अंशु हर्ष की रचनाएँ

फुहारे

आसमान से बरसता पानी
कभी तेज़ कभी रिमझिम …
सुखद अहसास है …
ठंडी हवाओं का चलना
और बालकनी में बैठ
फुहारों से खेलना
लेकिन उसी पल याद आती है
कुछ ऐसे लोगों की
जिनके सर पर है खुला आसमान
और खुली सड़के ही है जिनकी बालकनी
क्या वह भी खेलते है इन फुहारों के साथ या

ये फुहारे खेल जाती है उनकी ज़िन्दगियो से

बस की बात

हवा कि तेज़ सरसराहट से
शाख से अलग हुआ पत्ता
इठलाता, झूमता
घूमता हुआ इधर उधर
बह चला नदी के पानी में
तैरता हुआ …बोला
ओह मुझे तैरना भी आता है …
यु ही टंगा था इतने दिनों से?
शाम ढले शाख ने आवाज़ दी …
लौट आओ …
पर पत्ता हुआ उदास
बोला नहीं रही अब ये
मेरे बस की बात

बीज

में सिक्का नहीं हूँ,
जो जेब से गिर कर, एक बार खनक कर रह जाऊंगा …
में वह नन्हा-सा बीज हूँ जो जमीन पर गिरा,
तो एक दिन बड़ा पेड़ बन कर,
तुम्हारी ज़िन्दगी को चिलचिलाती हुई धुप से बचा कर,
अपनी छाव में बेठऊंगा
में दोस्ती का वह बीज हूँ …
जो एक बार फल गया तो।
हर रिश्ते में जी कर दीखाऊंगा

में हूँ तुम्हारा दोस्त 

में नहीं दूंगा तुम्हे तुम्हारी हर समस्या का हल,
फिर भी सुनुगा तुम्हारे जज़्बात और
साथ बैठ निकालेंगे हल:

में नहीं बदल सकता तुम्हारे अतीत के पल और भविष्य के कहानिया
पर अभी हु तुम्हारे साथ इस पल:

में नहीं रोक सकता तुम्हारे कदमो को डगमगाने से,
सिर्फ दे सकता हूँ अपना हाथ संभलने के लिए:

तुम्हारी जिदगी के फैसले तुम्हारे अपने होंगे,
में दूंगा उन्हें सहारा, उत्सा ह और मदद
जब तुम चाहोगे:

में नहीं रोक सकता तुम्हारे दिल को टूटने से,
पर तुम्हारे पास हूँ तुम्हे सहारा देने और उन टुकडो को जोड़ने के लिए:

मेरी दोस्ती के तुम्हारे जीवन में कोई बंदिशे नहीं होगे,
में नहीं चाहता तुम उन बेडियों में उलज जाओ,
सिर्फ जियो मेरे साथ उत्साह उमंग और बिना शर्तो के साथ:

में नहीं बता सकता कोंन हो तुम
पर में हूँ तुम्हारा दोस्त एक सुल्ज़ी हुई दोस्ती के साथ

माँ 

माँ, कैसी होती है,
कोई कहता है सागर जैसी कोइ कहता आकाश जैसी,
कोई कहता धुप में छाया जैसी,
या रेगिस्तान में पानी की बूँद जैसी
लेकिन में इन सबको नहीं जान पाता हूँ …
में माँ का छोटा बच्चा हूँ, सिर्फ माँ को पहचान पाता हूँ
मेने माँ को देखा है माँ ऐसी होती है …
जो मुझे खिलाती है, पिलाती है लोरी गाकर सुलाती है,
सारे घर का काम छोड़कर मेरा दुलार करती है,
रात को जब में रोता हूँ तो सीने से लगाकर सुलाती है
दिन भर जब खेल करता हूँ तो सारी थकान भूल जाती है
अपने जीवन का सबसे कीमती “वक़्त” मुझे देती है
माँ सबसे सरल है इस दुनिया में तभी तो
सबसे पहले माँ बोल पाता हूँ
माँ सिर्फ़ माँ है कोई उपमा कि नहीं दे पाता हूँ
में छोटा-सा बच्चा हूँ, सिर्फ़ माँ को ही जान पाता हूँ

बेटियाँ

इश्वर का अप्रतिम उपहार है बेटियाँ

माँ के सुख दुःख की राजदार है बेटियाँ
पिता कि तरक्की का आगाज है बेटियाँ

भाई के आँगन की चहचहात है बेटियाँ

सीने में धडकते दिल का अरमान है बेटियाँ
पूनम कीरात बिखरती चांदनी है बेटियाँ

बगिया में खिले फूलो की महक है बेटियाँ
सागर में उठती चंचल तरंगे है बेटियाँ

सुना है वह घर का आँगन जिसके
पेड़ की डाली पर
चिड़िया-सी फुदकती ना हो बेटियाँ…

निंदा ओर आलोचना

जानता है ये मन की निंदा ओर आलोचना करना ग़लत है
पर फिर भी कभी किसी का अन अपेक्षित स्वभाव
मजबूर कर देता है निंदा करने को,
बात जबान से निकलती है लेकिन मन कहता है
ये निंदा नहीं आलोचना है
ओर शायद फर्क है निंदा ओर आलोचना में
शब्दों में निंदा का भाव बना देता है कुरुक्षेत्र का मैदान
टकरा जाता है अहम् ओर चूर हो जाते है रिश्ते नाते
लेकिन आलोचना का अर्थ होता है
उस सत्य की खोज जो कभी कभी
छुपी रह जाती है

क्यों नहीं स्वीकारते हम

क्या जीवन उचित है पानी जैसा
कहने को शीतल जल
पर तेज बहाव ले जाता है
मानवता ओर शीतलता।
यु तो बेरंग पानी
पर हर रंग में घुल जाये
शायद सीखाता है,
हर परिस्थिति में सामंजस्य बैठाना।
जब मंजिल नजर आती है तो
राह में चाहे चट्टान आये या मैदान
बना लेता है अपनी राह सबको चीरते हुए।
कुछ गुण ओर कुछ अवगुण
पर स्वीकार्य है सभी को
ओर यही कहा जाता है
जल है तो जीवन है।
फिर क्यों नहीं स्वीकारते हम
अपनों को अवगुणों के साथ?

आत्मविश्वास

तुम्हारा रूठना, फिर चुप हो जाना

अच्छा लगता है, क्योकि तुम जानते हो
में फिर से तुम्हे मना लूंगी,

इसी आत्मविश्वास के साथ
हर बार रूठ जाते हो

तुम्हारा आत्मविश्वास
खुद पर है या मेरे प्यार पर?

ये जीवन

ये जीवन पतंग सा

रंग-बिरंगा, अजब अलबेला
कई रूप और कई रंग
कभी तेज हवा सहन करता
कभी तेज धुप

कही पेच उलझे तो कही कटी डोर
कोई काटने का जश्न मानता तो कोई उड़ने का
भूल कर ये बात की किसी दिन

डोर वाले हाथ ने चाहा
तो ज़िन्दगी जमीन पर आ जायगी
चाहे वह कागज़ की पतंग हो

जिसकी डोर है हमारे हाथ
और चाहे पंचतत्व की
जिसकी डोर आसमा वाले के हाथ …

बदलाव

वक़्त हमेशा चलता रहता है अनवरत
बिना रुके बिना थमे
कुछ भी तो स्थायी नहीं है जीवन में
ना खुशी ना ग़म
अब देखो ना
रोशनी का त्यौहार भी बीत गया
कितना शोर था, उसके आने का
सब कुछ नया-सा, रोशन
मिठास लिए व्यवहार
फिर अब वही अकेलापन
ज़िन्दगी का अलबेलापन
और मैं फिर से वक़्त के बीतने का
इंतज़ार करूँगा
अगला त्यौहार आये
उसके लिए फिर से नए सपने संजोउंगा
त्यौहार के बाद का सूनापन
अपने अंदर लिए
बीते हुए लम्हों से
मुस्कुराहटें आबाद रखने की कोशिश करूंगा।

खोया हुआ कुछ 

आँखों में जो गहराई तलाशते हो
वो अब यहाँ नहीं रहती
चेहरे की जिस मासूमियत की चाहत रखते हो
वो अब यहाँ नहीं रहती
जिन होठों पर शब्द हो मोहब्बत भरे
वो प्यार की गहराई
अब यहाँ नहीं रहती
जिसके बिखरते शब्द भी वही कहते है
जो दिल में नज़र आता है
वो खूबसूरत अनुभूति
अब यहाँ नहीं रहती
मत तलाश करों इस दुनियाँ में
अब सरलता की
वो खूबसूरत सादगी
अब इस दुनियाँ में नहीं रहती।

ज़िन्दगी का सुकून 

मेरी सरल सहज-सी दिखने वाली
ज़िन्दगी का सच बताती हूँ
टूट कर बिखर कर
मैं भी हर दिन मिट्टी में मिल जाती हूँ
फिर उसी मिट्टी से एक दिया बना
एक ज्योत लगाती हूँ
मुझे नहीं ज़रूरत रोशनी की
मेरे अपनों की राह में रख आती हूँ
फिर उसी माटी का एक कुल्हड़ बना
मसाले की चाय बना उसमें पी जाती हूँ
हर कड़वाहट ज़िन्दगी की
हर घूट के साथ निगल जाती हूँ
वो जो साथ देता है हर कदम पर
उस अदृश्य शक्ति को
आत्मसात किये जाती हूँ
माँ का सुर्ख़ कोमल गुलाब थी
इसीलिए तो अब काँटों पर
मुस्काती हूँ
कभी कभी बहुत थक जाती हूँ
ज़िन्दगी से
मैं भी एक सूकून भरी नींद चाहती हूँ

खामोश बातें

जब मेरी ख़ामोशी
तुम्हारी खामोशी से बात करती है
अनुभूतियों के सामने
शब्द कहाँ टिक पाते है
नर्म रुई के बादलों में
तुम्हारे नर्म दिल का अहसास है
उसी के बीच से आती हुई
सूरज की तेज किरणों मैं
तुम्हारी बातों का आक्रोश है
मंद चलती हुई हवा
जैसे तुम्हारी बात कह रही हो
सागर की लहर की हलचल में
तुम्हारा विशालता का स्वरूप है
अब बताओ कहाँ ज़रूरत है
हमारे साथ की
किसी बात की
चल रहे है ना अकेले
बिना मिले खामोशी से
और देखो कितनी कैफ़ियत
है इस ख़ामोश मिलन में

उलझनें 

संसार के कल्प वृक्ष पर
कांटों के साये में
मन की उलझनों के
कितने धागे बुने है
हर दिन पाने और खोने
के बीच मन की तड़पन के
अनगिनत तीर चुभे है
उलझता जाता हूँ
क़ायनात के धागों को लेकर
इस अजीब-सी कशमकश में
ये ना जाने कितनी सदियों की उलझने है

आखरी पड़ाव

कितनी शिद्धत से
हर जीवन में
एक घरौंदा
बनाते है हम
तिनका तिनका चुन
एक एक दीवार
सजाते है हम
क्यों चलता रहता है
ये सिलसिला
हर जीवन में
क्यों रूह का सफ़र
पार कर जाते है हम
इस बार पता नहीं मुझे
लेकिन ये अहसास है
अब मेरी रूह बूढ़ी है
और अब उसके जीवन के सफ़र का
आखरी पड़ाव है।

मन के पर 

पारदर्शी महीन और
अनगिनत जालों से बने
मन पर लगे पर
नज़र नहीं आते
लेकिन
उड़ान भरते है
अनंत आसमान की …

मन का द्वार 

मेरे मन का द्वार खुला रखा है
तुम्हारे लिए
क्योंकि मुझे पता है
एक दिन तुम आओगे
वैसे ही जैसे शबरी के राम आये थे
अहिल्या को फिर से एक रूप देने
तुम्हारें बिना पत्थर ही तो थी में
तुम्हारे साथ के अहसास भर से
देखो कितना भाव पूर्ण हो गया
मन मेरा …

गति 

मेरे मन की गति को देखो
चाँद के साथ ढलती है
और सूरज के साथ
फ़िर निकल पड़ती है
अनवरत …
बिना विराम
अब बताओ
चल सकते हो मेरे साथ
इस गति से
जिसपे चलकर
मैं पार पाना चाहता हूँ
हर अभिलाषा का …

अमृता

मुझे तुम मिले
तुम्हारी नज़रों से एक नयी दुनियाँ देखी
वो दुनियाँ जिसने मुझे ज़िन्दगी के
नए मायने बताये
एक रास्ते पर चल निकली मैं
जहाँ मुझे किसी के साथ की ज़रूरत नहीं
सच कहूँ तो तुम्हारी भी नहीं
क्योंकि मुझे
तुम्हारे शब्दों के सहारे
ये सफ़र तय करना है
और जानती हूँ मैं ये सफ़र मुझे
जीवन की उन गहराइयों में ले जायगा
जिसकी मुझे तलाश थी।

शब्दों की खनक 

जब मैं तलाशती हूँ
तुम्हारी खामोशी
और मेरी बातों के मायने
कल एक घुंघरू की झंकार
का ख़्याल मन में आ गया
वैसे ही तो तुम
उस घुंघरू के दाने जैसे
जिस दिन
मन के खोल से निकल जाओगे
शब्द खनखना छोड़ देंगे।

नया साल 

जब तुम मुस्कुरा दो
मेरे लिए तो वही नया साल है
जब तुम मेरी राहों में कदम बढ़ा दो
मेरे लिए वही नया साल है
जब तुम कह दो कि तुमसे जीवन है
मेरे लिए तो वही नया साल है
जब मुझे ये अहसास हो जायेगा कि
तुम्हारें जीवन का हर रंग मुझसे है
मेरे लिए वही नया साल है
जब तुम कह दोगे मुझे कि
तुम्हारें दिल की धड़कन मैं हूँ
बस मेरे लिए वही नया साल है …

तुम तक 

छोटा-सा मन अक्सर सोचता था
तुम ऊपर वाले हो
बादल में रहते हो
तुम्हे पाने का कौतुहल
सदा से रहा है मन में
यूँ तो अब
एकांत में अहसास हो तुम
फिर भी मचलते हुए
बाल सुलभ मन ने
देखो आज बादलो की पगडण्डी
बनवायी है तुम तक पहुँचने की।

तुम 

तुम्हें किस रिश्ते में बाँधू मैं
हर कदम पर एक
अलग अंदाज में दिखाई देते हो
तुम्हारे दिल में जो दर्द है
उससे परेशान तुम
कभी मुझे एक नन्हें से बच्चे नज़र आते हो
और में तुमसे अपने आपको बहुत बड़ा समझ
तुम्हारा सिर अपनी गोद में रख उसे
सहलाना चाहती हूँ
एक माँ की तरह
कभी तुम्हारी मोहब्बत भरी नजरों में
एक प्रेमिका बन में खुद को तलाशती हूँ
जब तुम बेबस और परेशान से बेचैन
अपने लडखडाते कदमों से चले जाते हो
एक दोस्त बन तुम्हारा हाथ थामना चाहती हूँ
और जब तुम अपने जीवन का अनुभव कहकर
राह दिखाते हो
तो यक़ीन मानो
मैं तुम्हारी बिटिया बन जाना चाहती हूँ …

तस्वीरें 

तस्वीरों की दुनियाँ
क्या है
बीते वक़्त की छुअन
जाते हुए लम्हों की खूश्बू
खुशनुमा मंज़र
जिसे हम क़ैद करना चाहते है
हमेशा के लिए हमारे पास
ताकि वह स्मृति बनी रहे
हमारे मानस पटल पर
याद कर सकें
उस वक़्त मौजूदा साथ को
उसके अहसास को
एक रोशनी की तेज आहट पर
मंज़र का क़ैद हो जाना
समय की चट्टानों पे
तराशा गया हो शिलालेख कोई

ज़िन्दगी के पल 

ज़िन्दगी के पल क्या है
क्या है हर साथ का मिलना
उम्र के अलग-अलग पड़ाव पर
महज घटनाएँ है जीवन की
जिनमें अपना किरदार निभाए
चले जाते है हम
सही ग़लत की उलझनों को
सुलझाते हुए
अपनों के साथ होने ना होने को
समझते समझाते हुए
बंधना नहीं है मुझे
किसी साथ से
कई घटनाओं को जीना है
ज़िन्दगी मानकर
जानकर उनके मिलने का उद्देश्य
ताकि बाधित ना हो मेरा मार्ग
किसी मोह से धागे से …

जानते हो

विचार कभी ठहरते नहीं है
चलते रहते है अनवरत
जीवन में आने के साथ ही
शुरू हो जाता है ये सिलसिला
विचारों के धागे उलझते जाते है
अंतर्मन में
खुद से बात करने लगते है हम
वो बात जो कोई दूसरा समझ नहीं सकता
खुद से कह लेते है हम
और कोई बात कहने से पहले एक शब्द
एक सम्बोधन देती हूँ मैं
जानते हो …
और फिर अपनी बात कह जाती हूँ
ये जानते हो का सिलसिला कब शुरू हुआ पता नहीं
लेकिन चलेगा जब तक मैं हूँ
जानते हो …
एक अहसास है जो
मेरा सबसे करीब है, सबसे अज़ीज़ है
ये सिर्फ़ अहसास है निराकार
उस अहसास का आकार रूप
वो जो कभी था ही नहीं …

बादल और पहाड़

बादल और पहाड़ों के बीच रहकर
मैंने कभी तुम्हें बादल बनाया
कभी में पहाड़ बनी
जब तुम्हें एक बादल के रूप में देखा
तो बरस रहे थे तुम गरज़ कर
पहाड़ पे लगातार
और जब मैं बादल बनी
तो पहाड़ के काँधे पे सहारा ले
उसे गले लगाया
उसे अपनेपन का अहसास कराया
दोंनो ही सूरत में
मैंने तुम्हें गरजते बरसते
पत्थर मन ही पाया…

रिश्ते

जानते हो कुछ रिश्तों की मुश्किल
उलझे है जलेबी जैसे
डूबे है मीठी चाशनी में भी
एक ने कहा पाव भर चाहिए
और दुसरा ढाई सौ ग्राम मांगता है…
स्वाद वही बात वही लेकिन
ज़िन्दगी है ना जलेबी जैसी
मीठी लेकिन उलझी हुई

सब तेरा

ये सूफ़ियाना अंदाज़
मुझे इतना मेरा लगता है…
कि उसे देख कर ऐसा लगता है
इस अंदाज को आत्मसात कर लूं मुझमें कहीं
ये अंदाज यही सिखाता है ना
ना पाने की खुशी ना खोने का गम
बहता चल ज़िन्दगी की रौ में
सब तेरा का भाव लिए…

तलाश

एक चाहत
हर कदम पर
रोशनी बिछाने की
तुम और मैं
उसी रोशनी पर चलकर
एक राह ढूंढते है
अपना आदि और अंत ढूंढने
की कोशिश करते
चले जाते है …

चाँद से बातें 

कल रात अचानक
एक दस्तक हुई मेरी पलकों पर
आँख खुली तो खिड़की के बाहर
बादल और चाँद के साथ का
सुहाना मंज़र बहुत सुंदर नज़र आ रहा था
देखा उसे नींद को रोक कई देर तक
जानते हो उस अधूरे चाँद में की मुस्कुराहट में
तुम्हारी मुस्कुराहट का अक्स नज़र आ रहा था
ख़्वाब नहीं था एक सच्चा अहसास था
एक सवाल खड़ा कर गया वो लम्हा
कि क्या याद का वो पल
मीलों दूर भी जिया जा रहा था ….
क्यों मुझे वो अधूरा चाँद बेवजह
तुम्हारी याद दिला रहा था

चाय

चाय का नींबू वाला स्वाद
अक्सर मुझे माँ की याद दिलाता है
जब भी फोन पे आवाज़ बैठी हुई होती है
तुरंत कहती है
नींबू चाय पी ले
और में मुस्कुरा कर
बना कर पी लेती हूँ
अब तो मेरी ज़िंदगी की
हर सुबह का हिस्सा हो गयी है
नींबू की चाय
कड़क काली मिर्च
मीठा शहद
खट्टा नींबू
और थोड़ा सा नमक
ज़िन्दगी के अलग अलग स्वाद का अनुभव
जिसमे याद है एक फिक्र की
जिसमें ताकत है
ज़िन्दगी से रु ब रु हो कर
सामना करने की
बिल्कुल खट्टी मीठी
ज़िन्दगी के स्वाद सी
नींबू वाली चाय

चिड़ियाँ

एक चिड़िया की काँटों भरी डगर
यूँ तो पँख है उस राह को पार करने को
लेकिन मन का एक तार जुड़ा है इस
डाल की राह से
मोह के धागे बंधे है
इस डाल के हर कोने से …
सारा कुसूर उस सागर का है
जिसकी उफ़ान खाती हुई लहरों पे चल
एक दूसरी डाल आ कर रुकी थी
इसी नन्ही चिड़िया के लिए …

अमावस

खुले आसमान के नीचे बैठ
अभी ख्याल आया
तुम्हें कहुँ ….
मुझे आज का चांद चाहिए
तलाशा आसमान में
फिर याद आया
आज अमावस है ….
बस ऐसा ही होता है अक्सर ….
हर चाहत के साथ …

एक थी ज़िन्दगी

ज़िन्दगी वो जगह है
जहाँ रहने के कई
क़ायदे कानून है
वहीं पेचीदा नियमों में
बंध जाती है ज़िन्दगी
जहाँ हमे लगता है
घुट गयी है साँसे
एक संघर्ष का अहसास होता है
कभी कभी गुस्सा बेहिसाब होता है
लेकिन जानते हो रूह का कोई नियम नही होता
चली जाती है अपनी रौ में
उड़ती हुई कही
जानती है वो भी कि
कोई अपना नही होता
प्यार जो खुद अधूरा शब्द है जीवन का
कोई क्या उसे पूरा कर पाएगा
करों तो इबादत करों
जीवन तभी सफल सार्थक हो पायेगा
मेरी रूह की राह आज़ाद है
उसे कोई कभी समझ भी न पाएगा
छोड़ दिया मैंने ज़िन्दगी को सोचना
बस कुछ जिम्मेदारियां है
जिन्हें ये जिस्म मरते दम तक निभाएगा।

प्रश्न चिन्ह 

ज़िन्दगी जीते हुए एक दिन अचानक
अहसास होता है कि
ये जो हाड़ मॉस का बना शरीर है
इसे चलाने के लिए एक रूह रहती है इसके अंदर
और उस रूह की कई परतें है
कई जन्मों का लेखा जोखा लिए
ये परतें खुलती जाती है उम्र के साथ
और हम प्रश्नचिन्ह लगाकर
उन लम्हों के आगे कई सवाल खड़े कर देते है
जवाब कुछ नहीं मिलता
मन की परतें जो कहती है
उसे मानते चले जाते है
यादें , आँसू , सपने , शब्द
सब उन्हीं परतों के बीच
खुद को उलझा पाते है
इन्हीं परतों के बीच ही तो
खुद के होने की वज़ह
समझ पाते है

मेरे अपने लम्हें 

कुछ लम्हें चुराना चाहता है मन
खुद के लिए
बिना कुछ सोचे
बिना कुछ कहे
जहां न आंखों की नमी हो
जब न मुस्कुराहट में कमी हो
जब न दिल उदास हो
जब न कोई आसपास हो
जब न खुद से कोई सवाल हो
जब न कोई नाउम्मीदी हो
जब उमंग उत्साह और ख़्वाब साकार हो
ज़िन्दगी सरल सहज और मेरी अपनी सी राह हो ….

ख़्वाब – 1 

कल रात
एक आहट सी हुई
दरवाज़े पर
देखा तो तुम थे
अपने चिर परिचित अंदाज़ में
मंद मुस्कुराहटें लिए
ना शब्द थे , ना बात हुई
ना ही पास बैठ मुलाकात हुई
तुम चाय पीना चाहते थे
और मैंने अपने एहसास का हर लम्हा
अदरक के साथ कूट कर
मिला दिया था उसमें
लेकिन ये क्या
तुम तो वहाँ नही थे
शायद एक अधूरा सा ख़्वाब था…..
अब यादें भी चाय के कप सी हो गयी है
तन्हा होते है तो ले कर बैठ जाते है

अलौकिक संसार

मृत्यु को जानने की कोशिश की है मैंने
उन तहों तक पहुँचने की कोशिश कई बार
की है मैंने
जो हमारे बंधनो की नींव है
उन परतों को अक्सर संभाला है मैंने
जहां कुछ अहसास जन्म लेते है
बिन वजह ….
कोई तो वजह होगी उनके होने की ?
इस बात की तपतीश की है मैंने
मृत्यु को करीब से देखा है
अपने अज़ीज़ को खो देने का डर
इसका भी अहसास है मुझे
ज़िन्दगी से परे
मैं तलाशता हूँ
उस अलौकिक खूबसूरत संसार को
जहां चले जाने के बाद
कोई लौट कर नही आता
चाहे कितना भी अज़ीज़ हो
कोई कितना भी करीब हो

दोस्त

जब मिलो मुझसे
तो वैसे ही मिलना
जैसे पहले मिला करते थे तुम
रेत के लड्डू फेकते हुए
मुझे तुम्हारे ब्रांडेड कपड़ों का ख्याल ना करने पड़े
रेत के घरोंदे बनाते हुए
तुम्हारे महंगे जूतों की फिक्र ना हो
चाय की चुस्कियों के साथ
पारले जी का बिस्किट तुम्हे भी याद आए
मिलो अगर तारों की छाया में तो यूँ ही मिलना
जैसे बिंदु मिलाते थे बचपन में
घटाओं में कभी मिल जाओं तो
वहीं आकार बनाना बादलों के
बारिश की बरसती बूंदों में मिलो तो भीगने से डरना मत
बहा देना इसमे सब दर्द जीवन के
चाँद की चांदनी में मिलों अगर
तो बाहें फैला समेट लेना उस चाँदनी को दामन में
सूरज की रोशनी में मिलों तो
मैग्निफाइंग ग्लास से जला देना सारे शिक़वे
कभी मिलो मुझसे तो मुझे मेरे वही दोस्त बन के मिलना
जिसके साथ से मुझे पूर्णता का अहसास है
पद प्रतिष्ठा को परे रख कभी मिलना मुझसे
उसी में हमारे जीवन की मिठास है

नींद का बादल

कल रात एक अजीब सा भारीपन था दिलो दिमाग पर न जाने क्यों
यु लग रहा था मानो एक बड़ा काला सा बादल
घर कर गया है मेरे मन के अंदर
न बरसता है न बिखरता है
बस अपनी जगह बनाकर
एक बैचेनी भरा समां बना लिया है चारो तरफ
कल रात आंखों में नींद थी लेकिन
सुकून नही था …

नज़्म

फ़लक पर पूरा चाँद
जब मेरी खिड़की के रास्ते
चाँदनी बिखेरता है मेरे आँगन में
मन करता है उस चाँदनी को
कलम में भर कर
एक नज़्म तुम्हारे नाम लिखूं

में समंदर तुम लहर

मैं प्रेम का समंदर हूँ
और तुम उसमें उठती लहर
कभी शांत कभी तीव्र गति से
भूल जाते हो कभी कभी
कि तेज बहाव
मुझे ठेस भी पहुचाएगा
बस उफन कर बाहर निकल जाते हो
और मैं हर बार अपने स्वाभिमान को
किनारे रख तुम्हे फिर से
समाने देती हूँ
खुद के अंदर
क्योंकि जानती हूँ मैं
मेरी गहराईयों में समाये
सीप और मोती
इसी उछाल से बाहर आएंगे

ख़्वाब – 2

ख़्वाबों में जब
आसमान में चहल कदमी करती हूँ
ये तारे चुभते है पग की हथेलियों में
बैठ कर बुहारती हूँ तो
हाथ की रेखाओं में चमक बैठ जाती है
चाँद से कहती हूँ
यूँ मत टूट के बिखरा करों
सुबह होते ही ये दुनियां
मेरे रात के सफर को
पहचान जाती है

ख़्वाहिश 

मेरा नन्हा सा मन
पलक का टूटा बाल
मुट्ठी पे रख
फूंक से उड़ा
स्कूल की छुट्टी मांगता था
और अगले दिन रविवार आ जाता था
काश ज़िन्दगी की हर हसरत
एक पलक के टूटे बाल से पूरी हो जाती

मन 

मेरा मन
जो अनवरत चलता रहता है
विचारों का सैलाब लिए
बिना ठहरे बिना थके
मीलों दूर सदियों तक
अ मन होने की दौड़ में
लेकिन मन क्या ठहराव पाता है ?
क्योकि जब मन ठहर जाता है
तो मन कहाँ रह पाता है
अ मन हो जाता है
तब एक अनुभूति होती है
आत्मतत्व की पहचान की

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