अज्ञेय की रचनाएँ

विकल्प

वेदी तेरी पर माँ, हम क्या शीश नवाएँ?
तेरे चरणों पर माँ, हम क्या फूल चढ़ाएँ?
हाथों में है खड्ग हमारे, लौह-मुकुट है सिर पर-
पूजा को ठहरें या समर-क्षेत्र को जाएँ?
मन्दिर तेरे में माँ, हम क्या दीप जगाएँ?
कैसे तेरी प्रतिमा की हम ज्योति बढ़ाएँ?
शत्रु रक्त की प्यासी है यह ढाल हमारी दीपक-
आरति को ठहरें या रण-प्रांगण में जाएँ?

पूर्व-स्मृति 

पहले भी मैं इसी राह से जा कर फिर-फिर हूँ आया-
किन्तु झलकती थी इस में तब मधु की मन-मोहक माया!
हरित-छटामय-विटप-राजि पर विलुलित थे पलाश के फूल-
मादकता-सी भरी हुई थी मलयानिल में परिमल धूल!

पागल-सी भटकी फिरती थी वन में भौंरों की गुंजार,
मानो पुष्पों से कहती हो, ‘मधुमय है मधु का संसार!’
कुंजों में तू छिपती फिरती-करती सरिता-सी कल्लोल,
व्यंग्य-भाव से मुझ से कहती, ‘क्या दोगे फूलों का मोल?’
हँस-हँस कर तू थी खिल जाती सुन कर मेरी करुण पुकार-

‘मायाविनि! मरीचिका है यह, या छलना, या तेरा प्यार?’
कई बार मैं इसी राह से जा फिर-फिर हूँ आया-
किन्तु झलकती थी इस में तब मधु की मन-मोहक माया!
चला जा रहा हूँ इस पथ से ले निज मूक व्यथा उद्भ्रान्त,

किन्तु आज छाया है इस पर नीरव-सा नीरस एकान्त!
पुष्पच्छटा-विहीन खड़े रोते-से लखते हैं तरुवर-
पीड़ा की उच्छ्वासों-सी कँपती हैं शाखाएँ सरसर!
बीता मधु, भूला मधु-गायन बिखरी भौंरों की गुंजार;
दबा हुआ सूने में फिरता वन-विहगों का हाहाकार!

अन्तस्तल में मीठा-मीठा गूँज रहा तेरा उपहास-
मानव-मरु में कहाँ छिपाऊँ मैं अपने प्राणों की प्यास?
कई बार मैं इसी राह से जा कर फिर-फिर हूँ आया-
किन्तु कहाँ इस में पाऊँ वह मधु की मन-मोहक माया!

दिल्ली जेल, नवम्बर, 1931

सम्भाव्य 

सम्भव था रजनी रजनीकर की ज्योत्स्ना से रंजित होती,
सम्भव था परिमल मालति से ले कर यामिनि मंडित होती!
सम्भव था तब आँखों में सुषमा निशि की आलोकित होती,
पर छायी अब घोर घटा, गिरते केवल शिशराम्बुद मोती!

सम्भव था वन की वल्लरियाँ कोकिल-कलरव-कूजित होतीं,
राग-पराग-विहीना कलियाँ भ्रान्त भ्रमर से पूजित होतीं;
सम्भव था मम जीवन में गायन की तानें विकसित होतीं,
पर निर्मम नीरव इस ऋतु में नीरव आशा की स्मित होतीं!

सम्भव था नि:सीम प्रणय यदि आँखों से आँखें मिल जातीं,
सम्भव था मेरी पीड़ा भी सुखमय विस्मृति में रल जाती-
सम्भव था उजड़े हृदयों में प्रेमकली भी फिर खिल आती!
किन्तु कहाँ! सम्भाव्य स्मृति से सिहर-सिहर उठती यह छाती!

दिल्ली जेल, अक्टूबर, 1931

क्योंकर मुझे भुलाओगे 

 दीप बुझेगा पर दीपक की स्मृति को कहाँ बुझाओगे?
तारें वीणा की टूटेंगी-लय को कहाँ दबाओगे?
फूल कुचल दोगे तो भी सौरभ को कहाँ छिपाओगे?
मैं तो चली चली, पर अब तुम क्योंकर मुझे भुलाओगे?

तारागण के कम्पन में तुम मेरे आँसू देखोगे,
सलिला की कलकल ध्वनि में तुम मेरा रोना लेखोगे।
पुष्पों में, परिमल समीर में व्याप्त मुझी को पाओगे,
मैं तो चली चली, पर प्रियवर! क्योंकर मुझे भुलाओगे?

दिल्ली जेल, सितम्बर, 1931

गीति – १

माँझी, मत हो अधिक अधीर।
साँझ हुई सब ओर निशा ने फैलाया निडाचीर,
नभ से अजन बरस रहा है नहीं दीखता तीर,
किन्तु सुनो! मुग्धा वधुओं के चरणों का गम्भीर

किंकिणि-नूपुर शब्द लिये आता है मन्द समीर।
थोड़ी देर प्रतीक्षा कर लो साहस से, हे वीर-
छोड़ उन्हें क्या तटिनी-तट पर चल दोगे बेपीर?
माँझी, मत हो अधिक अधीर।

दिल्ली जेल, नवम्बर, 1931

गीति – २ 

वे छोड़ दे, माँझी! तू पतवार।
आती है दुकूल से मृदुल किसी के नूपुर की झंकार,
काँप-काँप कर ‘ठहरो! ठहरो!’ की करती-सी करुण पुकार
किन्तु अँधेरे में मलिना-सी, देख, चिताएँ हैं उस पार

मानो वन में तांडव करती मानव की पशुता साकार।
छोड़ दे, माँझी! तू पतवार।
जाना बहुत दूर है पागल-सी घहराती है जल-धार,
झूम-झूम कर मत्त प्रभंजन करता है भय का संचार

पर मीलित कर आँखों को तू तज दे जीवन के आधार-
ऊषा गगन में नाच रही होगी जब पहुँचेंगे उस पार!
छोड़ दे, माँझी! तू पतवार।

दिल्ली जेल, नवम्बर, 1931

बत्ती और शिखा 

मेरे हृदय-रक्त की लाली इस के तन में छायी है,
किन्तु मुझे तज दीप-शिखा के पर से प्रीति लगायी है।
इस पर मरते देख पतंगे नहीं चैन मैं पाती हूँ-
अपना भी परकीय हुआ यह देख जली मैं जाती हूँ।

दिल्ली जेल, नवम्बर, 1931

तुम और मैं 

मैं मिट्टी का दीपक, मैं ही हूँ उस में जलने का तेल,
मैं ही हूँ दीपक की बत्ती, कैसा है यह विधि का खेल!
तुम हो दीप-शिखा, मेरे उर का अमृत पी जाती हो-
जला-जला कर मुझ को ही अपनी तुम दीप्ति बढ़ाती हो।

तुम हो प्रलय-हिलोर, तुम्हीं हो घोर प्रभंजन झंझावात,
तुम ही हो आलोक-स्तम्भ, कर देती हो आलोकित रात।
मैं छोटी-सी तरिणी-सा तेरी लपेट में बहता हूँ-
फिर भी पथ-दर्शन की आशा से चोटें सब सहता हूँ।

दिल्ली जेल, नवम्बर, 1931

घट 

कंकड़ से तू छील-छील कर आहत कर दे
बाँध गले में डोर, कूप के जल में धर दे।
गीला कपड़ा रख मेरा मुख आवृत कर दे-
घर के किसी अँधेरे कोने में तू धर दे।

जैसे चाहे आज मुझे पीडि़त कर ले तू,
जो जी आवे अत्याचार सभी कर ले तू।
कर लूँगा प्रतिशोध कभी पनिहारिन तुझ से;
नहीं शीघ्र तू द्वन्द्व-युद्ध जीतेगी मुझ से!

निज ललाट पर रख मुझ को जब जाएगी तू-
देख किसी को प्रान्तर में रुक जाएगी तू,
भाव उदित होंगे जाने क्या तेरे मन में-
सौदामिनि-सी दौड़ जाएगी तेरे तन में;

मन्द-हसित, सव्रीड झुका लेगी तू माथा,
तब मैं कह डालूँगा तेरे उर की गाथा!
छलका जल गीला कर दूँगा तेरा आँचल,
अत्याचारों का तुझ को दे दूँगा प्रतिफल!

दिल्ली जेल, दिसम्बर, 1931

अनुरोध 

अभी नहीं-क्षण भर रुक जाओ, महफिल के सुनने वालो!
मत संचित हो कोसो, हे संगीत सुमन चुनने वालो!
नहीं मूक होगी यह वाणी, भंग न होगी तान-
टूट गयी यदि वीणा तो भी झनक उठेंगे प्राण!

दिल्ली जेल, दिसम्बर, 1932

असीम प्रणय की तृष्णा 

(1)

आशाहीना रजनी के अन्तस् की चाहें,
हिमकर-विरह-जनित वे भीषण आहें
जल-जल कर जब बुझ जाती हैं,
जब दिनकर की ज्योत्स्ना से सहसा आलोकित

अभिसारिका ऊषा के मुख पर पुलकित
व्रीडा की लाली आती है,
भर देती हैं मेरा अन्तर्ï जाने क्या-क्या इच्छाएँ-
क्या अस्फुट, अव्यक्त, अनादि, असीम प्रणय की तृष्णाएँ!

भूल मुझे जाती हैं अपने जीवन की सब कृतियाँ :
कविता, कला, विभा, प्रतिभा-रह जातीं फीकी स्मृतियाँ।
अब तक जो कुछ कर पाया हूँ, तृणवत् उड़ जाता है,
लघुता की संज्ञा का सागर उमड़-उमड़ आता है।

तुम, केवल तुम-दिव्य दीप्ति-से, भर जाते हो शिरा-शिरा में,
तुम ही तन में, तुम ही मन में, व्याप्त हुए ज्यों दामिनी घन में,
तुम, ज्यों धमनी में जीवन-रस, तुम, ज्यों किरणों में आलोक!

(2)

क्या दूँ, देव! तुम्हारी इस विपुला विभुता को मैं उपहार?
मैं-जो क्षुद्रों में भी क्षुद्र, तुम्हें-जो प्रभुता के आगार!
अपनी कविता? भव की छोटी रचनाएँ जिस का आधार?
कैसे उस की गरिमा में भर दूँ गहराता पारावार?

अपने निर्मित चित्र? वही जो असफलता के शव पर स्तूप?
तेरे कल्पित छाया-अभिनय की छाया के भी प्रतिरूप!
अपनी जर्जर वीणा के उलझे-से तारों का संगीत?
जिसमें प्रतिदिन क्षण-भंगुर लय बुद्बुद होते रहें प्रमीत!

(3)

विश्वदेव! यदि एक बार,
पा कर तेरी दया अपार, हो उन्मत्त, भुला संसार-
मैं ही विकलित, कम्पित हो कर-नश्वरता की संज्ञा खो कर,
हँस कर, गा कर, चुप हो, रो कर-
क्षण-भर झंकृत हो-विलीन हो-होता तुम से एकाकार!
बस एक बार!

दिल्ली जेल, मई, 1932

कवि

एक तीक्ष्ण अपांग से कविता उत्पन्न हो जाती है,
एक चुम्बन में प्रणय फलीभूत हो जाता है,
पर मैं अखिल विश्व का प्रेम खोजता फिरता हूँ,
क्यों कि मैं उस के असंख्य हृदयों का गाथाकार हूँ।

एक ही टीस से आँसू उमड़ आते हैं,
एक झिड़की से हृदय उच्छ्वसित हो उठता है।
पर मैं अखिल विश्व की पीड़ा संचित कर रहा हूँ-
क्यों कि मैं जीवन का कवि हूँ।

दिल्ली जेल, सितम्बर, 1932

शिशिर के प्रति

 मेरे प्राण-सखा हो बस तुम एक, शिशिर!
छायी रहे चतुर्दिक् शीतल छाया,
रोमांचित, ईषत्कम्पित होती रहे क्षीण यह काया;
ऊपर नील गगन में, धवल-धवल, कुछ फटे-फटे से,

अपने ही आन्तरिक क्षोभ से सकुचे, कटे-कटे से,
जीवन में उद्देश्यहीन-सी गति से आगे बढ़ते बादल-
घिरे रहें बादल, पर बरस न पावें-
मेरे भी-मैं रहूँ नियन्त्रित, मूक, यदपि आँखें भर आवें।

अरे ओ मेरे प्राण-सखा, शिशिर!
सूनी-सूनी, खड़ी ठिठुरती, पर्णहीन वृक्षों की पाँत,
सिर पर काली शाखें मानो झुलस गये हों गात;
कहीं न फूल न पत्ते, अंकुर तक भी दीख न पावें,

नहीं सिद्धि के सुखद फलों की स्मृतियाँ हमें चिढ़ावें-
सम-दु:खी ओ विधुर शिशिर!
केवल दूर खड़ी, सकुचाती, कुछ-कुछ डरी हुई-सी,
आगे बढ़ती, फिर-फिर रुक-रुक जाती, सहम गयी-सी,

वह-भावी वसन्त ही आशा-वह, तेरी जीवन-आधार!
सखे! सदा वह दूर रहेगी-निष्कलंक वह आभा,
हम-तुम उस को छू न सकेंगे-हम-तुम, जिनके कर कलुषित हैं
अन्तर्दाह धुएँ से!

चाहते ही हम रह जावेंगे, नहीं कभी पावेंगे!
फिर भी-वैसी ही मेरे प्राणों में रहे अनबुझी आशा,
झिपती चाहे जावे, किन्तु न बुझने पावे!
इन प्राणों में, जो होते ही रहे सदा विफल-प्रयास-

कभी न कुछ भी कर पाये-रोने तक को समझे आयास!
केवल भर रहे अस्फुट आकांक्षाओं से-
भरे रहे, बस! भरे रहे, हा! फूट न पाये।
यह साकांक्ष विफलता ही रहे धुरी उस मैत्री की

जिस पर घूम रहे हैं प्राण, पा कर साथ तुम्हारा-
अरे, समदु:खी, सहभोगी, ओ वंचित प्राण-सखा, शिशिर!

दिल्ली जेल, सितम्बर, 1932

प्रस्थान

 रण-क्षेत्र जाने से पहले सैनिक! जी भर रो लो!
अन्तर की कातरता को आँखों के जल से धो लो!
मत ले जाओ साथ जली पीड़ा की सूनी साँसें,
मत पैरों का बोझ बढ़ाओ ले कर दबी उसाँसें।

वहाँ? वहाँ पर केवल तुम को लड़-लड़ मरना होगा,
गिरते भी औरों के पथ से हट कर पडऩा होगा।
नहीं मिलेगा समय वहाँ यादें जीवित करने को,
नहीं निमिष-भर भी पाओगे हृदय दीप्त करने को।

एक लपेट-धधकती ज्वाला-धूमकेतु फिर काला,
शोणित, स्वेद, कीच से भर जाएगा जीवन-प्याला!
अभी, अभी पावन बूँदों से हृदय-पटल को धो लो-
तोड़ो सेतुबन्ध आँखों के, सैनिक! जी भर रो लो!

दिल्ली जेल, 23 अप्रैल, 1932

कहो कैसे मन को समझा लूँ 

कहो कैसे मन को समझा लूँ?
झंझा के द्रुत आघातों-सा, द्युति के तरलित उत्पातों-सा
था वह प्रणय तुम्हारा, प्रियतम!
फिर क्यों, फिर क्यों इच्छा होती बद्ध इसे कर डालूँ?

सान्ध्य-रश्मियों के उच्छ्वासों, ताराओं की कम्पित साँसों-सा
था मिलन तुम्हारा, प्रियतम!
फिर क्यों, फिर क्यों आँखें कहतीं, उर में इसे बसा लूँ?
उल्का कुल की रज परिमल-सी, जल-प्रपात के उत्थित जल-सी,
थी वह करुणा-दृष्टि तुम्हारी-
फिर क्यों, प्रियतम! अन्तर रोता युग-युग उस को पा लूँ?
कहो कैसे मन को समझा लूँ?

मार्च, 1932

दृष्टि-पथ से तुम जाते हो जब

दृष्टि-पथ से तुम जाते हो जब।

तब ललाट की कुंचित अलकों-
तेरे ढरकीले आँचल को,
तेरे पावन-चरण कमल को,
छू कर धन्य-भाग अपने को लोग मानते हैं सब के सब।

मैं तो केवल तेरे पथ से
उड़ती रज की ढेरी भर के,
चूम-चूम कर संचय कर के
रख भर लेता हूँ मरकत-सा मैं अन्तर के कोषों में तब।

पागल झंझा के प्रहार सा,
सान्ध्य-रश्मियों के विहार-सा,
सब कुछ ही यह चला जाएगा-
इसी धूलि में अन्तिम आश्रय मर कर भी मैं पाऊँगा दब !

दृष्टि-पथ से तुम जाते हो जब।

दिल्ली जेल, दिसम्बर, 1931

कविता 

 मानस-मरु में व्यथा-स्रोत स्मृतियाँ ला भर-भर देता था,
वर्तमान के सूनेपन को भूत द्रवित कर देता था,
वातावलियों से ताडि़त हो लहरें भटकी फिरती थीं-
कवि के विस्तृत हृदय-क्षेत्र में नित्य हिलोरें करती थीं।

चिर-संचय से धीरे-धीरे कवि-मानस भी भर आया
किन्तु न फूट निकलने के पथ भाव-तरंगिनि ने पाया।
फिर भी कूलों से पागल-सा छलक गया वह पारावार-
‘कविता! कविता!’ कहता उस में बहा जा रहा सब संसार!

अमृतसर जेल, दिसम्बर, 1931

रहस्य 

मेरे उर में क्या अन्तर्हित है, यदि यह जिज्ञासा हो,
दर्पण ले कर क्षण भर उस में मुख अपना, प्रिय! तुम लख लो!
यदि उस में प्रतिबिम्बित हो मुख सस्मित, सानुराग, अम्लान,
‘प्रेम-स्निग्ध है मेरा उर भी’, तत्क्षण तुम यह लेना जान!

यदि मुख पर सोती अवहेला या रोती हो विकल व्यथा;
दया-भाव से झुक जाना, प्रिय! समझ हृदय की करुण व्यथा!
मेरे उर में क्या अन्तर्हित है, यदि यह जिज्ञासा हो,
दर्पण ले कर क्षण भर उस में मुख अपना, प्रिय! तुम लख लो!

दिल्ली जेल, 18 फरवरी, 1932

छाया, छाया तुम कौन हो

छाया, छाया, तुम कौन हो?
ओ श्वेत, शान्त घन-अवगुंठन! तुम कौन-सी आग की तड़प छिपाये हुए हो? ओ शुभ्र, शान्त परिवेष्टन! तुम्हारे रह:शील अन्तर में कौन-सी बिजलियाँ सोती हैं?
वह मेरे साथ चलती है।
मैं नहीं जानता कि वह कौन है; कहाँ से आयी है; कहाँ जाएगी! किन्तु अपने अचल घूँघट में अपना मुँह छिपाये, अपने अचल वसनों में सोयी हुई, वह मेरे साथ ऐसे चल रही है जैसे अनुभूति के साथ कसक…
वह मेरी वधू है।
मैं ने उसे कभी नहीं देखा। जिस संसार में मैं रहता हूँ, उस में उस का अस्तित्व ही कभी नहीं रहा। पर मेरा मन और अंग-प्रत्यंग उसे पहचानता है; मेरे शरीर का प्रत्येक अणु उस की समीपता को प्रतिध्वनित करता है।
मैं अपनी वधू को नहीं पहचानता।
मैं उसे अनन्त काल से साथ लिवाये आ रहा हूँ, पर उस अनन्त काल के सहवास के बाद भी हम अपरिचित हैं। मैं उस काल का स्मरण तो क्या, कल्पना भी नहीं कर सकता जब वह मेरी आँखों के आगे नहीं थी; पर वह अभी अस्फुट, अपने में ही निहित है…
वह है मेरे अन्तरतम की भूख!
वह एक स्वप्न है, इस लिए सच है; वह कभी हुई नहीं, इस लिए सदा से है; मैं उस से अत्यन्त अपरिचित हूँ, इस लिए वह सदा मेरे साथ चलती है; मैं उसे पहचानता नहीं, इस लिए वह मेरी अत्यन्त अपनी है; मैं ने उसे प्रेम नहीं किया, इस लिए मेरा सारा विश्व उस के अदृश्य पैरों में लोट कर एक भव्य विस्मय से उस का आह्वान करता है, ‘प्रिये!’
छाया, छाया, तुम कौन हो?

दिल्ली जेल, 3 दिसम्बर, 1933

सब ओर बिछे थे नीरव छाया के जाल घनेरे

सब ओर बिछे थे नीरव छाया के जाल घनेरे
जब किसी स्वप्न-जागृति में मैं रुका पास आ तेरे।
मैं ने सहसा यह जाना तू है अबला असहाया :
तेरी सहायता के हित अपने को तत्पर पाया।
सामथ्र्य-दर्प से उन्मद मैं ने जब तुझे पुकारा-
किस ओर से बही उच्छल, यह दीप्त, विमूर्छन-धारा?
हतसंज्ञ, विमूढ हुआ मैं नतशिर हूँ तेरे आगे।
तेरी श्यामल अलकों में- ये कंचन-कण क्यों जागे?
क्यों हाय! रुक गया सहसा मेरे प्राणों का स्पन्दन?
मुझ को बाँधे ये कैसे अस्पृश्य किन्तु दृढ़ बन्धन!

डलहौजी, 18 मई, 1934

आ जाना प्रिय आ जाना 

आ जाना प्रिय आ जाना!
अपनी एक हँसी में मेरे आँसू लाख डुबा जाना!
हा हृत्तन्त्री का तार-तार, पीड़ा से झंकृत बार-बार-
कोमल निज नीहार-स्पर्श से उस की तड़प सुला जाना।
फैला वन में घन-अन्धकार, भूला मैं जाता पथ-प्रकार-
जीवन के उलझे बीहड़ में दीपक एक जला जाना।
सुख-दिन में होगी लोक-लाज, निशि में अवगुंठन कौन काज?
मेरी पीड़ा के घूँघट में अपना रूप दिखा जाना।
दिनकर-ज्वाला को दूँ प्रतीति? जग-जग, जल-जल काटी निशीथ!
ऊषा से पहले ही आ कर जीवन-दीप बुझा जाना।
प्रिय आ जाना!

मुलतान जेल, 7 दिसम्बर, 1933

व्यथा मौन 

व्यथा मौन, वाञ्छा भी मौन, प्रणय भी, घोर घृणा भी मौन-
हाय, तुम्हारे नीरव इंगित में अभिप्रेत भाव है कौन?
कोई मुझे सुझा दे-मर भी जाऊँ तो जाऊँ, संशय की आग बुझा दे!

मुलतान जेल, 30 जनवरी, 1934

गए दिनों में औरों से भी मैं ने प्रणय किया है 

गये दिनों में औरों से भी मैं ने प्रणय किया है-
मीठा, कोमल, स्निग्ध और चिर-अस्थिर प्रेम दिया है।
आज किन्तु, प्रियतम! जागी प्राणों में अभिनव पीड़ा-
यह रस किसने इस जीवन में दो-दो बार पिया है?
वृक्ष खड़ा रहता जैसे पत्ता-पत्ता बिखरा कर-
वैसे झरे सभी वे मेरा अनुभव-भार बढ़ा कर।
किन्तु आज साधना हृदय की फल-सी टपक पड़ी है-
प्रियतम! इस को ले लो तुम अपना आँचल फैला कर!

लाहौर, 1935

इस कोलाहल भरे जगत में 

इस कोलाहल-भरे जगत् में भी एक कोना है जहाँ प्रशान्त नीरवता है।
इस कलुष-भरे जगत् में भी एक जगह एक धूल की मुट्ठी है जो मन्दिर है।
मेरे इस आस्थाहीन नास्तिक हृदय में भी एक स्रोत है जिस से भक्ति ही उमड़ा करती है।
जब मैं तुम्हें ‘प्रियतम’ कह कर सम्बोधन करता हूँ तब मैं जानता हूँ कि मेरे भी धर्म है।

गुरदासपुर, 14 मई, 1937

संसार का एकत्व

संसार का एकत्व एक सामान्य निर्बलता का बन्धन है, उस का प्रत्येक अंग अपनी निर्बलता को छिपाने के लिए मिथ्या सामथ्र्य का अभिनय करता है। इसी लिए संसार के सामान्य प्राणी अपनी शक्तियों को ही दूसरों से बँटाते हैं; शक्तियों के ही साझीदार होते हैं।
किन्तु मेरा और तुम्हारा एकत्व हमारी निर्बलताओं से नहीं, हमारे समान सामथ्र्य और शक्ति से गूँथा गया है। इस लिए आओ, हम-तुम अपनी-अपनी निर्बलताओं के साझीदार होवें, अपने अन्तर के घोरतम रहस्यमय सम्भ्रम और परिकम्पन को एक-दूसरे से कह डालें!

मुलतान जेल, 11 दिसम्बर, 1933

तुम गूजरी हो

तुम गूजरी हो, मैं तुम्हारे हाथ की वंशी।
तुम्हारे श्वास की एक कम्पन से मैं अनिर्वचनीय माधुर्य-भरे संगीत में ध्वनित हो उठता हूँ।
ये गायें हमारे असंख्य जीवनों के असंख्य प्रणयों की स्मृतियाँ हैं।
वंशी की ध्वनि सुनते ही ये मानो किसी भूले हुए संगीत की झंकार सुन कर चौंक उठती हैं।
तुम और मैं मिल कर इस छोटे-से मण्डल को पूरा करते हैं। तुम्हारी प्रेरणा से मैं ध्वनित हो उठता हूँ, और उस ध्वनि की प्रेरणा से हमारी चिरन्तन प्रणय-कामनाएँ पूरीकरण में लीन हो जाती हैं।
यही हमारे प्रेम का छोटा-सा किन्तु सर्वत: सम्पूर्ण संसार है।

दिल्ली जेल, 27 नवम्बर, 1932

प्राण-वधूटी

प्राण-वधूटी!

अन्तर की दुर्जयता तुमने लूटी!
गौरव-दृप्त दुराशाएँ, अभिमानिनी हुताशाएँ,
स्वीकृति-भर से ही कर डालीं झूटी!
प्राण-वधूटी!

दानशीलता खो डाली – दम्भ मलिनता धो डाली!
अहंमन्यता की छाया भी छूटी!
प्राण-वधूटी!

दीन-नयन की याञ्चा से- उर की अपलक वाञ्छा से
मंडित मेरी कुटिया टूटी-फूटी!
प्राण-वधूटी!

कम्पन ही से रुका हुआ, जीवन पैरों झुका हुआ-
हाय तुम्हारी मुद्रा अब क्यों रूठी!
प्राण-वधूटी!

अवगुंठन को डालो चीर-प्रकटित कर दो उर की पीर,
लज्जा के बिखरे फूलों पर, आज बहा दो आँसू नीर-
बस भिक्षा दे डालो आज अनूठी!
प्राण-वधूटी!

मुलतान जेल, 2 दिसम्बर, 1933

वधुके उठो

वधुके, उठो!
रात्रि के अवसान की घनघोर तमिस्रता में, अनागता उषा की प्रतीक्षा की अवसादपूर्ण थकान में हम जाग रहे हैं, मैं और तुम!
हमारे प्रणय की रात- हमारे प्रणय की उत्तप्त वासना-ज्वाला में डूबी हुई रात- समाप्त हो चुकी है, और दिन नहीं हुआ।
हमें अभी दिन-लाभ नहीं हुआ। फिर भी उठो, उठ कर सामने देखो, और यात्रा के लिए प्रस्तुत हो जाओ!
क्योंकि हमारे उस आग्नेय रात्रि के स्मारक इन चिह्नों को, अपने मंगल वस्त्रों पर पड़े हुए धब्बों को, देख कर खिन्न होने का समय कहाँ है? – और प्रयोजन क्या?
वधुके, वह काम पीछे आने वालों पर छोड़ो, हमें तो आगामी रात तक की लम्बी यात्रा करनी है!
वधुके, उठो!
हमारी जलायी आग जल-जल कर रात ही में कहीं बुझ गयी है, और हम घोर अन्धकार के आवरण में उलझे हुए पड़े हैं- तुम और मैं!
किन्तु यह मत भूलो कि उषा अभी नहीं आयी है; कि आरक्त प्रभातकालीन अंशुमाली ने अभी तक वेदना के विस्तार को भस्म नहीं कर डाला!
वधुके, उठो और सामने के विस्तीर्ण नीलिम आकाश में आँखें खोलो! हम- तुम क्यों प्रत्यूष के तारे के साथ रोवें?

मुलतान जेल, 8 दिसम्बर, 1933

ये सब कितने नीरस जीवन के लक्षण हैं

ये सब कितने नीरस जीवन के लक्षण हैं? मेरे लिए जीवन के प्रति ऐसा सामान्य उपेक्षा-भाव असम्भव है।
सहस्रों वर्ष की ऐतिहासिक परम्परा, लाखों वर्ष की जातीय वसीयत इस के विरुद्ध है। मेरी नस-नस में उस सनातन जीवन की तीव्रता नाच रही है, उसे ले कर मैं अपने को एक सामान्य आनन्द में क्यों कर भुला दूँ?
मेरी तनी हुई शिराएँ इस से कहीं अधिक मादक अनुभूति की इच्छुक हैं, मेरी चेतना को इस से कहीं अधिक अशान्तिमय उपद्रव की आवश्यकता है। बुद्धि कहती है कि जीवन से उतना ही माँगना चाहिए जितना देने का उस में सामथ्र्य हो। बुद्धि को कहने दो। मेरा विद्रोही मन इस क्षुद्र विचार को ठुकरा देता है-‘नहीं, यह पर्याप्त नहीं है…इस से अधिक- कहीं अधिक…सब…!’
इस अविवेकी, तेजोमय, भावात्मक भूख की प्रेरणा के आगे मेरी शक्ति क्या है! मैं उस की प्रलयंकारी आँधी में तृणवत् उड़ जाता हूँ।

दिल्ली जेल, 2 जुलाई, 1932

आकाश में एक क्षुद्र पक्षी

आकाश में एक क्षुद्र पक्षी अपनी अपेक्षा अधिक वेगवान् पक्षी का पीछा करता जा रहा है।
क्षुद्र पक्षी! तू अपने नीड़ से दूर और दूरतर होता जा रहा है, अपने विभव को खो कर उस का पीछा कर रहा है।
किन्तु वह तेजोराशि, वह ज्योतिर्माला, तुझ से आगे, तुझ से अधिक गति से उड़ी जा रही है। अनवरत चेष्टा से उस की ओर बढ़ते रहने पर भी उस में और तुझ में अन्तर बढ़ता जा रहा है…

दिल्ली जेल, 27 जून, 1932

मन मुझ को कहता है

मन मुझ को कहता है- मैं हूँ दीपक यह तेरे हाथों का
मुझे आड़ तेरे हाथों की, छू पावे क्यों झोंका!
राजा हूँ, ऊँचा हूँ- मुझ-सा नहीं दूसरा कोई;
फिर भी कभी न हो पाता हूँ साथ तुम्हारे मैं एकाकी-
सब विभूति जाती है खोई!
करों तुम्हारे हूँ फिर हूँ भी एक भीड़ में!
मेरा फीका-सा आलोक
डरते-डरते व्यक्त कर रहा तेरी मुख-छवि;
पर हा कितना छोटा है मेरा आलोक!
दूसरों का है भाग्य- सभी मिल दीपमालिका में साकार,
नील-अम्बरा तिमिर-शिखा को देते ज्वाला से आकार!

मुलतान जेल, 18 अक्टूबर, 1933

तितली, तितली 

तितली, तितली! इस फूल से उस पर, उस से फिर तीसरे पर, फिर और आगे, रंगों की शोभा लूटती, मधुपान करती, उन्मत्त, उद्भ्रान्त तितली!
मेरे इस सम्बोधन में उपालम्भ की जलन नहीं है। तितली! तुम्हारा जीवन चंचल, अस्थिर, परिवर्तन से भरा है, तुम दो पल भी एक पुष्प पर नहीं टिक सकतीं, तुम्हारी रसना एक ही रस के पान से तृप्त नहीं होती, एकव्रत तुम्हारे लिए असम्भव है किन्तु यह कह कर मैं प्रवंचना का उलाहना नहीं देना चाहता…
तुम ने यदि अपना जीवन संसार के असंख्य फूलों को समर्पित कर दिया है, तो मैं क्यों ईष्र्या करूँ? मैं ने तुम्हें गन्ध नहीं दी, तुम्हारे लिए मधु नहीं संचित किया। किन्तु तुम में गन्ध का सौरभ लेने की, मधु का स्वादन करने की, फूल-फूल कर उडऩे की, जो शक्ति है, वह तो मैं ने ही दी है! तुम्हारा यह अनिर्वचनीय सौन्दर्य, तुम्हारे पंखों पर के ये अकथ्य सौन्दर्यमय रंग- ये मेरे ही उपहार हैं। फिर मैं तुम्हारी प्रवृत्ति से ईष्र्या क्यों करूँ?
मैं मानो तुम्हारे जीवन का सूर्य हूँ। तुम सर्वत्र उड़ती हो, किन्तु तुम्हारी शक्ति का उत्स, तुम्हारे प्राणों का आधार, मैं ही हूँ- मेरी ही धूप में तुम इठलाती फिरती हो- मैं इसी को प्रतिदान समझता हूँ कि मेरे कारण तुम में इतना सौन्दर्य और इतना मधुर आनन्द प्रकट हो सकता है।
तितली, तितली!

दिल्ली जेल, 6 नवम्बर, 1932

जब मैं तुमसे विलग होता हूँ 

 जब मैं तुम से विलग होता हूँ, तभी मुझे अपने अस्तित्व का ज्ञान होता है।
जब तुम मेरे सामने उपस्थित नहीं होतीं, तभी मैं तुम्हारे प्रति अपने प्रेम का परिणाम जान पाता हूँ।
जब तुम दु:खित होती हो, तभी मुझे यह अनुभव होता है कि तुम्हें प्रसन्न रखना मेरे जीवन का कितना गौरवपूर्ण उद्देश्य है।
जब मैं तुम्हारे प्यार से वंचित होता हूँ, तभी यह संज्ञा जाग्रत होती है कि मेरे हृदय पर तुम्हारा आधिपत्य कितना आत्यन्तिक है।
क्योंकि तुम्हें पा लेने पर तो मैं रहता ही नहीं।
मैं उसी पक्षी की तरह हूँ जो यह जानने के लिए, कि उस का नीड़ कितना सुरक्षित है, बार-बार उस से उड़ जाता है और दूर से उस का ध्यान किया करता है।

दिल्ली जेल, 22 नवम्बर, 1932

तुम जो सूर्य को जीवन देती हो 

तुम जो सूर्य को जीवन देती हो, किन्तु उस की किरणों की आभा हर लेती हो, तुम कौन हो?
तुम्हारे बिना जीवन निरर्थक है; तुम्हारे बिना आनन्द का अस्तित्व नहीं है। किन्तु तुम्हीं हो जो प्रत्येक घटना में, प्रत्येक दिवस और क्षण में पीड़ा का सूत्र बुन देती हो; तुम्हीं हो जो कि कृतित्व का गौरव नष्ट कर देती हो! तुम्हीं हो जो कि भव की पहेली का अर्थ समझ कर हमें उस से वंचित कर रखती हो!

दिल्ली जेल, 13 जनवरी, 1933

वह इतना नहीं 

वह इतना नहीं, इस से कहीं अधिक है। तुम में कोई क्रूर और कठोर तत्त्व है- तुम निर्दय लालसाओं की एक संहत राशि हो!
यही है जो कि एकाएक मानो मेरा गला पकड़ लेता है, मेरे मुख में प्यार के शब्दों को मूक कर देता है- यहाँ तक कि मैं तुम से भी अपना मुख छिपा कर अपने ओठों को तुम्हारे सुगन्धित केशों में दबा कर, अस्पष्ट स्वर में अपनी वासना की बात कहता हूँ- कह भी नहीं पाता, केवल अपने उत्तप्त श्वास की आग से अपना आशय तुम्हारे मस्तिष्क पर दाग देता हूँ।
यही जुगुप्सापूर्ण और रहस्यमयी बात है जिस के कारण मैं तुम्हारे प्रेम के निष्कलंक आलोक में भी डरता रहता हूँ…

आशा के उठते स्वर पर मैं

आशा के उठते स्वर पर मैं मौन, प्राण, रह जाऊँ!
आशा, मधु, द्वार प्रणय का-इस से आगे क्या गाऊँ?

जीवन-भर धक्के खाये, आहत भी हुए विलम्बित;
पर दीप रहे यदि जलता तो शिखा क्यों न हो कम्पित?
विश्वात्मा ही यह जाने हम सुखी हुए या असफल;
मैं कहूँ कि यदि हम हारे-वह हार बड़ी है कोमल!
कर पार समुद्र जीवन का हम पीछे लौट न देखें
बढ़ते अनन्त तक जावें इस से गुरु क्या सुख लेखें!

आशा, मधु, द्वार प्रणय का-इस से आगे क्या गाऊँ?
आशा के उठते स्वर पर मैं मौन प्राण रह जाऊँ!

1936

अगर तुम्हारी उपस्थिति में मैं

पुअगर तुम्हारी उपस्थिति में मैं अभिमान और अहंकार से भर जाती हूँ-
तो, प्रिय! तुम उस धूली के अभिमान की याद कर लिया करो जो कि तुम्हारे पैरों के नीचे कुचली जा कर क्रुद्ध सर्प की तरह फुफकार कर उठ खड़ी होती है।

डलहौजी, सितम्बर, 1935

प्रिय, तुम हार-हार कर जीते 

 प्रिय, तुम हार-हार कर जीते!
जागा सोया प्यार सिहर कर, प्राण-अघ्र्य से आँखें भर-भर।
स्पर्श तुम्हारे से जीवित हैं, दिन वे कब के बीते!
कैसे मिलन-विरह के बन्धन? क्यों यह पीड़ा का आवाहन?

कोष कभी जो साथ भरे थे हो सकते क्या रीते!
प्रिय, तुम हार-हार कर जीते!

1936

दीपक के जीवन में 

दीपक के जीवन में कई क्षण ऐसे आते हैं, जब वह अकारण ही, या किसी अदृश्य कारण से, एकाएक अधिक दीप्त हो उठता है, पर वह सदा उसी प्रोज्ज्वलतर दीप्ति से नहीं जल सकता।
प्रेम के जीवन में भी कई ऐसे क्षण आते हैं जब अकस्मात् ही उसका आकर्षण दुर्निवार हो उठता है, पर वह सदा उसी खिंचाव को सहन नहीं कर सकता।
फिर, प्रियतम! हम क्यों चाहते हैं सदा इस ऊध्र्वगामी ज्वाला की उच्चतम शिखा पर आरूढ़ रहना!

1936

जग में हैं अगणित दीप जले

जग में हैं अगणित दीप जले।
वे जलते-जलते जाते हैं, फिर निर्वापित हो जाते हैं,
तब जग उन्हें बहा आता है;
उस को उन का मोह नहीं है-‘जल-जल कर फिर बुझना ही है,

इस गति से छुटकारा बोलो कौन कहाँ पाता है?’
कुछ भी हो, पर आज उधर जग में हैं अगणित दीप जले!
एक खड़ी हूँ मैं भी ले कर जो न कभी आलोकित होगा-
प्यार जगाता है, पीड़ा का जलना भी होगा अँधियारा-
मुझे घेर बहती जाती है एक विषैली धूमिल तारा।

खोना भी खो कर रोना भी, यह किन पापों का फल भोगा!
किन्तु उधर जग में हैं अगणित दीप जले!
एक ओर सारी जगती की ज्योतिर्माला-
और इधर, यह पीड़ा-अम्बर काला!

फिर भी, मैं भी दीपक थामे खड़ी हुई हूँ,
स्मृति की स्पन्दित टीसों ही से जीवित पड़ी हुई हूँ…
और उधर जग में हैं अगणित दीप जले!
आज, जगत् की सुन्दरता जब छीन ले गया पतझर-

उसे भुलाने वह जाता है ये सब अगणित दीप जला कर।
इधर खड़ी मैं सोच रही हूँ-
जिसे भूलना है, उस का ही आश्रय ले कर उसे भुलाना!
मैं ऐसी विफला चेष्टा में निरत नहीं हूँ!

यदपि आज जग में हैं अगणित दीप जले!
पतझर, पतझर, पतझर, पतझर…
गिरते पत्तों का यह अविकल सरसर,
कहता जाता है-सुन्दरता नश्वर, नश्वर!

मेरे हाथों का यह दीपक, मेरे प्राणों का यह स्पन्दन,
तड़प-तड़प कर करता जाता उस का खंडन!
गये दिनों में भी, नहीं जब पात झरे थे,
डार-डार पर जब फूलों के भार भरे थे,

अवनी-भर पर खेल रही थीं यौवन-जीवन की छायाएँ
मृदु अनामिका से मलयानिल
देता भाल-बिन्दु-सा परिमल,
गले-गले में डाल-डाल जाता सौरभ-मालाएँ!-

गये दिनों में कभी, अपरिचित एक बटोही आया,
उस के निर्मम हाथों मैं ने दीप एक बस पाया।
अंक छिपाये, भर-भर स्नेह लिये यह अभी खड़ी हूँ
और पात झरते जाते हैं, और, नहीं वह आया!

और उधर जग मैं हैं अगणित दीप जले!
बुझे-अनजले दीपक! मेरे जीवन की सुन्दरते!
अब अपने संकेत! नहीं क्यों छूट हाथ में गिरते!
गया बटोही, बीता मधु भी, फूल हो गये स्मृतियाँ

अब सूखी जीवन-शाखा के पात-पात हैं झरते!
पर जीवन-सर्वस्व! रहो बन मेरे एक सहारे
जग के दीपक एक-एक निर्वापित होंगे सारे!
वे मरणोन्मुख सफल-और तुम असफल जीवन-आतुर,

तुम पीड़ा हो, पर अजस्र; वे सुख हैं पर क्षणभंगुर!
मैं हूँ अन्धकार में पर विश्वास भरी हूँ रोती-
पीड़ा जाग रही है यद्यपि दीप-शिखा है सोती-
वे सब-विधि से गये छले-जग में हैं अगणित दीप जले!

1935

रवि गये जान जब निशि ने

 रवि गये-जान जब निशि ने घूँघट से बाहर देखा;
शशि के मुरझाये मुख पर पायी विषाद की रेखा।
प्रियतम से मिलने सत्वर सम्भ्रान्त चली वह आयी।
उस को निज अंग लगा कर शशि ने जीवन-गति पायी,

‘रविरोष अभी बाकी है’, ‘मिलनोचित समय’ नहीं है
‘नीलाम्बर व्यस्त हुआ है’, ‘भूषण-लडिय़ाँ बिखरी हैं’,
कब सोचा यह सब निशि ने?
जब उस की स्त्री-आत्मा का आह्वान किया प्रकृति ने?

ओ तू

ओ तू, जिसे आज मैं ने सह-पथिक लिया है मान,
दे मत कुछ, न माँग तू मुझ से कोई भी वाग्दान,
लेन-देन ही है क्या इस परमाहुति का सम्मान?
जहाँ दान है वहाँ कभी टिक सकते हैं अधिकार?

शब्दों ही में बँध जाएगा आत्माओं का प्यार?
माँग न अनुमति, आ तू! सारे खुले पड़े हैं द्वार!
काया-छाया, ज्योति-तिमिर में रहे परस्पर भाव-
मुझे परस्परता में भी कटु झलक रहा अलगाव-

हम-तुम पहुँचें जहाँ न हों सीमाएँ और दुराव!
ईश्वर बन कर मन्त्र शक्ति से छू दे मेरा भाल-
दानव हो कर चूर-चूर कर दे मेरा कंकाल-
मात्र पुरुष रह बाँध भुजों से मर्माहत कर डाल!*
मुझे सिखा दे सुनना केवल तेरा ही निर्देश-

तेरे अभयद कर की छाया में करना उन्मेष,
अपना रहना अपनेपन को दे कर तेरे वेश!

1935

प्रियतम! देखो 

प्रियतम! देखो, नदी समुद्र से मिलने के लिए किस सुदूर पर्वत के आश्रय से, किन उच्चतम पर्वत-शृंगों को ठुकरा कर, किस पथ पर भटकती हुई, दौड़ी हुई आयी है!
समुद्र से मिल जाने के पहले उसने अपनी चिर-संचित स्मृतियाँ, अपने अलंकार-आभूषण, अपना सर्वस्व, अलग करके एक ओर रख दिया है, जहाँ वह एक परित्यक्त केंचुल-सा मलिन पड़ा हुआ है।
और, प्रियतम! इतना ही नहीं, वह देखो नदी ने यद्यपि कुछ दूर तक समुद्र को रँग दिया है अवश्य, तथापि अपने मिलन में उस ने अपना स्वभाव भी उत्सर्ग कर दिया है, वह अपने प्रणयी के साथ लवण और अग्राह्य हो गयी है!
प्रियतम! देखो…

1934

प्रियतम मेरे मैं प्रियतम की

 प्रियतम मेरे मैं प्रियतम की!
आँखें व्यथा कहे देती हैं खुली जा रही स्पन्दित छाती,
अखिल जगत् ले आज देख जी भर मुझ गरीबनी की थाती,
सुन ले, आज बावली आती
गाती अपनी अवश प्रभाती :

प्रियतम मेरे मैं प्रियतम की!
बीती रात, प्रात-शिशु को उर से चिपटाये आयी ऊषा-
लुटा रही हूँ गली-गली मैं अपने प्राणों की मंजूषा-
मुझ पगली की बिखरी भूषा-

आज गूदड़ी में मेरी उन की मणियों की माला चमकी-
प्रियतम मेरे मैं प्रियतम की!
मेरा परिचय? रजनी मेरी माँ थी, तारे सहचर,
मेरा घर? जग को ढँप लेने वाला नंगा अम्बर-

मेरा काम? सुनाना दर-दर
महिमा उस निर्मम की!
प्रियतम मेरे मैं प्रियतम की!
मैं पागल हूँ? हाँ, मैं पागल, ओ समाज धीमान्, सयाने!

तेरी पागलपन की जूठन मैं ने बीनी दाने-दाने-
यही दिया मुझ को विधना ने,
मैं भिखमंगी इस आलम की!
तू सँभाल ले अपना वैभव अपने बन्द खज़ाने कर ले,

ओ अश्रद्धा के कुबेर! निज उर से बोझ घृणा के भर ले-
तेरे पास बहुत है तो तू उसे छिपा कर धर ले-
मुझ को क्या देता है धमकी
प्रियतम मेरे मैं प्रियतम की!

मैं दीना हूँ, मेरा धन है प्यार यही तेरा ठुकराया,
किन्तु बटाने को उतना ही मेरा मन व्याकुल हो आया-
एक अकेली ज्योति-किरण से पुलक उठी है मेरी काया,
मैं क्यों मानूँ सत्ता तम की?

प्रियतम मेरे मैं प्रियतम की!
तू इन आँखों के आगे बस स्थिर रह अरे अनोखे मेरे,
खड्गधार की राह बना कर पास आ रही हूँ मैं तेरे,
मुझ को कैसे घाट-बसेरे?

मेरी खेल बड़े जोखम की!
प्रियतम मेरे मैं प्रियतम की!
वन में रात पपीहे बोले, घन में रात दामिनी दमकी-
नभ में प्रात छा गयी स्मित उस अभिसारी मेरे निरुपम की-
प्रियतम मेरे मैं प्रियतम की!

कलकत्ता, 1939

मैं-तुम क्या? बस सखी-सखा

मैं-तुम क्या? बस सखी-सखा!

तुम होओ जीवन के स्वामी, मुझ से पूजा पाओ-
या मैं होऊँ देवी जिस पर तुम अघ्र्य चढ़ाओ,
तुम रवि जिस को तुहिन बिन्दु-सी मैं मिट कर ही जानूँ-
या मैं दीप-शिखा जिस पर तुम जल-जल जीवन पाओ;

क्यों यह विनिमय जब हम दोनों ने अपना कुछ नहीं रखा?
मैं-तुम क्या? बस सखी-सखा!
क्यों तुम दूर रहो जैसे सन्ध्या से सन्ध्या-तारा?
मैं क्यों बद्ध, अलग, जैसे वारिधि से अलग किनारा?

हमें बाँधने का साहस क्यों मधुर नियम भी पाएँ?
तुम अबाध, मैं भी अबाध, हो अनथक स्नेह हमारा!
प्रिय-प्रेयसि रह कर कब किसने उस का सच्चा रूप लखा!
मैं-तुम क्या? बस सखी-सखा!

1934

अकाल-धन

घन अकाल में आये, आ कर रो गये।
अगिन निराशाओं का जिस पर पड़ा हुआ था धूसर अम्बर,
उस तेरी स्मृति के आसन को अमृत-नीर से धो गये।
घन अकाल में आये, आ कर रो गये।

जीवन की उलझन का जिस को मैं ने माना था अन्तिम हल
वह भी विधि ने छीना मुझ से मुझे मृत्यु भी हुई हलाहल!
विस्मृति के अँधियारे में भी स्मृति के दीप सँजो गये-
घन अकाल में आये, आ कर रो गये।

जीवन-पट के पार कहीं पर काँपीं क्या तेरी भी पलकें?
तेरे गत का भाल चूमने आयीं बढ़ पीड़ा की अलकें!
मैं ही डूबा, या हम दोनों घन-सम घुल-घुल खो गये?
घन अकाल में आये, आ कर रो गये।

यहाँ निदाघ जला करता है-भौतिक दूरी अभी बनी है;
किन्तु ग्रीष्म में उमस सरीखी हाय निकटता भी कितनी है!
उठे बवंडर, हहराये, फिर थकी साँस-से सो गये!
घन अकाल में आये, आ कर रो गये।

कसक रही है स्मृति कि अलग तू पर प्राणों की सूनी तारें,
आग्रह से कम्पित हो कर भी बेबस कैसे तुझे पुकारें?
‘तू है दूर’, यहीं तक आ कर वे हत-चेतन हो गये?
घन अकाल में आये, आ कर रो गये!

दिल्ली जेल, जुलाई, 1933

जीवन-दान

मुक्त बन्दी के प्राण!
पैरें की गति शृंखल बाधित, काया कारा-कलुषाच्छादित
पर किस विकल प्रेरणा-स्पन्दित उद्धत उस का गान!
अंग-अंग उस का क्षत-विह्वल हृदय हताशाओं से घायल,

किन्तु असह्य रणातुर उस की आत्मा का आह्वान!
उस की भूख-प्यास भी नियमित उस की अन्तिम सम्पत्ति परिहृत
लज्जित पर बलिदान देख कर उस का जीवन-दान!
मुक्त बन्दी के प्राण!

डलहौजी, 1934

प्राण तुम्हारी पद-रज फूली 

 प्राण, तुम्हारी पद-रज फूली
मुझ को कंचन हुई तुम्हारे चंल चरणों की यह धूली।
आयी थी तो जाना भी था, फिर भी आओगी, दुख किस का?
एक बार जब दृष्टि-करों रसे पद-चिह्नों की रेखा छू ली।

वाक्य अर्थ का हो प्रत्याशी, गीत शब्द का कब अभिलाषी?
अन्तर में पराग-सी छायी है स्मृतियों की आशा-धूली।
प्राण, तुम्हारी पद-रज फूली।

मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ!

प्रिय, मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ!
वह गया जग मुग्ध सरि-सा मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ!
तुम विमुख हो, किन्तु मैं ने कब कहा उन्मुख रहो तुम?
साधना है सहसनयना-बस, कहीं सम्मुख रहो तुम!

विमुख-उन्मुख से परे भी तत्त्व की तल्लीनता है-
लीन हूँ मैं, तत्त्वमय हूँ, अचिर चिर-निर्वाण में हूँ!
मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ!
क्यों डरूँ मैं मृत्यु से या क्षुद्रता के शाप से भी?

क्यों डरूँ मैं क्षीण-पुण्या अवनि के सन्ताप से भी?
व्यर्थ जिस को मापने में हैं विधाता की भुजाएँ-
वह पुरुष मैं, मत्र्य हूँ पर अमरता के मान में हूँ!
मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ!
रात आती है, मुझे क्या? मैं नयन मूँदे हुए हूँ,

आज अपने हृदय में मैं अंशुमाली की लिये हूँ!
दूर के उस शून्य नभ में सजल तारे छलछलाएँ-
वज्र हूँ मैं, ज्वलित हूँ, बेरोक हूँ, प्रस्थान में हूँ!
मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ!

मूक संसृति आज है, पर गूँजते हैं कान मेरे,
बुझ गया आलोक जग में, धधकते हैं प्राण मेरे।
मौन या एकान्त या विच्छेद क्यों मुझ को सताए?
विश्व झंकृत हो उठे, मैं प्यार के उस गान में हूँ!

मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ!
जगत है सापेक्ष, या है कलुष तो सौन्दर्य भी है,
हैं जटिलताएँ अनेकों-अन्त में सौकर्य भी है।
किन्तु क्यों विचलित करे मुझ को निरन्तर की कमी यह-

एक है अद्वैत जिस स्थल आज मैं उस स्थान में हूँ!
मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ!
वेदना अस्तित्व की, अवसान की दुर्भावनाएँ-
भव-मरण, उत्थान-अवनति, दु:ख-सुख की प्रक्रियाएँ

आज सब संघर्ष मेरे पा गये सहसा समन्वय-
आज अनिमिष देख तुम को लीन मैं चिर-ध्यान में हूँ!
मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ!
बह गया जग मुग्ध सरि-सा मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ!
प्रिय, मैं तुम्हारे ध्यान में हूँ!

दिल्ली (एक कवि-सम्मेलन में बैठे-बैठे), 21 जुलाई, 1936

समाधि-लेख

मैं बहुत ऊपर उठा था, पर गिरा।
नीचे अन्धकार है-बहुत गहरा
पर बन्धु! बढ़ चुके तो बढ़ जाओ, रुको मत :
मेरे पास-या लोक में ही-कोई अधिक नहीं ठहरा!

अक्टूबर, 1969

नन्ही शिखा

जब झपक जाती हैं थकी पलकें जम्हाई-सी स्फीत लम्बी रात में,
सिमट कर भीतर कहीं पर
संचयित कितने न जाने युग-क्षणों की

राग की अनुभूतियों के सार को आकार दे कर,
मुग्ध मेरी चेतना के द्वार से तब
नि:सृत होती है अयानी एक नन्ही-सी शिखा।
काँपती भी नहीं निद्रा

किन्तु मानो चेतना पर किसी संज्ञा का अनवरत सूक्ष्मतम स्पन्दन
जता देता है मुझे,
नर्तिता अपवर्ग की अप्सरा-सी वह शिखा मेरा भाल छूती है,
नेत्र छूती है, वस्त्र छूती है,

गात्र को परिक्रान्त कर के, ठिठक छिन-भर उमँग कौतुक से
बोध को ही आँज जाती है किसी एकान्त अपने दीप्त रस से।
और तब संकल्प मेरा द्रवित, आहुत,
स्नेह-सा उत्सृष्ट होता है शिखा के प्रति :

धीर, संशय-हीन, चिन्तातीत!
वह चाहे जला डाले।
(यदपि वह तो वासना का धर्म है-
और यह नन्ही शिखा तो अनकहा मेरे हृदय का प्यार है!)

शिलङ्, मार्च, 1945

किस ने देखा चाँद

किस ने देखा चाँद?-किस ने, जिसे न दीखा उस में क्रमश: विकसित
एकमात्र वह स्मित-मुख जो है अलग-अलग प्रत्येक के लिए
किन्तु अन्तत: है अभिन्न :
है अभिन्न, निष्कम्प, अनिर्वच, अनभिवद्य,
है युगातीत, एकाकी, एकमात्र?

दिल्ली, 1942

मानव की आँख 

कोटरों से गिलगिली घृणा यह झाँकती है।
मान लेते यह किसी शीत रक्त, जड़-दृष्टि
जल-तलवासी तेंदुए के विष नेत्र हैं

और तमजात सब जन्तुओं से
मानव का वैर है क्यों कि वह सुत है
प्रकाश का-यदि इन में न होता यह स्थिर तप्त स्पन्दन तो!
मानव से मानव की मिलती है आँख पर
कोटरों से गिलगिली घृणा झाँक देती है!

इलाहाबाद स्टेशन, 12 अक्टूबर, 1947

पक गई खेती 

वैर की परनालियों में हँस-हँस के
हमने सींची जो राजनीति की रेती
उसमें आज बह रही खूँ की नदियाँ हैं
कल ही जिसमें ख़ाक-मिट्टी कह के हमने थूका था
घृणा की आज उसमें पक गई खेती
फ़सल कटने को अगली सर्दियाँ हैं।

मेरठ, 15 अक्टूबर, 1947

जीना है बन सीने का साँप 

जीना है बन सीने का साँप
हम ने भी सोचा था कि अच्छी ची ज है स्वराज
हम ने भी सोचा था कि हमारा सिर
ऊँचा होगा ऐक्य में। जानते हैं पर आज

अपने ही बल के
अपने ही छल के
अपने ही कौशल के
अपनी समस्त सभ्यता के सारे

संचित प्रपंच के सहारे
जीना है हमें तो, बन सीने का साँप उस अपने समाज के
जो हमारा एक मात्र अक्षन्तव्य शत्रु है
क्यों कि हम आज हो के मोहताज
उस के भिखारी शरणार्थी हैं।

मुरादाबाद स्टेशन (आधी रात), 12 नवम्बर, 1947

समानांतर साँप

 (1)

हम एक लम्बा साँप हैं
जो बढ़ रहा है ऐंठता-खुलता, सरकता, रेंगता।
मैं-न सिर हूँ (आँख तो हूँ ही नहीं)
दुम भी नहीं हूँ

औ’ न मैं हूँ दाँत जहरीले।
मैं-कहीं उस साँप की गुंजलक में उलझा हुआ-सा
एक बेकस जीव हूँ।
ब गल से गु जरे चले तुम जा रहे जो,
सिर झुकाये, पीठ पर गट्ठर सँभाले

गोद में बच्ची लिये
उस हाथ से देते सहारा किसी बूढ़े या कि रोगी को-
पलक पर लादे हुए बोझा जुगों की हार का-
तुम्हें भी कैसे कहूँ तुम सृष्टि के सिरताज हो?

तुम भी जीव हो बेबस।
एक अदना अंग मेरे पास से हो कर सरकती
एक जीती कुलबुलाती लीक का
जो असल में समानान्तर दूसरा

एक लम्बा साँप है।
झर चुकीं कितनी न जाने केंचुलें-
झाडिय़ाँ कितनी कँटीली पार कर के बार-बार,
सूख कर फिर-फिर

मिलीं हम को जिंदगी की नयी किस्तें
किसी टुटपुँजिये
सूम जीवन-देवता के हाथ।
तुम्हारे भी साथ, निश्चय ही

हुआ होगा यही। तुम भी जो रहे हो
किसी कंजूस मरघिल्ले बँधे रातिब पर!

(2)

दो साँप चले जाते हैं।
बँध गयी है लीक दोनों की।
यह हमारा साँप-हम जा रहे हैं
उस ओर, जिस में सुना है

सब लोग अपने हैं;
वह तुम्हारा साँप-
तुम भी जा रहे हो, सोचते निश्चय, कि वह तो देश है जिस में
सत्य होते सभी सपने हैं।
यह हमारा साँप-

इस पर हम निछावर हैं।
जा रहे हैं छोड़ कर अपना सभी कुछ
छोड़ कर मिट्टी तलक अपने पसीने-ख़ून से सींची
किन्तु फिर भी आस बाँधे

वहाँ पर हम को निराई भी नहीं करनी पड़ेगी,
फल रहा होगा चमन अपना
अमन में आशियाँ लेंगे।
वह तुम्हारा साँप-

उस को तुम समर्पित हो।
लुट गया सब कुछ तुम्हारा
छिन गयी वह भूमि जिस को
अगम जंगल से तुम्हारे पूर्वजों ने ख़ून दे-दे कर उबारा था

किन्तु तुम तो मानते हो, गया जो कुछ जाय-
वहाँ पर तो हो गया अपना सवाया पावना!

(3)

यह हमारा साँप जो फुंकारता है,
और वह फुंकार मेरी नहीं होती
किन्तु फिर भी हम न जाने क्यों
मान लेते हैं कि जो फुंकारता है, वह

घिनौना हो, हमारा साँप है।
वह तुम्हारा साँप-तुम्हें दीक्षा मिली है
सब घृण्य हैं फूत्कार हिंसा के
किन्तु जब वह उगलता है भा फ जहरीली,

तुम्हें रोमांच होता है-
तुम्हारा साँप जो ठहरा!

(4)

उस अमावस रात में-घुप कन्दराओं में
जहाँ फौलादी अँधेरा तना रहता है
खड़ी दीवार-सा आड़ कर के
नीति की, आचार, निष्ठा की

तर्जनी की वर्जना से
और सत्ता के असुर के नेवते आयी
बल-लिप्सा नंगी नाचती है :
उस समय दीवार के इस पार जब छाया हुआ होगा

सुनसान सन्नाटा उस समय सहसा पलट कर
साँप डस लेंगे निगल जाएँगे-
तुम्हें वह, तुम जिसे अपना साँप कहते हो
हमें यह, जो हमारा ही साँप है!

(5)

रुको, देखूँ मैं तुम्हारी आँख,
पहचानूँ कि उन में जो चमकती है-
या चमकनी चाहिए क्योंकि शायद
इस समय वह मुसीबत की राख से ढँक कर

बहुत मन्दी सुलगती हो-
तड़पती इनसानियत की लौ-
रुको, पहचानूँ कि क्या वह भिन्न है बिलकुल
उस हठीली धुकधुकी से

जनम से ही जिसे मैं दिल से लगाये हूँ?
रुको, तुम भी करो ऊँचा सीस, मेरी ओर
मुँह फेरो-करो आँखें चार झिझक को
छोड़ मेरी आँख में देखो,
नहीं जलती क्या वहाँ भी जोत-

काँपती हो, टिमटिमाती हो, शरीर छोड़ती हो,
धुएँ में घुट रही हो-
जीत वैसी ही जिसे तुम ने
सदा अपने हृदय में जलती हुई पाया-

किसी महती शक्ति ने अपनी धधकती महज्ज्वाला से छुला कर
जिसे देहों की मशालों में
जलाया!

(6)

रुकूँ मैं भी! क्यों तुम्हें तुम कहूँ?
अपने को अलग मानूँ? साँप दो हैं
हम नहीं। और फिर
मनुजता के पतन की इसी अवस्था में भी

साँप दोनों हैं पतित दोनों
तभी दोनों एक!

(7)

केंचुलें हैं, केंचुले हैं, झाड़ दो!
छल-मकर की तनी झिल्ली फाड़ दो!
साँप के विष-दाँत तोड़ उखाड़ दो!
आजकल का चलन है-सब जन्तुओं की खाल पहने हैं-
गले गीदड़-लोमड़ी की,

बाघ की है खाल काँधों पर
दिल ढँका है भेड़ की गुलगुली चमड़ी से
हाथ में थैला मगर की खाल का
और पैरों में-जगमगाती साँप की केंचुल

बनी है श्री चरण का सैंडल
किन्तु भीतर कहीं भेड़-बकरी,
बाघ-गीदड़, साँप के बहुरूप के अन्दर
कहीं पर रौंदा हुआ अब भी तड़पता है

सनातन मानव-खरा इनसान-
क्षण भर रुको तो उस को जगा लें!
नहीं है यह धर्म, ये तो पैतरे हैं उन दरिन्दों के
रूढि़ के नाखून पर मरजाद की मखमल चढ़ा कर

जो विचारों पर झपट्टा मारते हैं-
बड़े स्वार्थी की कुटिल चालें!
साथ आओ-गिलगिले ये साँप बैरी हैं हमारे
इन्हें आज पछाड़ दो यह मकर

की तनी झिल्ली फाड़ दो
केंचुले हैं केंचुले हैं झाड़ दो!

इलाहाबाद, 27-29 अक्टूबर, 1947

श्री मद्धर्मधुरंधर पंडा 

 (1)

धरती थर्रायी, पूरब में सहसा उठा बवंडर
महाकाल का थप्पड़-सा जा पड़ा
चाँदपुर-नोआखाली-फेनी-चट्टग्राम-त्रिपुरा में
स्तब्ध रह गया लोक

सुना हिंसा का दैत्य, नशे में धुत्त, रौंद कर चला गया है
जाति द्वेष की दीमक-खायी पोली मिट्टी
उठा वहाँ चीत्कार असंख्य दीनों पददलितों का
अपमानिता धर्षिता नारी का सहस्रमुख

फटा हुआ सुर फटे हृदय की आह
गूँज गयी-थर्राया सहम गया आकाश
फटी आँखों की भट्टी में जो खून
उतर आया था वह जल गया।

(2)

श्री मद्धर्मधुरंधर पंडा
के कानों पर जूँ तब रेंगी,
तनिक सरक कर थुलथुल
माया को आसन पर और
व्यवस्था से पधराकर

बोले-‘आये हो, हाँ, आओ
बेचारी दुखियारी!
मंगल करनी सब दुख हरनी
माँ मरजादा फतवा देंगी।

‘सदा द्रौपदी की लज्जा को
ढँका कृष्णा ने चीर बढ़ा कर
धर्म हमारा है करुणाकर
हम न करेंगे बहिष्कार

म्लेच्छ-धर्षिता का भी, चाहे
उस लांछन की छाप अमिट है।
साथ न बैठे-हाथ हमारे वह पाएगी
सदा दया का टुक्कड़-‘ सहसा जूँ रुक गयी।

तनिक सरकी थी-नारिवर्ग का घर्षण
(तीन, तीस या तीन हज़ार-आँकड़ों का जीवन में उतना मूल्य नहीं है-)
इतना ही बस था समर्थ। श्री पंडा जागे
यह भी उन की अनुकम्पा थी और नहीं क्या

अपने आसन से डिग जाते?
लुट जाती मरजाद सनातन?
इसीलिए जूँ रुकी। सो गये
श्री मद्धर्मधुरंधर पंडा।

मानवता को लगीं घोंटने फिर
गुंजलकें मरु रूढि़ की।

काशी-इलाहाबाद (रेल में), 6 नवम्बर, 1947

देखती है दीठ

हँस रही है वधू-जीवन तृप्तिमय है।
प्रिय-वदन अनुरक्त-यह उस की विजय है।
गेह है, गति, गीत है, लय है, प्रणय है :

सभी कुछ है।
देखती है दीठ-
लता टूटी, कुरमुराता मूल में है सूक्ष्म भय का कीट!

शिलङ्, 15 नवम्बर, 1945

बने मंजूष यह अंतस्

किसी एकान्त का लघु द्वीप मेरे प्राण में बच जाय
जिस से लोक-रव भी कर्म के समवेत में रच जाय।
बने मंजूष यह अन्तस् समर्पण के हुताशन का-
अकरुणा का हलाहल भी रसायन बन मुझे पच जाय।

इलाहाबाद, 29 दिसम्बर, 1949

हरी घास पर क्षण भर (कविता) 

आओ बैठें
इसी ढाल की हरी घास पर।

माली-चौकीदारों का यह समय नहीं है,
और घास तो अधुनातन मानव-मन की भावना की तरह
सदा बिछी है-हरी, न्यौती, कोई आ कर रौंदे।

आओ, बैठो
तनिक और सट कर, कि हमारे बीच स्नेह-भर का व्यवधान रहे, बस,
नहीं दरारें सभ्य शिष्ट जीवन की।

चाहे बोलो, चाहे धीरे-धीरे बोलो, स्वगत गुनगुनाओ,
चाहे चुप रह जाओ-
हो प्रकृतस्थ : तनो मत कटी-छँटी उस बाड़ सरीखी,
नमो, खुल खिलो, सहज मिलो
अन्त:स्मित, अन्त:संयत हरी घास-सी।

क्षण-भर भुला सकें हम
नगरी की बेचैन बुदकती गड्ड-मड्ड अकुलाहट-
और न मानें उसे पलायन;
क्षण-भर देख सकें आकाश, धरा, दूर्वा, मेघाली,
पौधे, लता दोलती, फूल, झरे पत्ते, तितली-भुनगे,
फुनगी पर पूँछ उठा कर इतराती छोटी-सी चिड़िया-
और न सहसा चोर कह उठे मन में-
प्रकृतिवाद है स्खलन
क्योंकि युग जनवादी है।

क्षण-भर हम न रहें रह कर भी :
सुनें गूँज भीतर के सूने सन्नाटे में किसी दूर सागर की लोल लहर की
जिस की छाती की हम दोनों छोटी-सी सिहरन हैं-
जैसे सीपी सदा सुना करती है।

क्षण-भर लय हों-मैं भी, तुम भी,
और न सिमटें सोच कि हम ने
अपने से भी बड़ा किसी भी अपर को क्यों माना!

क्षण-भर अनायास हम याद करें :
तिरती नाव नदी में,
धूल-भरे पथ पर असाढ़ की भभक, झील में साथ तैरना,
हँसी अकारण खड़े महा वट की छाया में,
वदन घाम से लाल, स्वेद से जमी अलक-लट,
चीड़ों का वन, साथ-साथ दुलकी चलते दो घोड़े,
गीली हवा नदी की, फूले नथुने, भर्रायी सीटी स्टीमर की,
खँडहर, ग्रथित अँगुलियाँ, बाँसे का मधु,
डाकिये के पैरों की चाप,
अधजानी बबूल की धूल मिली-सी गन्ध,
झरा रेशम शिरीष का, कविता के पद,
मसजिद के गुम्बद के पीछे सूर्य डूबता धीरे-धीरे,
झरने के चमकीले पत्थर, मोर-मोरनी, घुँघरू,
सन्थाली झूमुर का लम्बा कसक-भरा आलाप,
रेल का आह की तरह धीरे-धीरे खिंचना, लहरें
आँधी-पानी,
नदी किनारे की रेती पर बित्ते-भर की छाँह झाड़ की
अंगुल-अंगुल नाप-नाप कर तोड़े तिनकों का समूह,
लू,
मौन।

याद कर सकें अनायास : और न मानें
हम अतीत के शरणार्थी हैं;
स्मरण हमारा-जीवन के अनुभव का प्रत्यवलोकन-
हमें न हीन बनावे प्रत्यभिमुख होने के पाप-बोध से।
आओ बैठो : क्षण-भर :
यह क्षण हमें मिला है नहीं नगर-सेठों की फैया जी से।
हमें मिला है यह अपने जीवन की निधि से ब्याज सरीखा।

आओ बैठो : क्षण-भर तुम्हें निहारूँ
अपनी जानी एक-एक रेखा पहचानूँ
चेहरे की, आँखों की-अन्तर्मन की
और-हमारी साझे की अनगिन स्मृतियों की :
तुम्हें निहारूँ,
झिझक न हो कि निरखना दबी वासना की विकृति है!

धीरे-धीरे
धुँधले में चेहरे की रेखाएँ मिट जाएँ-
केवल नेत्र जगें : उतनी ही धीरे
हरी घास की पत्ती-पत्ती भी मिट जावे लिपट झाड़ियों के पैरों में
और झाड़ियाँ भी घुल जावें क्षिति-रेखा के मसृण ध्वान्त में;
केवल बना रहे विस्तार-हमारा बोध
मुक्ति का,
सीमाहीन खुलेपन का ही।

चलो, उठें अब,
अब तक हम थे बन्धु सैर को आये-
(देखे हैं क्या कभी घास पर लोट-पोट होते सतभैये शोर मचाते?)
और रहे बैठे तो लोग कहेंगे
धुँधले में दुबके प्रेमी बैठे हैं।

-वह हम हों भी तो यह हरी घास ही जाने :
(जिस के खुले निमन्त्रण के बल जग ने सदा उसे रौंदा है
और वह नहीं बोली),
नहीं सुनें हम वह नगरी के नागरिकों से
जिन की भाषा में अतिशय चिकनाई है साबुन की
किन्तु नहीं है करुणा।

उठो, चलें, प्रिय!

इलाहाबाद, 14 अक्टूबर, 1949

सपने मैंने भी देखे हैं 

सपने मैं ने भी देखे हैं-
मेरे भी हैं देश जहाँ पर
स्फटिक-नील सलिलाओं के पुलिनों पर सुर-धनु सेतु बने रहते हैं।

मेरी भी उमँगी कांक्षाएँ लीला-कर से छू आती हैं रंगारंग फानूस
व्यूह-रचित अम्बर-तलवासी द्यौस्पितर के!

आज अगर मैं जगा हुआ हूँ अनिमिष-
आज स्वप्न-वीथी से मेरे पैर अटपटे भटक गये हैं-
तो वह क्यों? इसलिए कि आज प्रत्येक स्वप्नदर्शी के आगे
गति से अलग नहीं पथ की यति कोई!

अपने से बाहर आने को छोड़ नहीं आवास दूसरा।
भीतर-भले स्वयं साँई बसते हों।
पिया-पिया की रटना! पिया न जाने आज कहाँ हैं :
सूली पर जो सेज बिछी है, वह-वह मेरी है!

इलाहबाद, 6 जनवरी, 1949

अकेली न जैयो राधे जमुना के तीर 

 ‘अकेली न जैयो राधे जमुना के तीर’
‘उस पार चलो ना! कितना अच्छा है नरसल का झुरमुट!’
अनमना भी सुन सका मैं
गूँजते से तप्त अन्त:स्वर तुम्हारे तरल कूजन में।

‘अरे, उस धूमिल विजन में?’
स्वर मेरा था चिकना ही, ‘अब घना हो चला झुटपुट।
नदी पर ही रहें, कैसी चाँदनी-सी है खिली!
उस पार की रेती उदास है।’

‘केवल बातें! हम आ जाते अभी लौट कर छिन में-‘
मान कुछ, मनुहार कुछ, कुछ व्यंग्य वाणी में।
दामिनी की कोर-सी चमकी अँगुलियाँ शान्त पानी में।
‘नदी किनारे रेती पर आता है कोई दिन में?’
‘कवि बने हो! युक्तियाँ हैं सभी थोथी-निरा शब्दों का विलास है।’

काली तब पड़ गयी साँझ की रेख।
साँस लम्बी स्निग्ध होती है-
मौन ही है गोद जिस में अनकही कुल व्यथा सोती है।
मैं रह गया क्षितिज को अपलक देख। और अन्त:स्वर रहा मन में-
‘क्या जरूरी है दिखना तुम्हें वह जो दर्द मेरे पास है?’

इलाहाबाद, 22 जून, 1948

खुलती आँख का सपना 

अरे ओ खुलती आँख के सपने!

विहग-स्वर सुन जाग देखा, उषा का आलोक छाया,
झिप गयी तब रूपकतरी वासना की मधुर माया;
स्वप्न में छिन, सतत सुधि में, सुप्त-जागृत तुम्हें पाया-
चेतना अधजगी, पलकें लगीं तेरी याद में कँपने!
अरे ओ खुलती आँख के सपने!

मुँदा पंकज, अंक अलि को लिये, सुध-बुध भूल सोता
किन्तु हँसता विकसता है प्रात में क्या कभी रोता?
प्राप्ति का सुख प्रेय है, पर समर्पण भी धर्म होता!
स्वस्ति! गोपन भोर की पहली सुनहली किरण से अपने!
अरे ओ खुलती आँख के सपने!

मेरठ, 25 दिसम्बर, 1946

जनवरी छब्बीस

(1)
आज हम अपने युगों के स्वप्न को
यह नयी आलोक-मंजूषा समर्पित कर रहे हैं।

आज हम अक्लान्त, ध्रुव, अविराम गति से बढ़े चलने का
कठिन व्रत धर रहे हैं
आज हम समवाय के हित, स्वेच्छया
आत्म-अनुशासन नया यह वर रहे हैं।

निराशा की दीर्घ तमसा में सजग रह हम
हुताशन पालते थे साधना का-
आज हम अपने युगों के स्वप्न को
आलोक-मंजूषा समर्पित कर रहे हैं।

(2)
सुनो हे नागरिक! अभिनव सभ्य भारत के नये जनराज्य के
सुनो! यह मंजूषा तुम्हारी है।

पला है आलोक चिर-दिन यह तुम्हारे स्नेह से, तुम्हारे ही रक्त से।
तुम्हीं दाता हो, तुम्हीं होता, तुम्हीं यजमान हो।
यह तुम्हारा पर्व है।

भूमि-सुत! इस पुण्य-भू की प्रजा, स्रष्टा तुम्हीं हो इस नये रूपाकार के
तुम्हीं से उद्भूत हो कर बल तुम्हारा
साधना का तेज-तप की दीप्ति-तुम को नया गौरव दे रही है!
यह तुम्हारे कर्म का ही प्रस्फुटन है।

नागरिक, जय! प्रजा-जन, जय! राष्ट्र के सच्चे विधायक, जय!
हम आलोक-मंजूषा समर्पित कर रहे हैं : और मंजूषा तुम्हारी है
और यह आलोक तुम्हारे ही अडिग विश्वास का आलोक है।

किन्तु रूपाकार यह केवल प्रतिज्ञा है
उत्तरोत्तर लोक का कल्याण ही है साध्य :
अनुशासन उसी के हेतु है।

(3)
यह प्रतिज्ञा ही हमारा दाय है लम्बे युगों की साधना का,
जिसे हम ने धर्म जाना।

स्वयं अपनी अस्थियाँ दे कर हमीं ने असत् पर सत् की
विजय का मर्म जाना।

सम्पुटित पर हाथ, जिस ने गोलियाँ निज वक्ष पर झेलीं,
शमन कर ज्वार हिंसा का-
उसी के नत-शीश धीरज को हमारे स्तिमित चिर-संस्कार ने
सच्चा कृती का कर्म जाना।

साधना रुकती नहीं : आलोक जैसे नहीं बँधता।
यह सुघर मंजूष भी झर गिरा सुन्दर फूल है पथ-कूल का।
माँग पथ की इसी से चुकती नहीं।

फिर भी बीन लो यह फूल
स्मरण कर लो इसी पथ पर गिरे सेनानी जयी को,
बढ़ चलो फिर शोध में अपने उसी धुँधले युगों के स्वप्न की
जिसे हम आलोक-मंजूषा समर्पित कर रहे हैं।

आज हम अपने युगों के स्वप्न को यह नयी आलोक-मंजूषा
समर्पित कर रहे हैं।

इलाहाबाद, 26 जनवरी, 1950

काँगड़े की छोरियाँ

काँगड़े की छोरियाँ कुछ भोरियाँ सब गोरियाँ
लाला जी, जेवर बनवा दो खाली करो तिजोरियाँ!
काँगड़े की छोरियाँ!

ज्वार-मका की क्यारियाँ हरियाँ-भरियाँ प्यारियाँ
धन-खेतों में प्रहर हवा की सुना रही है लोरियाँ-
काँगड़े की छोरियाँ!

पुतलियाँ चंचल कालियाँ कानों झुमके-बालियाँ
हम चौड़े में खड़े लुट गये बनी न हम से चोरियाँ-
काँगड़े की छोरियाँ!

काँगड़े की छोरियाँ कुछ भोरियाँ सब गोरियाँ।

काँगड़ा-नूरपुर (बस में), 24 जून, 1950

नदी के द्वीप

हम नदी के द्वीप हैं।
हम नहीं कहते कि हमको छोड़कर स्रोतस्विनी बह जाए।
वह हमें आकार देती है।
हमारे कोण, गलियाँ, अंतरीप, उभार, सैकत-कूल
सब गोलाइयाँ उसकी गढ़ी हैं।

माँ है वह! है, इसी से हम बने हैं।
किंतु हम हैं द्वीप। हम धारा नहीं हैं।
स्थिर समर्पण है हमारा। हम सदा से द्वीप हैं स्रोतस्विनी के।
किंतु हम बहते नहीं हैं। क्योंकि बहना रेत होना है।
हम बहेंगे तो रहेंगे ही नहीं।
पैर उखड़ेंगे। प्लवन होगा। ढहेंगे। सहेंगे। बह जाएँगे।

और फिर हम चूर्ण होकर भी कभी क्या धार बन सकते?
रेत बनकर हम सलिल को तनिक गँदला ही करेंगे।
अनुपयोगी ही बनाएँगे।

द्वीप हैं हम! यह नहीं है शाप। यह अपनी नियती है।
हम नदी के पुत्र हैं। बैठे नदी की क्रोड में।
वह बृहत भूखंड से हम को मिलाती है।
और वह भूखंड अपना पितर है।
नदी तुम बहती चलो।
भूखंड से जो दाय हमको मिला है, मिलता रहा है,
माँजती, सस्कार देती चलो। यदि ऐसा कभी हो –

तुम्हारे आह्लाद से या दूसरों के,
किसी स्वैराचार से, अतिचार से,
तुम बढ़ो, प्लावन तुम्हारा घरघराता उठे –
यह स्रोतस्विनी ही कर्मनाशा कीर्तिनाशा घोर काल,
प्रावाहिनी बन जाए –
तो हमें स्वीकार है वह भी। उसी में रेत होकर।
फिर छनेंगे हम। जमेंगे हम। कहीं फिर पैर टेकेंगे।
कहीं फिर भी खड़ा होगा नए व्यक्तित्व का आकार।
मात:, उसे फिर संस्कार तुम देना।

इलाहाबाद, 11 सितम्बर, 1949

सवेरे-सवेरे तुम्हारा नाम 

सवेरे-सवेरे तुम्हारा नाम।

एक सिहरन, जो मन को रोमांचित कर जाय
एक विकसन, जो मन को रंजित कर जाय
एक समर्पण जो आत्मा को तल्लीनता दे।

अँधेरी रात जागते शिशु की तरह मुस्करा उठे;
दिन हो एक आलोक-द्वार जिस से मुझे जाना है।

(समय मेरा रथ और उल्लास मेरा घोड़ा।)
मेरा जीवन-घास की पत्ती से झूलती हुई यह अयानी ओस-बूँद-
सूर्य की पहली किरण से जगमगा उठे और स्वयं किरणें
विकीरित करने लगे।

मेरा कर्म मेरे गले का जुआ नहीं, वह जोती हुई भूमि बन जाय
जिस में मुझे नया बीज बोना है।

गाते हुए गान
गाते हुए मन्त्र
गाते हुए नाम :
सवेरे-सवेरे तुम्हारा नाम।

दिल्ली, अक्टूबर, 1952′

वहाँ रात 

पत्थरों के उन कँगूरों पर
अजानी गन्ध-सी अब छा गयी होगी उपेक्षित रात।

बिछलती डगर-सी सुनसान सरिता पर
ठिठक कर सहम कर थम गयी होगी बात।

अनमनी-सी धुन्ध में चुपचाप
हताशा में ठगे-से, वेदना से, क्लिन्न, पुरनम टिमकते तारे।

हार कर मुरझा गये होंगे अँधेरे से बिचारे-
विरस रेतीली नदी के दोनों किनारे।

रुके होंगे युगल चकवे बाँध अन्तिम बार
जल पर
वृत्त मिट जाते दिवस के प्यार का-
अपनी हार का।

गन्ध-लोभी व्यस्त मौना कोष कर के बन्द
पड़ी होगी मौन
समेटे पंख, खींचे डंक, मोम के निज भौन में निष्पन्द!

पंचमी की चाँदनी कँपती उँगलियों से
आँख पथरायी समय की आँज जावेगी।
लिखत को ‘आज’ की फिर पोंछ ‘कल’ के लिए पाटी माँज जावेगी।

कहा तो सहज, पीछे लौट देखेंगे नहीं-
पर नकारों के सहारे कब चला जीवन?
स्मरण को पाथेय बनने दो :
कभी भी अनुभूति उमड़ेगी प्लवन का सान्द्र घन भी बन!

इलाहाबाद, 19 जनवरी, 1951

यही एक अमरत्व है 

ना, ना; फेर नहीं आतीं ये सुन्दर रातें, ना ये सुन्दर दिन!

नहीं बाँध कर रक्खा जाता, छोटा-सा पल-छिन।
चढ़ डोले पर चली जा रही, काल की दुलहिन।

साथी, उसी गैल में तुम स्वेच्छा से अपना घोड़ा डाल दो,
यह जो अप्रतिहत संगीत है तुम भी उस पर ताल दो।

यह सुन्दर है, यह शिव है,
यह मेरा हो, पर बँधा नहीं है मुझसे, निजी धर्म के मर्त्य है।
जीवन नि:संग समर्पण है, जीवन का एक यही तो सत्य है।

जो होता है जब होता है तब एक बार ही
सदा के लिए हो जाता है : यही एक अमरत्व है।
क्षण-क्षण जो मरता दिखता है अविरल अन्त:सत्त्व है।

जीवन की गति धारा है यह एक लड़ी है-क्रम तो अनवच्छिन्न है,
हर क्षण आगे-पीछे बँधा हुआ है, इसी लिए पर अद्वितीय है, भिन्न है।

पर मनुष्य से नहीं कहीं कुछ : इसी तर्क से जीवन स्वत: प्रमाण है।
दो, दो, खुले हाथ से दो : कि अस्मिता विलय एक मात्र कल्याण है।

ना, कुछ फेर नहीं आने का, साथी, ना ये दिन, ना रात,
फेर नहीं खिलने वाले हैं
एक अकेली सरसी के ये अद्वितीय जलजात।

इसे मान लो : तदनन्तर यदि रुकना चाहो रुक लो,
विलमाने में रस लो।
या फिर हँसने का ही मन हो तो वह हँसी दिव्य है :
हँस लो।

दिल्ली, 22 जनवरी, 1954

सर्जना के क्षण

एक क्षण भर और
रहने दो मुझे अभिभूत
फिर जहाँ मैने संजो कर और भी सब रखी हैं
ज्योति शिखायें
वहीं तुम भी चली जाना
शांत तेजोरूप!

एक क्षण भर और
लम्बे सर्जना के क्षण कभी भी हो नहीं सकते!
बूँद स्वाती की भले हो
बेधती है मर्म सीपी का उसी निर्मम त्वरा से
वज्र जिससे फोड़ता चट्टान को
भले ही फिर व्यथा के तम में
बरस पर बरस बीतें
एक मुक्तारूप को पकते!

दिल्ली, 17 मई, 1956

आदम को एक पुराने ईश्वर का शाप

जाओ
अब रोओ-
जाओ!

सोओ
और पाओ
जागो
और खोओ
स्मृति में अनुरागो
वास्तव में
ख़ून के आँसू रोओ।

बार-बार
निषिद्ध फल खाओ
बार-बार
शत्रु का प्रलोभन तुम जानो
आँसू में, खून में, पसीने में
हार-हार
मुझे पहचानो।

मृषा को वरना
तृषा से मरना
लौट-लौट आना
मार्ग कहाँ पाना?

रोओ, रोओ, रोओ-
जाओ!

पूर्वी बर्लिन, 4 अक्टूबर, 1955

पश्चिम के समूह-जन 

पश्चिम के समूह-जन
एक मृषा जिस में सब डूबे हुए हैं-
क्यों कि एक सत्य जिस से सब ऊबे हुए हैं।

एक तृषा जो मिट नहीं सकती इस लिए मरने नहीं देती;
एक गति जो विवश चलाती है इसलिए कुछ करने नहीं देती।

स्वातन्त्र्य के नाम पर मारते हैं मरते हैं
क्यों कि स्वातन्त्र्य से डरते हैं।

डार्टिंगटन हॉल, टॉटनेस, 18 अगस्त, 1955

सागर और गिरगिट

सागर भी रंग बदलता है, गिरगिट भी रंग बदलता है।
सागर को पूजा मिलती है, गिरगिट कुत्सा पर पलता है।
सागर है बली : बिचारा गिरगिट भूमि चूमता चलता है।
या यह : गिरगिट का जीवनमय होना ही हम मनुजों को खलता है?

नैपोली-पोर्ट सईद (जहाज में), 1 फरवरी, 1956

हे अमिताभ 

हे अमिताभ !
नभ पूरित आलोक,
सुख से, सुरुचि से, रूप से, भरे ओक :
हे अवलोकित
हे हिरण्यनाभ !

क्योतो, जापान, 6 सितम्बर, 1957

ब्राह्म मुर्हूत : स्वस्तिवाचन

जियो उस प्यार में
जो मैं ने तुम्हें दिया है,
उस दु:ख में नहीं, जिसे

बेझिझक मैं ने पिया है।
उस गान में जियो
जो मैं ने तुम्हें सुनाया है,
उस आह में नहीं, जिसे

मैं ने तुम से छिपाया है।
उस द्वार से गु जरो
जो मैं ने तुम्हारे लिए खोला है,
उस अन्धकार से नहीं

जिस की गहराई को
बार-बार मैं ने तुम्हारी रक्षा की
भावना से टटोला है।
वह छादन तुम्हारा घर हो

जिस मैं असीसों से बुनता हूँ, बुनूँगा;
वे काँटे-गोखरू तो मेरे हैं
जिन्हें मैं राह से चुनता हूँ, चुनूँगा।
वह पथ तुम्हारा हो

जिसे मैं तुम्हारे हित बनाता हूँ, बनाता रहूँगा;
मैं जो रोड़ा हूँ उसे हथौड़े से तोड़-तोड़
मैं जो कारीगर हूँ, करीने से
सँवारता-सजाता हूँ, सजाता रहूँगा।

सागर के किनारे तक
तुम्हें पहुँचाने का
उदार उद्यम ही मेरा हो :
फिर वहाँ जो लहर हो, तारा हो,

सोन-तरी हो, अरुण सवेरा हो,
वह सब, ओ मेरे वर्ग!
तुम्हारा हो, तुम्हारा हो, तुम्हारा हो।

नयी दिल्ली, 6 अप्रैल, 1957

अच्छा खंडित सत्य

अच्छा
खंडित सत्य
सुघर नीरन्ध्र मृषा से,
अच्छा
पीड़ित प्यार सहिष्णु
अकम्पित निर्ममता से।

अच्छी कुण्ठा रहित इकाई
साँचे-ढले समाज से,
अच्छा
अपना ठाठ फ़क़ीरी
मँगनी के सुख-साज से।

अच्छा
सार्थक मौन
व्यर्थ के श्रवण-मधुर भी छन्द से।
अच्छा
निर्धन दानी का उघडा उर्वर दुख
धनी सूम के बंझर धुआँ-घुटे आनन्द से।

अच्छे
अनुभव की भट्टी में तपे हुए कण-दो कण
अन्तर्दृष्टि के,
झूठे नुस्खे वाद, रूढि़, उपलब्धि परायी के प्रकाश से
रूप-शिव, रूप सत्य की सृष्टि के।

मछलियाँ 

  न जाने मछलियाँ हैं भी या नहीं
आँखें तुम्हारी
किन्तु मेरी दीप्त जीवन-चेतना निश्चय नदी है
हर लहर की ओट जिस की उन्हीं की गति

काँपती-सी जी रही है
पिरोती-सी रश्मियाँ हर बूँद में।

इलाहाबाद, 19 दिसम्बर, 1958

नया कवि : आत्म स्वीकार

किसी का सत्य था
मैं ने सन्दर्भ में जोड़ दिया।
कोई मधु-कोष काट लाया था
मैं ने निचोड़ लिया।

किसी की उक्ति में गरिमा थी
मैं ने उसे थोड़ा-सा सँवार दिया,
किसी की संवेदना में आग का-सा ताप था
मैं ने दूर हटते-हटते उसे धिक्कार दिया।

कोई हुनरमन्द था :
मैं ने देखा और कहा, ‘यों !’
थका भारवाही पाया—
घुड़का या कोंच दिया, ‘क्यों ?’

किसी की पौध थी,
मैं ने सींची और बढ़ने पर अपना ली,
किसी की लगायी लता थी,
मैं ने दो बल्ली गाड़ उसी पर छवा ली।

किसी की कली थी
मैं ने अनदेखे में बीन ली,
किसी की बात थी
मैंने मुँह से छीन ली।

यों मैं कवि हूँ, आधुनिक हूँ, नया हूँ :
काव्य-तत्व की खोज में कहाँ नहीं गया हूँ ?
चाहता हूँ आप मुझे
एक-एक शब्द पर सराहते हुए पढ़ें।
पर प्रतिमा—अरे, वह तो
जैसे आप को रुचि आप स्वयं गढ़े !

नयी दिल्ली (वाक् कार्यालय, सुन्दर नगर), 3 सितम्बर, 1958

अपलक रूप निहारूँ 

  अपलक रूप निहारूँ
तन-मन कहाँ रह गये?
चेतन तुझ पर वारूँ,
अपलक रूप निहारूँ!

अनझिप नैन, अवाक् गिरा
हिय अनुद्विग्न, आविष्ट चेतना
पुलक-भरा गति-मुग्ध करों से
मैं आरती उतारूँ।
अपलक रूप निहारूँ।

प्नोम् पेञ् (कम्बुजिया), 2 नवम्बर, 1957

सरस्वती पुत्र

मन्दिर के भीतर वे सब धुले-पुँछे उघड़े-अवलिप्त,
खुले गले से
मुखर स्वरों में
अति-प्रगल्भ
गाते जाते थे राम-नाम।
भीतर सब गूँगे, बहरे, अर्थहीन, जल्पक,
निर्बोध, अयाने, नाटे,
पर बाहर जितने बच्चे उतने ही बड़बोले।

बाहर वह
खोया-पाया, मैला-उजला
दिन-दिन होता जाता वयस्क,
दिन-दिन धुँधलाती आँखों से
सुस्पष्ट देखता जाता था;
पहचान रहा था रूप,
पा रहा वाणी और बूझता शब्द,
पर दिन-दिन अधिकाधिक हकलाता था:
दिन-दिन पर उसकी घिग्घी बँधती जाती थी।

साँस का पुतला 

वासना को बाँधने को
तूमड़ी जो स्वर-तार बिछाती है-
आह! उसी में कैसी एकांत निविड़
वासना थरथराती है !
तभी तो साँप की कुण्डली हिलती नहीं-
फन डोलता है ।

कभी रात मुझे घेरती है,
कभी मैं दिन को टेरता हूँ,
कभी एक प्रभा मुझे हेरती है,
कभी मैं प्रकाश-कण बिखेरता हूँ।
कैसे पहचानूँ कब प्राण-स्वर मुखर है,
कब मन बोलता है ?

साँस का पुतला हूँ मैं:
जरा से बँधा हूँ और
मरण को दे दिया गया हूँ:
पर एक जो प्यार है न, उसी के द्वारा
जीवनमुक्त मैं किया गया हूँ ।
काल की दुर्वह गदा को एक
कौतुक-भरा बाल क्षण तोलता है !

अंतरंग चेहरा

अरे ये उपस्थित
घेरते,घूरते, टेरते
लोग-लोग-लोग-लोग
जिन्हें पर विधाता ने
मेरे लिए दिया नहीं
निजी एक अंतरंग चेहरा ।

अनुपस्थित केवल वे
हेरते, अगोरते
लोचन दो
निहित निजीपन जिन में
सब चेहरों का,
ठहरा ।

वातायन
संसृति से मेरे राग-बंध के ।
लोचन दो-
सम्पृक्ति निविड़ की
स्फटिक-विमल वापियाँ
अचंचल :
जल
गहरा-गहरा-गहरा !

शिक्षायतन, कलकत्ता, 29 नवम्बर, 1959

यह महाशून्य का शिविर

यह महाशून्य का शिविर,
असीम, छा रहा ऊपर :
नीचे यह महामौन की सरिता
दिग्विहीन बहती है ।

यह बीच-अधर, मन रहा टटोल
प्रतीकों की परिभाषा
आत्मा में जो अपने ही से
खुलती रहती है ।

रूपों में एक अरूप सदा खिलता है,
गोचर में एक अगोचर, अप्रमेय,
अनुभव में एक अतीन्द्रिय,
पुरुषों के हर वैभव में ओझल
अपौरुषेय मिलता है ।

मैं एक, शिविर का प्रहरी, भोर जगा
अपने को मौन नदी के खड़ा किनारे पाता हूँ :
मैं, मौन-मुखर, सब छंदों में
उस एक निर्वच, छ्म्द-मुक्त को
गाता हूँ ।

जो कुछ सुन्दर था, प्रेम, काम्य

जो कुछ सुन्दर था, प्रेय, काम्य,
जो अच्छा, मँजा नया था, सत्य-सार,
मैं बीन-बीन कर लाया
नैवेद्य चढ़ाया ।
पर यह क्या हुआ ?
सब पड़ा-पड़ा कुम्हलाया, सूख गया मुरझाया :
कुछ भी तो उसने हाथ बढ़ा कर नहीं लिया ।

गोपन लज्जा में लिपटा, सहमा स्वर भीतर से आया :
यह सब मन ने किया,
हृदय ने कुछ नहीं दिया,
थाती का नहीं, अपना हो जिया ।
इस लिए आत्मा ने कुछ नहीं छुआ ।

केवल जो अस्पृश्य, गर्ह्य कह
तज आई मेरे अस्तित्त्व मात्र की सत्ता,
जिस के भय से त्रस्त, ओढ़ती काली घृणा इयत्ता,
उतना ही, वही हलाहल उस ने लिया ।
और मुझ को वात्सल्य-भरा आशिष दे कर-
ओक भर पिया ।

दूज का चाँद 

दूज का चाँद-

मेरे छोटे घर-कुटीर का दिया
तुम्हारे मंदिर के विस्तृत आँगन में
सहमा-सा रख दिया गया ।

असाध्य वीणा

आ गये प्रियंवद ! केशकम्बली ! गुफा-गेह !
राजा ने आसन दिया। कहा :
“कृतकृत्य हुआ मैं तात ! पधारे आप।
भरोसा है अब मुझ को
साध आज मेरे जीवन की पूरी होगी !”

लघु संकेत समझ राजा का
गण दौड़े ! लाये असाध्य वीणा,
साधक के आगे रख उसको, हट गये।
सभा की उत्सुक आँखें
एक बार वीणा को लख, टिक गयीं
प्रियंवद के चेहरे पर।

“यह वीणा उत्तराखंड के गिरि-प्रान्तर से
–घने वनों में जहाँ व्रत करते हैं व्रतचारी —
बहुत समय पहले आयी थी।
पूरा तो इतिहास न जान सके हम :
किन्तु सुना है
वज्रकीर्ति ने मंत्रपूत जिस
अति प्राचीन किरीटी-तरु से इसे गढा़ था —
उसके कानों में हिम-शिखर रहस्य कहा करते थे अपने,
कंधों पर बादल सोते थे,
उसकी करि-शुंडों सी डालें

हिम-वर्षा से पूरे वन-यूथों का कर लेती थीं परित्राण,
कोटर में भालू बसते थे,
केहरि उसके वल्कल से कंधे खुजलाने आते थे।
और –सुना है– जड़ उसकी जा पँहुची थी पाताल-लोक,
उसकी गंध-प्रवण शीतलता से फण टिका नाग वासुकि सोता था।
उसी किरीटी-तरु से वज्रकीर्ति ने
सारा जीवन इसे गढा़ :
हठ-साधना यही थी उस साधक की —
वीणा पूरी हुई, साथ साधना, साथ ही जीवन-लीला।”

राजा रुके साँस लम्बी लेकर फिर बोले :
“मेरे हार गये सब जाने-माने कलावन्त,
सबकी विद्या हो गई अकारथ, दर्प चूर,
कोई ज्ञानी गुणी आज तक इसे न साध सका।
अब यह असाध्य वीणा ही ख्यात हो गयी।
पर मेरा अब भी है विश्वास
कृच्छ-तप वज्रकीर्ति का व्यर्थ नहीं था।
वीणा बोलेगी अवश्य, पर तभी।
इसे जब सच्चा स्वर-सिद्ध गोद में लेगा।
तात! प्रियंवद! लो, यह सम्मुख रही तुम्हारे
वज्रकीर्ति की वीणा,
यह मैं, यह रानी, भरी सभा यह :
सब उदग्र, पर्युत्सुक,
जन मात्र प्रतीक्षमाण !”

केश-कम्बली गुफा-गेह ने खोला कम्बल।
धरती पर चुपचाप बिछाया।
वीणा उस पर रख, पलक मूँद कर प्राण खींच,
करके प्रणाम,
अस्पर्श छुअन से छुए तार।

धीरे बोला : “राजन! पर मैं तो
कलावन्त हूँ नहीं, शिष्य, साधक हूँ–
जीवन के अनकहे सत्य का साक्षी।
वज्रकीर्ति!
प्राचीन किरीटी-तरु!
अभिमन्त्रित वीणा!
ध्यान-मात्र इनका तो गदगद कर देने वाला है।”

चुप हो गया प्रियंवद।
सभा भी मौन हो रही।

वाद्य उठा साधक ने गोद रख लिया।
धीरे-धीरे झुक उस पर, तारों पर मस्तक टेक दिया।
सभा चकित थी — अरे, प्रियंवद क्या सोता है?
केशकम्बली अथवा होकर पराभूत
झुक गया तार पर?
वीणा सचमुच क्या है असाध्य?
पर उस स्पन्दित सन्नाटे में
मौन प्रियंवद साध रहा था वीणा–
नहीं, अपने को शोध रहा था।
सघन निविड़ में वह अपने को

सौंप रहा था उसी किरीटी-तरु को
कौन प्रियंवद है कि दंभ कर
इस अभिमन्त्रित कारुवाद्य के सम्मुख आवे?
कौन बजावे
यह वीणा जो स्वंय एक जीवन-भर की साधना रही?
भूल गया था केश-कम्बली राज-सभा को :

कम्बल पर अभिमन्त्रित एक अकेलेपन में डूब गया था
जिसमें साक्षी के आगे था
जीवित रही किरीटी-तरु
जिसकी जड़ वासुकि के फण पर थी आधारित,
जिसके कन्धों पर बादल सोते थे
और कान में जिसके हिमगिरी कहते थे अपने रहस्य।
सम्बोधित कर उस तरु को, करता था
नीरव एकालाप प्रियंवद।

“ओ विशाल तरु!
शत सहस्र पल्लवन-पतझरों ने जिसका नित रूप सँवारा,
कितनी बरसातों कितने खद्योतों ने आरती उतारी,
दिन भौंरे कर गये गुंजरित,
रातों में झिल्ली ने
अनथक मंगल-गान सुनाये,
साँझ सवेरे अनगिन
अनचीन्हे खग-कुल की मोद-भरी क्रीड़ा काकलि
डाली-डाली को कँपा गयी–

ओ दीर्घकाय!
ओ पूरे झारखंड के अग्रज,
तात, सखा, गुरु, आश्रय,
त्राता महच्छाय,
ओ व्याकुल मुखरित वन-ध्वनियों के
वृन्दगान के मूर्त रूप,
मैं तुझे सुनूँ,
देखूँ, ध्याऊँ
अनिमेष, स्तब्ध, संयत, संयुत, निर्वाक :
कहाँ साहस पाऊँ
छू सकूँ तुझे !
तेरी काया को छेद, बाँध कर रची गयी वीणा को

किस स्पर्धा से
हाथ करें आघात
छीनने को तारों से
एक चोट में वह संचित संगीत जिसे रचने में
स्वंय न जाने कितनों के स्पन्दित प्राण रचे गये।

“नहीं, नहीं ! वीणा यह मेरी गोद रही है, रहे,
किन्तु मैं ही तो
तेरी गोदी बैठा मोद-भरा बालक हूँ,
तो तरु-तात ! सँभाल मुझे,
मेरी हर किलक
पुलक में डूब जाय :

मैं सुनूँ,
गुनूँ,
विस्मय से भर आँकू
तेरे अनुभव का एक-एक अन्त:स्वर
तेरे दोलन की लोरी पर झूमूँ मैं तन्मय–
गा तू :
तेरी लय पर मेरी साँसें
भरें, पुरें, रीतें, विश्रान्ति पायें।
“गा तू !
यह वीणा रखी है : तेरा अंग — अपंग।
किन्तु अंगी, तू अक्षत, आत्म-भरित,
रस-विद,
तू गा :
मेरे अंधियारे अंतस में आलोक जगा
स्मृति का
श्रुति का —

तू गा, तू गा, तू गा, तू गा !

” हाँ मुझे स्मरण है :
बदली — कौंध — पत्तियों पर वर्षा बूँदों की पटापट।
घनी रात में महुए का चुपचाप टपकना।
चौंके खग-शावक की चिहुँक।
शिलाओं को दुलारते वन-झरने के
द्रुत लहरीले जल का कल-निनाद।
कुहरें में छन कर आती
पर्वती गाँव के उत्सव-ढोलक की थाप।
गड़रिये की अनमनी बाँसुरी।
कठफोड़े का ठेका। फुलसुँघनी की आतुर फुरकन :
ओस-बूँद की ढरकन-इतनी कोमल, तरल, कि झरते-झरते

मानो हरसिंगार का फूल बन गयी।
भरे शरद के ताल, लहरियों की सरसर-ध्वनि।
कूँजो की क्रेंकार। काँद लम्बी टिट्टिभ की।
पंख-युक्त सायक-सी हंस-बलाका।
चीड़-वनो में गन्ध-अन्ध उन्मद मतंग की जहाँ-तहाँ टकराहट
जल-प्रपात का प्लुत एकस्वर।
झिल्ली-दादुर, कोकिल-चातक की झंकार पुकारों की यति में
संसृति की साँय-साँय।

“हाँ मुझे स्मरण है :
दूर पहाड़ों-से काले मेघों की बाढ़
हाथियों का मानों चिंघाड़ रहा हो यूथ।
घरघराहट चढ़ती बहिया की।
रेतीले कगार का गिरना छ्प-छपाड़।
झंझा की फुफकार, तप्त,
पेड़ों का अररा कर टूट-टूट कर गिरना।

ओले की कर्री चपत।
जमे पाले-ले तनी कटारी-सी सूखी घासों की टूटन।
ऐंठी मिट्टी का स्निग्ध घास में धीरे-धीरे रिसना।
हिम-तुषार के फाहे धरती के घावों को सहलाते चुपचाप।
घाटियों में भरती
गिरती चट्टानों की गूंज —
काँपती मन्द्र — अनुगूँज — साँस खोयी-सी,
धीरे-धीरे नीरव।

“मुझे स्मरण है
हरी तलहटी में, छोटे पेडो़ की ओट ताल पर
बँधे समय वन-पशुओं की नानाबिध आतुर-तृप्त पुकारें :
गर्जन, घुर्घुर, चीख, भूख, हुक्का, चिचियाहट।
कमल-कुमुद-पत्रों पर चोर-पैर द्रुत धावित
जल-पंछी की चाप।
थाप दादुर की चकित छलांगों की।
पन्थी के घोडे़ की टाप धीर।
अचंचल धीर थाप भैंसो के भारी खुर की।

“मुझे स्मरण है
उझक क्षितिज से
किरण भोर की पहली
जब तकती है ओस-बूँद को
उस क्षण की सहसा चौंकी-सी सिहरन।
और दुपहरी में जब
घास-फूल अनदेखे खिल जाते हैं
मौमाखियाँ असंख्य झूमती करती हैं गुंजार —
उस लम्बे विलमे क्षण का तन्द्रालस ठहराव।
और साँझ को
जब तारों की तरल कँपकँपी

स्पर्शहीन झरती है —
मानो नभ में तरल नयन ठिठकी
नि:संख्य सवत्सा युवती माताओं के आशिर्वाद —
उस सन्धि-निमिष की पुलकन लीयमान।

“मुझे स्मरण है
और चित्र प्रत्येक
स्तब्ध, विजड़ित करता है मुझको।
सुनता हूँ मैं
पर हर स्वर-कम्पन लेता है मुझको मुझसे सोख —
वायु-सा नाद-भरा मैं उड़ जाता हूँ। …
मुझे स्मरण है —
पर मुझको मैं भूल गया हूँ :
सुनता हूँ मैं —
पर मैं मुझसे परे, शब्द में लीयमान।

“मैं नहीं, नहीं ! मैं कहीं नहीं !
ओ रे तरु ! ओ वन !
ओ स्वर-सँभार !
नाद-मय संसृति !
ओ रस-प्लावन !
मुझे क्षमा कर — भूल अकिंचनता को मेरी —
मुझे ओट दे — ढँक ले — छा ले —
ओ शरण्य !
मेरे गूँगेपन को तेरे सोये स्वर-सागर का ज्वार डुबा ले !
आ, मुझे भला,
तू उतर बीन के तारों में
अपने से गा
अपने को गा —
अपने खग-कुल को मुखरित कर

चित्र:Veena instrument.jpg

अपनी छाया में पले मृगों की चौकड़ियों को ताल बाँध,
अपने छायातप, वृष्टि-पवन, पल्लव-कुसुमन की लय पर
अपने जीवन-संचय को कर छंदयुक्त,
अपनी प्रज्ञा को वाणी दे !
तू गा, तू गा —
तू सन्निधि पा — तू खो
तू आ — तू हो — तू गा ! तू गा !”

राजा आगे
समाधिस्थ संगीतकार का हाथ उठा था —
काँपी थी उँगलियाँ।
अलस अँगड़ाई ले कर मानो जाग उठी थी वीणा :
किलक उठे थे स्वर-शिशु।
नीरव पद रखता जालिक मायावी
सधे करों से धीरे धीरे धीरे
डाल रहा था जाल हेम तारों-का ।

सहसा वीणा झनझना उठी —
संगीतकार की आँखों में ठंडी पिघली ज्वाला-सी झलक गयी —
रोमांच एक बिजली-सा सबके तन में दौड़ गया ।
अवतरित हुआ संगीत
स्वयम्भू
जिसमें सीत है अखंड
ब्रह्मा का मौन
अशेष प्रभामय ।

डूब गये सब एक साथ ।
सब अलग-अलग एकाकी पार तिरे ।

राजा ने अलग सुना :

“जय देवी यश:काय
वरमाल लिये
गाती थी मंगल-गीत,
दुन्दुभी दूर कहीं बजती थी,
राज-मुकुट सहसा हलका हो आया था, मानो हो फल सिरिस का
ईर्ष्या, महदाकांक्षा, द्वेष, चाटुता
सभी पुराने लुगड़े-से झड़ गये, निखर आया था जीवन-कांचन
धर्म-भाव से जिसे निछावर वह कर देगा ।

रानी ने अलग सुना :
छँटती बदली में एक कौंध कह गयी —
तुम्हारे ये मणि-माणिक, कंठहार, पट-वस्त्र,
मेखला किंकिणि —
सब अंधकार के कण हैं ये ! आलोक एक है
प्यार अनन्य ! उसी की
विद्युल्लता घेरती रहती है रस-भार मेघ को,
थिरक उसी की छाती पर उसमें छिपकर सो जाती है
आश्वस्त, सहज विश्वास भरी ।
रानी
उस एक प्यार को साधेगी ।

सबने भी अलग-अलग संगीत सुना ।
इसको
वह कृपा-वाक्य था प्रभुओं का —
उसकी
आतंक-मुक्ति का आश्वासन :
इसको
वह भरी तिजोरी में सोने की खनक —
उसे
बटुली में बहुत दिनों के बाद अन्न की सोंधी खुशबू ।
किसी एक को नयी वधू की सहमी-सी पायल-ध्वनि ।
किसी दूसरे को शिशु की किलकारी ।
एक किसी को जाल-फँसी मछली की तड़पन —
एक अपर को चहक मुक्त नभ में उड़ती चिड़िया की ।
एक तीसरे को मंडी की ठेलमेल, गाहकों की अस्पर्धा-भरी बोलियाँ

चौथे को मन्दिर मी ताल-युक्त घंटा-ध्वनि ।
और पाँचवें को लोहे पर सधे हथौड़े की सम चोटें
और छठें को लंगर पर कसमसा रही नौका पर लहरों की अविराम थपक ।
बटिया पर चमरौधे की रूँधी चाप सातवें के लिये —
और आठवें को कुलिया की कटी मेंड़ से बहते जल की छुल-छुल
इसे गमक नट्टिन की एड़ी के घुँघरू की
उसे युद्ध का ढाल :
इसे सझा-गोधूली की लघु टुन-टुन —
उसे प्रलय का डमरू-नाद ।
इसको जीवन की पहली अँगड़ाई
पर उसको महाजृम्भ विकराल काल !
सब डूबे, तिरे, झिपे, जागे —
ओ रहे वशंवद, स्तब्ध :
इयत्ता सबकी अलग-अलग जागी,
संघीत हुई,
पा गयी विलय ।

वीणा फिर मूक हो गयी ।
साधु ! साधु ! ”
उसने
राजा सिंहासन से उतरे —
“रानी ने अर्पित की सतलड़ी माल,

हे स्वरजित ! धन्य ! धन्य ! ”

संगीतकार
वीणा को धीरे से नीचे रख, ढँक — मानो
गोदी में सोये शिशु को पालने डाल कर मुग्धा माँ
हट जाय, दीठ से दुलारती —
उठ खड़ा हुआ ।
बढ़ते राजा का हाथ उठा करता आवर्जन,
बोला :
“श्रेय नहीं कुछ मेरा :
मैं तो डूब गया था स्वयं शून्य में
वीणा के माध्यम से अपने को मैंने
सब कुछ को सौंप दिया था —
सुना आपने जो वह मेरा नहीं,
न वीणा का था :
वह तो सब कुछ की तथता थी
महाशून्य
वह महामौन
अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय
जो शब्दहीन
सबमें गाता है ।”

नमस्कार कर मुड़ा प्रियंवद केशकम्बली। लेकर कम्बल गेह-गुफा को चला गया ।

उठ गयी सभा । सब अपने-अपने काम लगे ।
युग पलट गया ।

प्रिय पाठक ! यों मेरी वाणी भी
मौन हुई ।

यही, हाँ, यही

यही, हाँ, यही-
कि और कोई बची नहीं रही
उस मेरी मधु-मद-भरी
रात की निशानी :
एक यह ठीकरे हुआ प्याला
कहता है-
जिसे चाहो तो मान लो कहानी ।

और दे भी क्या सकता हूँ हवाला
उस रात का :
या प्रमाण अपनी बात का ?
उस धूमयुक्त कम्पहीन
अपने ही ज्वलन के हुताशन के
ताप-शुभ्र केन्द्र-वृत्त में
उस युग साक्षात का ?

यों कहीं तो था लेखा :
पर मैंने जो दिया, जो पाया,
जो पिया, जो गिराया,
जो ढाला, जो छलकाया,
जो नितारा, जो छाना,
जो उतारा, जो चढ़ाया,
जो जोड़ा, जो तोड़ा, जो छोड़ा-
सब का जो कुछ हिसाब रहा, मैंने देखा
कि उसी यज्ञ-ज्वाला में गिर गया ।
और उसी क्षण मुझे लगा कि अरे, मैं तिर गया
-ठीक है मेरा सिर फिर गया ।

मैं अवाक हूँ, अपलक हूँ ।
मेरे पास और कुछ नहीं है
तुम भी यदि चाहो
तो ठुकरा दो :
जानता हूँ कि मैं भी तो ठीकरा हूँ ।
और मुझे कहने को क्या हो
जब अपने तईं खरा हूँ ?

पक्षधर 

इनसान है कि जनमता है
और विरोध के वातावरण में आ गिरता है:
उस की पहली साँस संघर्ष का पैंतरा है
उस की पहली चीख़ एक युद्ध का नारा है
जिसे यह जीवन-भर लड़ेगा।

हमारा जन्म लेना ही पक्षधर बनना है,
जीना ही क्रमशः यह जानना है
कि युद्ध ठनना है
और अपनी पक्षधरता में
हमें पग-पग पर पहचानना है
कि अब से हमें हर क्षण में, हर वार में, हर क्षति में,
हर दुःख-दर्द, जय-पराजय, गति-प्रतिगति में
स्वयं अपनी नियति बन
अपने को जनना है।

ईश्वर
एक बार का कल्पक
और सनातन क्रान्ता है:
माँ—एक बार की जननी
और आजीवन ममता है:
पर उन की कल्पना, कृपा और करुणा से
हम में यह क्षमता है
कि अपनी व्यथा और अपने संघर्ष में
अपने को अनुक्षण जनते चलें,
अपने संसार को अनुक्षण बदलते चलें,
अनुक्षण अपने को परिक्रान्त करते हुए
अपनी नयी नियति बनते चलें।

पक्षधर और चिरन्तन,
हमें लड़ना है निरन्तर,
आमरण अविराम—
पर सर्वदा जीवन के लिए:
अपनी हर साँस के साथ
पनपते इस विश्वास के साथ
कि हर दूसरे की हर साँस को
हम दिला सकेंगे और अधिक सहजता,
अनाकुल उन्मुक्ति, और गहरा उल्लास

अपनी पहली साँस और चीख़ के साथ
हम जिस जीवन के
पक्षधर बने अनजाने ही,
आज होकर सयाने
उसे हम वरते हैं:
उस के पक्षधर हैं हम—
इतने घने
कि उसी जीने और जिलाने के लिए
स्वेच्छा से मरते हैं!

सितम्बर १९६५

फ़ोकिस में ओदिपौस

राही, चौराहों पर बचना!
राहें यहाँ मिली हैं, बढ़ कर अलग-अलग हो जाएँगी
जिस को जो मंज़िल हो आगे-पीछे पाएँगी
पर इन चौराहों पर औचक एक झुटपुटे में
अनपहचाने पितर कभी मिल जाते हैं:
उन की ललकारों से आदिम रूद्र-भाव जग आते हैं,
कभी पुरानी सन्धि-वाणियाँ
और पुराने मानस की धुंधली घाटी की अन्ध गुफा को
एकाएक गुंजा जाती हैं;
काली आदिम सत्ताएँ नागिन-सी
कुचले शीश उठाती हैं—
राही
शापों की गुंजलक में बंध जाता है:
फिर
जिस पाप-कर्म से वह आजीवन भागा था,
वह एकाएक
अनिच्छुक हाथों से सध जाता है।

राही चौराहों से बचना!
वहाँ ठूँठ पेड़ों की ओट
घात बैठी रहती हैं
जीर्ण रूढ़ियाँ
हवा में मंडराते संचित अनिष्ट, उन्माद, भ्रान्तियाँ—
जो सब, जो सब
राही के पद-रव से ही बल पा,
सहसा कस आती हैं
बिछे, तने, झूले फन्दों-सी बेपनाह!
राही, चौराहों पर
बचना।

देल्फ़ी, ग्रीस]

अंगार 

एक दिन रूक जाएगी जो लय
उसे अब और क्या सुनना?
व्यतिक्रम ही नियम हो तो
उसी की आग में से
बार-बार, बार-बार
मुझे अपने फूल हैं चुनना।
चिता मेरी है: दुख मेरा नहीं।
तुम्हारा भी बने क्यों, जिसे मैंने किया है प्यार?
तुम कभी रोना नहीं, मत
कभी सिर धुनना।
टूटता है जो उसी भी, हाँ, कहो संसार
पर जो टूट को भी टेक दे, ले धार, सहार,
उस अनन्त, उदार को
कैसे सकोगे भूल—
उसे, जिस को वह चिता की आग
है, होगी, हुताशन—
जिसे कुछ भी, कभी, कुछ से नहीं सकता मार—
वही लो, वही रखो साज-सँवार—
वह कभी बुझने न वाला
प्यार का अंगार!

फाल्गुन शुक्ला सप्तमी, सं० २०२२]

आज़ादी के बीस बरस

चलो, ठीक है कि आज़ादी के बीस बरस से
तुम्हें कुछ नहीं मिला,
पर तुम्हारे बीस बरस से आज़ादी को
(या तुम से बीस बरस की आज़ादी को)
क्या मिला?
उन्नीस नंगे शब्द?
अठारह लचर आन्दोलन?
सत्रह फटीचर कवि?
सोलह लुंजी-हाँ, कह लो, कलाएँ-
(पर चोरी, चापलूसी, सेंध मारना, जुआखोरी,
लल्लोपत्तो और लबारियत ये सब पारम्परिक कलाएँ थीं
आज़ादी के बीस बरस क्यों, बीस पीढ़ी पहले की!)
पन्द्रह…बारह…दस…यों पाँच, चार और तीन
और दो और एक और फिर इनक़लाबी सुन्न
जिस की गिड्डुली में बँधे तुम
अपने को सिद्ध, पीर, औलिया जान बैठे हो!
क्या हर तिकठी ढोने वाला हर डोम
हर जल्लाद का हर पिट्ठू
सिर्फ ढुलाई के मिस मसीहा हो जाता है?
ओ मेरे मसीहा, हाय मेरे मसीहा!
आज़ादी के बीस बरस निकल गये
और तुम्हें कुछ नहीं मिला-
एक कमबख़्त कम से कम पहचाना जा सकने वाला
जटियल सलीब भी नहीं :
जब कि इतने-इतने मन्दिरों और रथों से इतनी-इतनी काठ-मूर्तियाँ
तोड़ी-उखाड़ी जा कर रोज़ बिक रही हैं इतने अच्छे दामों!
हाय मेरे मसीहा!
बिना सलीब के तुम्हें कोई पहचाने भी तो कैसे
और जो तुम्हें नहीं पहचाने
उस की आज़ादी क्या?
पहचान तो तुम्हें, फ़क़त तुम्हें, हुई-
आज़ादी की भी और अपनी भी!
आज़ादी के बीस बरस से
बीस बरस की आज़ादी से
तुम्हें कुछ नहीं मिला :
मिली सिर्फ आज़ादी!

नयी दिल्ली, 23 अप्रैल, 1968

कुछ फूल : कुछ कलियाँ 

डाल पर कुछ फूल थे
कुछ कलियाँ थीं!

फूल जिसे देने थे दिये :
तुष्ट हुआ कि उसने उन्हें
कबरी में खोंस लिया!

कलियाँ
कुछ देर मेरे हाथ रहीं
फिर अगर गुच्छे को मैं ने पानी में रख दिया
तो वह अतर्कित उपेक्षा ही थी :
कोई मोह नहीं।

शाम को लौट कर आ गया।
कबरी के फूल
जिसे दिये थे
उसी के माथे पर सूख गये
जैसे कि मेरा मन
मुरझा गया।

कलियाँ-उन का ध्यान भी न आया होता
पर वे तो उपेक्षा के पानी में
खिल आयी हैं!
यहीं की यहीं!

फूल : मन : कलियाँ :
सब अपने-अपने ढंग से
उत्तरदायी हैं।

फूल
मुरझाएगा :
वही तो नियति है :
होने का फल है।
पर उसी की अमोघ बाध्यता का तो बल हैजो कली को खिलाएगा, खिलाएगा।
जो मुझे
जहाँ मारेगा वहाँ मरने से बचाएगा
जो फिर तुम्हारे निकट लाएगा।
क्यों? नहीं?

नयी दिल्ली, अक्टूबर 1968

तू-फू को : बारह सौ वर्ष बाद

पुराने कवि को
मुहरें मिलती थीं
या जायदाद मनचाही
या झोंपड़ी के आगे राजा का हाथी बँधवाने का
सन्दिग्ध गौरव,
या यश,
प्रशंसा,
दो बीड़े पान,
कंकण, मुरैठा,
वाहवाही।
या जिसे कुछ नहीं मिलता था
उस की सान्त्वना थी
बहुत-सी सन्तान
भरा-पुरा खानदान
हम तुम, दोस्त, नये कवि बेचारे :
प्रजातन्त्र में पाते हैं
प्रजापत्य विरोधी नारे :
दो या तीन बच्चे बस!
यह कि हम ने ईजाद किया
यही एक नया रस?

ग्वालियर, 15 अगस्त, 1968

तू-फू, चीनी कवि, सन् 713-790

नशे में सपना

नशे में सपना देखता मैं
सपने में देखता हूँ
नशे में सपना देखनेवाले को
सपने में देखता हुआ
नशे में डगमग सागर की उमड़न।

इतने गहरे नशों में
इतने गहरे सपनों में
इतने गहरे नशे में।
सागर इतना गहरा, विराट्।
देखने वाला मैं इतना छिछला, अकिंचन।

इतना बहुत नशा इतने बहुत सपने
इतना बहुत सागर इतना कम मैं।

नयी दिल्ली, मार्च, 1967

कोहरे में भूज 

कोहरे में नम, सिहरा
खड़ा इकहरा
उजला तन
भूज का।

बहुत सालती रहती है क्या
परदेशी की याद, यक्षिणी?

बर्कले (कैलिफ़ोर्निया), दिसम्बर, 1969

सोया नींद में, जागा सपने में 

सोया था मैं नींद में को
एकाएक सपने में
गया जाग :
सपना आग का
लपलपाती ग्रसती
हँसती
समाधि की विभोर आग।

फिसलता हुआ
धीरे-धीरे गिरा फिर
सुते हुए, ठंडे
जागने में।

आग शान्त, रक्षित,
सँजोयी हुई-
और भी कई आगों के साथ
सोयी हुई।
पहले भी तो
जागा हूँ

ऐसे, सपने में:
जलते हुए समाधिस्थ
अपने में;
फिसल कर गिरने को
जागने की नींद में;
आगें सब सुँती हुई, ठंडी,
सोई हुई,
और भी पुरानी कई आगों के
साथ ही सँजोयी हुई-
खोयी हुई!

नयी दिल्ली, अक्टूबर, 1969

एक सन्नाटा बुनता हूँ

पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ।
उसी के लिए स्वर-तार चुनता हूँ।
ताना : ताना मज़बूत चाहिए : कहाँ से मिलेगा?
पर कोई है जो उसे बदल देगा,
जो उसे रसों में बोर कर रंजित करेगा, तभी तो वह खिलेगा।
मैं एक गाढ़े का तार उठाता हूँ :
मैं तो मरण से बँधा हूँ; पर किसी के-और इसी तार के सहारे
काल से पार पाता हूँ।
फिर बाना : पर रंग क्या मेरी पसन्द के हैं?
अभिप्राय भी क्या मेरे छन्द के हैं?
पाता हूँ कि मेरा मन ही तो गिर्री है, डोरा है;
इधर से उधर, उधर से इधर; हाथ मेरा काम करता है
नक्शा किसी और का उभरता है।
यों बुन जाता है जाल सन्नाटे का
और मुझ में कुछ है कि उस से घिर जाता हूँ।
सच मानिए, मैं नहीं है वह
क्यों कि मैं जब पहचानता हूँ तब
अपने को उस जाल के बाहर पाता हूँ।
फिर कुछ बँधता है जो मैं न हूँ पर मेरा है,
वही कल्पक है।
जिस का कहा भीतर कहीं सुनता हूँ :
‘तो तू क्या कवि है? क्यों और शब्द जोड़ना चाहता है?
कविता तो यह रखी है।’
हाँ तो। वही मेरी सखी है, मेरी सगी है।
जिस के लिए फिर
दूसरा सन्नाटा बुनता हूँ।

हँसती रहने देना

जब आवे दिन
तब देह बुझे या टूटे
इन आँखों को
हँसती रहने देना!

हाथों ने बहुत अनर्थ किये
पग ठौर-कुठौर चले
मन के
आगे भी खोटे लक्ष्य रहे
वाणी ने (जाने अनजाने) सौ झूठ कहे

पर आँखों ने
हार, दुःख, अवसान, मृत्यु का
अंधकार भी देखा तो
सच-सच देखा

इस पार
उन्हें जब आवे दिन
ले जावे
पर उस पार
उन्हें
फिर भी आलोक कथा
सच्ची कहने देना
अपलक
हँसती रहने देना
जब आवे दिन!

उनके घुड़सवार

उन के घुड़सवार
हम ने घोड़ों पर से उतार लिये।
हमारे युग में
घुड़सवारी का चलन नहीं रहा।
(घोड़ों का रातिब हमीं को खाने को मिलता रहा।)
उन की मूर्तियाँ गला दी गयीं :
धातु क्या हुआ,
पता नहीं। उस के तो पिये तो नहीं बने।
कहीं तोपें तो नहीं बनीं?
-यह पूछने के लिए
उन्हीं के द्वारे जाना पड़ेगा
जिन के पास अब घोड़े नहीं हैं :
वे अनुकूलित वायु में या विमानों में सफ़र करते हैं।
उन की भी मूर्तियाँ बनेंगी।
चौराहों पर जहाँ अब ध्यान देने के लिए
हरी-पीली-लाल बत्तियाँ हैं,
पैदलों द्वारा उपेक्षणीय भी कुछ होना चाहिए।
लेकिन हम :
हम जब हमारी सड़कों पर चलेंगे,
तब आँख उठा कर किस की ओर देखेंगे?

बर्फ़ की तहों के नीचे 

 बर्फ़ की तहों के बहुत नीचे से सुना मैं ने
उस ने कहा : यहीं गहरे में
अदृश्य गरमाई है
तभी सभी कुछ पिघलता जाता है
देखो न, यह मैं बहा!
मेरी भी, मेरी भी शिलित अस्ति के भीतर कहीं
तुम ने मुझे लगातार पिघलाया है।
पर यह जो गलना है
तपे धातु का उबलना है
मैं ने इसे झुलसते हुए सहा
पर कब, कहाँ कहा!

हाइडेलबर्ग, 30 जनवरी, 1976

जरा व्याध 

मैं पाप नहीं लाया ढो कर
वन से बाहर
भी पग-पग पर
खाता ठोकर
मैं प्रश्न-भरा अकुलाया
बस-आप आया।
साथ में-अर्थ लाया
अव्यर्थ अर्थ की परतें।
मैं-जरा व्याध-
मार नारायण को ले आया
वैश्वानर नर!
निर्जर…
मैं पुण्य-भ्रष्ट हो कर
भी पाप नहीं लाया ढो कर…

हाइडेलबर्ग, 1976

झर गयी दुनिया

झर गयी है दुनिया मैं हूँ
झर गया मैं तुम हो
झर गये तुम प्रश्न है
झर गया है प्रश्न युद्ध है
झर गया युद्ध जीवन है
वही दुनिया है, मैं हूँ, तुम हो, प्रश्न है, युद्ध है
कविता है।

पेड़ों की कतार के पार 

पेड़ों के तनों की क़तार के पार
जहाँ धूप के चकत्ते हैं
वहाँ
तुम भी हो सकती थीं
या कि मैं सोच सकता था
कि तुम हो सकती हो
(वहाँ चमक जो है पीली-सुनहली
थरथराती!)
पर अब नहीं सोच सकता :
जानता हूँ :
वहाँ बस, शरद के
पियराते
पत्ते हैं।

बिनसर, 1978

मेघ एक भटका-सा

 रीता घर सूना गलियारा
वन की तरु-राजि
बिसूर पियूर की
हवा की थकी साँस :
मेघ एक भटका-सा
दो बूँदें टपका जाता है।
ऐसे ही टुकड़ों में सहसा
गँठ जाते हैं महाकाव्य
व्याकुल प्रेत-व्यथा
सब-कुछ से सब-कुछ ही बिछुड़न की
एक आह हीरक में शिलीभूत!

बिनसर, 19 जून, 1981

धुँधली चाँदनी

दिन छिपे
मलिना गये थे रूप
उन को चाँदनी नहला गयी।
थक गयी थी याद संकुल लोक में
उमड़ती धुन्ध फिर सहला गयी।
बोझ से दब घुट रही थी भावना, पर
प्रकृति यों बहला गयी।
फिर, सलोने, माँग तेरी
कसमसाती चेतना पर
छा गयी।

कौन खोले द्वार

सचमुच के आये को
कौन खोले द्वार!
हाथ अवश
नैन मुँदे
हिये दिये
पाँवड़े पसार!
कौन खोले द्वार!
तुम्हीं लो सहास खोल
तुम्हारे दो अनबोल बोल
गूँज उठे थर थर अन्तर में
सहमे साँस
लुटे सब, घाट-बाट,
देह-गेह
चौखटे-किवार!
मीरा सौ बार बिकी है
गिरधर! बेमोल!
सचमुच के आये को
कौन खोले द्वार!

छंद

मैं सभी ओर से खुला हूँ
वन-सा, वन-सा अपने में बन्द हूँ
शब्द में मेरी समाई नहीं होगी
मैं सन्नाटे का छन्द हूँ।

प्रतीक्षा / ऐसा कोई घर आपने देखा है 

एक द्वार या झरोखा एक नारी
एक नसेनी और एक प्रतीक्षा
सदैव एक प्रतीक्षा किसकी प्रतीक्षा?
नारी की नसेनी की
द्वार-देहरी की।

सावन मेघ

घिर गया नभ, उमड़ आए मेघ काले,
भूमि के कम्पित उरोजों पर झुका-सा, विशद, श्वासाहत, चिरातुर —
छा गया इन्द्र का नील वक्ष-वज्र-सा, यदि तड़ित से झूलता हुआ-सा।
आह, मेरा श्वास है उत्तप्त —
धमनियों में उमड़ आई है लहू की धार —
प्यार है अभिशप्त : तुम कहाँ हो नारि?
मेघ व्याकुल गगन को मैं देखता था, बन विरह के लक्षणों की मूर्ति —
सूक्ति की फिर नायिकाएँ, शास्त्रसंगत प्रेम क्रीड़ाएँ,
घुमड़ती थीं बादलों में आर्द्र, कच्ची वासना के धूम-सी।
जबकि सहसा तड़ित के आघात से घिरकर
फूट निकला स्वर्ग का आलोक। बाह्य देखा :
स्नेह से आलिप्त, बीज के भवितव्य से उत्फुल्ल,
बद्ध-वासना के पंक-सी फैली हुई थी
धारयित्री-सत्य-सी निर्लज्ज, नंगी, औ’ समर्पित।

मैं जो बन्‍दी हूं 

मैं, जो बंदी हूं
गाता हूं आनन्दित-मुक्तिगीत:
मेरी बेडि़यां फुसफुसाती रहती हैं-
“तुम समग्र हो,
तुम हो स्‍वतन्‍त्र”
तुम्‍हारे बन्‍धन हैं
केवल तुम्‍हारे बन्‍धुओं के
मुक्ति-प्रतीक !”

और…
तुम जो आबद्ध/स्‍वेच्‍छाचारी हो
चीखते रहो अनवरत आशंका में-
“हमें उसको बनाए रखना है
बन्‍दी,
अन्‍यथा हम मर जाएंगे।”

ओ एक ही कली की 

ओ एक ही कली की
मेरे साथ प्रारब्ध-सी लिपटी हुई
दूसरी, चम्पई पंखुड़ी!
हमारे खिलते-न-खिलते सुगन्ध तो
हमारे बीच में से होती
उड़ जायेगी!

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