अनवर फ़र्रूख़ाबादी की रचनाएँ

अाज की रात ज़रा प्‍यार से बातें कर ले

अाज की रात ज़रा प्‍यार से बातें कर ले
कल तेरा शहर मुझेे छोड़ के जाना हाेेेगा

ये तेरा शहर तेरा गॉंव मुबारक हाेे तुझेे
और ज़ुल्फाेे की हॅँँसी छॉंव मुबारक हो तुझे
मेरी किस्मत मेें तेरे जलवो की बरसात नहीं
तू अगर मुझसेे खफ़ा है तो कोई बात नहीं

एक दिन तुझे भी मेरे लिए रोना हाेेेगा
रात की नींंद भी और चैन भी खोना होगा
याद में तेरी कल अश्‍क बहाना होगा
कल तेरा शहर भी छोड़ के जाना होगा

आज की रात ज़रा प्‍यार से बातें कर ले

सबको मालूम है मैं शराबी नहीं

सब को मालूम है मैं शराबी नहीं
फिर भी कोई पिलाए तो मैं क्या करूँ
सिर्फ़ एक बार नज़रों से नज़रें मिलें
और क़सम टूट जाए तो मैं क्या करूँ

मुझ को मयकश समझते हैं सब वादाकश
क्यूँकि उनकी तरह लड़खड़ाता हूँ मैं
मेरी रग रग में नशा मुहब्बत का है
जो समझ में ना आए तो मैं क्या करूँ

हाल सुन कर मेरा सहमे-सहमे हैं वो
कोई आया है ज़ुल्फ़ें बिखेरे हुए
मौत और ज़िंदगी दोनों हैरान हैं
दम निकलने न पाए तो मैं क्या करूँ

कैसी लूट कैसी चाहत कहाँ की खता
बेखुदी में हाय अनवर खिदू(?) का नशा
ज़िंदगी एक नशे के सिवा कुछ नहीं
तुम को पीना न आए तो मैं क्या करूँ

हमें ताेे लूट लिया मिल के हुस्न वालो ने 

हमें तो लूट लिया मिल के हुस्नवालों ने
काले-काले बालों ने, गोरे-गोरे गालों ने
हमें तो लूट लिया…

नज़र में शोख़ियाँ और बचपना शरारत में
अदाएँ देख के हम फँस गए मुहब्बत में
हम अपनी जान पे जाएँगे जिनकी उल्फ़त में
यक़ीन है कि न आएँगे वो ही मय्यत में
ख़ुदा सवाल करेगा अगर क़यामत में
तो हम भी कह देंगे हम लूट गए शराफ़त में
हमें तो लूट लिया…

वहीं-वहीं पे क़यामत हो वो जिधर जाएँ
झुकी-झुकी हुई नज़रों से काम कर जाएँ
तड़पता छोड़ दे रस्ते में और गुज़र जाएँ
सितम तो ये है कि दिल ले लें और मुकर जाएँ
समझ में कुछ नहीं आता कि हम किधर जाएँ
यही इरादा है ये कह के हम तो मर जाएँ
हमें तो लूट लिया…

वफ़ा के नाम पे मारा है बेवफ़ाओं ने
के दम भी हमको न लेने दिया जफ़ाओं ने
ख़ुदा भूला दिया इन हुस्न के ख़ुदाओं ने
मिटा के छोड़ दिया इश्क़ की ख़ताओं ने
उड़ाया होश कभी ज़ुल्फ़ की हवाओं ने
हया ने, नाज़ ने लूटा, कभी अदाओं ने
हमें तो लूट लिया…

हज़ारों लुट गए नज़रों के इक इशारे पर
हज़ारों बह गए तूफ़ान बन के धारे पर
न इन के वादों का कुछ ठीक है न बातों का
फ़साना होता है इनका हज़ार रातों का
बहुत हसीन है वैसे तो भोलपन इनका
भरा हुआ है मगर ज़हर से बदन इनका
ये जिसको काट ले पानी वो पी नहीं सकता
दवा तो क्या है दुआ से भी जी नहीं सकता
इन्हीं के मारे हुए हम भी हैं ज़माने में
हैं चार लफ़्ज़ मुहब्बत के इस फ़साने में
हमें तो लूट लिया…

ज़माना इनको समझता है नेक और मासूम
मगर ये कैसे हैं, क्या हैं, किसी को क्या मालूम
इन्हें न तीर, न तलवार की ज़रुरत है
शिकार करने को काफ़ी निगाह-ए-उल्फ़त है
हसीन चाल से दिल पायमाल करते हैं
नज़र से करते हैं, बातें कमाल करते हैं
हर एक बात में मतलब हज़ार होते हैं
ये सीधे-सादे, बड़े होशियार होते हैं
ख़ुदा बचाए हसीनों की तेज़ चालों से
पड़े किसी का भी पाला, न हुस्नवालों से
हमें तो लूट लिया…

हुस्न वालों में मुहब्बत की कमी होती है
चाहने वालों की तक़दीर बुरी होती है
उनकी बातों में बनावट ही बनावट देखी
शर्म आँखों में, निगाहों में लगावट देखी
आग पहले तो मुहब्बत की लगा देते हैं
अपने रुख़सार का दीवाना बना देते हैं
दोस्ती कर के फिर अनजान नज़र आते हैं
सच तो ये है कि बेईमान नज़र आते हैं
मौत से कम नहीं दुनिया में मुहब्बत इनकी
ज़िन्दगी होती है बर्बाद बदौलत इनकी
दिन बहारों के गुज़रते हैं मगर मर-मर के
लुट गए हम तो हसीनों पे भरोसा कर के
हमें तो लूट लिया…

जब दिल में नहीं है खोट तो फिर क्यूं डरता है 

जब दिल में नहीं है खोट तो फिर क्यूं डरता है
नादाँ यहाँ जो करता है वो भरता है
जब दिल में नहीं है खोट तो फिर क्यूं डरता है
नादाँ यहाँ जो करता है वो भरता है
जब दिल में नहीं है खोट तो फिर क्यूं डरता है

कहाँ चला है ठोकर खाने ये रस्ते हैं अनजाने
इक पाप छुपाने की खातिर सौ पाप ना कर दीवाने -२
क्यूं जीते जी मौत का सौदा करता है
नादाँ यहाँ जो करता है वो भरता है
जब दिल में नहीं है खोट तो फिर क्यूं डरता है

तेरा मालिक है रखवाला तुझे मिल जाएगा उजाला
कहते है मिटाने वाले से बढ़कर है बचाने वाला -२
फिर मूरख अपने हाथों से क्यूं मरता है
नादाँ यहाँ जो करता है वो भरता है
जब दिल में नहीं है खोट तो फिर क्यूं डरता है

जब साफ़ तेरा ये दिल है किस बात की फिर मुश्किल है
भगवान् है तेरी रक्षा को इन्साफ तेरी मंजिल है -२
इस राह में तू डर डर के कदम कुओं धरता है
नादाँ यहाँ जो करता है वो भरता है
जब दिल में नहीं है खोट तो फिर क्यूं डरता है
नादाँ यहाँ जो करता है वो भरता है
जब दिल में नहीं है खोट तो फिर क्यूं डरता है

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