अंजना टंडन की रचनाएँ

पिता

अंतिम यात्रा पर निकले पिता
आँगन में कितनी जगह रह जाते हैं,

खाट के निचे चप्पल और छड़ी में
बैठक के रेडियो और जेब घड़ी में
टँगी टोपी और सब्जी की थड़ी में,

कितना कुछ हरा है
घर के बाहर लिखे छोटे नाम में
कितना कुछ भरा है,

सब ठीक है में गले रूधँते हैं
अम्मा के फोन अक्सर कटते हैं।

माँ – 1

बचाना जानती है माँ,

बारिशों के लिए कुछ धूप
अंधेरों के लिए कुछ उजास,

बचा ही लेती है हर बार,

तंगी के दिनों के लिए कुछ अच्छे दिन
बुरे समय में भी कुछ अच्छी तारिखें,

कैसे तैसे बचाती रही हर बार,

टूटता चूल्हा
बँटती मुँडेर
मुठ्ठी भर इज्जत,

बस नहीं बचा पाई

चार बूँद आँसू,
पिता की विदाई पर

सब रोते रहे
माँ ना रोई,

रेत रेत होती माँ पत्थर हो गई।

माँ – 2

जब नहीं रहेगी माँ
तो मत ढूँढना
उसे इस घर में,

छूट सकता है माँ से घर
कहती रही वो भी उम्र भर
पर
हर बार अटकी
हूक लिए लौटी
बेतरतीब समानों और मकड़ी के जालों में
सूखे बगीचे और टब भर डूबे कपड़ों में
अनदेखा भी किया
पर माँ का मन जो ठहरा
वहीं कहीं छूटा,

अब जब
हो चुकेगें नेत्रदान
देह होगी कहीं चीडफाड़ की मेज पर
ठिठौली करते छात्रों के मध्य
और लेकर
वाजिब नावजिब हसरतें
निकल पड़ेगी रूह
मोक्ष से पहले
शेष इच्छापूर्ति के लिए,

नहीं लौट पाएगी वो
फिर इस आँगन
चढ़ा कर नैवेध
अपनी स्नेही चंद्रिका का,

आँख सूखी रख
जतन से
खिंची वर्जनाओं को मिटाना,

क्यूँकि टपका एक आँसू भी
कुंडी पर फिर जंग लगा सकता है।

देह पक्षालन

मन की ग्लानि का पुख्ता सबूत
अहम् के दायरे में छिपा रहा
तुम्हें गला ना सका,

गलने के लिए
पिघलना जरूरी था
और
चुक गया था
तुम्हारी
माचिसों का मसाला,

जानते हो ना
भरी हुई आँख की रगड़
दरअसल
चिंगारी की तड़प है,

जिरह के अंत तक भी
गर सुनाई दे गई
एक निर्दोष अश्रुपूरित कलकल
तो
चले आना सपाट
खोल रखूँगी कपाट
जैसे
किसी अर्थी को विदा कर
गंगोत्री के छींट के बाद
पवित्र हो देह चली आती है
किसी विश्वास के भीतर।

स्मृतियों का मोक्ष

जिस तरह
हवन की वेदी में धधक कर
यौवन के दिन याद करती है
आम और नीम की उम्रदराज़ लकड़ियाँ,

जिस तरह
पुराने कपड़ों की पोटली में बँधी
रंग उड़ी जामुनी लहरिया याद करती है
अपना मुस्कराता पहला सावनी उत्सव,

उसी तरह
हरिद्वार के घाट पर से बहाया हुआ वो अस्थिकलश
मझदार में पहुँच कर याद करता है
देह के जंगल से पार
किसी का मन में उतरना,

अवशेषी स्मृतियों के लिए कोई मणिकर्णिका घाट नहीं होता ।

सरहद के मरहम

कितने उलझे है सभी
आपाधापी में,

जबकि
इस समय
लिखी जानी चाहिए थीं
दुनिया की
तरलतम प्रेम कविताएँ,

ख़तों के मजमून सी

जिन्हें
प्रेमिकाएँ भेज सकें
गीले बोसे में लपेट,

इस बुरे दौर में यकीनन
ये ही मरहम मानिंद हैं,

सरहद पर इन दिनों जख़्म बहुत है।

प्रजापति राम

जानते थे राम

कैकेयी के मन का मैल
फिर भी माँ का मान रखा,

शबरी के झूठे बेर
फिर भी भावों का संज्ञान सहेजा,

केवट की छलिया बातों का स्नेह
फिर भी भक्त का प्रेम दिखा,

शिला के अतीत का राज
उदारमना अहिल्या पर पैर धरा,

क्या नहीं जानते थे वह
वैदेही का एकनिष्ठ अनुराग
जो चली थी हर पग पर साथ

सच है राजन
जन का अधिक
अभिजन का बहुत कम होता है,

तभी तो प्रजापति कहलाता है।

आदत या अधिकार

तुम्हें पंसद थी आजादी
और मुझे स्थिरता,

तुम्हें विस्तार
मुझे सिमटना,

तुम
अंतरिक्ष में हवाओं में
मैदानों में पहाड़ों पर
कविता लिखते रहे,

मैं
नयनों पर इश्क पर
मेहदीं पर सिंदूर पर
भाग्य सराहती रही,

तुम देहरी के बाहर हरापन उगाते रहे
मैं आँगन के पेड़ों को पहचानती रही,

बातें आदत की थी या अधिकारों की,

खूँटे हम दोनों के थे

फ़र्क़ सिर्फ रस्सी की लम्बाई में थे….।

लौटती सभ्यताएँ

विश्वास की गर्दन प्रायः
लटकती है संदेह की कीलों पर,

“कहीं कुछ तो है” का भाव दरअसल
दिमाग की दबी आवाज है
जो अक्सर छोड़ देती है
प्रशंसा में भी कितनी खाली ध्वनियाँ ,

संदेह के कान
आत्ममुग्धता की रूई से बंद है
आँखें ऊगी हैं पूरी देह पर और
खून में है दुनियावी अट्टाहास ,

कंठ भर तंज
दिल के मर्म को कभी जान नहीं पाएगा,

मृत्यु बाद ही धुले थे
बुल्लेशाह ,मीरा ,और अमृता के दाग,

वैसे तो हर सभ्यता प्रेम से जन्मती है
विश्वास पर पनपती है
और संदेह की हवा में सांस तोड़ती है,
पर भुक्तभोगी जानते है कि इतिहास जुठला कर
इन दिनों उसके रक्तरंजित पदचिन्ह, उल्टे पाँव लौटने के सिम्त दर्ज हो रहे है।

मृत्यु गंध

कभी देखी है क्या होती है ’’मृत्यु गंध’’

युगों से जंग लगे ताले के पास से कभी गुजरो
महसूस करना कोई शेष रहा स्पन्दन,

इंतजार में जड़ होती किसी विरहन को देखना
सूखी बंजर आँखों से खरपतवार निकालते हुए,

निशानियाँ फेंकने से पहले अवशेषी स्मृतियाँ गाड़ते हुए
दिवागंत सैनिक की माँ की आवाज सुनना,

अंतिम सफर से ठीक पहले
नाभि चक्र में अटके
हारा के शेष जुडाव को
झटक कर तोड़ने से ही
उपजती है ये विशेष गंध,

चिता दहकने से पहले ही कितना कुछ दहक चुका होता है,

संगम के घाट पर बहने वालों में अक्सर
सूखी सरस्वती भी ढूढ़े से नहीं मिलती।

याददाश्त

हम उस दौर में है
जब सिकुड़ने लगती है याददाश्त
और
असंख्य शाप पीछा करते है
तब कितना आसाँ होता है
पलट कर विस्मृति का एलबम खोल
बिना जोखिम के
कहीं पर भी कंपकपाती ऊँगली धर
धीमे शब्दों में बोलना,

हर नई भूलभुलैया में भी
जीवन के बीहड़ में
बहुत कुछ छूट जाने का पछतावा
हमेशा
ठीक से याद रहता है ।

जानती हूँ
सप्तपदी पर लिए
सातवें वचन का मान,

बामअंग आने से पूर्व ही
मिली थी नियमावली
जिसमें विकल्प नहीं होते,

’’पर पुरूष देखना भी पाप था’’

बस ध्यान ही तब गया जब
किसी ने
काले और सफेद का झूठ ढूँढ निकाला,

मालूम नहीं
ये दुस्साहस था या परमार्थ
उकेर कर रख दी थी उसने
मुझ जैसी
कई दारूण गाथाएँ अदब के पन्नों पर,

पर सच मानो
मैंने कभी नहीं देखा
उसका चेहरा मोहरा
सिवाय शाब्दिक झलक के,

संवेदनशील सह्रदय मित्र सा लगा
और
स्त्री समझ दुख साझा कर लिया,

वास्तव में
वो कोई पर पुरूष नहीं
मेरे ही ईश का कोई टुकड़ा निकला,

स्त्रियाँ जानती हैं
वचनों का मान क्या होता है

हाँ….मैंने सच में नहीं देखा।

प्रेम या प्रक्रिया

थकहार,रात्रिभोज के बाद
वह स्त्री
जब आँख बंद करती है तुम्हारे साथ
दरअसल वो कहीं
चाँदनी में पगे किसी रेतीले टीले पर
प्रेम के शगुन रोप रही होती है,

जब तुम दम्भ से खींचते हो वस्त्र
हाथ खींच मनचाही करते हो
ठीक उसी समय
किसी छाती के बालों की स्निग्धता में
वह स्पर्श रोप रही होती है,

जब तुम होते हो
उन्माद की आख़ीरी प्रक्रिया में
कोई हल्के हाथों से
सुलझा रहा होता है उसकी उलझी अलकें
हौली नजरों से चूम लेता है उनींदी पलके,

जब पुरूषत्व अपने दंभ पर गर्वित होता है
वो महसूस कर रही होती है
ख़ालिस प्रेम की छुअन
देह पर बहते स्वेद बिंदु की लड़ियों में

तुम थोड़ा परे खिसक
सुलगा रहे होते हो सिगरेट
उसी समय कहीं
उसके होंठों की गोलाई
गहरी डूबी होती है
शुरूआती किसी रससिक्त चुम्बन में,

ठीक जहाँ तुम खत्म करते हो
वहीं से वो अपनी
प्रेम कलाएँ सिद्ध करती है,

जिन्हें कभी वात्स्यायन भी नहीं लिख पाया,
उसके लिए मुश्किल है रखना
महज जिस्मानी प्रक्रिया और प्रेम एक कतार में।

अघोषित अधिकार क्षेत्र

एक सदी कुएँ में बिताने के पश्चात,
और दस पीढ़िया एक्वेरियम में
कितना मुश्किल रहा होगा
मेढ़क और मछलियाँ का दरिया से
हस्बमामूल होना,

तुम तो फिर भी स्त्री थी,

अपनी अहमियत के बरक्स अब तक
धरती के कितने छोटे हिस्से पर रहती आई
हासिल पूरे घर को अब अपना कैसे समझ लेती,

पुरूष भी युगों बाद समझ रहा था
सिलसिले वार निर्लिप्तता चाह रहा था
आसमान इतनी जल्दी कहाँ छूटता,

उसने ताना तुम्हारी खिड़की पर
वो नीला टुकड़ा,
खिड़की के बाहर भी माड़ दिया
वो ’’ओ हेनरी’’ का आखिरी पत्ता
तुम्हार वितान सजा दिया,

सूरज अभी भी उसके अधिकार क्षेत्र में है।

बूँद भर चाह

तुमने सुना
दर्शन कहता है
वेग गर बाँध लिया जाए
तो मुक्त करता है,

नदी की हरहराती प्यास
कब तक समन्दर ढूँढती,

शिव नहीं हूँ
इसलिए अंचभित हूँ जानकर
कि विष बूँद बूँद उतरे तो
पोषक बन जाता है,

आँखों में ठहरे हैं थार,
क्या मल सकते हो
तन के गीलेपन पर
मन के मसान की राख,

हर नीलकंठ का बनना परमार्थ नहीं
रोम रोम तक कुछ टपकता है।

तुम सुन रहे हो ना

तुम्हें
जब-जब मैं कहती हूँ लौट जाओ
डबडबायी आँखों को झुका सुन पाती हूँ
तुम्हारी चुप्पी में एक छन्न-सी आवाज,

टूटे कांच की किरचियाँ समेटती नहीं
नंगे पाँव चलते
देखती रहती हूँ उनका लाल होना
एक अंधी सुरंग में
जो जाकर बंदिशों के देश में खुलती है कहीं,

मुझे नहीं स्वीकार
पिछे से आती हँसती हुई ग्लानि
और अक्सर खो देती हूँ
उस एक पल में इंसान होने का अधिकार
कभी नहीं खो पाई ये कशमकश,
पर अब जब दिन गिने है
आओ..देखो
मेरी आँखों की पुतलियों में ढलते सूरज का रंग है
अबीर की मानिंद
इनमें टिको कुछ देर
दो जोड़ी आँखों की संयुक्त प्रार्थनाओं में
सात सुरों की तृप्ति बुन सके
फिर तुम चले जाना
हाँ..सचमुच चले जाना तुम
मल्हार के रास्ते बारिशों के देश,

तुम सुन रहे हो न प्रिय
हाँ..यह सब होते-होते
हो सकता है
अचानक कभी जा ब जा
उग आए कोई गुलमोहरी फूल
मेरी देह पर
उस लम्हे से पहले लौट जाना तुम
काल और परिस्थिति की
ठीक उस अनुकूलता तक
जब सुवासित हथेलियों का सारा हरा रंग
लौटा के ला सको किसी वाजिब तरिके से
उस समय…….तक
साया बन साये पर बिखरे रहना
किसी पुकार में वास करके…।

नये तेवर की कविता

सुनो कवि इस बार

मेरे रूप को लिखने से पहले
नथ, नुपुर, टीका, कगंन
किसी सरोवर में उछाल आना
बिंदिया, सुरमा, लाली ,मेंहदी
लिखने में समय मत गँवाना,

सौन्दर्य को मेरे
केसरिया रंगत तीखे नक्श
से ही बस मत मापना,
बाँके कजरारे नयनों से भी
कोई तीर मत चलवाना,

माधर्ु्य और रति रस का
चलन इनदिनों कम है
ऐसे क्षणिक भावों का मन नहीं,
किसी इश्क और मुश्क की
घिसी पिटी बात भी मत दोहराना

गर देखना है तो
क्रांन्तिकारी उच्छ्वास देखना
होसलौं में बसी
शाश्वत सी अग्न देखना
क्षितिज से भी ऊँची
पंखों की परवाज देखना
सपट निर्लज्ज सी
ईमान की आशिकी देखना,

गर मुझे सजाना हो तो
ललाट पर कुछ पसीना उगाना,
और तलवों में कुछ काँटे
पीठ पर कुछ दृढ़ता की रपट
और आँखों में सितारे,

लचक शमशीर की मत लिखना
लक्ष्य किसी तीर का सा लिखना,

नये तेवर की कविता हूँ मैं
इस बार
चिलमन के पार का कुछ लिखना ।

सृष्टि के तिलिस्म

सृष्टि के तिलिस्म
अनियमित नहीं
मायावी भी नहीं
घर के नियमों जैसे ही सृष्टि के तिलिस्म हैं,

अज्ञानी का ज्ञान
निर्लप्त का प्रेम
अबोध का बोध
यायावर की ठिठकन
सब की डायरी में लिखे हैं
यथा अनुसार नुस्ख़े ,

नक्षत्र सितारे भोर और शाम
समय पर उठना और लगा देना काम पर
बच्चों को तैयार कर स्कूल भेजने जैसा ही है
ईश्वर वाकई में कहीं हैं….तो स्त्री ही होगा
भीगने, तपने, जमने के मौसम
उसने स्वयं ही गढ़े होगें,

वाकई
जुनून में आई औरत कुछ भी कर गुजरती है,

हर पेट का राशन जुगाड़ना
अंडे में पीतक एकत्रित करने जैसा ही है
ओवम की तरफ लपकते
हज़ारों स्पर्म
ईश्वर का उपालंभ है
अतंतः बस
एक ही काम आता है
असहमति में उसके ’ना’ की मजबूती
कोई भी पीर फकीर रत्न नगीने नही भेद पाया ,

सारे यक्ष प्रशनों के जवाब जानते बूझते भी
जवाब में कोरी निर्लप्त सी मुसकान,

उस आदिम नाद को पता करने के लिए
पत्थरों का टकराव नही
बिग बैंग की परिकल्पना भी नहीं
बस हर शै, शगूफा, शगल में ध्यान सी शिद्दत चाहिए,

इसीलिए तो
छम छम बरिशों से उठती सुगँध

’’फ्रेगंस आँफ वुमन’’ कहलाती है….।

बुद्धि, मन और देह

मन लिप्त हुआ
देह पिछे भागी
बुद्धि जड़ ही रही,

बुद्धि ने बोला
मन को टोका
देह अधरझूल रही,

देह लौटने लगी
बुद्धि को चुप करा
मन फिर पलटा,

बुद्धि ने तर्क लगाया
मन ने छल दिखाया
देह कश्मकश में रही,

समय निकलता रहा
खेल चलता रहा
देह भटकती रही,

मन अपनी करता
बुद्धि उपालंभ भरती
देह तरसती रहती,

मन ने मोह छोड़ा
बुद्धि ने नाता तोड़ा
देह दर्द सहती रही,

मन खाली हुआ
बुद्धि बंजर हुई
देह रेत हुई,

आखिर तक
जाते जाते भी देह जलती रही,

बोध हँसता रहा…।

भुलावा

ऐसा विज्ञान
जो चित्त की वृत्ति का रसायन
प्रेम से बदल कर
घृणा कर दे
ये तो बुद्धि ने कभी नहीं चाहा होगा,

ऐसे पदचिन्ह
जो जंग के मैदानों से होकर
कल के आँगन में
रक्तिम छाप छोड़े
ये तो सभ्यता ने कभी नहीं चाहा होगा,

ऐसी शंखध्वनि
ईराक, ईरान, सीरिया के आगे
काश्मीर की घाटियों को
रूदाली के गीतों से जगाए
ये तो ऊपर वाले ने भी नहीं सोचा होगा ,

खुशनसीबी है ये हमारी तुम्हारी
कि हमारे पास
खुद के जमीर से बचने के लिए
प्रेम कविताएँ हैं
जिसमें बसा है हमारा संसार,

वहीं रह देखते हैं बाहर
जैसे आग की लपटों में घिरा कोई पराया नक्षत्र हो
पसलियों के दर्द को छाती में दबा
उठा लेते है कलम
और लिखते हैं
एक सौ सोलह च़ाँद
और एक उसके क़ाँधे का तिल,

कोई फफक कर कहीं रो पड़ता है।

परिचय

अब तक
हर देह के ताने बाने पर
स्थित हैं
जुलाहे की ऊँगलियों के निशान
बस थोड़ा सा अंदर
रूह तक
जा धँसे है,

विश्वास ना हो
तो कभी
किसी की
रूह की दीवारों पर
हाथ रख देखना
तुम्हारे दस्ताने का माप भी
शर्तिया उसके जितना निकलेगा।

खाली सीपी में समुन्दर

जैसे समन्दर लिखता है बादल
जैसे बादल बनते है हरा
जैसे हरा साथी है तितलियों का
जैसे तितली का माथा चूमता है कोई बच्चा
जैसे बचपन की आँख में है उजला सहज प्रेम,

नीली चादर लपेटे
वृत के आखिरी सिरे पर से अब
लौट जाना चाहती हूँ,

लौट आऊँगी बूढें कदमों से
बचपन को रोपने के लिए
हँडिया की भूख की तृप्ति के लिए
फसलों की सूखी आँख में नमी के लिए
समन्दर के किनारे रेत के घरौंदों के लिए,

बस
मृत्यु की परछाई आने के बाद भी शेष रहूँगी
जितना किसी खाली सीपी में
बचा रहता है समन्दर….।

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