अजय कृष्ण की रचनाएँ

दुख और पहाड़

दुख और पहाड़ का बहुत गहरा रिश्ता है
पहाड़ की गोद में
दुख पाता है सुकून और
चोटी पर आसन्न रहती है उदासी

इसकी ढलानों पर थककर
सोए रहते हैं विचार
उगता है जब लाल सूरज पर्वत पर
दर्शन बन कर जागते हैं विचार…
और फिर ग़र्क होता सूरज थककर
घनतम अन्तर अंधकार में
कभी-कभी चलती है बयार और सरसरा उठते हैं वृक्ष पौधे पत्तियाँ
पहाड़ रहता है स्थिर लेकिन
शान्त , अविचलित गंभीर और
आसमान रहता है शून्य विचारमग्न ।

घने हिम अंधकार में ठिठुरती हैं चट्टानें जब
दरारों से रिसती है नदी
और तारों के आँसू
टपकते हैं चाँद पर
पहाड़ का वज़न दुख का वज़न है।

मदर टेरेसा 

मदर, माँ, एंजेल, टेरेसा
लव, गॉड, चैरिटी, मिशनरी
प्रेम, सेवा, त्याग, करुणा
ग़रीब, दीन, दुखी, अनाथ
युगोस्ला‍विया, अल्बानिया, बोस्निया
कुष्ठ रोग, सेवा-शुश्रूषा, इलाज
दया, सिंपेथी, गाड्स चिल्ड्रेन
गाड्स मैसेंजर, एंजेल, मदर, मसीहा
क्राइस्टस, ईसू, ईश्वर, होलीनेस
लार्ड, होली पोप, पोप जान पाल
गॉड, गॉड ब्ले‍स यू, माई चाइल्ड
इण्टरनल पीस, वन अलमाइटी
चैरिटी अवदान, अनुदान, अनुकम्पा‍
पूअर, आपेरस्ड , अनफार्चुनेट्स
प्रेअर, एंजेल, मेरी क्राइस्ट्
लोरेटो, माइकेल, जेवियर्स
फादर, मदर, गाड ब्लेस यू
युनीक, युनीक, पर्सन, यूनीक-प्रिंसेस,
पीपुल्स प्रिंसेस, पीपुल्स मदर
बीसवीं सदी, अदभुत दृश्य, महानतम क्षण
मदर टेरेसा, प्रिंसेस डायना
पापा रात्सी, अल्फइद, पैमेला बोर्डेस्,
सुस्मिता सेन, ऐश्वर्य राय
शोक
शोकाकुल भीड़, शोक, स्तब्ध संसार
क्लिंटन, एलिजाबेथ
स्टेट मार्निंग, राष्ट्रीय शोक, अन्तरराष्ट्रीय
शोक
होमेज, फ्लोरल ट्रिब्यूट, लास्ट रेस्पेक्ट्
वर्ल्ड पीस
भारत-रत्न, मिस इंडिया, मिस यूनिवर्स
नोबेल प्राइज ।

बिस्मिल्लाह खाँ

गर्व से मुस्काराते हैं बिस्मिल्ला खाँ
जब उन्हें कहा जाता है
पाइपर ऑफ वारानसी
भोजपुर में जन्मे खाँ साहब
कतराते हैं अपने साक्षात्कारों में
लेने में जन्मस्थली का नाम
आखिर वहाँ कैसे बजती शहनाई
जहाँ बिरहा की तान पर
गरजते हैं कट्टे।
वाकई खाँ साहब की शहनाई में
हैदराबादी बिरयानी की ख़ुशबू
और बनारसी का जायका है

उन्हें गवारा न था
उनकी शहनाई से आए
लिट्टी-चोखे की चटकार
और खैनी की झाँस…..

क्या ख़ूब आती है नींद
जब स्वादिष्ट भोजन से
भरा हो पेट और दाँतों को
गुदगुदाती हो सुपारी

पर उन्हें कैसे आए नींद
जिनकी अंतडि़यों से खटखटाती
हो सूखी लिट्टी और
दाँतों तले किनकिनाता हो
खैनी में बारूद

यहीं चूक गए खाँ साहब
अपनी पाइप में
नहीं भर पाए बारूद
न ही फूँक पाए शहनाई में टाइफून
जिला-जवारी होकर भी
हिला नहीं पाए ‘जीला’
जब मुसहरों की बारात में बजाते थे शहनाई
तभी से सपनाते थे
अकबरी दरबार और तानसेन

सो आज बन गए नवरत्न
मुस्काते हैं अब कैसे सुपारी कुरेदते
पेग्विन क्लाकसिक्से पर ……..

पर खाँ साहब को नहीं मालूम
कबीर अब भी बडआते हैं
कैमूर की पहाडि़यों पर ।

खाँ साहब की शहनाई
भले भरमा ले श्रोताओं को
पिलाकर अफ़ीम
पर नहीं झुठला सकती
इतिहास और लहू का वास्ता

मुस्कुराता है कल्लू धोबी
बनारस के घाट पर
धोता हुआ खाँ साहब का कुरता
जब उलटी पाकिटों के
कोनों से झड़ता है
सत्तू और खैनी ।

आर्तनाद

छातियों में धँस-धँस कर
फट रहे हैं प्रक्षेपास्त्र
माताओं के गर्भ में नित्य
बन रहे हैं सूराख़
गगनभेदी हुंकार से
भिड़ता है बार-बार
एक ही आर्तनाद
नहीं दबा पा रहा
इसे बमों का आतंक….
मिसाइलों के मलबों के नीचे
कुलबुला रहे हैं,
‘अजन्में शिशु’
पनप रहे हैं
कई-कई अष्टावक्र
चाट-चाट कर बस
बारूद ।

शिरकत 

अब तक सन्ना रहा है तप्त आसमान
भटक रहा है आँधियों में झुलसता गिद्ध
थकता है दिन
पत्ते होते हैं सुर्ख़
शान्त पड़ते हैं वृक्ष
फिर भी काफ़ी गति है हवा में
दर्द से सिहर उठती हैं फुनगियाँ
जब पोरों में सूखता है आख़िरी कतरा

खखोरता है खुरपे पर
कोई बचा-खुचा सीमेंट
कान्हे पर लिए बन्दूक
खोजता है पानी एक जवान

और उधर
फिसलता है सूरज / उतरती है ज़मीन पर /
जले हुए जंगलों की राख

आज की तारीख़ में
इतनी सी शिरकत
करता है इतिहास

हम से महरूम है 

अभी हाल-हाल तक
हमने लिखनी शुरू की थी
ख़ुशी और उत्साह की कविता
दोस्ती, पहाड़, नीले आसमान की कविता
जोश की उल्लास की
उम्मीदों के उफान की कविता….

पढ़ी थी हमने, स्कूलों में, कालेजों में
निराला और प्रसाद की प्रेम-कविता
समझा था कि जिन्होंने
जीवन में प्रेम और स्नेह बहुत कम पाया
कैसे अधिकार से लिखा है प्रेम पर
बहुत अच्छा लगा था हमें तब….

वक़्त आया
हम लिखने लगे लू की कविता
खीझ और आक्रोश की कविता
ख़याल था हम भी करते हैं
प्रेम दोस्त से, दुश्मन से, प्रकृति से
समाज से, परिवार से, मूल्यों से
हम भी लिखेंगे और ख़ूब लिखेंगे
प्रेम की कविता

वक़्त आया
हम लिखने लगे बिछोह की कविता
बिखराव का काव्य….
हम चाहते थे लिखना ‘जीत’ की कविता
हम लिखने लगे हार की, दुख की
मौत की कविता

रोटी के अभाव में नहीं पले थे हम
माँ-बाप ने, दादा-दादी ने नाना-नानी ने
बड़े ही जतन से पाला था हमें

अच्छे स्कूल और कॉलेज में पढ़े थे हम
बबुआ और बुचिया नाम रखा गया हमारा
रोटी-तरकारी और भात-दाल के साथ-साथ
कैडबरी चॉकलेट भी खूब खाया था हम ने
दुलार में सहक के माटी थे हम ….

किसे हक था हम से अधिक
सुन्दर कल्पनाओं के रमणियों और राजकुमारों पर
ममता, मोह, माया पर
कौन बेहतर लिख सकता था
बेवफ़ाई पर भी हमसे
जो पनपे सदैव
स्नेह और वफ़ा की क्यारी पर

और आज हम यहाँ हैं
लिख रहे हैं कविता अन्धकार की
स्याह और धुँधले क्षितिज की
लिख रहे हैं कविता हम श्मशान की…..
हम से महरूम है
प्रेम की पहली कविता
बेवफ़ाई की बात
क्या करें हम

इंटरनेट और बरगद

मध्य रात को
चुपचाप अँधकार में सरसराते हुए
इंटरनेट के एक मैसेज का
एक बरगद रास्ता रोककर खड़ा हो जाता है
और पूछता है
कि क्या तुम्हारे पास
मेरा परिप्रेक्ष्य है !

साइबेरिया से उड़ता हुआ हंसों का जोड़ा
रेगिस्तान की दहलीज़ पार करने से पहले
कई-कई रात मुझसे संवाद करता है
और पेट के अण्डों को महसूसता हुआ
सूरज के ताप को अन्दाज़ता है
पहाड़ों के जंगल से उतरकर
किंग-कोबरा का एक जोड़ा
मेरे कोटरों में घोंसला बनाता है
बच्चे जन कर, उन्हें बड़ा करता है
और फिर कई दिनों के बाद
बढि़याए सोन को पारकर
एक गाँव में लुप्त हो जाता है

ओ पैमेला एंडरसन की नग्न
नब्बे मेगाबाइट
तुम तो रोज़ मेरे सवालों को अनसुना कर
वित्त-सचिव के लैपटॉप पर
डाउनलोड होने को आतुर रहती हो
तुम्हेो नहीं मालूम
बूढ़ी गंडक का बढ़ा हुआ पानी
मेरी जड़ों तक आते-आते
थककर शान्त पड़ जाता है
और ध्वंस का पाठ भूल कर
मेढकों के बच्चों को सेता है
और उसी में एक
गरीब गरेडि़या का बेटा
बंसी डालकर
माँ और बाबा के साथ
मछली-भात का सपना
खर्राटे मार-मारकर देखता है

आकाशगंगा

करोड़ों-करोड़ ग्रहों और तारों
को प्रकाशमान करती हुई आकाशगंगा
गुज़रती है ख़ामोश, पृथ्वी के सन्नाटे
अंधकार के ऊपर से….
एक झोपड़ी के छिद्री में से
कभी-कभार कोई मनचला प्रकाशकण
छिटकता है आँसुओं से भीगे
मध्यनिद्रा में सोए, एक शिशु कपोल पर

खेतों में पड़ी चौड़ी दरारों से
घूरता है काला अँधकार
और झींगुरों की आवाज़ का पहरा
गहराता जाता है रात-रात

दूर कहीं कोने में
बंसवार के पीछे
पता नहीं कब से
चुपचाप, एक प्रयोगशाला में चल रहे अनुसंधान से
एक तीव्र प्रकाश-पुंज
घूमता है इधर-उधर

ढूँढता शायद, ऊँचे पीपलों
की फुनगियों में पलता हुआ कुछ ….
फड़फड़ा उठता है बीच-बीच में
चौंधियाता हुआ सोया पड़ा उल्लू

नहर के उस पार सीवान पर
एक मटमैले प्रकाश में
चल रहा है गोंड का नाच
और झलकता है उसमें
रंगेदता हुआ राम प्रताप को
लाल साड़ी में एक लौंडा

आती है कभी-कभी
एक अँधेरे आँगन में
खाली बर्तनों के ठनठनाने की आवाज़
खोज रहा है बूढ़ा मूस
अनाज का एक दाना

एक घर की पिछुत्ती में
सुलगाता है बीड़ी
थका-हारा, मायूस एक चोर
कभी-कभार देखता है आकाशगंगा
की ओर बढ़ते हुए उस प्रकाश पुंज को
आखिर क्यों नहीं पड़ती कभी
भूलकर भी उस पर …..।
जैसे जेलों के टावरों से
पड़ती है रोशनी
भागते हुए क़ैदियों पर
क्यों टकराती है बेतरतीब
सुनसान ऊँचे पीपल और बरगदों से, नंगी पहाडि़यों की चोटियों से

अजीब है वक़्त अभी
रोशनियों के कुचक्र में से
फुँफकार रहा है अंधकार का अजगर

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