अनामिका अनु की रचनाएँ

लोकतन्त्र 

खरगोश
बाघों को बेचता था,
फिर
अपना पेट भरता था ।

बिके बाघ
ख़रीदारों को
खा गए,

फिर बिकने
बाज़ार में
आ गए ।

तुम सब शून्य कर दोगे 

जब भी
मेरे प्रेम पर चर्चा हो
तुम मेरे नाम के बग़ल में
अपना नाम लिख देना,
मेरे पापों की गणना हो,
मेरे नाम के आगे
अपना नाम लिख देना ।

तुम तो शून्य हो न !
बग़ल में रहे तो दहाई कर दोगे,
आगे लग गए तो इकाई कर दोगे,

गुणा भी कर दिया किसी ने
तो क्या मसला है,
तुम सब शून्य कर दोगे ।

उस दिन खुल गई चोटी

मैं एक विकल्प थी,
कई सन्तानों में
एक ।

अपनी टीचर के लिए
कई विद्यार्थियों में
एक

मैं गुंथी चोटी थी
उस दिन खुल गई
जब मैं
प्रेम में विकल्प बन गई

मायाला

बैंगनी किताब
हरा बुक मार्क
और भीतर की
वह उफ़्फ़ सी मीठी खटाई

किताब नहीं मायाला[1] थी

बिक रही थी
केरल की उन दुकानों में
जहाँ हर स्वाद मिलता था

झक कर खाने वाले
मोल लाते थे
झोले भर-भर कर
और हंसते शब्द विदा हो लेते थे
हर उस दुकान से

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें मैंगोस्टीन

मैं पूरा पेड़ हूँ

सिर्फ एक पेड़ का छेद नहीं, मैं पूरा पेड़ हूँ
नहीं मैं केवल योनि हूँ
जहाँ मेरी सारी गरिमा और पवित्रता बनी हुई है
मैं एक पूर्ण व्यक्तित्व हूँ
मजबूत, सक्षम, सफल
किसी के झटके में शायद शरीर हार गया होगा
लेकिन दिमाग कभी नहीं होगा ।
मैंने पृष्ठभूमि से कहा
अब सबसे आगे से प्रचार –
मैं नहीं हारूँगा ।

मैं घुसपैठ को रोक नहीं सकता
पेड़ के छेद में घातक साँप का
लेकिन यह मेरी जड़ें भी नहीं हिलाता है
मेरा विकास, फूल और फल कम नहीं होते
मैं पेड़ ही रहता हूँ ।
मेरे कई पत्ते गिर गए
हवाओं से फटी कई शाखाएंँ
लेकिन मैं नई पत्तियां उगाई, बोर नई शाखाएँ
मेरे बीज के नए पेड़ बनाए
सिर्फ एक पेड़ का छेद नहीं, मैं पूरा पेड़ हूँ ।

बहने वाले लाल रक्त को मत बुलाओ
मेरे छेद से, अशुद्ध
इसमें निर्माण का आश्वासन है
इसमें निरंतरता का घमण्ड है
यह कुछ नहीं के लिए लाल नहीं है
इसमें जीवन की दहाड़ है
शक्ति की शक्ति
यह मेरा सबसे सुंदर स्राव है
जीवन से भरा हुआ
इसमें मातृत्व की शुभ खुशबू है
मेरा श्रृंगार, मेरी पहचान
शायद मेरा सबकुछ नहीं हो सकता, लेकिन यह बहुत कुछ है

राख लड़कियाँ 

लड़कियों की देह की माटी से
बनी हैं
सभी देव प्रतिमाएँ

इसलिए
ईशपूजा से भागती हैं लड़कियाँ ।

जो लड़कियाँ
धर्मच्युत बताई जाती हैं
वास्तव में धर्ममुक्त होती हैं

वे न परम्परा ढोती हैं
न त्योहार
वे ढूँढ़ती हैं विचार

वे न रीति सोचती हैं
न रिवाज
वे सोचती हैं आज

नई तारीख़ लिखती
इन लड़कियों की
हर यात्रा तीर्थ है ।

उपला

छत्तीस साल
शादी के,
इश्क़ तो नहीं था ।

ज़रूरत
जो थोपी गई,

जैसे उपला
दीवार पर ।

न्यूटन का तीसरा नियम 

तुम मेरे लिए
शरीर मात्र थे
क्योंकि मुझे भी तुमने यही महसूस कराया।

मैं तुम्हारे लिए
आसक्ति थी,
तो तुम मेरे लिए
प्रार्थना कैसे हो सकते हो ?

मैं तुम्हें
आत्मा नहीं मानती,
क्योकिं तुमने मुझे अंत:करण नहीं माना ।

तुम आस्तिक
धरम-करम मानने वाले,

मैं नास्तिक !
न भौतिकवादी, न भौतिकीविद

पर फिर भी मानती हूँ
न्यूटन का तीसरा नियम —
क्रिया के बराबर प्रतिक्रिया होती है,
और हम विपरीत दिशा में चलने लगे…।

झाँकना

काश !
वह झाँकता
इस तरह मेरे भीतर

कि खुल जाती
उम्र की वह स्वेटर

जो वक़्त के काँटे पर
बुनी गई थी
बिना मेरी इजाज़त के ।

मुझे देखा भी है

अपने कितने किए क़सीदे
आज उघाड़े हमने
तब जाकर इतनी सी हक़ीक़त
तुमने देखी है

कितनी अपनी छवियाँ धूमिल
कर बाहर निकलूँगा ।

कितना अनगढ़ हूँ मैं,
अभी तुम्हें
बताना बाक़ी है ।

कितने और मुखौटों को
चीर-फाड़ कर फेकूँगा
फिर आइने में
ख़ुद को
ज़रा -ज़रा सा देखूँगा ।

दो भीगे शब्द 

तुम क्या
दे देते हो
जो कोई नहीं दे पाता

दो भीगे शब्द
जो मेरे सबसे शुष्क प्रश्नों का
उत्तर होते हैं ।

तुम मुझसे ले लेते हो
तन्हा लम्हें
और मैं महसूस करती हूँ
एक गुनगुनाती भीड़
ख़ुद के ख़ूब भीतर ।

मेरी पीड़ाओं पर
तुम्हारा स्पर्श
एक नई रासायनिक प्रतिक्रिया का
हेतु बनता है,

मेरी पीड़ाएँ
तुम्हारे स्पर्श में घुलकर
शहद हो जाती हैं,

मैं मीठा महसूस करती हूँ ।

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