अंशु मालवीय की रचनाएँ

अकेले … और … अछूत

… हम तुमसे क्या उम्मीद करते
बाम्हन देव!
तुमने तो ख़ुद अपने शरीर के
बायें हिस्से को अछूत बना डाला,
बनाया पैरों को अछूत
रंभाते रहे मां … मां … और मां
और मातृत्व रस के
रक्ताभ धब्बों को बना दिया अछूत
हमारे चलने को कहा रेंगना
भाषा को अछूत बना दिया
छंद को, दिशा को
वृक्षों को, पंछियों को
समय को, नदियों को
एक-एक कर सारी सदियों को
बना दिया अछूत
सब कुछ बांटा
किया विघटन में विकास
और अब देखो बाम्हन देव
इतना सब कुछ करते हुए
आज अकेले बचे तुम
अकेले … और … अछूत.

वास्‍तविक जीवन की भाषा 

हम गांव
अव‍धी बोलते थे
पढ़ते हिन्‍दी में थे,
शहर आए तो
हिन्‍दी बोलने लगे
और पढ़ने लगे अंग्रेज़ी में.
रिश्ते-नाते
दरद-दोस्त हिन्‍दी में
कागज-पत्तर बाबू-दफ़्तर
सब अंग्रेज़ी में;
बड़ा फ़र्क हो गया हमारे वास्‍तविक जीवन की भाषा
और बौद्धिक जीवन की भाषा में.

वे प्रचार करते थे हिन्दी में
हम वोट देते थे
रोज़मर्रा की जिन्दगी की चिन्‍हानी पर,
वे करोड़ों के खर्च पर चलने वाली संसद में
चंद लोगों की भाषा बोलते थे,
बड़ा फ़र्क है गण और तंत्र की भाषा में.

हम काम करते हैं,
एक हाथ को पड़ती है दूसरे की ज़रूरत,
हर हाथ बोलता है करोड़ों हाथों की भाषा में,
जिस भाषा में बनती है उत्पादन की सामूहिक कविता
जो कुछ लोगों के फ़्रेम में जड़ दी जाती है.
स्वतंत्रता और विविधता के पक्षधर
हज़ारों लाखों भाषा-बोलियों को मार कर रचते हैं
अन्‍तर्राष्‍ट्रीय भाषा.

बड़ा फ़र्क है पैदा करने और खाने की भाषा में
‘हैय्या हो’ बाहर बैठा दिया जाता है दरवाज़े के
और अघाई हुई डकारें
हमारी वास्‍तविक राष्‍ट्रभाषा बन जाती हैं.

वैष्‍णव जन

वैष्णव जन
आखेट पर निकले हैं!
उनके एक हाथ में मोबाइल है
दूसरे में देशी कट्टा
तीसरे में बम
और चौथे में है दुश्‍मनों की लिस्‍ट.

वैष्‍णव जन
आखेट पर निकले हैं!
वे अरण्‍य में अनुशासन लाएंगे
एक वर्दी में मार्च करते
एक किस्म के पेड़ रहेंगे यहां.

वैष्‍णव जन
आखेट पर निकले हैं!
वैष्‍णव जन सांप के गद्दे पर लेटे हैं
लक्ष्‍मी पैर दबा रही हैं उनका
मौक़े पर आंख मूंद लेते हैं ब्रह्मा
कमल पर जो बैठे हैं.

वैष्‍णव जन
आखेट पर निकले हैं!
जो वैष्‍णव नहीं होंगे
शिकार हो जाएंगे …
देखो क्षीरसागर की तलहटी में
नसरी की लाश सड़ रही है.

मैं बहुत खुश थी अम्मा! 

सब कुछ ठीक था अम्मा !
तेरे खाए अचार की खटास
तेरी चखी हुई मिट्टी
अक्सर पहुँचते थे मेरे पास…!
सूरज तेरी कोख से छनकर
मुझ तक आता था।
मैं बहुत खुश थी अम्मा !
मुझे लेनी थी जल्दी ही
अपने हिस्से की साँस
मुझे लगनी थी
अपने हिस्से की भूख
मुझे देखनी थी
अपने हिस्से की धूप ।
मैं बहुत खुश थी अम्मा !
अब्बू की हथेली की छाया
तेरे पेट पर देखी थी मैंने
मुझे उन का चेहरा देखना था
मुझे अपने हिस्से के अब्बू
देखने थे
मुझे अपने हिस्से की दुनिया
देखनी थी।
मैं बहुत खुश थी अम्मा !
एक दिन
मैं घबराई…बिछली
जैसे मछली…
तेरी कोख के पानी में
पानी में किस चीज़ की छाया थी
अनजानी….
मुझे लगा
तू चल नहीं घिसट रही है अम्मा !
फ़िर जाने क्या हुआ
मैं तेरी कोख के
गुनगुने मुलायम अंधेरे से
निकलकर
चटक धूप
फिर…
चटक आग में पहुँच गई।
वो बहुत बड़ा ऑपरेशन था अम्मा।
अपनी उन आंखों से
जो कभी नहीं खुलीं
मैंने देखा
बड़े-बड़े डॉक्टर तुझ पर झुके
हुए थे
उनके हाथ में तीन मुंह वाले
बड़े-बड़े नश्तर थे अम्मा…
वे मुझे देख चीखे !
चीखे किसलिए अम्मा…
क्या खुश हुए थे मुझे देख कर
बाहर निकलते ही
आग के खिलौने दिए उन्होंने
अम्मा !
फ़िर मैं खेल में ऐसा बिसरी
कि तुझे देखा नहीं…
तूने भी अन्तिम हिचकी से सोहर
गाई होगी अम्मा !
मैं कभी नहीं जन्मी अम्मा !
और इस तरह कभी नहीं मरी
अस्पताल में रंगीन पानी में
रखे हुए
अजन्मे बच्चे की तरह
मैं अमर हो गई अम्मा !
लेकिन यहाँ रंगीन पानी नहीं
चुभती हुई आग है !
मुझे कब तक जलना होगा …..अम्मा !!!

हम मांस के थरथराते झंडे हें 

देखो हमें
हम मांस के थरथराते झंडे हैं
देखो बीच चौराहे पर बरहना हैं हमारी वही छातियाँ
जिनके बीच
तिरंगा गाड़ देना चाहते थे तुम
देखो सरेराह उघडी हुई
ये वही जांघे हैं
जिन पर संगीनों से
अपनी मर्दानगी का राष्ट्रगीत
लिखते आए हो तुम
हम निकल आयें हैं
यूं ही सड़क पर
जैसे बूटों से कुचली हुई
मणिपुर की क्षुब्ध तलजती धरती

अपने राष्ट्र से कहो घूरे हमें
अपनी राजनीति से कहो हमारा बलात्कार करे
अपनी सभ्यता से कहो
हमारा सिर कुचल कर जंगल में फैंक दे हमें
अपनी फौज से कहो
हमारी छोटी उंगलियाँ काटकर
स्टार की जगह लगाले वर्दी पर
हम नंगी निकल आयीं हैं सड़क पर
अपने सवालों की तरह नंगी
हम नंगी निकल आयीं हैं सड़क पर
जैसे कड़कती है बिजली आसमान में
बिल्कुल नंगी…….
हम मांस के थरथराते झंडे हें

निजी जीवन का राजनैतिक रेखाचित्र

इकहत्तर की लड़ाई के वक्त
पैदा हुआ में
स्कूल गया
इमरजेंसी में,
मस्जिद गिरने के साथ
गया विश्वविद्यालय
नई आर्थिक नीति के साथ
बाहर आ गया वहां से,
फिलहाल बेरोजगार हूँ
और किसी बड़ी राजनीतिक घटना में
रोज़गार तलाश रहा हूँ।

हिंदू राष्ट्र के शहीदों के प्रति

जहाँ जली वह ट्रेन
उसके अगले स्टेशन पर हिंदू राष्ट्र था।

जैसे विश्व विजय थी
कारगिल के उस पार
हालांकि अभी मंज़ूर नहीं थी अमेरिका को

वैसे ही जैसे
अमेरिका और अम्बानी दोनों को मंज़ूर नहीं था
फिलहाल हिंदू राष्ट्र

जले दुधमुंहे बच्चे
अभी जिन्हें हिंदू बनाया जाना था
जली वे औरतें
जो धरम के कारखानें में
दिहाड़ी मजदूर थी
जले वे बेचारे पुरूष
जिन्हें ठोक-पीट कर मर्द बनाया जा रहा था।

जलते हुए इन मासूमों की चीख
राष्ट्रगान लगी
अगले स्टेशन पर बैठे लोगों को।

जिन्होंने ट्रेन में आग लगाई
उनका राष्ट्र पिछले स्टेशन पर छूट चुका था।

(गोधरा में मारे गए लोगों के लिए)

दोस्त 

आश्वसित
मुँह से क्या कहूँ,
मेरा तो पूरा वजूद
तेरे लिये शुभकामना है मेरे दोस्त !
तुझे क्या बताऊँ
कि बिना दोस्त के नास्तिक नहीं हुआ जा सकता –
समाज में असुरक्षा है बहुत,
आदमी के डर ने बनाया है ईश्वर
और उसके साहस ने बनाई है दोस्ती
तुझसे क्या क़रार लूँ,
तेरा पूरा वजूद ही
मेरे लिये आश्वस्ति है

बच्चा

कालीन कारख़ाने में बच्चे
कालीन कारख़ाने में बच्चे,
खाँस्ते हैं
फेफड़े को चीरते हुए
उनके नन्हें गुलाबी फेफड़े
गैस के गुब्बारों से थे,
उन्हें खुले आकाश में
उड़ा देने को बेचैन –
मौत की चिड़िया
कारख़ानों में उड़ते रेशों से
उनके उन्हीं फेफड़ों में घोंसला बना रही है ।
ज़रा सोचो
जो तुम्हारे खलनायकीय तलुओं के नीचे
अपना पूरा बचपन बिछा सकते हैं,
वक्त आने पर
तुम्हारे पैरों तले की ज़मीन
उड़स भी सकते हैं ।

हम तुमसे क्या उम्मीद करते

हम तुमसे क्या उम्मीद करते

…हम तुमसे क्या उम्मीद करते
ब्राम्‍हण देव!
तुमने तो खुद अपने शरीर के
बाएं हिस्से को अछूत बना डाला
बनाया पैरों को अछूत
रंभाते रहे मां…मां और मां,
और मातृत्व रस के
रक्ताभ धब्बों को बना दिया अछूत
हमारे चलने को कहा रेंगना
भाषा को अछूत बना दिया
छंद को, दिशा को
वृक्षों को, पंछियों को
एक-एक कर सारी सदियों को
बना दिया अछूत
सब कुछ बांटा
किया विघटन में विकास
और अब देखो ब्राम्‍हण देव
इतना सब कुछ करते हुए आज अकेले बचे तुम
अकेले…और…अछूत !

…संतानें हत‌‍भागी

जब से भूख तुम्हारी जागी
धरती बिकी
बिकी धरती की संतानें हत‌भागी
पांड़े कौन कुमति तोहे लागी !

धरती के भीतर का लोहा
काढ़ा, हमने तार खिंचाए
तार पे फटी दिहाड़ी लटकी
बिजली की विरुदावलि गाए
जब से भूख तुम्हारी जागी
लोहा बिका
बिकी लोहे की संतानें हतभागी !
पांड़े कौन कुमति तोहे लागी !

धरती के भीतर का पानी
खींचा हमने खेत सधाए
पानी बंधुआ बोतल में
साँस नमी की घुटती जाए
जब से भूख तुम्हारी जागी
पानी बिका
बिकी पानी की संतानें हतभागी
पांड़े कौन कुमति तोहे लागी !

धरती के भीतर का कोयला
खोदा और फ़र्नेस दहकाए
चिमनी ऊपर बैठ के कोयल
कटे हाथ के असगुन गाए
जब्से भूख तुम्हारी जागी
कोयला बिका
बिकी कोयले की संतानें हतभागी
पांड़े कौन कुमति तोहे लागी !

करमन की गति न्यारी

करमन की गति न्यारी

कर्ज़ की हमको दवा बताई
कर्ज़ ही थी बीमारी
साधो !
करमन की गति न्यारी ।
गेहूँ उगे शेयर नगरी में
खेतों में बस भूख उग रही
मूल्य सूचकांक पे चिड़िया
गाँव शहर की प्यास चुग रही
करखानों में हाथ कट रहे
मक़तल में त्यौहारी
साधो !
करमन की गति न्यारी ।
बढ़ती महंगाई की रस्सी
ग्रोथ रेट बैलेन्स बनाए
घट-बढ़ के सर्कस के बाहर
भूखों के दल खेल दिखाए
मेहनत-क़िस्मत-बरकत बेचें
सरकारी व्योपारी
साधो !
करमन की गति न्यारी ।
शहर-शहर में बरतन मांजे
भारत माता ग्रामवासिनी
फिर भी राशनकार्ड न पाए
हर-हर गंगे पापनाशिनी
ग्लोबल गाँव हुई दुनिया में
प्लास्टिक की तरकारी
साधो !
करमन की गति न्यारी !

मार्खेज को डिमेंशिया हो गया है

मार्खेज को डिमेंशिया हो गया है।
जीवन की उत्ताल तरंगों के बीच गिर-गिर पड़ते हैं
स्मृति की नौका से बिछल-बिछलकर;
फिर भरसक-भरजाँगर
कोशिश कर बमुश्किल तमाम
चढ़ पाते हैं नौका पर,
उखड़ती साँसों की बारीक डोर थाम।
जिसे इनसानियत का सत्व मानते हैं वह
वही स्मृति साथ छोड़ रही है उनका
विस्मृति के महाप्रलय में
निरुपाय-निहत्था है हमारा स्मृतियोद्धा अब।
सामूहिक स्मृतिलोप के शिकार
माकोंडो गाँव के निवासियों की तरह
चलो हम उनके लिए चीजों पर उनके नाम लिख दें –
देखो ये बिक चुकी नदी है
ये नीलाम हो चुके पर्वत
अपने अस्तित्व ही नहीं
हमारी यादों के भी कगार पर जी रहे पंछी
ये हैं अवैध घोषित हो चुकी नस्लें
ये हैं हमारे गणराज्य
बनाना रिपब्लिक के संवैधानिक संस्करण
ये है तुम्हारा वाइन का गिलास
ये कलम, ये कागज और ये तुम हो
हमारे खिलंदड़े लेखक गेब्रिएल गार्सिया मार्खेज !
ये यादें ही तो हैं
जिन्होंने नाचना और गाना सिखाया
सिखाया बोलना और चलना
सिखाया जीना और बदला लेना,
लामकाँ में घर बनाना सिखाया
हमारे विस्थापित मनों को
हमें और किसी का भरोसा नहीं स्मृति यात्री!
धर्म ने हमारा सत्वहरण कर लिया
विज्ञान ने तानाशाहियों की दलाली की
विचारधाराओं ने राष्ट्रों के लिए मुखबिरी की
इतिहास ने हमारी परछाइयाँ बुहार दीं
हमें यादों का ही भरोसा है,
अब वह भी छिनी जाती है
बगैर किसी मुआवजे के हमारी जमीनों जैसी।
यादें जमीन हैं
आसमान के बंजरपन को
अनंतकाल से कोसती हुई।
हमारी नाल कहाँ गड़ी है?
माँ जैसे लोरी सुनाने वाले सनकी बूढ़े!
कब से यूँ ही विचर रहे हो धरती पर
हमारे प्रसव के लिए पानी गुनगुना करते,

थरथराते हाथों से दिए की लौ पकड़े हुए स्मृति धाय! हमारी नाल कहाँ गड़ी है?
कैसी हैं हमारी विच्छिन्न वल्दीयतें!
कैसे हैं इनसानियत के नकूश!
हमारे गर्भस्वप्न कैसे हैं?
किन तितलियों के पंखों में छुपे हैं
हमारे दोस्त फूलों के पुष्प पराग…!
किससे पूछें
तुमसे तो खुद जुदा हो चली हैं स्मृतियाँ
स्मृति नागरिक !
मछलियों की रुपहली पीठों पर ध्यान लगाए
पानी के ऊपर ठहरे जलपाखियों की एकाग्र साधना से पूछें,
पूछें पानी से सट कर उड़ते बगुलों की पंख समीरन से,
जमुना के गंदले पानी में टूटकर बिखरे
सूरज की किरचों से पूछें,
पूछें मरीचिका के संधान में मिथक बनते मृगों से,
डेल्टावनों की सांघातिक मक्खियों से पूछें
या पूछें अभयारण्यों में खाल के व्यापारियों से
अभय की भीख माँगते बाघों से,
अपने खेत में अपने पोसे हुए पेड़ की डाल से खुदकुशी करते
किसान के अँगोछे की गाँठ से पूछें,
या बंद कारखाने के अकल्पनीय अकेले चौकीदार से पूछें,
फ्लाई ओवर के नीचे गड़गड़ाहट से उचटी नींदों से पूछें
या पूछें सीवर से निकलती कार्बन मोनो ऑक्साइड से
किस उपनिषद- किस दर्शन के पास जवाब है इन सवालों का
सिवाय यायावर यादों की एक तवील यात्रा के
हमें हमारी गड़ी हुई नालों के स्वप्न क्यूँ आते हैं?
हमारे ज्ञानी ओझा!
हम सब डिमेन्शिया में जा रहे हैं मार्खेज!
अपने उचटे हुए हाल और बेदखल माजी के बीच झूलते
किसी और का मुस्तकबिल जीने को अभिशप्त;
ये किन अनुष्ठानों का अभिशाप है?
कि शब्द अपने अर्थ भूलते जा रहे हैं
भूलती जा रही हैं साँसें अपनी लय
खिलौने सियासत करने लगे हैं
साज लड़ने लगे हैं जंग
जिस्मफरोशी कर रही हैं रोटियाँ
और हम हथियारों का तकिया लगाने को मजबूर हैं!
हम सब डिमेन्शिया में जा रहे हैं मार्खेज
और हम इसे अलग-अलग नामों से पुकार रहे हैं
विकास, तरक्की, साझा भविष्य… या
या इतिहास गति की वैज्ञानिक नियति?
विज्ञान और नियति
माई गुडनेस!
मार्खेज तुम्हें डिमेन्शिया हो गया है और
इससे पहले कि यादों से पूरी तरह वतन बदर हो जाओ
एक बार जरूर हमारे लिए चीजों पर नाम की चिप्पियाँ लगाना
मसलन-
ये हैं यादें
ये है आजादी और
ये है लड़ना
यादों के छोर तक लड़ना!

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