अंजना वर्मा की रचनाएँ

चाय पीती वह गरीब औरत 

हल्की बूँदा-बाँदी में भी
लपेट ली है उसने शाल
काली, मैली शाल देह पर डाले
झुर्रियों वाले मुँह से
झरती हुई बूँदों को देखती
निर्लिप्त बैठी हुई
घुटने मोड़कर पेट में सटाये
वक्त और काम की मार से टूटी हुई देह
आसानी से मुड़ जाती है
बैठी हुई है पैर मोड़े
घुटनों को पेट के साथ जोड़े
चाय का गिलास लिये हाथ
पी रही है चाय
हर चुस्की का रस लेती हुई
पलों में डूबकर जीती हुई
खाना मिले, न मिले
भूख से पेट जले तो जले
पर चाय ज़रूर मिले
दिन-भर में कई-कई बार
क्योंकि यही तो है आधार
चाय और बीड़ी पर
चल रहा है जीवन
बीड़ी फूँकती है दनादन
जल गये हैं फेंफड़े
रुक रहा स्पंदन
फिर भी हारा नहीं है मन
चलती है
तो साँसें फूलती हैं
पर है निर्विकार
नहीं है चिंता
उसका तो यही मौज
यही आधार
नहीं है कोई शिकायत
न आसमां से, न ज़मीं से
कहती नहीं भेद किसीसे
मेल रखती है सभीसे
विदुषियों से भी अधिक विचारशीला वह
किंतु संघर्ष का टीला वह
जानती है जीवन की लीला वह
घर है झगड़े का घर
मिलती है उपेक्षा
वह कहती है राम की इच्छा
वह जानती है सच
नहीं पोसती झूूठे आदर्श
गल गया है तन-मन
फिर भी हर हाल में
जी रही है जीवन
चाय पीती है गरीब औरत
दुबली अंगुलियों से थामे चैन का गिलास
फिर धुँए से भरेगी साँस
यही है आनंद का सार
सब भूलो
कि दुनिया है बेकार

कूड़े पर

अब कूड़े के पास से गुजरते हुए
यूँ ही न निकल जाना
या घृणा से मुँह न फेर लेना
कूड़ पर फेंकी गई गठरियोंं में
कभी-कभी ज़िन्दगी भी होती है बंद
जिसे फेंक दिया जाता है
मौत का निवाला बनने के लिए
और निश्चित तौर पर
वह ज़िन्दगी बेटी की होती है

गौर से देख लेना गठरी को
गठरी कहीं रोती न हो
कहीं हिलती-डुलती न हो
यह देखने के लिए
थोड़ा ठहर भी जाना

जहाँ
बेटियाँ बुहारन बन सकती हैं
वहाँ कचरे पर
एक नजर डाल लेना ज़रूरी है

यह अपराध नहीं है 

वे दे रहे हैं
फाइव स्टारों में लंच-डिनर
पर घर की थाली मेज पर
धरी रह जाती है
दिन पर लिखा है उनका नाम
रात भी उनकी मुट्ठियों में समा जाती है

पत्नी तरसती है
घर में साथ खाने के लिए
बच्चे तरसते रह जाते हैं
पिता की गोद में बैठने के लिए
माँ तरसती रह जाती है
बेटे से दो बातें करने के लिए

अपने घर को घर बनाने के लिए
अपने ही घर से निष्कासन ले लेना पड़ता है
स्वेच्छा से
वे कागज के टुकड़े हमेंं थमाकर
हमसे छीन रहे हैं हमारा समय
पैसों के ढेर पर बैठकर भी
फुर्सत के मामले में
कंगाल हो गये हैं हम

हमसे हमारे समय को छीनकर
उन्होंने हमें ज़िन्दगी से
बेदखल करने की कोशिश की है
पर यह आज की दंड-संहिता में
अपराध नहीं है

अमलताश

उठा लिया है भार
इस भोले अमलताश ने
दुनिया को रोशन करने का
बिचारा दिन में भी
जलाये बैठा है करोड़ों दीये!

(2)
न जाने किस स्त्री ने
टाँग दिये अपने सोने के गहने
अमलताश की टहनियों पर
और उन्हें भूलकर चली गई

(3)

पीली तितलियों का घर है अमलताश
या सोने का शहर है अमलताश
दीवाली की रात है अमलताश
या जादुई करामात है अमलताश!

आश्विन

(1)
आश्विन आया है अभी-अभी
थकान उतारने के लिए नहाया
नदी में
सज-धजकर तैयार हुआ
पगड़ी बाँधी और उसमें खोंस ली
कास की सफेद कलगी
उसकी देह को छूकर
आ रही है ठंडी हवा

(2)

आश्विन की सुबह
रोज नहाती है
आकाश की साँवली झील में
पहन लेती है केसरिया साड़ी
और झाँकने लगती है
पूरब की खिड़की से
उसके भींगे बालों से टपकी बूँदे
अटकी रह जाती हैं
घास की फुनगियों में

(3)

देखोगे आश्विन को हँसते हुए?
तो देखना
हर नीली सुबह
वह न जाने किससे बातें करता है
और खूब हँसता है
हरसिंगार के पेड़ के नीचे
सवेरे उसकी हँसी बिखरी रहती है

तहखाना अपने लिए

अपनी जगह पहचान लेती है लड़की
एक कदम पीछे रहती है वह
आगे जाने का मौका
दे देती है लड़कों को
स्वीकार कर लेती है हँसकर
तहखाना अपने लिए
आसमान दे देती है लड़के को

ज़रा देखो

ज़रा देखो
कि कहाँ है हवा?
कहाँ है पानी?
कहाँ है स्त्री?
जहाँ भी है ये तीन चीजें
वहाँ ज़िन्दगी है

मेरे चेहरे से झाँकती है माँ

मेरे चेहरे से अक्सर
झाँक जाती है मेरी माँ
लोग कहते हैंं
कि उन्होंने मुझमें मेरी माँ को देखा

आईना देखती हूँ
तो अपने ललाट में दिखाई देता है
माँ का ललाट
कभी भाई के चेहरे से झाँकती होती है माँ
तो कभी बेटी की बोली में
सुनाई देती है माँ की आवाज़
तो कभी बक्षन की काया में
छाया बनकर चलती होती है माँ

शरीर की सीमाओं को पार करके भी
अदेह होकर भी
रह न सकी वह हमें छोड़कर
कि वह लौट रही है हम सबके अस्तित्व में

हममें प्रकट होती है माँ बार-बार
माँ चलती रहती है हमारे साथ उम्र-भर
अपनी रचनाके मोह में बँधी
हमीं में समाकर
हमारे ही साथ निरंतर
आखिर बिना माँओं के
रह भी कैसे पायेगी यह पृथ्वी
सप्राण और सजीव?

छोटा ईश्वर

आत्मा से टूटा एक टुकड़ा
मेरी काया में लिपटा हुआ
जो बेटी बन गया
मेरी आत्मा का दूसरा हिस्सा टूटा
मेरी हड्डियों से मिलकर
बेटा बन गया
ओ जादूगर दुनिया के!
एक जादू का श्रेय तो
तुमने मुझे भी दिया
मैं इस जादू के बदले
क्या दूँ तुम्हें?
न दे पाउंगी वैसा अनमोल कुछ
जैसा तुमने मुझे दिया
क्योंकि माँ बनाकर तुमने तो मुझे
छोटा ईश्वर बना दिया!

ढूँढ़ती रही हूँ अब तक

आज तक तो ढूँढ़ती ही रह गई वैसे शब्द
जो हो सकते थे तुम्हारी ममता और
छोह के बराबर
पर मिले नह़ीं

अब तक ढूँढ़ रही हूँ वे पेन्सिलें
जिनसे बना सकूँ माँ!
तुम्हारी मोटी-मोटी आँखें
पूरी दुनिया में जो थीं
अपनापन की पहली और सच्ची पहचान
अटूट प्यार के बोल छुपाये
तुम्हारे ओठ
बुखार में दवा की गोली
और पानी का गिलास थमाते हुए
पिता! तुम्हारे वे हाथ
रात-दिन अपने बच्चों के लिए व्यस्त
तुम दोनों की कायाएँ!

वे स्वेटर बुनते
फल काटते
और अपने हाथ का अनोखा स्वाद वाला
खाना परोसते
माँ! तुम्हारे दो कोमल हाथ
हम सबके भविष्य के सपने देखतीं
पिता! तुम्हारी कभी चमकतीं
तो कभी धुंध से भरी आँखें!
अपने जादुई शब्दों से
हमारी बाँहों को पंखों में तब्दील करते
और हमारे लिए एक अछोर आकाश रचते
पिता तुम!

कहाँ मिलीं वैसी पेन्सिलें
जिनसे उकेर पाती यह सब?
अब तक खोजती रह गई वे रंग
जिनमें हल्का—सा भी
अक्स दिखाई देता तुम्हारा
अब करूँ क्या?
इसीलिए बैठी रह गई हूँ
हाथ में थिसारस, पेन्सिल और ब्रश लिये

लड़की

गर्मी की धूप में
सुर्ख़ बौगेनवीलिया की
एक उठी हुई टहनी की तरह
वह पतली लड़की
गर्म हवा झेलती
साइकिल के पैडल मारती
चली जा रही है
वह जब भी निकलती है बाहर
कालेज के लिए
कई काम हो जाते हैं
रास्ते में दवा की दुकान है
और डाकघर भी
काम निबटाते और वापस आते
देर हो जाती है अक्सर
सवेरे का गुलाबी सूरज
हो जाता हे सफेद तब तक तपकर
रोज ही करती है सामना लू का
उसे अपना रास्ता मालूम है
अब रास्ते में जो मिले
छाँह की उम्मीद उसे नहीं रहती है
धूप के लिए लड़की
हमेशा तैयार रहती है

किन्नर

किसी तरह अस्तित्व-रक्षा में लीन
ठिकाना मालूम नहीं है अपना
कभी रेलगाड़ी में
कभी चौराहे पर
तो कभी किसीके द्वार पर
हर जगह दिख जाती हैं
उनकी फैली हथेलियाँ
ओठों पर याचना है
बीत जाएगी इसी तरह उम्र इनकी

दु: ख नहीं है इनके लिए किसीको
न किसीके पास समय है
इनके लिए कुछ सोचनेका
परंतु
इन्हें समाज से बहिष्कृत करने के लिए
समय भी था
और ताकत भी थी
समाज क्रूर बन गया
तो माता-पिता भी पत्थर
जिन्होंने जन्म देकर त्याग दिया

क्या है पहचान इनकी?
सृजनहार की गलती का
और समाज के अन्याय का
फल भोगते हुए वे
भटक रहे हैं कहाँ-कहाँ?

पता खो गई चिट्ठियोंकी तरह
कोई गंतव्य नहीं है इनका
गौर से देखो
वे बिना पते की
फाड़ी गई चिट्ठियाँ हैं
एक अदृश्य डस्ट बिन में

परिदृश्य

गाड़ी जब रुकेगी जाम में
या लाल बत्ती पर
तो आयेगा कोई साँवला—सा लड़का
शीशा साफ करेगा
हमारे रोकने पर भी नहीं रुकेगा
और फिर पारदर्शी दीवार के बाहर
खड़ा रहेगा दो क्षण
पैसे न मिलने पर गिड़गिड़ायेगा
धीमे स्वर में
जैसे मंत्र पढ़ रहा हो
फिर भी यदि हम अंधे-बहरे बने बैठे रहे
तो वह निर्लिप्त—सा
चल देगा किसी दूसरी गाड़ी की ओर
वहाँ फिर यही सब दुहरायेगा
एक कमजोर औरत आयेगी
कमर पर एक दुधकट्टू नंगा बच्चा लिये
अपने मुँह पर
अपनी पाँचों उंगलियाँ जोड़ेगी कौर की तरह
बच्चे को दिखा-दिखाकर
हाथ पसार देगी
बाजार में चलते हुए
कोई बच्चा मिलेगा
काला, मैला, दुर्बल और फटेहाल
“बाबू खाने के लिए पैसे दो”
आगे बढ़ने पर कूड़े का ढेर मिलेगा
उस पर दो जीव दिखाई देंगे
कुछ सूँघते हुए कुत्ते
और कचरे बीनते हुए बच्चे
गाड़ियाँ चली जायेंगी अपनी राह
लोग चले जायेंगे अपने घर

चले आये थे समीप 

पानी की तलाश में चोंच खोलकर घूमते
थके-हारे पक्षी की तरह
दिन का वह कुम्हलाया तीसरा पहर भी
तपते-हाँफते दिन—सा
सूना और सन्नाटा था
एकाएक न जाने कैसे खो गयी थी
दुनिया की सारी आवाजें

धूप रहते हुए भी न जाने कैसे
सारी आकृतियाँ गायब हो गई थीं
तभी कई भूले-बिसरे दर्द
वृद्ध परिजनों का रूप धर-धरकर
ऐलबम के पुराने
ब्लैक ऐंड व्हाइट चित्रों की तरह
निकल-निकलकर चले आये थे
मेरे समीप
और बैठ गये थे
मेरे मन के दालान में

उनका इस तरह बैठ जाना अपने पास
उनके अपनेपन की गंध का
इस तरह पसर जाना चारोंं ओर
अचानक बहने लगा था नीला पानी
आकाश की तरह तन जाने का दर्द
भोग रही थी मैं

वे मेरे पास रहते हुए भी इतने दूर थे
कि मैं उनके हाथ अपने हाथों में
नहीं ले सकती थी
वे न जाने क्या कह रहे थे
मैं सुन नहीं पा रही थी
यह नजदीकी क्या होती है
जब दूरी एक सृष्टि-भर की हो?
वे तो थे मेरे चारोंं ओर
पर मैं उनसे कुछ कह-सुन नहीं सकती थी

यह मेरे जीने की यंत्रणा है
और न जाने कैसे
आनंद भी यही है
कि बार-बार उन्हें देखकर
दुर्घटनाग्रस्त और लहूलुहान होकर भी
मैं उन्हें अपने सीने में बसाये रखना चाहती हूँ

सृजन का अँधेरा 

एक शिशु को जन्म लेने के बाद
मिलती है यह रोशनी की दुनिया
तब वह जीना शुरू करता है
सूरज के उजाले में
वही आधार है जीवन का
हमारी साँसों का मालिक वही
रात-दिन का निर्माता
पूरी सृष्टि को गढ़ने वाला
लेकिन सूरज की रोशन दुनिया से
अलग है कोख की अँधेरी कोठरी
माँ गढ़ती है अपने शिशु को
कला-कक्ष के अंधकार में
यह अँधेरा सर्जन का अँधेरा है
जो बड़ा है रोशनी से
जिसे यह नहीं मिलता
उसे सूरज भी
ज़िन्दगी का उजाला दे नहीं सकता।

मैंने प्यार बाँटा 

मेरे पास प्यार था
जो मैंने बाँटा
फूलों और तितलियों को
जमीन, आसमान और बादलों को
हवा और चिड़ियों को
पहाड़ों, नदियों और झरनों को
एक-एक दूब
और एक-एक ओस-बूँद को
धूप-किरणों और पत्तियों को
दूब पर रेंगते घोंघे और भृंग को
कुत्तों, बकरियों और हिरनों को
गाय, भैंसों और घोड़ों को
उदास चेहरोंं और बच्चों को
और भी न जाने किस-किस को
सबको बाँटते-बाँटते भी
खत्म नहीं हुआ है प्यार
अब तक ज्यों-का-त्यों है
ताज्जुब है
अब तक, जबकि
दिन चल दिया है सोने

कलम दौड़ी जा रही है

जनवरी का महीना है
आधी रात से ऊपर का वक्त
सन्नाटा लगा रह है गश्त
झन्न बोल रही है उसकी सीटी
इंसान जड़ हो गया है बिस्तर में
पेड़ों की पत्तियाँ भी जमकर
काठ हो गई हैं
ठंड के बिच्छुओं के अनगिनत डंकों से
सड़क हो गई है अचेत

नीली चादर पर
दुधिया झीनी मशहरी में
चाँद सोया हुआ है
गहरी नींद में

जाग रही है तो बस एक बेचैन कलम
जो लगातार भागी जा रही है
ऐम्बुलेंस की तरह
शब्दों का बजाती हुई हार्न
और चीखती हुई
क्योंकि उसे बचाना है जीवन

जब तक कलमें दौड़ रही हैं
तब तक एक-एक जान है अनमोल
भरोसा रखो उन कलमों पर
जो सोती नहींं
अभी भी कितनी आँखों में नमी है
और कितने हाथ सक्रिय हैं
किसीको सँभालने के लिए
यह सब इसलिए कि
कलमें जाग रही हैं

तुम्हारा चाँद, मेरा चाँद

एक चाँद तुम्हारी खिड़की के आसमान पर है
जो तुम्हें बेहद प्यारा लगता है
जिसे देखकर तुम्हें
तुम्हारी प्रेमिका याद आ जाती है

एक चाँद
मेरे भी खुले आसमान पर है
पर उसे देखकर
भुखमरी के इस मौसम में
मेरे मुँह से
एक ही शब्द निकलता है- ‘रोटी’
मुझे रोटी याद आती है

चाँद को चाँद कहने के लिए
ज़रूरी है पेट में रोटी का होना

चाय का मग्गा

यह चाय का मग्गा
कितना प्यारा है!
मन करता है चूम लूँँ इसे
(वह तो करती ही हूँ चाय पीते हुए)
कितना अपना लगता है यह!
कि जब मैं थकती हूँँ
यह चला आता है मेरे पास
मेरी थकान दूर करने
जब भी लिखते-लिखते
थकती हैं उंगलियाँ
चिकमिक करने लगती है नज़र
और आँखें बंद होने लगती हैं
लपककर भागती हूँ किचेन में
बनाती हूँ चाय
और ढाल देती हूँ इस उजले मग्गे में
फिर कुछ क्षणों के लिए
यह मग्गा होता है मेरे साथ
और मैं रहती हूँ इसको लिए हाथ
हाय रे मग्गे!
तेरी जय हो!

कोई चुरा रहा है

कोई चुपके-चुपके चुरा रहा है
हमारा समय
रोटी की तरह खाता है हमारा वक्त
सूती कपड़े की तरह तंग हो गये हैं
हमारे दिन-रात
हमारा वजूद समा नहीं रहा उसमें
गरीब की चादर बन गया है वक्त
सिर ढँको तो पाँव नंगे
पाँव ढँको तो सिर

वे हाथ कहाँ दिखाई देते हैं
जो नचा रहे हैं हमें?
हम कठपुतलियाँ हैं बेशक
क्योंकि नाच रहे हैं
पर काठ के नह़ीं बने हम
हम जीवित हैं
साँसें चल रही हैं हमारी
हमारे हाथ-पैर भी चल रहे हैं
दिल और दिमाग भी
पर सब चल रहे हैं
किसी और के इशारे पर

हम बँधुआ मजदूर हैं
बाजार के गुलाम
जो सिर्फ़ विस्तार चाहता है
और दुनिया में कुछ नह़ीं
किसीका वजूद नह़ीं
सब बेजान-बेकार!

नेपथ्य में 

ढाबे में,
कुर्सियों पर बैठे
सैकडों लोग अपनी भूख मिटा रहे हैं

वहीं नेपथ्य में कुछ बच्चे
अपनी छोटी-छोटी देहों से
लगे हुए हैं कामों में

छोटे-छोटे हाथ
बड़े हाथों को मात देते हुए
फुर्ती से नाच रहे हैं
काँच के गिलासों से
गिर रहा है भूरा पानी

खाने की उम्र में खिलाने का काम करते हुए
दिन-भर में सैकड़ों लोगों की थालियाँ धोते हैं
फेंकते हैं सब्जियों की अनखायी फाँकें
भात के-दाने
नालियों में

जाड़े में उनके पैर
पावरोटियाँ बन गये हैं
छिद्रयुक्त
मुँह से लेकर पैर तक, पूरी देह
अँधेरे में डूब गई है

टेबुल पर नाश्ता देते हुए
प्लेटों से चिपकी हुई हैं उनकी नजरें
जो लाख खींचने से भी छूटती नहीं
तश्तरियों के साथ
अपनी दृष्टि भी छोड़कर
वहीं मेज पर
वे वापस गायब हो जाते हैं नेपथ्य में

इन बच्चों की आँखों में
कोई सपना नहीं है
इनकी देह पर खड़ी है
हमारी दुनिया!

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