अखिलेश श्रीवास्तव की रचनाएँ

कविता 

एक वक्रोक्ति ने टेढ़ी कर दी है
सत्ता की जुबान
एक बिम्ब ने नंगा कर दिया है राजा को!

ढ़ोल नगाड़ो और चाक चौबंद सैनिकों के आगे
दर्प से चलते राजदंड़ को
एक हलन्त ने
लंगड़ी मार कर घूल घूसरित कर दिया है!

अलंकार उतार कर फेक दिये गये है
कसे गये है वीणा के तार
तांड़व की तैयारी में
ये जो दूध की बारिश हुई है सड़कों पर
वो राग भैरवी के कारण है
मल्हार तो
पसीना निकाल लेता है
और एक बूंद तक नहीं देता पानी की!

शिल्प ने राजनीति के चेहरे पर
कालिख पोत दी है
सामंती आंखो में खून उतरआया है
उससे बहते विकास के परनाले
दरिद्रता का कीचड़
पैदा कर रहे है
सड़कों पर रपट कर गिर रहे है,
छटपटा रहेहै,
मुक्ति-मुक्ति चिल्ला रहे हैअन्नदाता

एक सूखे श़जर के नीचे
अन्नपूर्णा पांच मीटर लंबा
कपास बट रही है!

कई चौधरियों की हड्डियाँ
गड़ रही है चौराहों पर
खूंटा बनकर लार टपकाते
कूकूर भोज समझ कर
इकट्ठा हो रहे है।

एक रूपक ने
रामराज्य के सदरियों को धोबी कहा हैं

बहुत दिनों के बाद एक कविता नक्कारखानें
में तूती बन गई है!

बहन 

1)

जिस भोर बहन जन्मी घर में
दादा ने माँ के पुरखो को गालियाँ दी
दादी ने माँ के खानदान को
पिता ने माँ को
औऱ बिलखती माँ ने खुद को
सांझ होते-होते
लपेट लिये गये ईश्वर भी।
फिर भी बहन ने संस्कार सीखे
औऱ मैंने गालियाँ!

2)

मैंने पहली बार सातवीं में प्रेम किया
दूसरी बार नौवीं मे
तीसरी बार गयारहवी मे
फिर काफी का कप बन गया प्रेम।
बहन ने सिर्फ़ एक बार किया प्रेम
सिर्फ एक बार लिया अपने ईश्वर का नाम
गला रेता गया रात के तीन बजे
तक जाकर सबेरे तक बच पायी इज्जत!

वस्त्र 

मेरे गांधी बनने में तमाम अडचने हैं
फिर भी चाहताहूँ
कि तुम खादी बन जाओ
मैं तुम्हें तमाम उम्र
कमर के नीचे बाँध कर रखना चाहता हूँ
और इस तरह कर लेता हूँ खुद को स्वतंत्र
घूमता हूँ सभ्यता का पहरूआ बनकर!

जबतक तुम बंधी हो

मैं उन्मुक्त हूँ
गर कभी आजाद हो
झंड़ा बन फहराने लगी
तो मैं फिर नंगा हो जाऊँगा!

चरखे का चलना
समय का अतीत हो जाना है
अपनी बुनावट में अतीत समेटे तुम
टूटे तंतुओ से जुड़ते जुड़ते
थान बन जाती हो
सभ्यताओ पर चादर जैसी बिछती हो
और उसे बदल देती हो संस्कृति में
जैसे कोई जादूगर
रूमाल से बदल देता है
पत्थर को फूल में!

इस खादी की झिर्री से देखो
तो एक बंदर,
पुरुष में बदलता दिखता हैं
वस्त्र लेकर भागा है अरगनी से
बंदर के हाथ अदरक है
चखता है और थूक देता है।

गिल्लू गिलहरी

जब झुरमुट तक नहीं होगा
और पानी वितरित होगा सिर्फ़ पहचान पत्र देखकर
बरगद, पीपल…
सब मृत घोषित कर दिये जायेगें

प्रकाश-संश्लेषण पर कालिख पोतते हुए
सागर सुखा दिया जायेगा
क्योंकि वह मृदुता से असहमत हैं
तो कविताओं में तुम
नीर भरी दुख की बदली
कहाँ से लाओगी महादेवी?

जब जल विष बन जायेगा
और हर कंठ शंकर
अनुबंध पर ले लिए जायेगे सभी फेफडे
अमीर चिमनीयो के धुआं संशोधन हेतु
चींटियाँ अचेत हो जायेंगी कतारों में
चुटकी भर आटे के लिए
तब भी तुम व्यस्त रहना
निबंधों में खूब अनाज बाँटना महादेवी!

अब मैं एक घूँट पानी नहीं पिऊँगी
न खाऊँगी एक भी काजू
जब तक तुम
नदी, जंगल, जमीन
के लिए नीर नहीं बहाओगी!

फिक्रमंद गिल्लू गिलहरी ने
महादेवी से कहा!

घास 

पाँवो तले रौदें जाने की आदत यूँ हैं
कि छूटती ही नहीं
किसी फार्म हाऊस के लान में भी उगा दिया जाँऊ
तो मन मचल ही जाता है
मालिक के जूती देख कर!
इस आदत के पार्श्व में एक पूरी यात्रा हैं
पूर्व एशिया से लेकर उत्तर यूरोप तक की
जिसे तय किया है मैने
कुछ चील कौवों के मदद से
मैं चील के चोंच से उतना नहीं डरता
जितना आदम के एक आहट से डरता हूँ

मैंने आजतक
बिना दंराती लिये हुये आदमी नहीं देखा!

शेर भले रहते हो खोंहो में
पर बयाँ, मैना, कबूतर के घर
मैंने बनाये हैं
मैंने ही पाला है उन सबको
जिनके पास रीढ़ नहीं थी
मसलन सांप, बिच्छू और गोजर!
मैंने कभीनहीं चाहा
कि इतना ऊपर उठूं
जितना ऊंचा है चीड़
या जड़े इतनी गहरी जमा लूं
ज्यो जमाता हैं शीशम
धरती को ताप से
जितना मैंने बचाया है
उतना दावा देवदार के जंगल
भी नहीं कर सकते
जिन्होंने छिका रखी हैं
चौथाई दुनिया की जमीन

मैं उन सब का भोजन हूँ
जिनकी गरदन लंबी नहीं हैं!
मैं उग सकता हूँ
साइबेरिया से लेकर अफ्रीका तक
मैं जितनी तेजी
से फैल सकता हूँ
उससे कई गुना तेजी से
काटा और उखाड़ा जा रहा हूँ।

मैं सबसे पहला अंत हूँ
किसी भी शुरुआत का!

मैं कटने पर चीखता तक नहीं
जैसे पीपल, सागौन और
दूसरे चीखते हैं
मेरे पास प्रतिरोध की वह
भाषा नहीं हैं
जिसे आदमी समझता हो
जबकि उसे मालूम हैं कि मुझे बस
सूरज से हाथ मिलाने भर की देर हैं
ऐसा कोई जंगल नहीं
जो मैं राख न कर सकूँ।
मुझे काटा जा रहा है चीन में
मैं मिट रहा हूँ रूस में
रौंदा जा रहा हूँ
यूरोप से लेकर अफ्रीका तक
पर मेरे उगने के
ताकत और डटे रहने की
जिजीविषा का अंदाजा
नहीं है तुमको!

मैं मिलूंगा तुम्हें
चांद पर धब्बा बनकर
और हाँ मंगल का रंग भी लाल हैं!

प्रेम 

आओ मिल कर खोजें प्यार
लुप्त प्रजातियों की भाँति
चाहो तो पूछ लो
अरगनी पर टँगे चाँद से
या फिर डाल दो
इक मेल मंगल को!

परिंदों,
किसी खुली खिड़की से घुस जाओ
आसमान के घर में
या फिर
डाल्फिन से कहो
खोजे समुंदर के तलहट में
हो सकता है
टाइटॅनिक के नीचे दबा हो प्यार!

वर्तमान और निकट भविष्य में भी
प्रेम इतना दुर्लभ है
कि आओ सब मिल कर
प्रेम को परमात्मा मान लेते हैं!

हम दोनो को
खोजते रहना चाहते हैं
पाना नही!

अभी खबर आयी है
पश्चिमी उत्तर प्रदेश से
पाए गये है दो लोग प्यार करते हुए
एक को गोली मारी गयी
दूसरे को काटा गया गडासे से
प्यार का खून पा
लहलहा गयी प्रधान की चुनावी फसल
पंच के फ़ैसले पर
उठा ले गये कुछ लोग
प्रेमी की बहन को खेत में
परमात्मा, प्रेम का हश्र देख
बिला गये है जाने कहाँ!

देख ले रे नकुला
जंघवा पर तिल।
हो हो हो
कै बरिस के होई
ए फ़ैसला त
पंचे करिहे।
खी खी खी

सारे गाँव वाले खिखिया कर हँस रहे थे
पर खेत शर्मिंदगी झेल नहीं पाए
सूखा गयी सरसों
किरा गये धान
सारे पत्ते गिरा कर
नंगी औंधी पड़ी है अरहर
गाँव के बीचो बीच
लड़की की तरह!

गोरखपुर 

बानरों ने कच्चा कंदमूल त्याग दिया है
अब बिना देवता के मदद के
उगा लेता है अनाज!

बादल में चमकी बिजली
पकड़ कर नदी के मुहाने पर
बाँध दी गई है और अब
चाकरी करती है आदमी की!

पगडंडियों ने दूरी तय की
और बदल गई
राजमार्गो में
कुएँ बाँधों में बदल गये!
धरती की छाती पर फोड़े से उगे
माटी के घर बदल गये गगन चुंबी अटट्लिकाओं में
गुब्बारे उठे और पहुँच गये मंगल तक!

सबने तरक्की की उर्ध्व दिशा में
सिर्फ साहित्य चला है पीछे
सिर्फ़ हमीं चले उल्टी राह पर!

अलिफ लैला में राक्षस की जान
पिंजरे के तोते की गरदन में थी
और चाभी बच्चों के हाथ में!

आज बच्चों की जान तोते में है
और चाभी
राक्षसों के हाथ में
इधर वह चाभी घुमाता है
उधर कई गर्दनें ऐंठ जाती हैं!

त्यागपत्र

मैं हर उस जगह से अनुपस्थित होना चाहता हूँ
जहाँ बंद खिड़कीयाँ चाहती है
कि मैं हवा हो जाऊँ!

तनी हुई भवो के बीच बहूँ
गर्म माथे से गुजरते हुए
उसे ठंडा रखूँ
उनकी नाक से गुजरते हुए
उन्हें जीवन दूँ
पर जब उच्छवास से बाहर निकलूँ
तो खुद को
कोयले की राख में बदला हुआ पाऊँ!
जब पूँछू
खुद के राख हो जाने की कहानी
तो कहा जाये कि
तुम शुरू से ही कोयला थे
बहुत होगा तो फानूस रहे होगें!

मैं फिर-फिर छानता हूँ खुद को
बहुत मुश्किल से बन पाता हूँ
इतनी-सी हवा
कि खुद सांस ले सकूँ!
पर कोई अनुभवी व
घाघ हो चुकी नाक
पहचान ही लेती है मुझे
मैं घाघ नाकों की जीभ पर
रखा हुआ भोजन हूँ!

हवा से राख बनते-बनते
इतना आजिज आ चुका हूँ
कि सोचता हूँ त्यागपत्र दे कर
पानी बन जाऊँ
सिर्फ एक बार पिया जा सकूँ
और गटर कर दिया जाऊँ!

माँ-1

जब हम बच्चें थे
तो फूल मान लिये गये थे
रोज सबेरे क्याँरी सींची जाती थी

अरगनी पर चादर तान
दों टूक जवाब दे दिया जाता था सूरज को
बचा लियें जाते थे हर ताप से
पौधों के नींचे रख दिये जाते थे
दों धारीदार पत्थर
हमारे बहाने ही
पूजें जाते थे शिव

दुपहरियाँ में निराई गुड़ाई
करते पिता खुरपी जैसे कठोर हो जाते
और सांझ होते-होते
इतने नर्म जैसे कपास के फोहे हो
खूब सुख भरा था
फूल के हर पंखुड़ी में
जब भी माँ का ख्याल आया
एक मिठास तैर जाती मन में
कभी मनाती कभी पोहलाती माँ
एक मिठाई जैसी है

बहुत दिन बाद
जब फूल से फल बने
और फल से बीज़
तब तलाशनी शुरू की वह जमीन
जहाँ मुझे उगना था
देनी थी छाया।
क्याँरी में उगना
और किसी अनजान जमीन पर
अपनी जड़े जमा लेने का अंतर
या तो अमलतास की बेंलो को पता है
या मुझे।

पिता के अलावा
दुनिया के सारे रिश्ते
चीड़ के जंगलों जैसे हैं
और फैले हैं दूर-दूर तक
जीवन का सारा जल
खींच लिया हैं आस पास से

कई योजन तक
पठार ही पठार हैं
उनकी पत्तियाँ नुकीली और शंकुल हैं
बगल से गुज़र जाऊँ तो
पूरे शरीर पर खरोंच के निशान दिखते हैं
जैसे कई बाघो ने
एक साथ मारा हो पंजा

माँ उस जंगल
में कनेर जैसी है
जब भी कोई फांस लगी पांव में
उस पठार भरे चीड़ के जंगल से
गुजरते हुये
उसने अपनी पूरी शक्ति
जड़ो से खींचकर
फुनगिंयो तक पहुंचाई
अपने को कूटा, मसला
और ज़ख्मो पर छाप दिया
माँ मुरझा गई
एक दिन अपनी ही फुनगिंया तोड़ते-तोड़ते
मैं आज भी
चीड़ के जंगलो में कनेर ढूंढता हूँ।

कोहरा 

मैं शाम होते-होते तुम्हें चाँद कह ही देता हूँ
नहीं तो रात तक तुम मेरे लिए
नक्षत्र हो जाओगी।
यह नयी युक्ति, नया विचार रच
फिसल कर गिरने का समय है
देवता गिर कर बदल रहे है मानव में
मानव असुरो में
असुर श्वानो में
स्त्री, देव तक तुमको सिर्फ़ देखना नहीं
स्पर्श करना चाहते है
कोहरा, एक बहाना है
रातो का विस्तार है इसमें
देवताओं की लार मिली हुई है।

दाएँ- बाएँ 

संसद दाईं तरफ है
7 RCR दाईं तरफ है
नीति आयोग दाईं तरफ है
यहाँ तक कि साहित्य अकादमी
दाईं तरफ है
और सर्वोच्च न्यायालय भी!

वो खींच लेना चाहते है
सारी जमीन, सारी नदियाँ, सारा जंगल दाहिनी तरफ ही!
हमसे कहा जा रहा है
आप सभ्य नागरिक हैं
नियमो का पालन
मुस्तैदी से करे
हमेशा बायें तरफ चलें!
मै इस स्वतंत्र, संप्रभु गणराज्य में
कुत्ता बनना चाहता हूँ
जो यूँ ही चलते-चलते
बेधड़क घुसता है कहीं भी
बिना खदेड़े जाने का खौफ लिए!

सपना

मैंने दुखों का समन्दर पैरों से लांघकर नहीं
सर के बल चलकर पार किया है
हरियाली धरती पर लोटने का मन था
पर रेत फैली है दूर तक
हँसता भी हूँ तो
बालू चबाता हूँ!

समन्दर के सफर में
जल दैत्यों से लड़ा
कुछ मछलियों से दोस्ती की
सिर को तराश कर नुकीला बनाया
जिस हिस्से में मेरे सपने रहते थे
उन्हें छील कर जल प्रवाहित कर दिया!
जिन पैरों को पंख बनना था
मैंने उन्हें पूंछ बना लिया!

इस नुकीले सर को लिए-लिए
जब सुनता हूँ कि ऊंट की तरह लम्बी गर्दन चाहिये
रेगिस्तान को पार करने के लिये
तो बचे-खुचे सपने फिर उठाता हूँ
उसी की बनाता हूँ रस्सी

एक सपने की रस्सी के फंदे पर
दूसरे सपने की गर्दन लुढ़क जाती है
तीसरे सपने की जीभ बाहर निकल आई है

हर सपने की मौत के बाद
मेरी आँखें अब इक रेत का टीला हैं
चढ़कर देखो तो दूर रेगिस्तान में
एक झरना दिखाई पड़ता है!
आ से आंख
आंख माने सपना!

कायर-1

शेरवानी में दमकते सुपुत्र को
पिता ने गले लगाया
सेहरा पहने बेटे की माँ ने ली बलैया

घुडचडी के पहले
मंत्रोच्चार के बीच
पंडित जी ने
खानदानी तलवार छोटे ठाकुर की कमर में
बाँध दी

एक घर के सामने से गुजरी बारात
तो छत्रपति मिला नहीं पाये
छत पर खड़ी एक लड़की से आंख

ठाकुर के बेटे को
आज फिर
एक चमार की बिटिया ने कायर कहा।

कायर-2

मैं जात का कोरी हूँ
बिना थके दिन भर
बाभनों के खेतों को पानी पिलाता हूँ
एक पल में इतना वीर हूँ
कि पहलवान जुलाहो को
चित्त कर देता हूँ

अगले ही क्षण इतना कायर
कि लूले बनिये का पैर दबाता हूँ।

बिटियाकोखी औरतें

कभी सुना है तुमने
उस गवई स्त्री के ठहाके में दर्द का अट्टहास
जिसकी हकीकत में तीन बेटियाँ हो
और ख्वाब में हो एक बेटा।
बेटों वाली स्त्रियाँ
कभी स्वप्न में भी नहीं जान पायेगी
बिटियाकोखी स्त्रियों का दर्द।

वो हर बार पूजा बढ़ा देती है
पर हर बार पाती है बिटियाँ
अब वह ईश्वर के खिलाफ हो चली है
परम्पराओ के खिलाफ हो चली है
नहाती ही नहीं है नरक चतुर्दशी को
जब बेटा है ही नहीं
तो वैसे भी नहीं मिलना स्वर्ग
ये फालतू का मनुवादी आडम्बर क्यों
इस तरह के तर्को से वैज्ञानिक बन
खिसिआई हँसी हंसती हैं
फिर कहती है-कहीं नहीं है स्वर्ग-नरक
सब ‘यहीं’ है
उनके यहीं में
हहाकर-सी समाई रहती हैं उनकी बेटियाँ।

कोईरी बुआ सबसे
पावर फुल्की अल्ट्रा साउंड मशीन है गाँव की
हफ्ता बता देती है
चार कदम चाल देखकर
पेटवा बढिआया है गोवर्धन जैसा
जबकि पीठियाँ शांत है यमुना जैसी
पक्का होगा कन्हैंया।

एक पिपरा वाले बाबा भी है गाँव में
गर्भवती स्त्रियों के पेट पर
उभरी लकीर देखकर पढ़ते है
अजन्मे का लिंग
जो नाभि से उठती है
और जाती है बहुत नीचे तक।

पल्लू हटने पर
झट छिनाल कह देने वाली सास
खुद बहुरिया संग कुटिया में जाती है
टाट पर लिटा उघार देती है पेट
और बिना कहे बाहर निकल जाती है
बहुत महीन व धुंधला-सा
पर शायद वह जानती है
लकीर के फकीर होने का मतलब।

बाबा देखते है,
टटोलते है, बहुत पास से
सूंघते है नाभि
तौलते है लेटी स्त्री की विरोध चेतना
फिर बडबडाते हुए
रगड देते हैं वक्ष पर भभूत
जिसमें से स्त्री सुन पाती है
सिर्फ़ माया व मोहनी जैसे शब्द।
ये पहले प्रहार हैं
इसे सुनकर काठ मार जाता है
उस बहादुर स्त्री को भी
जिसने कल ही मारा था दालान में
निकला गेंहुवन।

इन शब्दों का विष
फैल रहा है स्त्री के शरीर में
वो नीली पड़ती जा रही है
उसके कोरो से बहते अश्रुबूदों में
अपनी अनामिका डुबो कर
घिसता है एक जड़ी, बनाता है लेप
फिर झुकता है लकीर पर
बड़े नजदीक से पढता हैं लकीर की लिखावट
इस बार योग शक्ति से आंखे जीभ में निकल आई हैं
यह योग शक्ति छोटी बड़ी मात्रा में होती है
हर पुरुष के पास।

लेप नाभि पर गिराता है, फैलाता है
सूंघता है, चखता है, थूकता है
जड़ी के बहाने वह नाभि, पिंडली व कमर चाट रहा है
स्त्री देह का पूरा कटि प्रदेश
भर देता है अपने लार से
लगता है अजन्मा खुद पिघल कर नाभि से
बाहर आ रहा हो
वो लार ज्वालामुखी से निकले
लावे की तरह गर्म है।
अचानक कूदकर उठाता है कमंडल
स्त्री के मुँह पर छीटें मारकर
साफ करता हैं फेंन चिल्ला कर
पूछता है पहिल का था
पूतना कि कन्हैंया…
निश्चेत स्त्री के मुंह में एक भी शब्द नहीं है
बाबा ने धर दिया है कमंडल पर कपाल
हमारा सारा ज्ञान, सारा व्याकरण, सारे शब्दकोश, सारे कर्मकांड,
उसी कमंडल में बंद हो गये है
मनु अपने पूरे नाव सहित
उस कमंडल में तैर रहे है
कमंडल में कोई
प्रलय नहीं है।

शब्द उपजाने की कोशिश में
वो अपनी आँख लगी जीभ डाल देता है
स्त्री के मुँह में
लेता है पूरे मुँह की तलाशी
स्त्री के निचले होंठ से खून रिसने लगा है
पिपरा के पेड़ पर बैठें बरम खुश है
चढ़ावा चढ़ चुका है
स्त्री देह से सम्बंधित कोई भी पूजा
उसके रक्त यादाह के बिना पूरी नहीं होती।

पूरे कंठ प्रदेश में
एक भी शब्द न होने से
बाबा उग्र हो उठता है
अब जीभ छोड़ दांतो से काट लेता हैं
उसके कान
वहीं चिल्लाता है
पूतना कि कन्हैया…
ये शब्द इतने तीक्ष्ण व तीव्र है कि
निस्तेज
स्त्री का ह्रदय कांप जाता है
बिखरे, निढ़ाल, क्षत-विक्षत दो शब्द होंठो पर
धरती फैले खून को लांघते
हुए निकलते हैं
तीन ठे पूतना…
ये शब्द ईश्वर के न्यायालय से जारी
बाबा के विजय का आदेश पत्र है।
बाबा चुभला कर
खाता है इन शब्दों को
फिर खींच कर पीता है
होंठ से रिसता खून
इस भोजन में
वहीं तृप्ति है जो परास्त शत्रु के
सर पर पैर रखकर उसे कुचलनें से आती है
दर्प से उसका चेहरा चमचमा रहा है
विजय भाव शरीर में लगातार नीचे उतर रहा है
शरीर की सारी शक्तियाँ मिलकर
उसके एक महत्त्वपूर्ण हिस्से को तनाव दे रही हैं।
बाबा को समाधि की राह दिखी है
वह स्त्री नाभि पर पहुँचता है
और उसी लकीर की पगडंडी पकड़े उतरता जाता हैं
नीचे और बहुत नीचे तक
एक जगह पहुँच कर वह
स्त्री की देह उतार देता हैं
स्त्री अब सिर्फ़ आत्मा है।
समाधि की राह पर
सबसे पहले टकराता है
हिमालय के एक पठार से
चीड़ के घने जंगल है आस पास
कई जंगली फूलों की गंध है
अनगढ़ जड़ें है
वहाँ कोई आवाज नहीं है
न कोई सन्नाटा है
ये बात शब्दों के जन्म के बहुत पहले की है
बहुत ठंड है वहाँ
वहाँ हजारों साल से कोई सूरज नहीं उगा
वहाँ कोई रोशनी नहीं है
घुप्प अँधेरा है

स्त्री अब आत्मा नहीं है
स्त्री अब प्रकृति है।
पुरुष की जीभ आँख है
उसके दोनों कान आँख है
उसका पूरा चेहरा हजारों आँखों से भर गया हैं
वह उस घुप्प अंधेरे में भी खोज लेता
है वह खोह
जहाँ उसे योग मुद्रा लगाकर बैठना है।

वह अपनी आंखों
लगी नाक, जीभ घुसाता है भीतर
झांक कर देखता है
कहाँ बैठे है ब्रह्मा
कहाँ छुपा है उनका अमृत कलश
जो इस खोह से लगातार उपजता रहता है, जीवन
न जाने कितनी सदियों से।
पुरुष जानता है कि वह हजार जन्म भी ले ले
तो भी उसका पाप उसे इस खोह में घुसने नहीं देगा।
अब वह बनाता है
एक वासुकि
खोह में डालकर मथता है उसे
अमृत कलश की चाह में।
वासुकि के मुख
से अग्नि शिखा निकल रही है
ब्रह्मा ने अपना अमृत कलश
अपने वामांग मुख की दाढ़ में छुपा लिया है
ओम ओम का उच्चारण अब घोष में बदल रहा है
लगातार मंथन से एक धार निकलती है उस खोह से
स्त्री अब प्रकृति नहीं है
उसका एक उप समुच्चय हैं
स्त्री अब एक कथित जीवन धार है
स्त्री अब गंगा है।
पुरुष उस धार में खोज रहा है अमृत
पर उसमें गाद है
वासुकि का विष है
उसकी केंचुल है
गाद है बहुत सारा
और अमृत छटाक भर भी नहीं
स्त्री अब गंगा नहीं है
स्त्री अब मथ दी गई मांस का लोथा है
जिसमें न देह है न आत्मा है, न प्रकृति।

पिपरा बाबा का देह धरे पुरुष अब
समाधि की अंतिम अवस्था में है
उसकी जटायें खुल चुकी है
वो लगभग शव हो चुके स्त्री देह पर
तांडव कर रहा है
पर वह शिव नहीं है
उसकी तांडव मुद्रा उर्ध्वाकार न होकर क्षैतिज है
वह खूब लम्बी साँसे भर रहा है
लटपटाती, हाँफती आवाज में
खूब तेज चिल्ला रहा है
ओउ$म ओ$ $म
बाहर बैठी बुढिया
भींच लेती है दोनों हाथ
चढ़ा लेती है माथे पर
मनौती में बढ़ा रही है
रत्ती पर रत्ती
और ये अंतिम ओ$$$म है
बुढिया पहुँच चुकी है आठ रत्ती तक
अब यही चढावा चढेगा
पिपरा वाले बाबा को।
इस बार बात
चीत्कार से आगे की है
प्रकोप इतना बड़ा है कि
मर्द घर छोड़कर भाग खड़े हुए है
पर झींगुर वही है
कुत्ते भूख से कूक रहे है
कुओं ने अपनी ठंडाई चूल्हो को देकर
खुद आग पकड़ ली है
सिसकियो के बीच बस बकरियाँ है
जो हुलस कर मिमियाँ रही है जिब़ह होने के खौफ को विस्मृत किये हुए
बधाई हो, बिटिया हुई है।

शहर

कविता का शहर अदृश्य होता है
शब्द तो बस पगडंडीयाँ हैं
उस अदृश्य तक पहुँचानें को।

एक नगर जिसमें भावों की बसावट है
प्रेम की अनगिनत झोपड़ियाँ है
करूणा के जलसोत्र है
नफरत के दरकते हुए किले है।

शब्द अक्षरों से बुना हुआ भुलभुलैया है
चन्द्र बिंदु पर आसमान छूता एक भाव
अक्षरों की देह पर सरकता हुआ
हलन्त तक आते-आते विलीन हो जाता है।

जब कोई शब्द उचारा नहीं गया था
न लिखा गया था कोई अक्षर रेत पर
कविताएँ तब भी गुंजायमान थी
सबसे पहली कविता आदमी ने नहीं लिखी
विरह के मारे क्रोंच पंक्षियों ने लिखी।

कविता तक पहुँचना हो
तो शब्दों का तिलिस्म तोडो
पूर्णविरामों की दरबानी हटाओ.

सबसे बडी और अच्छी कविताएँ
दो शब्दों के बीच खाली जगहों में होती है
आधे शब्द प्रेम के घर होते हैं
सबसे ज़्यादा शब्दों में लिखी जाती है
तोंदिल कविताएँ।

कवियों
कविता पर चर्बी चढ़ाने से बचो।

उम्र

भाव स्मृतियाँ पुरनियाँ हैं शब्दाक्षरों की
विषाद की उम्र अ से ज़्यादा है
क्षोभ बड़ा है आ से
प्रेम धरती का सहोदर हो सकता है पर
नफरत पानी और आग से भी पुरातन है
इसी के चलते धरती टूट कर अलग हुई
किसी बड़े आग के गोले से।

नफ़रत धरती का पुश्तैनीं गुण है
प्रेम कृत्रिमता है
सभ्य होने के प्रयास में सीखा गया गुण
कांधे पर लबादा टांगे-टांगे जब चिलकती है बाजू
तो लबादा बदल जाता है कई-कई झंडो में
युद्ध धरती की सहज होने की प्रक्रिया है।

जब रोशनाईं नहीं बनी थी
न कंठय ध्वनियों की कोई बात थीं
भाव ही तंतु था समाज का
मृत्यु का अर्थ विलाप था
जन्म का अर्थ हर्ष की तुमुल ध्वनि
देह
लोभ, क्षोभ, मोह, कुंठा, निंदा का घर था
प्रेम की एक लहर भी बहती थी ऊपर-ऊपर
पर अंतस में वही नफ़रत ठाठें मारता है बुर्जुआ बनकर
बाकियों सारे भाव उसी की पायलग्गी करते है।

प्रेम एक नया-सा
कच्ची उम्र का भाव है सब भावों में
जैसे हिमालय है सबसे कच्चा पहाड़
नफ़रत सतपुड़ा है
उम्र में प्रेम से करोड़ों वर्ष बड़ा।

बुजुर्गों का सम्मान करो
मेरे धर्म की सबसे समकालीन व्याख्या है।

गेहूँ का अस्थि विसर्जन

खेतो में बालियो का महीनों
सूर्य की ओर मुंह कर खड़ा रहना
तपस्या करने जैसा है
उसका धीरे-धीरे पक जाना है
तप कर सोना बन जाने जैसा

चोकर का गेहूँ से अलग हो जाना
किसी ऋषि का अपनी त्वचा को
दान कर देने जैसा है

जलते चूल्हे में रोटी का सिकना
गेहूँ की अंतेष्ठी है
रोटी के टुकड़े को अपने मुँह में एकसार कर
उसे उदर तक तैरा देना
गेहूँ का अस्थि विसर्जन जैसा है

इस तरह
तुम्हारे भूख को मिटा देने की ताकत
वह वरदान है
जिसे गेहूँ ने एक पांव पर
छ: महीना धूप में खडे़ होकर
तप से अर्जित किया था सूर्य से

भूख से
तुम्हारी बिलबिलाहट का खत्म हो जाना
गेहूँ का मोक्ष है

इस पूरी प्रक्रिया में कोई शोर नहीं हैं
कोई आवाज नहीं हैं
शांत हो तिरोहित हो जाना
मोक्ष का एक अनिवार्य अवयव हैं

मैं बहुत वाचाल हूँ
बिना चपर-चपर की आवाज निकाले
एक रोटी तक नहीं खा सकता।

प्रजा और पूँजी

पूंजीवादियो की सेनायें सामने थी
उनके रथियों के पास
गेहूँ के बीजो से लेकर
चिता के चइला तक
सब कुछ दमकती पन्नियों में पैक था!

प्रजा निहत्थी थीं
उन्होंने जबरन खुलवाई मुट्ठीयाँ
जिन हाथों में दमडिया नहीं थी
वो काट दिये गये!

धडाधड कटते बाजूओ के बीच
विपन्नो ने मैदान छोड़ दिया
कुछ ने कुँओं की शरण ली
कुछ ने पेड़ों के टहनियों की!
मैं शरणागत हुआ
संधिपत्र पर किये हस्ताक्षर
अपने गेहूँ के खेत उन्हें बेच कर
खरीद लिया गेहूँ का एक पैकेट!

खरीद फरोख्त में शामिल न होता
तो बीच बाजार
बाजार के हाथों मारा जाता!

अब मैं उनकी सेना में शामिल
पैदल मोहरा हूँ
अपने ही बंधुओं की बाजू काटता हूँ!

लौटना

कदम दर कदम बढ़ रहा हूँ चुपचाप
समय ने एक लाठी छुपा कर रखी है इस राह पर
किसी भी दिन सामने आ सकती है
नीरव पदचाप को बदल सकती है ठक-ठक में।

मेरे पीछे कई बकैंया चलते पाँव
जिनसे रूनझुन संगीत निकलता था
भाग रहे है अब
मेरे चेहरे पर धूल उडाते हुए.

धुँधलाई नजरों से देखा
अब लोगों के शरीर में कंधे नहीं थे
जहाँ टिक जाता क्षणभर

एक पेड़ ने अपनी एक टहनी दी
ठक ठकाते हुए कुछ दूर तक चला उसी भीड़ में

लौटना चाहता हूँ
किसी कंधे या घर तक नहीं उसी पेड़ तक
लौटा तो
उसने स्वागत में सारी शाखाएँ गिरा दी

उन्हीं टहनियों पर लेटा हूँ
थकने के बाद एक गर्म बिस्तर पर सोना
टहनियाँ यूँ गले लग रही है
जैसे कोई पुरानी याद बाकी हो
न पांव बचे है न लाठी
थकान तक धुआँ-धुआँ है।

फिर माटी में पाँव उगें तो
कांधा खूंटी पर टांग कर निकलूंगा।

आत्म हत्याएँ

प्रेमपत्रों में तुमने बसीयत लिखी
सोने के कर्णफूल माँ के हाथ धर देने की इच्छा की
देह को सौंप दिया जाये अग्नि को
किताबें और बस्ते छोटी बहन को मिले
और आत्मा ईश्वर की खोज में न निकले
वह मिल कर एक हो जाये तुम्हारी आत्मा से।

मन ने बिसार दी सब स्मृतियाँ
देह भस्म हुई तो बस चिर लुभाता प्रेम बचा
आत्मा की ओठों पर तिल-सा लगा हुआ।

मेरा तुम्हारे देहरी तक पहुँचना
कपाट का बंद पाना
और फिर लौट आना किसी देह में

रस्सी फेंक कर
कपाट बंद कर लेने वाला प्रेम
चाहता है कि मुक्त हो जाऊँ इस बंधन से
एक देह के इस कदर आध्यात्मिक हो जाने से
प्रेम अंधा नहीं रह पाता
और सब देखने लगता है चौकन्ना होकर

प्रेम का प्रकट होना
बहुत-सी बुराइयों के अदृश्यता का समय है
पर प्रेम धारण करने के लिए
देह, मस्तिष्क या आत्मा की नहीं
एक मन की आवश्यकता है
जो कही हो तो बात बने।

पश्चिम ने नकार दिया है मन का अस्तित्व
और पूरब है कि टिका है इसी के भरोसे।
अगर मान ले बात
तो प्रेम के रस्सी से होने वाले हजारों आत्म हत्याओं से बच सकता है।

युवा कवि

हिंदी कविता में समकालीनता की उम्र
मुझसे एक दिन कम है।

मैं ही कविता को जन के बीच लेकर गया
बदल दिया उसे धन में
इस तरह कविता जन धन हो गई
उसमें वादे जमा हुए
और आत्महत्याओं की निकासी हुई.

पहले कविता पुस्तकालयों में कैद थी
मैंने कांधा लगाया तो
वो पूंजीवादियों के पंच लाइनों में बदल गई
मेरी मखमली कोशिश ने
सिनेमा हालो को माॅल में बदला
पंनसारी की दुकान को माॅल में बदला
यहाँ तक की स्त्रीयों को माल में बदला
मुझ पर आरोप लगे उसके पहले ही
जब काँधे पर लाश ढोते लोग गुजरे सामने से
तो मैंने ठेलों को एम्बुलेंस में बदल दिया
इस तरह विकास को गति दी।

मैं धुँर युवा हूँ
कविता में गुगली खेलता हूँ
मैं एक छोर से कविता डालता हूँ
दूसरे छोर वह लपक ली जाती है सुविधाजनक गदेलियों में
मेरी कविता लकड़ी, कुदाल, हसियाँ से टकराती नहीं है
उसमें कोई खटराग नहीं है
मैं स्केटिंग करते हुए लिख सकता हूँ कविता
पैदल घसीटते हुए जिनके तलवे फट गये
उनके लिए कोई कविता नहीं है मेरे पास।

मैं लिखता नहीं हूँ, कविता करता हूँ
सुबह प्रशंसा प्रैक्टिस करने अकादमी में घुस जाता हूँ
शाम को पुराने चुप्पा कवियों के कुछ शब्द झोले में डालता हूँ और आलोचना पर निकल पड़ता हूँ
पुरस्कारों की घोषणा वाले दुपहरियों में मैं
अपनी कविता के साथ जे एन यू में मिलूंगा
बधाई, शुभकामना का बैना बाँटने में इस कदर
व्यस्त हूँ कि मूतने तक की फुरसत नहीं
जब जंतर मंतर पर किसान मूत्र पी रहे थे
मैं उनके लिए मूत्र तक की व्यवस्था न कर सका।

मेरे लिए तालाब खरे नहीं है
नदियों के जिन्न को मैंने बोतल बंद कर दिया है
बेरोजगारी, ध्यान लगाने का समय देती है
आत्महत्या की राह ईश्वरीय पदचिन्ह है
इसी दर्शन के आख्यान पर
बिल्डरो से मिले स्मृति चिह्न में पीपल के बोन्साई को देखता हूँ
तो एक फ्लैट की जुगत में लग जाता हूँ
मिल जाएँ तो कितना आसान हो जाएँ
बुद्ध बनना।

मैं गिटार भी बजाना सीख रहा हूँ
ताकि सत्ता के सुर में सुर में मिला सकूँ
इतना चिल्लाकर पढ़ता हूँ कविता
कि कभी जयकारे का मौका मिले तो
सबसे अलग दिखूँ।

गौरैया

कौवों ने सारा
तन्दुल चुग लिया है
मटके के तली तक का पानी
हथिया लिया है पत्थरबाज़ी करके!

चिड़ियों ने निराशा में
घोसलों से निकलना छोड़ दिया है
खोहों के मुहांने पर
तिनके की ओट डाल पर्दादारी की प्रथा
ज़ोर पकड़ रही है!

आकाश को चीलों का बताया जा रहा है
और उनके लिये नियत है उतना ही आकाश
जितना दो पत्तियों के बीच
दरख्त के एक शाख़ से दिखता है!

नई बात यह है कि
कांव कांव को
जंगल ने अपना राष्ट्रीय गीत मान लिया है
कोयल की कूँक को माना गया है
एक डायन की आवाज़!

और अब दरख्तों की कहानी सुनिए
एक गौरैया की ग़रदन
अपनी ही शाख के
एक धारदार पत्ती ने रेत दी है!

पेंग्विन

जब छोटा था और
सीख रहा था चलना
तो पंजे रखते ही भुरभुरी बर्फ
घुटने तक समा जाती थे
मैने गदेली भर पत्थर भी नहीं देखा
जहाँ बर्फ न हो।

मेरे पुरखे जो सुनाते थे
प्रलय की कहानियाँ
सिर्फ उसमें होती थी
बर्फ के गल जाने की खबर
हम सारे झबरीले पेग्विनों के बाल
झड़ जाते थे कहानियों में
और नहीं होती थी
एक भी मछली बर्फ की तलहट में
सफेद पहाड़ बदलने लगतेहहहब थे
शैतानी काले रंग में

अब जब मैं बूढ़ा रहा हूँ
तो एक-एक लक्षण दि हखते है प्रलय के
मैं भी सुनाना चाहता हूँ वही कीओशओकहानियाँ
पर अब बच्चे इसे नियति नहीं परिणित मानते है
तर्क गढ़ते है और पारिस्थितिकी के प्रश्न पूछते है पूरी दुनिया से

वो ऊलावों से पूछते है
शेरों से पूछते है और
पूछते हैं घड़ियालो से
किसी ने नहीं उज़ाड़े वन

तो फिर कौन काट रहा है करोड़ो दरख्त
पूरी धरती सुलग रही है अलाव बनकर
कौन ताप रहा है इसे
कौन किस्सों पर ताली ठोक रहा है
कौन कहकहे लगा रहा है

अलाव के एक उड़ते चिनगारी ने
पकड़ ली है घर में बिछी बर्फ की चादर
फर्श चटक रही है जगह-जगह से
पैर रखता हूँ तो सीधे चट्टान पर पड़ते है पंजे
मुझे घर की नंगी नींव दिखाई दे रही है
और अपनी कब्र भी!

इन दिनों

तुमनें पलकें खोली
हथेलियाँ हटा ली चेहरे से
खिड़की से निहारा आकाश भी
पर भोर नहीं हुई
सूरज नहीं उगा।

तुमनें आबनूस से केश बिखेरें
तो भी नहीं उमड़े कुंतल मेघ
बादल के फोहों ने झुक कर
पेड़ के फुनगियों की कोई खबर नहीं ली
सीपो के मुंह खुले रह गये
कोई स्वाति बूंद उन तक नहीं पहुंची।

तुमने छमकाई पायल
पर नदी ने जल तंरग नहीं छेडा़
गौरैया ने फुदक-फुदक कर
ताल से ताल नहीं मिलाया
न कोयल ने कूक भरी
न कबूतर ने कहा गुंटर गूँ।

मेरा प्रेम तुम्हारी क्रियाओं का कंठ है
वही पहुँचाता है तुम्हारी सारी बातें ख़ुदाई तक
तुम फिर से आ जाओ मेरे पास
ईश्वर सुन नहीं रहा हैं तुम्हारी कुछ भी
इन दिनों।

पहर

रात्रि के तीसरे पहर में
उसके लटों से खेलना
मेरे लिये आग तापनें जैसा है
उसके लिये है राख हो जाने जैसा।

उसका प्रेम उर्ध्वाकार होकर
यज्ञ की अग्नि बनना चाहता है
जबकि मेरा प्रेम चाहता है
क्षैतिज हो जाना।

वह माँ हो जाना चाहती है
पर कुंती होना नहीं।
मै आमादा हूँ सूर्य बन जाने को
पर पिता होना नहीं चाहता।

माँ और पिता का सम्बध
एक प्रयोग है कई बार
जिसमें पीठ सहलाते हुए दी जाती है
लड़कीयों को माँ बन जाने की सलाह
जबकि पिता होने व बन जाने के बीच
एक स्वीकृत ज़रूरी है
यह सुश्रुत का देश है
रूह व अजन्मे मांस को यूं अलग करता है
कि माँ तक को खबर नहीं होती।

शल्य चिकित्सा
कोख में अवैध खनन जैसा है
घोषणा पत्र पर पिता के हस्ताक्षर है
किसी ठेकेदार के हस्ताक्षर जैसे
अजन्मा शिशु बालू जैसा है।

दुनिया में
स्त्री के माँ बन जाने की संख्या
पुरूष के पिता बन जाने की संख्या से
कई गुना ज़्यादा है।

जीवन

क्षण भंगुर है जीवन तो
शाश्वत क्या है
मृत्यु?
जिसकी एक भी स्मृति अपने पास नहीं!

माटी, अम्बर, जल, वायु, अग्नि
जिससे मिलकर बना है यह घट
जीवन उसी के विराट हो जाने की कहानी है!

माटी उपजाने लगे अन्न
और भरने लगे कई पेट
तुम्हारे भीतर के आकाश में उड़ान लेने लगे कुछ आश्रित पंछी
विष इतना चख लिया हो कि जल बदल जाये खारे समंदर में
उच्छवास से किसी की मद्धिम लौ-सी कोई उम्मींद
देखते ही देखते अग्नि शिखा हो जाये
तो अपनी पीठ ठोक लेना!

अपने शव से कहना कि
तू एक जिंदा आदमी की लाश है।
तुझमें जीवन और मृत्यु साथ-साथ नहीं रहे
तेरे लिये जीवन एक युग था और
मृत्यु एक क्षण।

ऐसा हुआ तो
तेरे भीतर की अग्नि को अग्नि बन जाने के लिए
घी की कोई ज़रूरत नहीं
तू लौटा सकेगा अम्बर को अम्बर
माटी को माटी!

बाकी ईश्वर पर छोड़ दे
वो रच सके तो रच ले फिर से
तुझ जैसा जीवन।

स्वप्न 

दिन के खतरे इतने ज़्यादा हैं
सपनों ने अपने लिए रात चुनी

सपनों को रोशनी से इस कदर खतरा है कि
जिन आँखों में थोड़ी-सी भी रोशनी है
वही सबसे ज़्यादा डर है सपनों की भ्रूण हत्याओं का
कई सपनों की कब्रगाह हैं आँखें
भवें हैं या लोहे की जालियाँ लगी हैं बाँधों पर
खुलते ही कई लाशें बहकर बाहर आ जाती हैं

निर्जन में खारे पानी की नदी है
पर फैला अंधियार अनुकूलन है सपनों के लिये
एक कैक्टस पनप ही जाता है उसी क्षार में
चुभता है और सोने नहीं देता

तितलियों से बतिया लूँ उनकी भाषा में
पहाड़ों की चोटी पर पैर रख दूँ तो समतल हो जाये ज़मीन
कुरेद दूँ रेत तो मीठे पानी की सोता फूट पड़े
ये बचपन के सपनें तो दूर
फिर से बच्चा बन जाने तक का सपना भी देख लूँ तो नींद में चीख पड़ता हूँ

इस क्रूर समय में आँखें खो देने का डर
हर सपने पर भारी है
बिना नींद और सपने का एक देश
विक्षिप्तता की तैयारी है

सुबह

सोचता हूँ कि
कितना चक्रवर्ती होगा वह सम्राट
जिसके कहने पर सूरज अनवरत दहकता है
अपनी हड्डियाँ लगातार बदलता है लावे में।
और एक मुट्ठी राख तक नहीं छोड़ता।

जलो तो राख हो जाने की छूट तो होनी ही चाहिए
चीखने से रोकना तानाशाहों की निशानी है।

दाह में निकली चीख पुकार तो किसी ने सुनी नहीं
पर लोर पहुँचती है धरती तक
धरती के बेटों का जलवा यह है कि
इन लोरों का उपहास उड़ाते हैं
कभी तरंग तो कभी कण कहकर

यह दाह से उपजी लोर नहीं है
मगरमच्छ है सूरज

अपनी सुबह के लिये किसी का दाह…

इस षड्यंत्र में उल्लू व चमगादड़ शामिल नहीं हैं
इस छोटे से विरोध से भी भयभीत है चक्रवर्ती
एक के लिए धन प्रलोभन के द्वार खोल दिये गये हैं
दूसरे को दिया गया है स्तनधारी होने पर
उड़ने का वरदान

हम सब उसी चक्रवर्ती की संतान हैं
वह परम दयालु है
आप कहते रहो मुझे उल्लू
मैं तो नहीं मानूँगा!

नव वर्ष 

नव वर्ष छुएँ आपको

जैसे पहली ओस ने छुआँ हो पाँखुरी को
पसीने से तर शरीर को छूती है
नदियाँ किनारे बाग से चलती हवा।

जैसे चाँद से चेहरे को
अम्मा के काज़ल ने छुआ हो
डिठौंना बनकर
जैसे हुलस कर आशीष में उठे पिता के हाथ
छूँ लेते हैं पूरे शरीर को
भले ही हमनें आधा झुककर छुएँ हो पाँव।
जैसे प्रार्थना के मंत्र छूतें हैं अवसादित मन pको
प्यासे, थके पथिक को छूँ लेता है
निर्जन सरोवर का जल।

या फिर ऐसे
जैसे बिस्मिल्ला ने छूँई हो शहनाई.

ऐसे बिल्कुल न छुए
जैसे नमक की बड़ी-सी डली छूती है
नवजात बिटियाँ के
कंठ, जिह्वा, तालू, श्वांस नली को
सवार हो जाती है नन्हीं-सी चीख पर
उसके शांत हो जाने तक।

बकैती

हर चर-अचर के भीतर
एक आत्मा होती है
और मेरे?
स्त्री-कंठ का प्रश्न था
तुम्हारी आत्मा तुम्हारी देह के बाहर है
चिड़िया की तरह बैठी रहती है काँधे पर
बिजूका के हिलने की आहट पाते ही
फुर्र से उड़ जाती है
जब तब यह बिजूका है तुम देह हो।
यह पानी पर लिखी एक किताब के
पहले पन्ने पर लिखा है औरत!

सारे जीव-जन्तुओं को समान अधिकार है
जीवित रहने का!
फिर झटके से मेरी गर्दन उड़ा देने का औचित्य?
जब खाल उतरनी ही है तो पहनाता क्यों हैं बचपन में
मेरे जीवन का अधिकार लंबित है सदियों से
गर्दन बचाते हुये जिबहबेला में मेमिआते
एक अनपढ बकरे के जिरह को ख़ारिज किया
एक आसमानी किताब के बीच के पन्ने ने!

सब पदार्थ एक ही परम पिता के रचे हुए हैं
तो फिर चंदन माथे पर क्यों है
और मैं ख़ुश्बू के बावजूद पाँव में क्यों?
इस गुस्ताख प्रश्न पर ही कई फूलों की गंध
छीन ली गई
यह वाकया दर्ज है
उस किताब के आखिरी पन्ने पर
जिसके हर्फ़ हवा में उभरे थे!

इतने युगों से बरस रहा है पानी
धरती तक ठंडीे हो चली
पर इन किताबों में आग धधक रही है अब तक
खुलते ही जला देते हैं दो-चार घर!

इस उमस भरे मौसम में
मुझे उम्मीद बस दीमकों से है
वो चट कर जाये हर उस किताब का पन्ना पन्ना
जहाँ ईश्वर बैठा-बैठा
बकैती करता रहता है!

आविष्कार

मैं कुछ नये भाव रचना चाहता हूँ
जो अचरो के मन में बसे हो अबतक
जिनकी पहुँच आदमी तक न हो पायी हो
जैसे़ अपने देह से शाखा निकल आने का सुख
या फिर वह सीमांत दुख जिसमें जिंदा हरी छाल
छीली दी जाती हैं कुल्हाड़ी से
सफेद-सा द्रव्य कुल्हाड़ी की जीभ भिगोता हैं
और वह पागल हो जाती हैं!

कमजोर के खून और
और दबंग के लार का रिश्ता
आदम और हव्वा से भी पुराना है!

इन भावों का सूत्र खोजने
आबनूस से भी गहरे काले कंदराओ में भटकना होगा
कोटरो में सर डालकर
उनके भीतर रखे संदूको के ताले तोड़ने होंगे
पेड़ों की भाषा सीखनी होगी
जड़ों के रूदन और फुनगी का अट्टहास का
पुश्तैनी इतिहास समझना होगा!

इन भावों को रोपना है
किसी चर में
जो अचरो से बस एक कदम आगे हो
जिसने डग भरने सीखें ही हो
अधिक से अधिक सीखा हो कुलाचें भरना!

ऐसा आदम मिले तो बताना
जिसके पाँव तो हो
पर वह रौंदना न जानता हो!

घास 

पाँवो तले रौदें जाने की आदत यूँ हैं
कि छूटती ही नहीं
किसी फार्म हाऊस के लान में भी उगा दिया जाँऊ
तो मन मचल ही जाता है
मालिक के जूती देख कर!
इस आदत के पार्श्व में एक पूरी यात्रा हैं
पूर्व एशिया से लेकर उत्तर यूरोप तक की
जिसे तय किया है मैने
कुछ चील कौवों के मदद से
मैं चील के चोंच से उतना नहीं डरता
जितना आदम के एक आहट से डरता हूँ

मैंने आजतक
बिना दंराती लिये हुये आदमी नहीं देखा!

शेर भले रहते हो खोंहो में
पर बयाँ, मैना, कबूतर के घर
मैंने बनाये हैं
मैंने ही पाला है उन सबको
जिनके पास रीढ़ नहीं थी
मसलन सांप, बिच्छू और गोजर!
मैंने कभीनहीं चाहा
कि इतना ऊपर उठूं
जितना ऊंचा है चीड़
या जड़े इतनी गहरी जमा लूं
ज्यो जमाता हैं शीशम
धरती को ताप से
जितना मैंने बचाया है
उतना दावा देवदार के जंगल
भी नहीं कर सकते
जिन्होंने छिका रखी हैं
चौथाई दुनिया की जमीन

मैं उन सब का भोजन हूँ
जिनकी गरदन लंबी नहीं हैं!
मैं उग सकता हूँ
साइबेरिया से लेकर अफ्रीका तक
मैं जितनी तेजी
से फैल सकता हूँ
उससे कई गुना तेजी से
काटा और उखाड़ा जा रहा हूँ।

मैं सबसे पहला अंत हूँ
किसी भी शुरुआत का!

मैं कटने पर चीखता तक नहीं
जैसे पीपल, सागौन और
दूसरे चीखते हैं
मेरे पास प्रतिरोध की वह
भाषा नहीं हैं
जिसे आदमी समझता हो
जबकि उसे मालूम हैं कि मुझे बस
सूरज से हाथ मिलाने भर की देर हैं
ऐसा कोई जंगल नहीं
जो मैं राख न कर सकूँ।
मुझे काटा जा रहा है चीन में
मैं मिट रहा हूँ रूस में
रौंदा जा रहा हूँ
यूरोप से लेकर अफ्रीका तक
पर मेरे उगने के
ताकत और डटे रहने की
जिजीविषा का अंदाजा
नहीं है तुमको!

मैं मिलूंगा तुम्हें
चांद पर धब्बा बनकर
और हाँ मंगल का रंग भी लाल हैं!

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