अजन्ता देव की रचनाएँ

मेरा मिथ्यालय 

आमंत्रण निमन्त्रण नहीं
अनायास खींच लेता है अपनी ओर
मेरा मिथ्यालय

श्रेष्ठ जनों के बीच
यहीं रचा जाता है
कलाओं का महारास

मेरे द्वार कभी बंद नहीं होते
वे खुले रहेंगे
तुम्हारे जाने के बाद भी ।

विपरीत रसायन

स्त्रियाँ नहीं बन सकतीं शराबी
यह कहा होगा कवि ने
मेरे हाथ से पीकर
अगर बन जातीं स्त्रियाँ शराबी
तो पिलाता कौन

मेरे प्याले भरे हैं मद से
केसर-कस्तूरी झलझला रही है
वैदूर्यमणि-सी
कीमियागर की तरह
मैं मिला रही हूँ
दो विपरीत रसायन
विस्फोट होने को है
मैं प्रतीक्षा करूंगी तुम्हारे डगमगाने की ।

एक माहिया

ये अब्र पुराने हैं
बरसेंगे यहीं आकर
मेरा घर जाने हैं

रामरसोई 

तुम्हारी जिह्वा
ठाँव-कुठाँव टपकाती है लार
इसे काबू करना तुम्हारे वश में कहाँ
तुमने चख लिया है हर रंग का लहू

परन्तु एक बार आओ
मेरी रामरसोई में
अग्नि केवल तुम्हारे जठर में नहीं
मेरे चूल्हे में भी है

यह पृथ्वी स्वयं हांडी बनकर
खदबदा रही है

केवल द्रौपदियों को ही मिलती है
यह हांडी
पाँच पतियों के परमसखा से ।

कैवल्य

झुलनिया के एक आघात से
पहुँचाऊंगी पाताल
सुलाऊंगी शेषनाग के फन पर
डोलेगी धरा
डोलेगी तुम्हारी देह
मेरी लय पर

कभी पैंजनिया कभी पायलिया झंकारेगी
परन्तु कोई नहीं आएगा
इस एकान्त में
जिसे रचा है मैंने
अंधकार के आलोक से

रुको नहीं चले चलो
भय नहीं केवल लय
मैं नहीं तुम कहोगे कैवल्य
मैंने तो गढ़ा है इसे
मैं जानती हूँ इसका मामूली अर्थ
मैं हर रात यह प्रदान करती हूँ ।

तुम्हारा हृदय 

क्या तुम्हारा हृदय तुम्हारा है
अब भी
जबकि तुम्हारे सामने मैं हूँ

जो अलक-पलक चुरा लेती है
हृदय ही नहीं सम्पूर्ण पुरुष
सप्तपदी में ऎसे ही नहीं कहती धर्मपत्नी

यद इयं हृदयं तव
तद इयं हृदयं मम

उसे हर युग में आना पड़ता है
मेरे पास
प्राप्त करने तुम्हारा हृदय ।

अन्य जीवन से

किस लोक के कारीगर हो
कि रेशे उधेड़ कर अंतरिक्ष के
बुना है पटवस्त्र
और कहते हो नदी-सा लहराता दुकूल

होगा नदी-सा
पर मैं नहीं पृथ्वी-सी
कि धारण करूँ यह विराट
अनसिला चादर कर्मफल की तरह
मुझे तो चाहिए एक पोशाक
जिसे काटा-छाँटा गया हो मेरी रेखाओं से मिलाकर
इतना सुचिक्कन कि मेरी त्वचा
इतने बेलबूटे कि याद न आए
हत‌‌भाग्य पतझड़
सारे रंग जो छीने गए हों
अन्य जीवन से

इतना झीना जितना नशा
इतना गठित जितना षड़यंत्र

मैं हर दिन बदलती हूँ चोला
श्रेष्ठजनों की सभा में
आत्मा नहीं हूँ मैं
कि पहने रहूँ एक ही देह
मृत्यु की प्रतीक्षा में ।

त्रिभंग

हर कोई वही देखता है
जिस ओर संकेत करती हैं
मेरी अंगुलियाँ
और मैं
उत्तान बाहें फैलाए रह जाती हूँ त्रिभंग

हंसिनी, मयूरी या मृगी
इन्हें क्या देखना
ये तो नहीं जानतीं स्वयं को
कौतुक से देखती रहतीं हैं मुझे
जब मैं डिखाती हूँ
इनसे भी अदभुत्त इनकी ही भंगिमा

अप्सराएँ आती हैं मेरी सभा में
सीखने वह दिव्य संचालन
प्रेम प्रारम्भ में
दो देहों का नृत्य ही तो है ।

युद्ध न संधि

मेरा हर क्षण बीतता है आमने-सामने
मैं और हवा होते हैं सम्मुख
बन जाता है प्रलयंकारी चक्रवात
सामना करते हैं जल और मैं
समुद्र की तरंगे तट छोड़ देती हैं

मेरे और मेघों के घर्षण से
प्रकट होती है दामिनी
सुलग उठती है लकड़ी की तरह सूखी लालसा
पर आश्चर्य !
नहीं होता कुछ भी
जब मेरे सामने होते हो तुम
न युद्ध न संधि
इस तरह बीतता जाता है वह क्षण
जैसे ठोकर के बाद का संतुलन
इसी क्षण
ढल जाता है सूर्य
बजने लगता है युद्ध समापन का तूर्य
युद्ध का कारण याद नहीं आता योद्धा को
कौंध जाता है इसी क्षण
एक स्तब्ध पराक्रम
ध्वस्त करता हुआ
अभ्यास के कौशल को ।

मेरी स्याही 

सारे उपादान उपस्थित हैं
मैंने ले लिया है एकान्तवास
प्रहरियों ने कर लिए हैं द्वार बंद
विघ्न का कोई अवसर नहीं

कलंक से भी अधिक
कालिमा है मेरी स्याही में
अपमान से अधिक
तीखी है नोक कलम की
प्रशंसा से अधिक चिकना है काग़ज़
मंत्रबिद्ध की तरह मुग्ध हूँ
स्वयं की प्रतिभा पर
फिर भी क्या है
जो रोक रहा है मुझे
न भूतो न भविष्यति रचने से

क्यों अक्षरों के घूम
लगते हैं भूलभूलैया से
यह कौन सा तिर्यक कोण है
जहाँ अपनी ही आँख
दूसरे की हुई जाती है ।

रंग है री

कैसी आंधी चली होगी रात भर
कि उड़ रही है रेत ही रेत अब तक

असंख्य पदचिन्हों की अल्पना आंगन में
धूम्रवर्णी व्यंजन सजे हैं चौकियों पर
पूरा उपवन श्वेत हो गया है
निस्तेज सूर्य के सामने उड़ रहे हैं कपोत

युवतियाँ घूम रही हैं
खोले हुए धवल-केश
वातावरण में फैली है
वैधव्य की पवित्रता
कोलाहल केवल बाहर है
आज रंग है री माँ! रंग है री।

अनिकेत

इसे कभी महल कभी प्रासाद कहा गया
छत को असंख्य हाथों ने सम्भाला
विशाल खम्भों की तरह
यह खड़ा था नींव के सहस्रपदों पर

शताब्दियों तक टपकने के बाद चूना
झंझाओं से टकराकर चूर-चूर चट्टान
मेरे महल की भित्तियों के लिए
कितनी कुल्हाड़ियाँ कितनी चोटें
लकड़ी के एक खंड पर
कितनी आरियों का दिन-रात आवागमन
तब कहीं कक्ष के दो जोड़े किवाड़

कितने अधिक श्रम पर
यह मेरा विश्राम था ।
पर यात्राएँ अभी और थीं
प्रस्थान का हो चुका है समय
सभी कक्ष बंद किए जा रहे हैं
खुला है केवल एक अकेला द्वार
बाहर नक्षत्रों की खचाखच है
पीछे बंद होती साँकल की
धातुई ध्वनि

अब मैं अनिकेत हूँ ।

अर्द्धसमाप्त जीवन 

क्या यही मृत्यु है
जबकि सब-कुछ रह गया पहले सा
मैं भी मेरा जीवन भी
रह गया लोकस्मृति में

आशा रह गई पुनर्जन्म की
खीज रह गई कुछ नहीं पाने की
शरीर गया पर रह गया अशरीर
पृथ्वी रह गई विहंगम कोण से दिखती हुई
रह गई पिपासा जो नहीं मिटेगी जल से

क्षुधा स्वयं को खा रही है
निद्रा घेर रही है चेतना को
महास्वप्न में दिख रहा है तुम्हारा चेहरा
मेघ में आकृति की तरह
अनहद के पार से
पुकार रही हूँ तुम्हें
चातक की तरह नहीं
अपनी तरह

मृत्यु भी पूर्ण नहीं कर सकी
एक अर्द्धसमाप्त जीवन ।

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