अछूतानन्दजी ‘हरिहर’ की रचनाएँ

आल्हा

पहले सुमरों सतगुर स्वामी, दीन्हा लौकिक आतम ज्ञान,
ब्रह्म रूप चेतन घट-घट में, व्यापक सकल सृष्टि दरम्यान।

सो ही आदि शक्ति सत्ता में, होय तत्व संयोग वियोग।
नज़र पसार लखो जो कुछ भी, है सब माया में उपयोग।

अलख अनादि अदेह अनूपम, आतम रूप झलक दर्शाय।
है प्रत्यक्ष समक्ष सभी कै, तौ भी सहज समझ नहिं आय।

बिन पारख के भेद न पाये, जीवन मुक्ति साधना मूल।
माया ब्रह्म विचार सार है, क्रम विकास विज्ञान उसूल।

सो खगोल विद्या बिन जाने, जग विज्ञान समझ में पोल।
ब्रह्म विलक्षणता माया में, बने नक्षत्र ग्रहादि खगोल।

ऐसे गोले बहुत बने हैं, जिन में लोक बसें अनमोल।
उन में से ही एक हमारा, यही भूमि गोला भूगोल।

जिस भूमण्डल पर हम बस्ते, उस का एक अंश ये खण्ड।
जम्बू दीप मध्य में हैं ये, हिन्दुस्तान सार भूमण्ड।

देश हिन्द है नाम पुराना, कुछ तारीफ करी ना जाय।
…गण्य उन्नत सब ही से, सभ्य हमी थे वेद बताय।

देखो पारसीन की पुस्तक, सशातीर नामः जरतुस्त।
जो है वैदिक वंश आर्यन, ईरान आयरीशादी दुरुस्त।

इक थैली के चट्टा बट्टा, पुरातत्व वेत्ता बतलाँय।
अनुसन्धान किया सब भारी, जिन आये सब सीस झुकाय।

शब्दापेक्षिकी विद्या जो, भाषा तत्व खोज है सार।
ज़न्दावस्ता छन्द व्यवस्था, अपभ्रन्शादि किया सुविचार।

यो ही रिग्वेद आदिक भाषा, मिला देखिये ज़न्द ज़बान।
सात हजार वर्ष निगचानै, जब से आर्य्यं बसे यहं आन।

आर्य जाति पर जो कुछ बीता, वोरिग रिचा मंत्र में गान।
सबसे है प्राचीन ग्रन्थ सो, सायण भाष्य वेद व्याख्यान।

आर्य जाति का आल्ह खण्ड है, वो रिगवेद युद्ध का भेद।
बहुतक रिषियों ने गाई है, स्तुति इन्द्रादिक की करि खेद।

विश्वामित्र के सुत मधुछन्दा, उन के जेता सुत निर्लेप।
कण्व पुत्र मेंधातिथि कहिये, अजीगर्त के सुत शुनः शेष।

वशिष्ठ बन्सीशक्ति परासर, लोपामुद्रा अगस्त की नार।
जिन के नाम मन्त्र में आये, ऐसी बहुतन करी पुकार।

उसी वेद से पता चलाया, सुनी जो पुरखन की मौखादि।
के हम आदि वन्श हैं हिन्दू, और द्विजाती कहिये बाद।

पण्डित पत्रा वेद छिपाये, बन्श भेद नहिं हमें सुनाँय।
उल्ट भुलावो देयं सभी को, गुण गौरव प्राचीन मिटायँ।

और नीच कहके हम सब पर, करें जुल्म और अत्याचार।
उन्नति पद पर नहिं चढ़ने दें, रखें बनाय गुलाम गंमार।

पुनर्जन्म का रच ढकोसला, प्रारम्भ घर के सिर भार।
की तुम पूर्वले कर्मों से, जन्में नीच जाति मंझार।

सेवा कर्म तुम्हारा ही है, तुम हो इस के ठेकेदार।
गाली मार हमार सहो सिर, करो अछूतो तुम बेगार।

यही हुक्म है नारायण का, शूद्रों भोगो सेवा कर्म।
फेर जन्म जब पाओगे तो, तुम्हें मिले द्विज जाति धर्म।

धर्म मनुष्यत्व ही भुलाया, रचा पशुत्व स्वार्थ का जाल।
यहाँ कि बातें यहीं रह गईं, अब पीछे का सुनिये हाल।

आर्य जाति जब आई हिन्द में, स्वर्ण भूमि लखि के सुख पाये।
आदि हिन्दुओं से लड़ भिड़ के, रही सिंधु तट छप्पर छाय।

धन दौलत की कौन चलाई, धातु पात्र भी नहीं नसीब।
मिट्टी कूंडे काठ कठौती, भर-भर पीवें सोम गरीब।

जौ पत्थर पर भूंजें चाबें, सत्तू फाँकि करें गुजरान।
गऊ मेध कुर्बानी मानें, अश्व मेध घोड़ा बलिदान।

अजामेध बकरी को काटें, छांटे बांटे हिस्से दार।
वेद उपनिषद मीमांसा में, विधि बतलाँय पुकार-पुकार।

चौथा है नरमेध यज्ञ बलि, राजे शत्रु तहाँ चढ़वाँय।
आदि सभ्यता में ये हरकत, हैवानियत बन्द करवाँय।

अर्थ छिपाय शुभःशेष के, तहु शतपथ ब्राह्मण में पायें।
‘अश्वालम्ब, गवालम्बम् कलि, पन्च विवर्जित’ शास्त्र बताँय।

वेद मन्त्र में गाँवें ये सब, हालत निज आर्य्य दर्शायें।
‘माँस भिक्षा मुपासीत’यों, यज्ञ प्रसादी माँगें खायें।

घोड़े, गौ, धन, अन्न, नगर, घर, किले पुरन्दर इच्छा वान।
बड़ी चाह से माँगे खेती, करें प्रार्थना आर्यं किसान।

अग्नि, वायु, सूर्य, इन्द्र, वरुण, इत्यादि देव की पूजा ठान।
आदि वन्श पै वे चढ़ दौड़े, डाकू छली आर्य्य हयवान।

स्वर्ण भूमि की खातिर तन-मन, सेती करें युद्ध घमसान।
भय खाँवे विनती कथ गावें, करि-करि इन्द्र देव का ध्यान।

अगुवा आर्य जाति ने माना, दिवोदास के धर सिर ताज।
वृत्र कृष्ण संवर नेता थे, आदि हिन्दुवन के महाराज।

जिनके सौ-सौ किले बने थे, अर्ध लाख सेना संग साज।
भारी युद्ध किया आर्यन से, होन हार की पड़ गई गाज।

छलौ छिद्र रच किले छीन कर, धोखे से कारे सब काज।
साम दाम और दंड भेद ये, कपट नीति से किया स्वराज।

धर्म नीति से आर्य जो लड़ते,तो गिनती के साढ़े तीन।
इने गिने सब मारे जाते, के गुलाम बनते आधीन।

फोड़-फोड़ कर भेद नीति से, द्विज श्रेणी रच दी मखलूत।
रिश्तेदारी तक कर डाली, वैदिक मत के पढ़ो सबूत।

संस्कार सोरह फैलाए, होम यज्ञ के रचे विधान।
सौ भी चिन्ह प्रबल प्राचीनी, छूट गई नहिं रस्म निदान।

जो सब में अब तक फैली है, रीति नाग पंचमी मनाँय।
घर-घर नारि नाग लिख पूजे, सेना, गढ़, गजहय, रथ गाय।

होरी, भुंजरिया, पीपल, तुलसी, बट पूजन बृक्षन व्यौहार।
कोल भील द्राविड़ आदिन में, यही गोत और तीज तौहार।

कृष्ण आदि हिन्दू राजा तो, गो वर्धन पूजा कर वाँय।
आर्य देवता इन्द्र छुड़ाया, वैदौ भागवत जंग जनाँय।

जो कि स्वाभिमान हित बन गए, युद्ध समय प्राचीनी गाँय।
पकड़े उन्हें गुलाम बनाए, शूद्र अछूत नाम धरवाँय।

इन सब में क्या द्विज जातिन में, भी वह प्रथा लीजिए देख।
हाँ! अब नए आर्य त्यागत हैं, पर नहिं मिटने के ये लेख।

यों दो जातिन के मिलने से, हुई द्विजातीय थी तैयार।
उन में शैव शाक्य वैष्णव हैं, करें वही प्राचीन प्रचार।

वे ही दो जन्मज रीतिन को, धर्म मध्य धारण कर वाँय।
सोई सनातन अर्थ आदि के, प्राचीनी हिन्दू कहलाँय।

बहुत गोत हैं शूद्ध सनातन, जो न वेद वाणी में पाँय।
वही कुदरती बनवासिन के, गोत शूद्र द्विज सभी रखाँय।

यों ये आदि बन्श से निकले, और अभी भी निकरत जाँय।
नहीं वर्ण संकर शूद्रदिक, द्विज हो तो ऐसे दर्शांय।

रीषि जाबाल पिता नहिं जिनके, माता ने बतलाए अनेक।
जाने किसका गर्भ रहा था, छाँदोग्य में ये गाथा-एक।

गणिका गर्भः संभूतो थे, मुनि वशिष्ठ वैदिक विद्वान।
जिनकी कथा मंत्र वेद रिग, में है पैदायश व्याख्यान।

स्वयं मंत्र रचता हो गये थे, मंत्री दिवोदास के दोय।
वशिष्ठ विश्वामित्र परस्पर, द्वेषी थे पढ़ लीजे कोय।

रिग्वेद मंडल पढ़ो तीसरा, जिनके अर्थ छिपायें आर्य।
उल्टे अर्थ किये हैं तौ भी, बहुत प्रमाण मिले अनिवार्य।

सायण भाष्य श्रेष्ठ सब में है, जिनको माने सर्व सुजान।
दयानन्द भाष्य में बदला, अर्थ छिपा इतिहासिक ज्ञान।

कवित्त 

स्वामी दयानन्द ने यों खेद ले विचार किया,
वेद अधिकार यदि शूद्रन ना बतायेंगे।
तब तो न शूद्र जाति द्विजन की सेवक रहात,
इनको तो ईसाई या मुसलमां अपनायेंगे।
यदि अधिकार देत तो बपौती बेर लेत,
क्योंकि रिग्वेद में संग्राम पढ़ पायेंगे।
याते हैं उपाय एक रहे न इतिहास नेक,
अर्थ माँहिं आदि हिन्दू बंश को मिटायेंगे।

अछूत यानी पवित्र बंश का, रहने देय न गौरव मान,
यों सब संस्कृति छलवादि, मिटा रहे निज बंश महान।

आर्य वंश तादाद बढ़ायें, आदि निवासी देंय घटाए,
अपनी जथा प्रबल कर लेवें, औरन देवें निबल बनाय।

इसी नीति पर वर्ण व्यवस्था, रच के धर्म चलाई चाल,
रखें गुलामी में फुसला कर, धर्म आड़ में करें हलाल।

जो कोई होनहार निज बल से, पढ़ लिख लेंय वेद इतिहास,
उसे खेंच लें द्विज श्रेणी में, करने पाय न बंश विकास।

जो कहीं रह के जोश प्रचारे, तो देवेगा बंश जगाय,
जो जग जावें असली हिन्दू, नकलिन की दुर्गति हो जाय।

कौन गुलामी करे हमारी, हमको फेर कहाँ आराम,
सुख सपने हूँ में नहिं मिलिहें, करिहें कौन-कौन हम काम।

हम से मेहनत नहिं होने की, परे-परे हम पाप कमायँ
ब्याज त्याज घर फँसा गरीबन, कलम कसाई बन धन खाँय।

जिन के श्रम से भए धनिक हम, कैसे करें इन्हें आजाद,
रूखे रोट महनती खा के, हमें देयं छत्तीसों स्वाद।

यही सबब व्यौपार द्विजों ने, अपने रखा गोल के हाथ,
जिससे धन बल बढ़े न विद्या, ऊपर उठें न होंय सनाथ।

जो आजाद होन तुम चाहो, तो अब छाँट देउ सब ‘छूत’,
आदिबंश मिल जोर लगाओ, पन्द्रह कोटि सछूत ‘अछूत’।

आदि-वंश का डंका 

आदि हिन्दू का डंगा बजाते चलो।
कौम को नींद से जगाते चलो।

हम जमीं हिन्द के आदि सन्तान हैं,
और आजाद हैं, खूब सज्ञान हैं,
अपने अधिकारों, पर दे रहे ध्यान हैं,

संगठन कौम में अबबढ़ाते चलो।
आदि हिन्दू का डंका बजाते चलो।

आर्य-शक-हूण बाहर से आये यहाँ,
और मुसलिम ईसाई जो छाये यहाँ,
सब विदेशी हैं कब्जा जमाये यहाँ,

खोलकर सारी बातें बताते चलो।
आदि-हिन्दू का डंका बजाते चलो।

दो विदेशी फक़त और हम आठ हैं,
हम हैं बहुजन मगर, उनके ही ठाठ हैं,
हमको पढ़ने-पढ़ाने यही पाठ हैं,

ख्वाबे-गफलत का परदा हटाते चलो।
आदि-हिन्दू का डंका बजाते चलो।

इन लुटेरों के चक्कर में तुममतपड़ो,
कायदे की लड़ाई है, डटकर लड़ो,
उठ खड़े हो कमर बाँध हक पर अड़ो,

काम बिगड़े हुए सब बनाते चलो।
कौम को नींद से अब जगाते चलो।

प्रभात फेरी (कव्वाली)

ऐ आदि-वंश वालो! जागो, हुआ सवेरा।
अब मोह-नींद त्यागो, देखो हुआ उजेरा॥
अन्याय की निशा से, अन्धेर से न डरना।
होगा उदय तुम्हार, भागेगा दुख घनेरा॥
सब जग चुके, तुम्हीं क्यों सोये हुए पड़े हो?
फुर्ती से उठ खड़े हो, साहस करो करेरा॥
ऐ नवजवान जागो, सोने दो वृद्धजन को।
अब मुल्क से मिटा दो अन्याय का अंधेरा॥
प्रति सैकड़ा तुम्हारी अस्सी विशाल संख्या।
दुख दूर दासता का करदो हुआ अबेरा॥
तुम हो निसर्ग से ही, भारत के आदि-स्वामी।
गैरों का हो गया है, इस देश में बसेरा॥

सवर्णों को चेतावनी

राम-कृष्ण की पूजा करके चंदन-तिलक लगाते हो।
किंतु कुकर्मों के करने में, नेक न कभी लजाते हो॥
लकड़ी और नमक को धोकर चौके में ले जाते हो।
पर हमने आँखों देखा है, होटल में तुम खाते हो॥

यद्यपि हमारे लिये कुओं का, पानी बन्द कराते हो।
पारटियों में पर तुम जूठा पानी भी पी जाते हो॥
मन्दिर में हम जाते हैं, तो बाहर हमें भगाते हो।
बड़ी-बड़ी शानें भरते हो, हमें अछूत बतातेहो॥

किन्तु मन्दिरों में तुम पशु बन, अपनी लाज गँवाते हो।
देव-दासियों के संग में नित काले पाप कमाते हो॥
संड मुसंड पुजारी रखकर अबलों को फुसलाते हो।
इस प्रकार तुम धर्म नाम पर महाठगी कर खाते हो॥

छाया पड़े हमारी तुम पर, तो दो बार नहाते हो।
किन्तु यवन के साथ खुशी से हँसकर हाथ मिलाते हो॥
हम सेवा करते हैं जब तक, तब तक तुम ठुकराते हो।
किन्तु विधर्मी बन जाने पर अपने साथ बिठाते हो॥

हमको देख घृणित भावों को मन में सदा जगाते हो।
पास बिठाते हो कुत्ते को, हमको दूर भगाते हो॥
हमको तो ठुकराते हो तुम, उनको गले लगाते हो।
जिनको गोभक्षी कहते हो, जिनको यवन बताते हो॥

दंगे जब होते हैं, तब तुम दुबक घरों में जाते हो।
बहु-बेटियों तक की लज्जा डरकर नहीं बचाते हो॥
कभी जनेऊ को तुड़वाकर चोटी तक कटवाते हो।
ठाकुर-पूजा तिलक लगाना, भूल सभी तब जाते हो॥

त्राहि-त्राहि कर घर भीतर से तब हमको चिल्लाते हो।
काम हमीं तब आते, पर तुम हमको ही लड़वाते हो॥
होकर ऋणी हमारे ही तुम, हम ही को ठुकराते हो।
हम सेवा करते हैं, पर तुम हमको नीच बताते हो॥

हम तो शुद्ध-बुद्ध मानव हैं, पर तुम परख न पाते हो।
घुसे छूत के कीड़े सिर में, इससे तुम चिल्लाते हो॥
हम करते अब छूत-झड़ौवल, ठहरो, क्यों घबराते हो?
संभलो! क्यों अपने ही हाथों नष्ट हुए तुम जाते हो॥

आत्म-विज्ञान (भजन) 

था हमको नहिं यह ज्ञान, आदि-मत हिंद-निवासी थे। टेक
विद्या से पता लगाया, गुरुता गौरव दर्शाया।
सब दूर हुआ अज्ञान, भुला रहे सत्यानासी थे॥
लिख दी झूठी बदनामी, हा! संकर-बरन हरामी।
रच-रच के कथा पुराण, बनाये दासो-दासी थी॥
जन्मे शूद्र-योनि में आकर, पूर्व के फलों को पाकर।
कहें हुक्म दिया भगवान, किये यों अँध विश्वासी थे॥
जब जीव अनादि बताया, फिर कौन कर्म फल पाया।
तब आदि सृष्टि दरम्यान, न देह कर्मेन्द्रिय वासी थे॥
ईश्वर-अंश जीव अविनासी, चेतन अमल सहज सुखरासी.
सब वेद-शास्त्र यों कहें, व्यास वेदांत-विकासी थे॥
बिन देह कर्म नहीं होगा, फिर कहाँ कर्म का भोगा।
क्यों जन्मे नीच घर आन, जीव ‘हरिहर’ अनिवासी थे॥

इतिहास-ज्ञान (ग़ज़ल) 

वेद में भेद छिपा था, हमें मालूम न था।
हाल पोशीदा रखा था, हमें मालूम न था॥
कदीम वासी हैं हम, हिंद के असली स्वामी।
हमारा राज यहाँ था, हमें मालूम न था॥
विष्णु ने छल के बली, देश ले लिया जब से।
वंश ये नीचे गिरा था, हमें मालूम न था॥
ब्राह्मणी पोथी पुराणों में, निरी भर उलझन।
फसाना जाली रचा था, हमें मालूम न था॥
मनु ने सख्त थे कानून बनाये ‘हरिहर’ ।
पढ़ाना कतई मना था, हमें मालूम न था॥

खरी-खरी फटकार 

मैं अछूत हूँ, छूत न मुझमें, फिर क्यों जग ठुकराता है?
छूने में भी पाप मनता, छाया से घबराता है?

मुझे देख नाकें सिकोड़ता, दूर हटा वह जाता है।
‘हरिजन’ भी कहता है मुझको, हरि से विलग कराता है॥
फिर जब धर्म बदल जाता है, मुसलमान बन जाता हूँ।
अथवा ईसाई बन करके, हैट लगाकर आता हूँ।

छूत-छात तब मिट जाती है, साहब मैं कहलाता हूँ।
उन्हीं मन्दिरों में जा करके, उन्हें पवित्र बनाता हूँ॥
क्या कारण इस परिवर्तन का, ऐ हिंद बतला दे तू?
क्यों न तजूँ इस अधम धर्म को? इसे ज़रा जतला दे तू?

नहीं-नहीं मैं समझ गया, क्या मेरा तेरा नाता है।
तू है मेरा शत्रु पुराना, अपना बैर चुकाता है॥
उत्तर धु्रव से, तिब्बत होकर, तू भारत में घुस आया।
छीन लिया छल-बल से सब कुछ, बहुत जुल्म मुझ पर ढाया॥

हो गृहहीन फिरा मैं वन-वन फिर जब बस्ती में आया।
कह ‘अछूत दूर-दूर हट’ जालिम, तूने मुझको ठुकराया॥
कड़े-कड़े कानून बनाये, बस्ती बाहर ठौर दिया।
बदल गया अब सब कुछ भाई! पर तेरा बदला न हिया॥

उसी भाव से अब भी जालिम! तू मुझको कलपाता है।
भाईपन का भाव हिये मेें, तेरे कभी न आता है॥
रस्सी जल न ऐंठन छूटी, तेरा यही तमाशा है।
घर में घृणा, गैर की ठोकर, करता सुख की आशा है॥

समझ-सोचकर चेत, अरे अभिमानी! कर ईश्वर का ध्यान।
मिट जायेगा तू दुनिया से, अरे! समझता नर को श्वान्॥
कभी न तेरा भला होयगा, जो मुझको ठुकरायेगा।
दुर्गति के खंदक में ‘हरिहर’ तू इक दिन गिर जायेगा॥

मनुस्मृति से जलन (कव्वाली)

निश दिन मनुस्मृति ये हमको जला रही है।
ऊपर न उठने देती, नीचे गिरा रही है॥
ब्राह्मण व क्षत्रियों को सबका बनाया अफसर।
हमको “पुराने उतरन पहनो” बता रही है॥
दौलत कभी न जोड़े, गर हो तो छीन लें वह।
फिर ‘नीच’ कह हमारा, दिल भी दुखा रही है॥
कुत्ते व बिल्ली मक्खी, से भी बना के नीचा।
हा शोक! ग्राम बाहर, हमको बसा रही है॥
हमको बिना मजूरी, बैलों के साथ जातें।
गाली व मार उस पर, हमको दिला रही है॥
लेते बेगार, खाना तक पेट भर न देते।
बच्चे तड़पते भूखों, क्या जुल्म ढा रही है॥
ऐ हिन्दू कौम! सुन ले, तेरा भला न होगा।
हम बेकसों को ‘हरिहर’ गर तू रुला रही है॥

चेतावनी (ग़ज़ल)

पुरखे हमारे थे बादशाह, तुम्हें याद हों कि न याद हो।
अब हिन्द में हम हैं तबाह, तुम्हें याद हो कि न याद हो॥

इतिहास में जो नामवर, थे वीर पराक्रमी धनुर्धर।
आये थे आर्य यहाँ नये, हमको हजम जो कर गये।

छल-बल से वे मालिक भये, तुम्हें याद हो कि न याद हो॥
यदि खून में कुछ जोश हो, ओ बेहोश कौमों, जो होश हो।

तुम क्यों पड़े खामोश हो, तुम्हें याद हो कि न याद हो॥
अब भी हमारी राय लो, सभी आदि हिन्दू बनाय लो।

इतिहास-ज्ञान जगाय लो, तुम्हें याद हो कि न याद हो॥
‘हरिहर’ समय अनुकूल है, अब भी न चेतो, भूल है।
गहरी तुम्हारी मूल है, तुम्हें याद हो कि न याद हो।

इतिहास-ज्ञान 

आये थे अब आर्य हिन्द में, तिब्बत का स्थान,
रहती यहाँ सदा से थी इक जाती सभ्य महान।
जिनके थे सैकड़ों किले पाषाणों के मजबूत,
उनको कहे असभ्य नीच जो वह है पूरा ऊत।
शंवर कुयब कृष्ण विश्वक थे महावीर बलवान,
कंपित होते आर्य नाम सुन, छिप जाते भय मान।
सौ-सौ किले सुदृढ़ पत्थर के, दुर्जय सैन्य अपार,
कौन जीत सकता था उनको, मन से जाते हार।
हिरनकशिपु बलि और विरोचन महाप्रतापी वीर,
वैदिक देव काँपते थर-थर, छूट गया था धीर।
तब षड़यन्त्र रचा आर्यों ने सौ यज्ञों का स्वांग,
राजा बलि को फांस दान में लिया त्रिलोकी मांग।
फिर कब्जा कर लिया देश पर भेज उन्हें पाताल,
जनता मारी गई मुफ्त में, हुआ देश पामाल।
यों छल से ले लिया छीन उनका सारा धनधाम,
दस्यु-दास शूद्रादिक कह जनता को किया गुलाम।
नहीं गुलामी रुची जिन्हें वे गये वनों में भाज,
कोल भील संताल गोंड वे बांके तीरन्दाज।
आर्य-विजय की लीला तुमको ‘हरिहर’ गये सुनाय,
देखो तो इतिहास पुराना ऋक्संहिता उठाय।

आदिवंश-अष्टक

जय आदि ब्रह्म अवतारा ‘छूत’ और छल-माया से न्यारा।
जागे आदिम वंश हमारा, “छूत-विवर्जित” अछूत प्यारा॥
जै-जै आदिब्रह्म सब घट में, आत्मशक्ति चेतन जड़पट में।
है कारण उतपति निस्तारा, जागै आदिम वंश हमारा॥
आतम-अनुभव आदिधर्म गति, सभी मतों की जो है उतपति।
जीवन मुक्ति ज्ञान दातारा, जागै आदिम वंश हमारा॥
“एतद्देश प्रसूत अग्रजन्मा” “संस्कार से बने द्विजन्मा”।
मूल-वंश का सब विस्तारा, जागै आदिम वंश हमारा॥
आदि-ज्ञान सत्भेद छिपाते, रूपान्तर संस्कृती बनाते।
करते हैं यो द्विज संस्कारा, जागै आदिम वंश हमारा॥
मतवादी अपस्वार्थ चाल से, फांस फोड़ प्राचीन काल से।
नाश करै गुण-गौरव सारा, जागै आदिम वंश हमारा॥
भेद वेद में वंश बड़ाई, विश्व-विजय भुलवाते भाई.
त्रैलोकी बलि छल से मारा, जागै आदिम वंश हमारा॥
उठो! उठाओ! अब भी प्यारो, जगो! जगाओ! वंश उबारो।
बजा देओ फिर विजय नगारा, जागै आदिम वंश हमारा॥
आत्मिक, लौकिक दोनों मग में, पग धर भरो जोश रग-रग में।
“संत” साम्य संगठन हमारा, जागै आदिम वंश हमारा॥

थिएटर-ध्वनि 

जागो जी जागो, असली नाम डुबाने वाले। टेक।
वंश डुबाने वाले, राज गँवाने वाले,
बन के गुलाम ‘दस्यु’ , नाम धराने वाले॥
गफलत में सोने वाले, अटकी पर रोने वाले,
सहते धुत्कार अपना सर्वस्व मिटाने वाले॥
तुमको है निद्रा प्यारी, जग में हो रहे धिक्कारी,
खोके धन-धाम सारा दुक्खों के बढ़ाने वाले॥
तुम तो हो नेशन भारी, मुलकी हक के अधिकारी,
ले लो निज राज ‘हरिहर’ बातों के बनाने वाले॥

अब तो जागो हुआ क्या फजर ही नहीं 

चाहो उठना अगर तो उठो हो निडर,
समझो धड़ पर हमारे है सर ही नहीं।
अब नहीं वह रहा वक्त ऐ भाइयों,
जो मनु ने थी छोड़ी कसर ही नहीं।
जो मिटा नस्ल असली बने दोगले,
वह थे समझे कि हम-सा है नर ही नहीं।
देखे नफ़रत नज़र से जो निज कौम को,
मैं तो समझूं वह कौमी पिसर ही नहीं।
पर कमी एक भारी हमारी भी है,
आलिमों की जो करते क़दर ही नहीं।
यों ही रौनक घटे गुलशने-कौम की,
जो खिला गुल गंवाया, फिकर ही नहीं।
पर सबब है लाइल्मी का अफसोस यह,
मेरे कहने का होता असर ही नहीं।
दस्त बस्ता है “हरिहर” जगाता तुम्हें,
अब तो जागो हुआ क्या फजर ही नहीं?

इतिहास पढ़ के देखो (ख्याल)

हरेक नेशन उठी है यों ही ज़रा तो इतिहास, पढ़ के देखो।
न मानो गर तो ये आर्य जाती का वेद ही खास, पढ़ के देखो।
इस हिन्द में जब ये आई चलकर, तो डाकू वहशी से कम नहीं थी।
तमीज़ ही थी, न मालो दौलत थी उसके पास, पढ़ के देखो॥
मगर है होनी ने ज़ोर मारा, भटकती आ हिन्द में आ पहुँची।
तो हिन्द सोने की सरज़मीं में, किया था जब बास, पढ़ के देखो॥
मगर थे हम हिन्द में तो अफजल, किले हमारे थे सौ-सौ यहाँ पर।
लड़े भी हम, पर हमारा छल से, गया था हो नास, पढ़ के देखो॥
हमारे पुरखे थे सीधे-सच्चे, न जानते थे कपट व छल को।
इसीसे दक्षिण से हट गये वे, ये शोक-उच्छ्वास, पढ़ के देखो॥
बचे जो जकड़े गये वही फिर गुलामी करने को आर्यों की।
वही है ‘हरिहर’ हमारे नेशन बनी जोयों दास, पढ़ के देखो॥

कौमी जोश (ग़ज़ल)

ज़िन्दगी है जो हो खूँ, जोश जिगर में कौमी।
मुर्दा समझो जो हो गर, होश न नर में कौमी॥

लब पर सदा कौम के हो, जाप भी हर दम कौमी।
मुँह से गर निकले भी मजमूँ तो ज़िकर में कौमी॥

भोज में, शादी-ग़मी में, जहाँ भी हों इकजा।
गीत गर नारियाँ गावें, तो हर घर में कौमी॥

ज़िक्र हर बात में हो जात का पुर-राम कौमी।
कहानी किस्से में हर फर्दो बशर में कौमी॥

कथा व पाठ भजन में, भी हो कौमी उपदेश।
ज्ञान और भक्ति जो कुछ हो “हरिहर” हो कौमी॥

प्राचीन हिन्द वाले (ग़ज़ल) 

हम भी कभी थे अफजल, प्राचीन हिन्द वाले।
अब हैं गुलाम निर्बल, प्राचीन हिन्द वाले॥
इतिहास हैं बताते, है शुद्ध खूँ हमारा।
पर अब हैं शूद्र सड़ियल, प्राचीन हिन्द वाले॥
बाहर से क़ौम आई, बसने को जो यहाँ पर।
सब ले लिया था छलबल, प्राचीन हिन्द वाले॥
वे ही हैं द्विजाती ये, पर खल्तमल्त हैं सब।
छाती के बने पीपल, प्राचीन हिन्द वाले॥
अकड़े जो, गयेपकड़े, जकड़े गये वह छल से।
फिर दास बने थल-थल, प्राचीन हिन्द वाले॥
तन-मन व धन निछावर, कर दोगे कौम पर गर।
“हरिहर” बनोगे परिमल, प्राचीन हिन्द वाले॥

शेर-
तवारीखें बताती हैं हर इक कौमों की हालत को।
गिरी हैं या उठीं कैसे, ज़रा इतिहास पढ़ देखो॥

निर्वाणी आत्म-पद (भजन) 

लखोजी संतों, आतम पद निर्बानी।
आतम-तत्व परख पारख कर जीवन-मुक्ति निशानी॥
षट् विकार का कारण कहिए, व्यापक सकल समानी।
आवागमन मरन-जीवन में, परखो सत विज्ञानी॥
जीव नहीं तू ब्रह्म बताया, संतन की ये बानी।
यही व्यास वेदांती गाया, शंकर दत्त बखानी॥
गोरख नानक दादू सुंदर, कह कबीर परखानी।
जीव-ब्रह्म में नहीं कुछ भेदा, तुलसी कहत रमानी॥
जड़-चेतन से और तीसरा, कहो कौन परमानी।
काहे करो कल्पना कोरी, जो ‘हरिहर’ पहचानी॥

सुर्ता-पद-निर्वाण (1)

सुर्ता तन मन धन कुर्बान, है निर्वाण-पद में विचरी।
जागा आतम-अनुभव ज्ञान, परख सतगुरु से करी॥
सुर्ता सत्य सार पहिचान, यथारथ की जाँच परी।
तब रोचक भयानक जान, अंध विश्वास बिसरी॥
सुर्ता आत्मिक दैहिक मान, त्याग मत देय तिसरी।
बिन दैशिक वृत्ति विज्ञान, शूद्ध नहिं होत खरी॥
सुर्ता तीनों अनुभव प्रमाण, प्रमेय, पारख ले धरी।
पाया जीवन-मुक्ति निसान, “हरिहर” व्याधि हरी॥

सुर्ता-पद-निर्वाण (2)

सुर्ता अनुभव पद में आन, ज्ञान निर्वाण लहै।
यहाँ पक्षपात नहिं कोय, अंध विश्वास दहै॥
सुर्ता रोचक भयानक भर्म, लहर में क्यों है बहै।
अब खोज ले यथारथ ज्ञान, परख सत पंथ गहै॥
ये तो आलम अलख हुजूर, नूर भरपूर रहै।
लखि माया ब्रह्म विकास, भर्म दुख क्यों सहै॥
जग जड़ चेतन का मेल, खेल कुछ और न है।
सुन मुक्तानन्द ये सैन, बैन “हरिहर” है कहै॥

पारख-पंचक

जब तक पारख आय ना, अनुभव तीन प्रकार।
हरि-पद निर्भय पाय ना, सत्य विवेक विचार॥

आदि सृष्टि या उत्पत्ति में तो, सब सर्वज्ञ समान हुए.
पाँच तत्व का ढाँचा ये है, देह इसी में प्राण हुए.

तत्वों के मिश्रण में जागी, जोति विलक्षण भान हुए.
जीव, जीवन शक्ति विकासक और प्रकाशक ज्ञान हुए॥

ज्ञानकोष मानुष में पूरे और अधूरे नास्तिक हैं।
अन-अस्तित्व उपासक, नास्तिक, अस्तिवान ही आस्तिक हैं।

जीव ब्रह्म अद्वैत ज्ञान ही, सत्य शुद्ध है सात्विक है।
मानव हृदयब्रह्म का मंदिर, इसे जानते तात्विक हैं॥

जड़ चेतन सत्ता-मिश्रण से, सभी सर्जना फैली है।
यही आत्म-अनुभव संतों का, पारख-पद की शैली है।

व्यापक ब्रह्म सचेतन प्रत्यक्ष, अन्य कुगति मति थैली है।
निर्विकार है ब्रह्म एक बस और बात सब मैली है॥

है यथार्थ एक साम्य संगठन, शान्ति प्रचारक सुखकारी।
जिसमें सभी मानवी हित हों, सम-दरशी अनुभव-धारी।

आदि-वंश की शाखाएँ मिल आनंदित हों नर-नारी।
आदिधर्म पद मनुष्यत्व लें, ‘अछूत’ और अत्याचारी॥

सब देशों में आदि-वंश ज्यों, मानवता से सम होते।
त्योंही आदि-हिंद के वासी, नहीं किसी से कम होते।

हिन्द मातृ भाषा-भाषी भी, सब “हरिहर” एकसम होते।
यदि छल-छिद्र छूत छैकारी, आदि-हिन्दु आश्रम होते॥

आदिवंशी बसन्त

अब आदिवंश खेलहु बसंत, सब संत करहु दासता अंत॥
है आदिवंश का आदि-धर्म, तजि आत्म-अनुभवी ज्ञान-मर्म।
हो दास दिमागी, शोक! शर्म! क्यों बने अज्ञ सर्वज्ञ संत॥
जग में जो जारी है प्रपंच, तिन मेटन हित दें ध्यान रंच।
जग स्वर्ग बना बनिए विरंच, दल दुख दारिद दासत्व हंत॥
पारख-पद अनुभव ज्ञान-धार, नाशक कुताप त्रय तत्व सार।
आत्मिक, लौकिक, दैहिक सुधार, करिये प्रचार सतमत महन्त॥
भव भ्रमहि भुलाये भई हानि, विषबेलि बोइये द्विजन पानि।
रोचक, अंधक, भयदाय वाणि, संशोधि यथारथ करहु अंत॥

सतगुरु-ज्ञान होरी 

सतगुरु सबहि समझावें, सबन हित होरी रचावें।
ज्ञान-गुलाल मले मन मुख पर, अद्धै अबीर लगावें।
प्रेम परम पिचकारी लेकर, सतसंग रुचि रंग लावें।
तत्व-त्यौहार मनावें॥
छल पाखंड प्रपंच धूर्तता, की धरि धूर उड़ावें।
विज्ञ विवेक विचार प्रचारें, सत्य कबीर सुनावें।
गीत गुण गौरव गावें॥
सन्त सुधार सभाएँ करके, साधु सुसीख सिखावें।
प्रचलित पक्षपात अरु उलझन, सबहि सहज सुलझावें।
द्वेष दुख द्वंद्व दबावें॥
आत्मिक लौकिक उन्नति पथ पर, चतुर सुचाल चलावें।
‘हरिहर’ सबै स्वत्व रक्षित करि, मुलकी हम दिलवावें।
वंश आदिहिन्दू जगावें॥

अछूत (पवित्र) होरी 

होरी खेलौ अछूतौ भाई, छुतैरों से छोर छोड़ाई. टेक
इनके लोभ फंसे जो भाई, उन्नति कबहूँ न पाई.
धोवत धीमर नाई धोती, जूँठनि रहे उठाई.
कहौ क्या पदवी पाई, भरम भ्रम-भूत भगाई॥
जिनको नीच म्लेच्छ द्विज कहते, नफरत बहुत कराई.
उनको ऊँचे ओहदे पदवी, देत हृदय में डराई.
सुविद्या बुद्धि बड़ाई, लखौ मुसलिम ईसाई॥
अंग्रेजन कहँ भंगी बतावत, बकत बहुत बौराई.
बनत आप उनके चपरासी, झाड़त बूटन धाई.
कहाँ तब गई ठकुराई, अछूतन करत सफाई॥
मुलकी हक सब अलग बँटावौ, करहु संगठन भाई.
देखहु मुसलिम भाइन ‘हरिहर’ युनिवर्सिटी खुलवाई.
कालिजहु करत पढ़ाई, अछूतन देहु चेताई॥

आत्मिक आरती (भजन) 

आरति आतम देव की कीजै, ब्रह्म विवेक हृदय धर लीजै॥
परिपूरन को कहँ से आवाहन, सर्वाधार को देउँ कहँ आसन।
स्वच्छ शुद्ध कहँ अधरू आचमन, निर्लेपहिं कहँ चंदन लेपन॥
पुष्प कौन जब वे निर्वासन, निर्गंधहिं कस धूप सुगंधन।
स्वयं प्रकाश जो आतम चैतन, जोति कपूर है तुच्छ दिखावन॥
पान सुपारी मेवा मिष्ठान, पाक प्रसादी छत्तिस व्यंजन।
भोगी भोग बनाय कर भोजन, भोगे नहिं कोइ है निज पालन॥
देह देवालय आतम देवन, ताहि त्याग करे किनकी सेवन।
जाको तू चाहे नर ढूँढन, सो “हरिहर” ब्रह्मानन्द पूरन॥
मन-मंदिर वाको सिंहासन, ज्योतिमान शुच निर्मल चेतन।
आत्मदेव की आरति-पूजन, करहिं प्रेम-युत आदि संतजन॥

निज वंश डुबाना ना चाहिए (ख्याल)

स्वार्थियों की सलाह में आ निज वंश डुबाना ना चहिए.
बाप बना गैरों को नस्ल अस्ली को मिटाना ना चहिए॥
जाति बदलकर शुद्ध खून दागले कहाना ना चहिए.
बहुत हजम करने को फिरें फन्दे में फंसाना ना चहिए॥
सदा सताते रहे जाति को, उनमें मिलाना ना चहिए.
छूत-छात के छल में आकर जाति छिपाना ना चहिए॥
ऊँच-नीच के भय से भीत मन निबल बनाना ना चहिए.
अपने पांव पर होके खड़े बिल्कुल भय खाना ना चहिए॥
क़दम बढ़कर आगे फिर, पीछे न हटाना ना चहिए.
शूर-वीर प्राचीन हिंद के, फिर डर जाना ना चहिए॥
गैर कौम कहें लाख जतन से, मन पिघलाना ना चहिए.
खुदगर्जी में फंसकर अपना सत्य डिगाना ना चहिए॥
अपने जाति-नेताओं से तो, मन को फिराना ना चहिए.
घुटने पेट ओर झुकते हैं, इसे भुलाना ना चहिए॥
ऊँचे पद पाने को क्या संतान पढ़ाना ना चहिए?
करके जाति-सभा जलसे क्या जाति जगाना ना चहिए?
गये गिराये ‘हरिहर’ जिनसे क्या उन्हें हराना ना चहिए?
बैर-बपौती बदले उन्हें क्या मजा चखाना ना चहिए?

शैर-

चले गर सभा के नियमों पर, तो फिर यह जाति जग जावे।
उठी “हरिहर” बहुत कौमें, यों चलकर कोई अजमावे॥

पारखी संत

भेद कोई सन्त पारखी जाने। टेक
भरमि-भरमि माया में भटकें, जग में फिरें भुलाने।
ब्रह्मजाल के पड़े फंद में, निश दिन रहत दिवाने॥
सीपी को चाँदी, रस्सी को झूठहि सर्प बखाने।
राजपुत्र को ईश्वर माने, रूपहि रहत लुभाने॥
वेदवाद को मर्म न जाने, कर्ता में उलझाने।
जल स्नान को धर्म बखाने, जाति बरन अभिमाने॥
करे जलशयन अग्नी तापे, धरती रहे समाने।
कंठी छाप तिलक माला के, भेस रचै मनमाने॥
नाचै थिरकै कूल्ह उछालै, गाय सुरीले गाने।
लय सुर ताल पै तालि बजावे, आँखी ऐंचै ताने॥
काम क्रोध लालच के चेरे, राग-द्वेष लपटाने।
दर्शन ज्ञान चरित नहिं जाने, शील न कबहुँ पिछाने॥
आतम-अनुभव ज्ञान न “हरिहर” , मन-बुधि नहीं ठिकाने।
देय दृष्टि कोउ संत पारखी, सकल तत्व पहिचाने॥

हक बँटवइयो कि ना? (कजरी)

बोलो आदि-वंश के भाई, मुल्की हक बँटवइयों कि ना॥टेक
बीस कोटि सछूत अछूत हि उहदे दिवइयो कि ना।
अत्याचार बेगार आदि केदुख मिटवइयो कि ना॥
तादाद अनुसार बोर्ड कौंसिल में मेम्बर पहुँचइयो कि ना।
जहाँ कानून कौम-हितकारी भी रचवइयो कि ना॥
दीवान दरोगा मुंशी मुहर्रिर मुंसिफ बनवइयो कि ना।
तहसील अदालत फौज पुलिस में भर्ती करइयो कि ना॥
सूबेदार बहादुर गदर में थे तिनके गुन गइयो कि ना।
‘हरिहर’ पुरखों की सनदें सरकार को दिखइयो कि ना॥

पूर्वी मल्हार बरसाती

जाती नगरिया, बजरिया, डगरिया, सहत-सहत अपमान रे।
आदिवंशी वीर कोई है दुखहरिया, करे जो जाति-उत्थान रे॥
विद्या-विहीन करत बेगरिया, मुल्की हक हूँ भुलान रे।
धन बिन बने सब हाँड़ की ठठरिया, बिसरा वंश-विज्ञान रे॥
द्विज सारे देखैं अति हीन नजरिया, छीन आत्म-अभिमान रे।
दीन बनाय कीन बेदरिया, मिलत न कहुँ सम्मान रे॥
अब सब करें संगठन सहरिया, छूत-अछूत महान रे।
‘हरिहर’ तजि अब मोह-निदरिया, हक बंटवाओ समान रे॥

“हरिजन” पद (भजन)

कियौ हरिजन-पद हमैं प्रदान। टेक
अन्त्यज, पतित, बहिष्कृत, पादज, पंचम शूद्र महान।
संकर बरन और वर्णाधम पद अछूत-उपमान॥
थे पद रचे बहुत ऋषियन ने, हमरे हित धरि ध्यान।
फिर ‘हरिजन’ पद दियै हमैं क्यों, हे गांधी भगवान्॥
हम तो कहत हम आदि-निवासी, आदि-वंस संतान।
भारत भुइयाँ-माता हमरी, जिनकौ लाल निशान॥
आर्य-वंश वारे-सारे तुम, लिये वेद कौ ज्ञान।
पता नहीं कित तें इत आये, बांधत ऊँच मचान॥
‘हरि’ को अर्थ खुदा, ‘जन’ बंदा जानत सकल जहान।
“बंदे खुदा” न बाप-माय का जिनके पता-ठिकान॥
हरिजन हरिदासी, देवदासी, रामजनी-सम मान।
वेश्या-सुत सम जानत सब जन, वैसाई है सनमान॥
हम हरिजन तौ तुम हूँ हरिजन कस न, कहौ श्रीमान?
कि तुम हौ उनके जन, जिनको जगत कहत शैतान॥
हम निसर्ग से भारत-स्वामी, यहु हमरो उद्यान।
‘हरिजन’ कहि ‘हरिहर’ हमरौ तुम, काहे करत अपमान॥

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