसी भी चीज़ की,
कैसे सीख जाता है बाँध लेना ज़रूरतों को मुट्ठियों तक।
उन्होंने जो किया बस इतनी ही दूर में करते रहे हैं।
सब लेते रहे हैं जो लेना रहा उनसे
और कहते रहे उनको कमतर क्योंकि
वो जोर से कभी बोले नहीं कुछ
और छीना नहीं कुछ किसी से।
मेरे हाथ देखने में उनके हाथों जैसे लगते हैं
और मेरी आँखें भी उनकी आँखों जैसी,
पेड़ों की छाँव में रहते-रहते बीजों के मन में भी पलती है इच्छा
पेड़ होने की।

आधी रात को अस्पताल आगमन

बरगद का पेड़ है, नीचे बैठा हूँ जिसके, अँधेरा है जिसकी टेक ली है
सामने पोस्टमार्टम विभाग की इमारत है जिधर नजर टिकी हुई है,
इसको कविता नहीं कहता, रुदन कहता हूँ, जो महसूस करता हूँ उसको प्रेम नहीं घृणा।
नाक सूंघ रही है खुली हुई लाश, मिली हुई उससे सड़ती हुई लाश की गंध,
गाती हुई रात की हवा कानों में जा रही है, मुर्दे चीखते नहीं, मरघट में कोई करतल नहीं होता।
सन्नाटा है उस नए कवि के कमरे में, कान में हेडफोन, फोन की स्क्रीन पर पोर्न
जेब में बॉदलेयर, पेट में ब्रेख्त, नसों में गिन्सबर्ग, दिमाग में फिलिस्तीन, दिल में लोर्का
आंख में नींद और हाथ में उसका पुरुषत्व, सब गतिमान, सन्नाटा है और अँधेरा है
अंधेरा उसकी पीठ पर भी भरा है और उसके बिस्तर के खाली पड़े तकिये पर सोया हुआ है
समेटा जा सकता है उसको, एक डिप्रेशन की गोली से छह घंटे, फिर अगली गोली।
निष्कर्षत:
आधी रात है और स्त्री का प्रेम अकेला है, जगा हुआ, इंतजार करता,
उसकी देह अकेली, हर दाग सहलाए जाने का इंतजार करते हुए,
सिंक की छाप मिट जाने का यत्न करती हथेलियाँ
उसकी कमर में डूब चुकी मछलियाँ जागती हैं
आधी रात को दूर कहीं से सुनकर घड़ियाल की आवाज
चूल्हा ठंडा होता हुआ बनता जा रहा है जी.बी. शॉ का कोई नाटक,
धीमे-धीमे, जूठे बर्तनों का गान नेपथ्य लेता रहेगा
सुबह फिर स्टेज के मध्य आ जाएगी वही स्त्री, यही किरदार फिर उसको घेरे हुए,
आधी रात को भाषा का न होना वरदान है।
शहर एक पिंजरा है आधी रात को, सिर्फ़ महसूस किए जा सकते हैं सींखचे,
मेरे उन पर चोंच मारते रहने से भी
उनका क्या बिगड़ेगा, पानी की आवाज पोस्टमार्टम वार्ड के सामने सिर्फ़ मेरी जुगुप्साओं का तुष्टीकरण करती है
प्यास लगेगी तो इस मरघट पर ये बरगद है, इस पर घड़ीघंट टंगे हैं,
उनसे पानी निकालकर पिया जा सकता है,
दुनिया की परिक्रमा करना है यहाँ जीवन जीना,
श्राद्ध करते हुए परिक्रमा करना, उसकी जड़ों में डालना मटके से पानी बार-बार, अप्रतिम तौर से पानी का सूखना,
विचार आधी रात को नागफनी के पौधे हो जाते हैं,
लिपटे रहते हैं उससे क्षुधा के नाग
आधी रात को रो रहे हैं, आंसू कहते हैं अखबार से, आधी रात को हंस रही है सरकार
कहता है अखबार उनसे,

प्यार कॉल होल्ड पर रखकर सो चुका है, उसकी संसद में मेरे खिलाफ कोई निंदा-प्रस्ताव पारित हुआ है, घृणा आवेश को जन्म देती है, धिक्कार पैदा करती है रोने से सिकुड़ गई आंखों की चमड़ी, एक ही बल्ब जल रहा है बस, उस पर इतना बड़ा बोझ… जागो, बेताल, उस छोटी रोशनी के अंदर छिपे हुए तुम झूठी उम्मीद के भूत, अवरुद्ध कर दो मेरी सांस की नली, चीखता हूँ आधी रात को, दो हजार चौदह की गर्मियों में सूरज पूरा खर्च हो चूका, धरती की धुरी एक नोक की तरह चुभती है विश्व बाज़ार को।
अंतत:
जो हो रहा है—समालोचन, संभोग, शिष्टाचार, सबका संविधान सुबह तक समाविष्ट हो जाता है रात की सैर से बचने के संकल्प में और समय होने तक सुदृढ़ रहता है।

प्यार के लिए अढ़ाई कोस धूप

धूप के अढाई कोस शहर और वर्णमाला के अढाई अक्षरों के बीच
स्पष्टता का वीराना पड़ता है। मेरी जगह कौन-सी है?
कौन-सा कोना है जहाँ से बिना किसी को निकाले खुद को फिट कर सकता हूँ?
सवाल इंतजार करते हैं कविता का, जैसे तुम्हारे इंतजार में खड़ा रहता हूँ
उड्हुल के एक गाछ के पास, सामने सड़क है, कीचड़ है, पानी है,
एक मोटर गुजरी है अभी और तुम्हारी गंध थामे हवा ने रुख किया है मेरी ओर।
गंगा में घाट उतरते ही घात लगाए बीस-बीस फीट के गढ़हे हैं
पानी को एक मौका मिला और आपका माथा फिर धूप में कभी नहीं चमकेगा।
उजाड़ है सब, बसते हुए भी, जहाँ से देखता हूँ, हम कहाँ बचते हैं भागने से प्रेम करते हुए भी।
तुम्हारे हाथ पर जले हुए के निशान हैं, तुम्हारी आंखें नींद से भारी हैं, तुम सोच रही हो मुझको
जिया जा सकता है इतनी ही दूर में, इतना आसमान काफी है चमकने के लिए
कवि उन्मुख हो प्रेम करने के लिए और दिन के सब पहरों में कम से कम एक पहर मुख मोड़ सके त्रासदियों से।
बादशाह की गद्दी से बादशाह की कब्र के बीच में जाने कितनी लाशें हैं
देख सको तो ईश्वर के महल से ईश्वर के किले के बीच भी देखना तुम
लंबी-घनी सुरंगें विचारधारा की, मशालें ढाई-ढाई कोस पर। किधर मुड़ गए?
पूरा दिन सरकता है मिलते हुए प्रदूषण से पेड़ों के झुरमुटों में, तुम बंधी मेरी कलाई पर
आज रात तुम्हारी आवाज नहीं आएगी, न कल रात और मैं तुम्हारे न होने में कविता खोजूंगा,
अपने अंधेरे में खोजते हुए बिजली का स्रोत, हम सूरज की चिरौरी करेंगे जब तक जिएंगे।
इसका कोई मतलब नहीं बनता
मैं भूल जाता हूँ मुझे क्या लिखना है—असंतुष्ट-सा, जलता हुआ, स्लिगल और सरल के बीच झूलता हुआ
शवयात्रा के आगे झुकते हुए याद आता है ईश्वर खेत हो गया, त्रासदियों का युद्ध कई बार खेला गया इसके बाद।
सब शोर थम जाता है, तुम गाती हो जब फुसफुसाती हुई-सी, मेरे कानों में।

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