अतीक़ इलाहाबादी की रचनाएँ

अगरचे लाई थी कल रात कुछ नजात हवा

अगरचे लाई थी कल रात कुछ नजात हवा
उड़ा के ले गई बादल भी साथ साथ हवा

मैं कुछ कहूँ भी तो कैसे कि वो समझते हैं
हमारी ज़ात हवा है हमारी बात हवा

उन्हें ये ख़ब्त है वो क़ैद हम को कर लेंगे
तुम्हीं बताओ कि आई कि के हाथ हवा

किसी भी शख़्स में ठहराओ नाम का भी नहीं
हमें तो लगती है ये सारी काएनात हवा

उड़ा के फूलों के जिस्मों से ख़ुशबू सारी
करे है मेरे लिए पैदा मुश्किलात हवा

‘अतीक़’ बुझता भी कैसे चराग़-ए-दिल मेरा
लगी थी उस की हिफ़ाज़त में सारी रात हवा

चंद लम्हों को सही था साथ में रहना बहुत

चंद लम्हों को सही था साथ में रहना बहुत
एक बस तेरे न होने से है सन्नाटा बहुत

ज़ब्त का सूरज भी आख़िर शाम को ढल ही गया
ग़म का बादल बन कर के आँसू रात भर बरसा बहुत

दुश्मनों को कोई भी मौक़ा न मिलने पाएगा
दोस्तों ने ही मिरे बारे में है लिक्खा बहुत

मैं खरा उतरा नहीं तेरे तक़ाज़े पर कभी
ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी तुझ से हूँ शर्मिंदा बहुत

बस अना के बोझ से नज़रें मिरे उठने न दीं
उस की जानिब देखने को जी मिरा चाहा बहुत

मैं ने पूछा ये बता मुझ से बिछड़ने का तुझे
कुछ क़लफ़ होता है क्या उस ने कहा थोड़ा बहुत

घर हमारा फूँक कर कल इक पड़ोसी ऐ ‘अतीक़’
दो घड़ी तो हँस लिया फिर बाद में रोया बहुत

हम तो बिछड़े के रो लेते हैं

हम तो बिछड़े के रो लेते हैं
दाग़-ए-जुदाई धो लेते हैं

ग़म को नाहक़ रूस्वा करने
मय-ख़ाने को हो लेते हैं

हो जाते हैं ख़ुद वो मुक़द्दस
नाम भी उन का जो लेते हैं

जिस ने भी कीं प्यार से बातें
साथ उस के हो लेते हैं

क्यूँ चाहें अख़्लाक़ की फ़सलें
वो जो नफ़रत बो लेते हैं

देव परी के क़िस्से सुन कर
भूके बच्चे सो लेते हैं

जुदाई हद से बढ़ी तो विसाल हो ही गया

जुदाई हद से बढ़ी तो विसाल हो ही गया
चलो वो आज मिरा हम-ख़याल हो ही गया

नवाज़ता था हमेशा वो ग़म की दौलत से
और इस ख़जाने से मैं माला माल हो ही गया

मैं आदमी हूँ तो हिम्मत न टूटती कैसे
ग़मों के बोझ से आख़िर निढाल हो ही गया

ये और बात कि वो आदमी न बन पाया
मगर ज़माने की ख़ातिर मिसाल हो ही गया

वो आफ़्ताब कि दिन में उरूज था जिस का
हुई जो शाम तो उस का ज़वाल हो ही गया

मैं कारोबार-ए-जहाँ में उलझ गया इतना
कि ख़ुद से मिलना भी अब तो मुहाल हो ही गया

ज़ब्त की हद से हो के गुज़रना सो जाना

ज़ब्त की हद से हो के गुज़रना सो जाना
रात गए तक बातें करना सो जाना

रोज़ाना ही दीवारों से टकरा कर
रेज़ा रेज़ा हो के बिखरना सो जाना

दिन भर हिज्र के ज़ख़्मों की मरहम-कारी
रात को तेरे वस्ल में मरना सो जाना

मुझ को ये आसूदा-मिज़ाजी तुम ने दी
साँसों की ख़ुशबू से सँवरना सो जाना

होंटो पर इक बार सजा कर अपने होंट
उस के बाद न बातें करना सो जाना

अपनी क़िस्मत में भी क्या लिक्खा है ‘अतीक़’
बाँहों की वादी में उतरना सो जाना

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