अतुल कुमार मित्तल की रचनाएँ

यह रोटी नहीं

यह
रोटी नहीं
रथ का टूटा पहिया है
जिसे लेकर
अकेला अभिमन्यु
चक्रव्यूह में घुस पड़ा है
लेकिन
यह एक वक़्त की रोटी
मात्र सूर्यास्त तक ही
उसका साथ दे सकी थी
और फिर
प्राणघातक भूख ने
चारों ओर से घेरकर
उसे
मार डाला था!

मेरा बचपन

मेरा बचपन मेरी आहें
मेरी बीती बात कथाएं
चुपके से उठ अन्तर से
आँसू बन जाती हैं
याद तुम्हारी रह-रहकर क्यों आज सताती है?

तब बूढ़ा तरु पात हिलाकर
कहे हवा से कुछ समझाकर
तुझको पगले इस जग की रस्में
कुछ रास न आती हैं
धूल उड़ी तो अन्त समय की याद दिलाती है!

तभी कोयलिया वन में गाए
जग मर्यादा राम निभाएं
पर कान्हा को तो ब्रज की
सखियाँ ही रिझाती हैं
याद तुम्हारी रह-रहकर क्यों आज सताती है?

तभी श्वान रोए करुणा से
व्याकुल हो जग के लांछन से
मैं रात्रि को रात्रि मुझे
निज व्यथा सुनाती है
धूल उड़ी तो अन्त समय की याद दिलाती है!
(29 अगस्त 1981)

जीवन का सार 

पूरे जीवन का सार
सीख लिया था अनजाने ही
खेलते बचपन में आँख-मिचौली

तब बंधी होती थी
आँखों पर पट्टी
ढूंढना होता था कई अनजानों में
एक अपना
उत्साह में भरे
आते ही बाहों में
उतावली देखने की
कौन है?
तब था सब
कुछ एक सपना
और फिर से वही क्रम
बिना जाने अन्त-
कि आखिर किस पर जाकर
रुकेगी
यह खोज
अब
शक्ति नहीं
फिर-फिर घूमने की
उसी गोल में
आते ही बांहों में
उतावली की जगह
एक ठंडा सा भय
कहीं खोल दी पट्टी
और
वो न हुआ! तब!
(22.05.87)

बोझा 

मैंने कितना बोझा लेकर सफ़र तय किया है साँसों का
पहरों बीती रात मगर कर्जा बाकी जग की आसों का
जग को है मुझसे प्रत्याशा
उसके बोझ में हाथ बटाऊँ
मेरी इच्छा बन के पखेरु
नील गगन में मैं उड़ जाऊं
तुमको भी तो धोया तोड़ा
होगा उम्रों की लहरों ने
मैंने कितना मूल्य चुकाया बचपन की छोटी बातों का

तुमने जाने अनजाने में
मांग भरी है उस विधवा की
जिसके जीवन में, पतझड़ में
और वसन्त में भेद नहीं है
पर अनुबन्धित नहीं सखे तुम
उम्र तुम्हारी अपनी है
क्या विश्वास भला इस पागल ऋतु की गुप-चुप-सी घातों का

जब-जब रातें हुई स्याह और
दिन को सूरज ने झुलसाया
तब-तब अपने मन को मैंने
ऐसा कह-कहकर समझाया
तू क्या पगले! तेरी क्या औकात
यहाँ पर यह धरती है
गुजर चुका काफ़िला यहाँ से ईसा, मीरा, सुकरातों का

जीना है तो जी ले अपने सिर्फ
एक उस पल में ही तू
जिसमें तू यह भूल गया था
यह ‘मैं’ हूँ या तू है
जिन रातों में दीप बना तू
जल मगर औरों की लौ में
एक आयु भी मूल्य नहीं है जीवन में ऐसी रातों का

मेरा दिमाग 

एक तन्दूर है मेरा दिमाग
कविता का नर्म केक
नहीं पकता इसमें
वह तो झुलस कर कोयला
हो जाता है
इसकी तेज लपटों में

इसकी आंच कम करने
के लिए मैं और कस
लेता हूँ मुठ्ठियाँ अपनी
इतनी जोर से कि
नीली मोटी-मोटी नसें
उभर आती हैं हाथों पर
पर उंगलियों की दरारों
से फिसलता चला जाता
है मेरी उम्र का ईंधन
रुकता ही नहीं
और फिर मैं चौंककर
पूरा समेत लेना चाहता हूँ
उमड़ती हुई लपटों को
अपनी दोनों बाहों में
और तन्दूर में पकने लगती
हैं मोटी-मोटी रोटियां
दिन-रात इसमें पकती रहतीं
हैं टेढ़ी-मेढ़ी बदशक्ल बदमजा रोटियां
इतनी रोटियां
सिकती हैं इसमें
ढेर की ढेर
मानो कारखाना लगा हो कोई
रोटियां बनाने का!
और दूसरी तरफ लगता जाता
है ढेर कोयले का
ककनूसी कोयला
रोटियां बनती हैं जलती हैं
फिर कोयला बन जाती हैं
और पुन: जलकर
जुट जाता है बनाने में
और-और रोटियां!

अलाव है दिमाग मेरा 

एक अलाव है दिमाग मेरा
गर्माना था इसे घर अपना
पर झुलसा रहा है इसे यह
इसकी गर्मी से विचारों
की ईंटें पिघल जाती हैं
सीसे सी
और फिर देश के कुशलतम
इंजीनियर आते हैं
मुआयना करने इस अलाव
का
और सुझाते हैं कि फिट
करवा दिया जाय इसमें
एक सेफ्टी वाल्व
यदि अलाव की उम्र दराज
करनी हो!

नहीं-नहीं चाहिए मुझे
सेफ्टी जैसा कोई वाल्व
अपने आप बनाएगा
खौलता लावा कोई राह
दिमाग की दीवारों में से
या फिर
फूट पड़ेगा एक दिन
ज्वालामुखी की शक्ल में
और
दुनिया को ऊर्जा का
दर्शन दे जायेगा!

टोपी शुक्ला को पढ़कर

एक दु:खांत नाटक के
नायक की भाँति
अन्त कर लूँ क्या स्वयं का
और भला कर भी क्या
सकता हूँ
रंगों में दौड़ते इस
गर्म-गर्म लहू का
उड़ेल दूँ क्या इसे
किसी अस्पताल के
बैड के सिरहाने लटकी
उल्टी बोतल में?
या फेंक दूँ चुल्लू में भर-भर कर
रंगा के चाकू पर बिल्ला के पंजों पर
या बाँट दूँ हिस्से-हिस्से इसे
रंग बिरंगे झंडों और बिल्लों को
रंगूं इससे कोरे कागज
या फैला दूँ इसे खाली केनवास पर

सच दोस्त!
मुझसे सही नहीं जाती इसकी
तेज रफ़्तार
मियादी बुखार की तरह
इसका कारवाँ
दिल से दिमाग तक
चढ़ता उतरता है
दिन में कई-कई बार
ज्वार की तोड़ फोड़
भाटे की थकन
झेलता है हर बार
एक मेरा मन

क्या कहते हो दोस्त
मेरी किस्मत ही
किस्मत है मेरे देश की!
सच कहते हो बिल्कुल सच
यह देखो मेरी चिरी
फटी हथेली
कुंठाओं के पर्वतों से निकलकर
अभावों की रेखा पहुँचती तो है किसी मुकाम पर
लेकिन इस अज्ञात स्थल का
नाम तक नहीं जानता

सच ही तो है दोस्त
किस्मत का अर्थ ही है परवशता, गुलामी
और इस गुलामी से मुक्ति के लिए
लहू का समुद्र छब्बीस बरस से
मेरे जिस्म की दीवार पर
टक्करें मार रहा है!

ऊर्जा 

नष्ट कभी नहीं होती
होती जाती है सिर्फ रूपान्तरित
ऊर्जा!

रूपान्तरित होती है बैटरी की ऊर्जा
बजाते बजाते अश्लील गीत
कुसंस्कारों में!

फरफराते पंखों से मीठी नींद
यों रूपान्तरित होती है विद्युत् ऊर्जा
सपनों में!

सूर्य की ऊर्जा से खौलता है मजदूर का खून
बहता है पसीना
और बन जाती हैं बहुमंजिला इमारतें
रक्त के उमड़ते प्रवाह से
जन्मती है मृग-मरीचिका
और अन्तत: सीमावाद, प्रांतवाद या जातिवाद
के दंगे
और तोड़ता है इस तरह रक्त का प्रवाह
जिस्म के बांध को
और विचार ऊर्जा
चढ़ जाती है दिमाग की ट्यूब्स में
और फिर होता है धमाका
-चेरनोबिल जैसा!
और बैठाया जाता है साईकियाट्रिस्ट्स का आयोग
दुर्घटना के कारणों की जाँच के लिए!
अनंत है अमर है है ऊर्जा
किन्तु क्यों स्वयं ही रूपान्तरित होती रहती है
भद्दे आकारों में
हम ढाल नहीं पाते
इस ऊर्जा से
मोनालिसा की एल मुस्कान
क्यों?

(15.10.86)

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