अजय सहाब की रचनाएँ

इश्क़ का राग जो गाना हो मैं उर्दू बोलूं 

इश्क़ का राग जो गाना हो मैं उर्दू बोलूं
किसी रूठे को मनाना हो ,मैं उर्दू बोलूं

किसी मुरझाते हुए बाग़ में ग़ज़लें पढ़कर
जब मुझे फूल खिलाना हो ,मैं उर्दू बोलूं

इसकी खुशबू से चला आएगा खिंचकर कोई
जब उसे पास बुलाना हो ,मैं उर्दू बोलूं

बेअदब बज़्म में शाइस्ता बयानी कर के
शमए तहज़ीब जलाना हो ,मैं उर्दू बोलूं

बात नफ़रत की हो करनी तो ज़बानें कितनी
जब मुझे प्यार जताना हो ,मैं उर्दू बोलूं

ऐसी ख़ामोश सी बज़्मों में भी लफ़्ज़ों से ‘सहाब’
जब मुझे आग लगाना हो ,मैं उर्दू बोलूं

दिल मेरा सोज़े निहां से उम्र भर बेताब था 

दिल मेरा सोज़े निहां से उम्र भर बेताब था
कश्ती ए दिल का मुक़द्दर पुरख़तर गिरदाब था

वां हलावत पी के भी वो यार शिकवा संज था
याँ रवां शिरयानों से इक दरिया ए तलख़ाब था

वां कि आरिज़ सुर्ख़ था रंगे तिला ए नाब से
याँ वफ़ूरे अश्क से मिज़गां मिरा सीमाब था

जैसे ढूंढे काफ़िरों में निकहते ईमां कोई
हासिल ए हक़ ,इस जहाँ में इस क़दर नायाब था

वां कि उसको नींद मिस्ले मग़फ़िरत हासिल रही
याँ कोई आज़ुर्दगी से ता क़ज़ा बेख़्वाब था

शेर ऐसे कह के भी हासिल मेरा गुमनाम है
वरना मेरा ये हुनर तो क़ाबिले अलक़ाब था

कितनी सुबहें कितनी शामें कितनी रातें छोड़ आये 

कितनी सुबहें ,कितनी शामें ,कितनी रातें छोड़ आये
अपना दिल ,अपनी धड़कन और अपनी साँसें छोड़ आये

तेरी ही बातें करते थे जिन पेड़ों से रातों में
उन पेड़ों की शाखों पर वो सारी बातें छोड़ आये

अब भी तुझको ढूंढेंगी ,उस घर के कोने कोने में
उस घर से जाते जाते हम अपनी आँखें छोड़ आये

उन राहों को , उन गलियों को , मुड़ कर भी अब क्या देखें
जिनमें उस बिछड़े हमदम की सारी यादें छोड़ आये

अब भी तू वापस आये तो तुझसे आकर लिपटेंगी
वक़्ते हिजरत उस बस्ती में अपनी बाहें छोड़ आये

कोई लड़की है रौशनी जैसी

कोई लड़की है रौशनी जैसी
आंसुओं में छुपी हंसी जैसी

वो जो देखे तो शेर हो जाएँ
उसकी आँखें हैं शाइरी जैसी

दूर तुझसे कहाँ मैं जाऊँगा?
ये मुहब्बत है हथकड़ी जैसी

मेरी हर रात ही दिवाली है
तेरी यादें हैं फुलझड़ी जैसी

सारी दुनिया में कोई चीज़ नहीं
मेरे हमदम की सादगी जैसी

चाल तेरी है ऐसी मस्ताना
एक बहती हुई नदी जैसी

कैसे लम्हों में ख़त्म कर दूँ मैं ?
उसकी बातें हैं इक सदी जैसी

जब भी मिलते हैं तो जीने की दुआ देते हैं 

जब भी मिलते हैं तो जीने की दुआ देते हैं
जाने किस बात की वो हम को सज़ा देते हैं

हादसे जान तो लेते हैं मगर सच ये है
हादसे ही हमें जीना भी सिखा देते हैं

रात आई तो तड़पते हैं चराग़ों के लिए
सुब्ह होते ही जिन्हें लोग बुझा देते हैं

ये भी खुल जाये शराबों की हक़ीक़त क्या है
सबसे पहले इन्हें साक़ी को पिला देते हैं

क्यूँ न लौटे वो उदासी का मुसाफ़िर यारो !
ज़ख़्म सीने के उसे रोज़ सदा देते हैं

जब भी आँखों से कोई अश्कों की गंगा निकले
राख टूटे हुए सपनों की बहा देते हैं

जिस्म मिटटी का है ,मिटटी में मिलाकर इसको
ज़िन्दगी ले तेरे अहसान चुका देते हैं

जिनसे सब रानाइयाँ थीं ,मेरी इस तहरीर में

जिनसे सब रानाइयाँ थीं ,मेरी इस तहरीर में
अब तो वो रिश्ते सिमट कर रह गए तस्वीर में

मेरे हाथों की लकीरें सब उसी के नाम थीं
बस वही इक इक शख़्स जो ,था ही नहीं तक़दीर में

ख़्वाब सारे , ख़्वाब ही थे ,ख़्वाब बन कर रह गए
कुछ हक़ीक़त काश होती ,ख़्वाब की ताबीर में

एक पल के प्यार की ऐसी सज़ा हमको मिली
उम्र भर महबूस रहना ,दर्द की ज़ंजीर में

चांदनी में आज कुछ गहरी उदासी है ‘सहाब’
दर्द मेरा मिल गया है चाँद की तनवीर में

तन्हाइयों में अश्क बहाने से क्या मिला 

तन्हाइयों में अश्क बहाने से क्या मिला ?
ख़ुद को दिया बना के जलाने से क्या मिला ?

मुझ से बिछड़ के रेत सा वो भी बिखर गया
उस जाने वाले शख़्स को जाने से क्या मिला ?

अब भी मिरे वजूद में हर साँस में वही
मैं सोचता हूँ उस को भुलाने से क्या मिला ?

तू क्या गया कि दिल मिरा ख़ामोश हो गया
इन धड़कनों के शोर मचाने से क्या मिला ?

अपने ही एक दर्द का चारा न कर सके
सारे जहाँ का दर्द उठाने से क्या मिला ?

जिस के लिए लिखा उसे वो तो न सुन सका
वो गीत महफ़िलों को सुनाने से क्या मिला ?

उन का हर एक हर्फ़ है दिल पर लिखा हुआ
उस दोस्त के ख़तों को जलाने से क्या मिला ?

सोचो ज़रा कि तुम ने ज़माने को क्या दिया
क्यूँ सोचते हो तुम को ज़माने से क्या मिला ?

तय था हमारा क़त्ल ,सज़ा के बगै़र भी

तय था हमारा क़त्ल ,सज़ा के बगै़र भी
मुजरिम हमीं बने थे ,ख़ता के बग़ैर भी

कोई हुनर नहीं है पे , मशहूर हैं बहोत
जलते हैं ये चिराग़ ,हवा के बग़ैर भी

जब भी किसी ने हाथ पे, लिक्खा है मेरा नाम
चमके हैं उसके हाथ ,हिना के बग़ैर भी

हर सम्त क़त्लो खून से ,साबित हुआ यही
चलता है ये जहान ,खुदा के बग़ैर भी

नागाह ख़ल्वतों में जो आई तुम्हारी याद
चमकी शबे फ़िराक़,ज़िया के बगै़र भी

खुद्दार हो कोई तो ,ज़रूरी नहीं है मौत
इक शर्म मारती है ,क़ज़ा के बग़ैर भी

उरयानियों के दौर में ,ग़ैरत तो है ‘सहाब’
मेरा बदन ढका है ,क़बा के बग़ैर भी

दर्द खुद को ही सुनाने से है राहत कितनी

दर्द खुद को ही सुनाने से है राहत कितनी
अश्क चुपचाप बहाने से है राहत कितनी

जिसके आने से कभी मिलती थी राहत दिल को
आज उस शख़्स के जाने से है राहत कितनी

न कोई आह ,न आंसू न ख़लिश सीने में
जाने वालों को भुलाने से है राहत कितनी

दिल की दीवार में अब दर्द के धब्बे भी नहीं
इक तेरा नाम मिटाने से है राहत कितनी

लाख हंसने में तकल्लुफ़ थे ,पशेमानी थी
खुल के अश्कों को बहाने से है राहत कितनी

उनका हर हर्फ़ था शाहिद मेरी बर्बादी का
तेरे हर ख़त को जलाने से है राहत कितनी

जब तलक सर था तो तलवारों की ज़द में थे ‘सहाब’
सिर्फ़ इक सर को कटाने से है राहत कितनी

दिन में जीता हूँ मगर रात में मर जाता हूँ 

दिन में जीता हूँ मगर रात में मर जाता हूँ
इक जहन्नम सा है यादों का जिधर जाता हूँ

मैंने तुझ जैसे किसी शख़्स को चाहा था कभी
अब तो इस बात को सोचूं भी तो डर जाता हूँ

कोई दरिया है तसव्वुर के किसी कोने में
जिस में हर शाम मैं चुपचाप उतर जाता हूँ

अब कोई प्यार जताए तो हंसी आती है
एक बेज़ारी के अहसास से भर जाता हूँ

अब तो उस राह पे वो दोस्त ,न यादें उसकी
फिर भी जाता हूँ तो पत्थर सा ठहर जाता हूँ

कोई अब मुझको संभाले तो फिसलता हूँ ‘सहाब’
कोई अब मुझको समेटे तो बिखर जाता हूँ

बिन तपे लोहा भी फ़ौलाद नहीं हो सकता 

बिन तपे लोहा भी फ़ौलाद नहीं हो सकता
कोई बिन मश्क़ के उस्ताद नहीं हो सकता

तूने तेशे को छुआ ,और न परबत काटा
तू मियां मुफ़्त में फरहाद नहीं हो सकता

मैं हूँ इक आह मगर कोई अना है मेरी
मैं कोई कांपती फ़रियाद नहीं हो सकता

रोज़ मिलता है मुझे, रोज़ बताता हूँ उसे
नाम हम जैसों का तो याद नहीं हो सकता

उम्र भर तुमने रुलाया जिसे आंसू देकर
इक तबस्सुम से तो अब शाद नहीं हो सकता

मेरा अफ़साना भी इक फूल है वीराने का
जो कभी क़ाबिले रुदाद नहीं हो सकता

दिल की तामीर इलाही ने अजब की है ‘सहाब’
ये जो लुट जाए तो आबाद नहीं हो सकता

भूल पाए न तुझे आज भी रोने वाले

भूल पाए न तुझे आज भी रोने वाले
तू कहाँ है मेरी आँखों को भिगोने वाले ?

हम किसी ग़ैर के हो जायें ये मुमकिन ही नहीं
और तुम तो कभी अपने नहीं होने वाले

सोचते हैं कि कहाँ जा के तलाशें उनको ?
हमको कुछ दोस्त मिले थे कभी ,खोने वाले

रेत के जैसा है अब तो ये मुक़द्दर मेरा
ख़ुद बिखर जाएंगे अब मुझको पिरोने वाले

दर्द और अश्क ज़माने में अज़ल से हैं वही
सिर्फ़ बदले हैं हर इक दौर में रोने वाले

पेड़ का साया तो होता नहीं खुद की खातिर
फ़स्ल अपनी कभी पाते नहीं बोने वाले

दर्द ग़ैरों का भला कौन उठाता है ‘सहाब’
सब यहाँ खुद की सलीबों को हैं ढोने वाले

मेरे अंदर जो इक फ़क़ीरी है

मेरे अंदर जो इक फ़क़ीरी है
ये ही सब से बड़ी अमीरी है

कुछ नहीं है मगर सभी कुछ है
देख कैसी जहान-गीरी है

‘पंखुड़ी इक गुलाब के जैसी’
मेरे शे’रों में ऐसी मीरी है

रूह और जिस्म सुर्ख़ हैं ख़ूँ से
फिर भी ये पैरहन हरीरी है

तल्ख़ सच सबके सामने कहना
अपने अंदाज़ में कबीरी है

तुझ से रिश्ता कभी नहीं सुलझा
उस की फ़ितरत ही काश्मीरी है

ये मेरी ग़ज़ल का मिज़ाज है कभी आग है कभी फूल है 

ये मेरी ग़ज़ल का मिज़ाज है कभी आग है कभी फूल है
कभी क़हक़हों का है क़ाफ़िला ,कभी आंसुओं से मलूल है

जो दे प्यार तू उसे प्यार दे ,जो दे दर्द उसको मुआफ़ कर
यही ज़िन्दगी का है क़ायदा ,यही दोस्ती का उसूल है

यहाँ सब है तेरा दिया हुआ ,मेरा जाम भी ,मेरी प्यास भी
तेरे हाथ से जो मिले अगर ,मुझे तिश्नगी भी क़ुबूल है

तू चला गया मुझे छोड़कर ,मुझे भूलने की उमीद में
मुझे भूल पायेगा तू कभी ,तेरा सोचना तेरी भूल है

ये तमददुनों के चिराग़ सा ये वतन मेरा किसी बाग़ सा
जिसे छू के रूह महक उठी मेरे हिन्द वो तेरी धूल है

यूँ ही हर बात पे हँसने का बहाना आए

यूँ ही हर बात पे हँसने का बहाना आए
फिर वो मा’सूम सा बचपन का ज़माना आए

काश लौटें मिरे पापा भी खिलौने ले कर
काश फिर से मिरे हाथों में ख़ज़ाना आए

काश दुनिया की भी फ़ितरत हो मिरी माँ जैसी
जब मैं बिन बात के रूठूँ तो मनाना आए

हम को क़ुदरत ही सिखा देती है कितनी बातें
काश उस्तादों को क़ुदरत सा पढ़ाना आए

आज बचपन कहीं बस्तों में ही उलझा है ‘सहाब’
फिर वो तितली को पकड़ना, वो उड़ाना आए

रात जब टूट कर बिखर जाये

रात जब टूट कर बिखर जाये
जागने वाला फिर किधर जाये ?

उम्र गुज़री है जैसे कानों से
सरसराती हवा गुज़र जाये

अपने यादें भी साथ ले जा तू
ये तेरा क़र्ज़ भी उतर जाये

ज़िन्दगी बाद में गुज़ारेंगे
हिज्र की रात तो गुज़र जाये

सिर्फ़ तू है ,तेरा नज़ारा है
जिस तरफ़ भी मेरी नज़र जाये

अब तो तू भी नहीं है धड़कन में
दिल का क्या काम अब वो मर जाये

सब है फ़ानी यहाँ संसार में किसका क्या है

सब है फ़ानी यहाँ संसार में किसका क्या है
फ़िक्र फिर भी है तुझे अपना पराया क्या है ?

ज़िन्दगी खुद पे तू इतना भी गुमां मत करना
चन्द साँसों के सिवा तेरा असासा क्या है ?

आपका पहला ही अंदाज़ बता देता है
आपको आपके वालिद ने सिखाया क्या है ?

फिर से इक और लड़ाई के बहाने के सिवा
तुम बता दो कि किसी जंग से मिलता क्या है?

उम्र भर कुछ न किया जिसकी तमन्ना के सिवा
उसने पूछा भी नहीं मेरी तमन्ना क्या है?

इश्क़ इक ऐसा जुआ है जहाँ सब कुछ खोकर
आप ये जान भी पाते नहीं खोया क्या है?

कुछ ग़रीबों की गली में भी दिये जल जायें
इस से बेहतर भी दीवाली का उजाला क्या है ?

वही भूके ,वही आहें वही आँसू हैं सहाब
शह्र का नाम बदल जाने से बदला क्या है ?

है तीर राम जी का मेरा हर एक नग़मा

है तीर राम जी का ..मेरा हरेक नग़मा
गौतम के धीर जैसा ..मेरा हरेक नग़मा

सबके दुखों को पीकर ..पड़ने लगा है नीला
शिव के शरीर जैसा ..मेरा हरेक नग़मा

हर शब्द में घुला है ..दुनिया का दर्द जैसे
गंगा के नीर जैसा ..मेरा हरेक नग़मा

हर शब्द को चखा है ..लिखने से पहले मैंने
शबरी के बेर जैसा ..मेरा हरेक नग़मा

किसको इसे सुनाऊं ..सुनता है कौन आखिर
है दर्द उर्मिला का ..मेरा हरेक नग़मा

जिसने भी ज़ुल्म ढाया..बरसा है खूब उस पर
बजरंग की गदा सा ..मेरा हरेक नग़मा

इतने हैं बोझ ग़म के ..इसकी कमर झुकी है
लगता है मन्थरा सा ..मेरा हरेक नग़मा

उन्वान 

क्या ज़रूरी है मुहब्बत को मुहब्बत कहना ?
क्या बिना नाम दिए प्यार नहीं हो सकता ?
क्यों ज़रूरी है कि खुशबू को कहें हम खुशबू ?
क्या बिना बोले ये अहसास नहीं हो सकता ?

प्यार कह कह के कोई प्यार करे तो क्या है
प्यार जज़्बात की तश्हीरो नुमाइश तो नहीं
प्यार करना तो मुक़द्दस सी जज़ा है खुद में
प्यार कुछ पाने की बेसूद सी ख़्वाहिश तो नहीं

प्यार मिल जाए तो उन्वान न देना उसको
नाम कुछ भी हो मुहब्बत तो वही रहती है
कोई फूलों को अगर ख़ार पुकारे भी तो क्या
फूल की ज़ीनतो निकहत तो वही रहती है

बंधन

रिश्तों की रस्सियों से ,उलझे हुए हैं तन मन
हैं मोह के ये पिंजरे ,इंसान के ये बंधन

अपनी ही इक चिता में हर कोई जल रहा है
खुशियों के इक भरम में ,खुद को ही छल रहा है
बँटते हुए दिलों ने ,बांटे हैं सारे आँगन
रिश्तों की रस्सियों से…

सीनों में सबके दिल हैं पर धड़कनें कहाँ हैं ?
वो प्यार और वफ़ा की सब दौलतें कहाँ हैं ?
सूखी हैं सब हवाएं ,आये कहाँ से सावन
रिश्तों की रस्सियों से…

हर कोई खो गया है अपनी ही खुशबुओं में
होता है दर्द सब को ,अपने ही आंसुओं में
खुद को ही बस दिखायें ,हैं ख़ुदग़रज़ ये दरपन
रिश्तों की रस्सियों से…

मनवा

मनवा तू काहे बेचैन रे ?
अब तक तो पाया है सूरज
थोड़ी सह ले रैन रे !
ये जीवन है जैसे साया
सबने खोजा ,हाथ न आया
सागर सागर प्यास मिलेगी
आँखों आँखों आस मिलेगी
जब तक तेरी चाह है लंबी
जीवन की हर राह है लंबी
जब तक तृष्णा ,कैसी तृप्ति
जीवन जाल से कैसी मुक्ति
होंगे गीले नैन रे !

Share