अनामिका सिंह ‘अना’ की रचनाएँ

सरस्वती स्तुति 

नमामि हे शिवानुजा, नमामि हे महाश्रया।
नमामि माँ सरस्वती, अजान हूँ करो दया॥
करो प्रशस्त पंथ माँ, असत्य का सुबोध हो।
कुरीतियाँ विलुप्त हों, नवीन प्रीति शोध हो॥

मिटा कुपंथ द्वेष माँ, प्रसार हो सुप्रेम का।
बढ़ें सदा सुभाव ले, सदैव सृष्टि क्षेम का॥
विकार ग्रंथियाँ बढ़ीं, सभी समूल दाह दे।
सुकामना समष्टि की, सुचेतना प्रवाह दे॥

समस्त दृश्य सृष्टि के, सदैव हों सुरम्य माँ।
अगम्य पंथ लक्ष्य के, करो सभी सुगम्य माँ॥
नकार चित्त वृत्तियाँ, रचूँ सुछंद ओज के.
लिखे व्यथा सुलेखनी, अकिंच घाव सोज के॥

भाव मन के सब उपासे

नोंक है टूटी क़लम की,
भाव मन के सब उपासे।

चीख का मुखड़ा दबा है,
और सिसकती टेक है।
शब्द हैं बनवास पर,
शून्यता अतिरेक है।

सर्जना का क्या सुफल जब,
गीत के हों बंध प्यासे।

छप रहे हैं नित धड़ाधड़,
पृष्ठ हर अखबार में।
क्षत-विक्षत कोपल मिली है,
फिर भरे बाज़ार में।

और फिर हम हिन्दू-मुस्लिम,
के बजाते ढोल ताशे।

दूर हैं पिंडली पहुँच से,
ऊँचे रोशनदान हैं।
कैद दहलीज़ों के भीतर,
पगड़ियों की शान हैं।

जन्म पर जिनके बँटे थे,
खोंच भर भी न बताशे।

प्रश्न तुझसे है नियंता,
क्यों अभी तक मौन है।
बिन रज़ा पत्ता न हिलता,
बोल आखिर कौन है।

मरघटी मातम न दिखता,
छाये क्या ऊपर कुहासे!

हुई भूख अति ढीठ

उम्मीदों के कैसे होंगे,
भारी फिर से पाँव।

धँसी आँख ज़िंदा मुर्दे की,
मिली पेट से पीठ।
आज़ादी भी प्रौढ़ हो चली,
हुई भूख अति ढीठ।

बंजर धरती बनी बिछौना,
सिर सूरज की छाँव॥

कड़वा तेल नहीं शीशी में,
ख़त्म हो गया नून।
दो टिक्कड़ अँतड़ियाँ माँगें,
हुआ है गीला चून।

जा मुंडेर से कागा उड़ जा,
लेकर कर्कश काँव॥

मौला मेरे रख दो काला,
पथवारी ताबीज़।
गाँव की मुनिया आ पहुँची
यौवन की दहलीज़।

पहन मुखौटे फिरें भेड़िये,
कब लग जाए दाँव॥

बाकी सब शुभ-समाचार है

बाकी सब शुभ-समाचार है।

मिथ्या नव अध्याय गढ़े हैं,
अवनति के सोपान चढ़े हैं।
उन्नति का आलेख मृषा है,
क्षुधा बलवती तीव्र तृषा है॥

कृषि प्रधान देश है भूखा,
अन्नपूर्णा शर्मसार है।

काल पृष्ठ पर आहत अंकन,
विरुदावली छद्म का मंचन।
प्रतिभायें नेपथ्य विराजित,
झूठ-सत्य में सत्य पराजित॥

चढ़ी मुखौटों मंद हँसी है,
रुदन हृदय में जार-जार है।

बोनसाई नित महिमा मंडित,
तुलसी चौरे हुये विखंडित।
अपसंस्कृति का गर्दभ गायन,
संस्कारों का हुआ पलायन॥

आलेखों में साफ दिख रहा,
चाटुकारिता कारगार है।

है अवाम गांधारी खाला,
स्वविवेक पर ताला डाला।
वैमनस्यता का नित पोषण,
निज बांधव नव दोषारोपण॥

हम मंगल पर जा पहुँचे हैं,
समरसता बस तार-तार है।

बाकी सब शुभ-समाचार है॥

आह! ज़िन्दगी बनी नटी 

रंगमंच पर सभी जमूरे,
आह! ज़िन्दगी बनी नटी.

बाखर-बाखर ईंटें उखड़ीं,
एक मकां दो मकीं हुये।
तर्पण करने गया चल दिये,
अम्मा के दुख किसे छुये।

वही पूत है जिसके खातिर,
अकुलायी दिन-रैन खटी.

अंतड़ियों का प्रणय निवेदन,
ढीठ भूख अनसुनी करे।
भूखी सोयी भूखी जागी,
भूखों मरे न भूख मरे।

क्षुधा सघन सम सुरसा है,
रट रोटी की सघन रटी.

खेत रहन पर हुरिया का है,
संतो का क्यों फटा दुकूल।
शोषण शक्ति का है जारी,
गिद्ध दृष्टि अवसर अनुकूल।

पाँव भारी हुये पीर के,
गति श्वासों की तीव्र घटी.

दीनों को हक़ नहीं निवाला,
धनिक और भी हुये धनी।
ता-ता थैया नाच नचाये,
नीति डोर बेशर्म तनी।

सत्ता ओवरवेट हुयी है,
दीन पेट से पीठ सटी.

न्यारा देश हमारा (छंद मदलेखा)

न्यारा देश हमारा। प्राणों से अति प्यारा।
हिंदू मुस्लिम भाई। न्यारी है पहुनाई॥

भाती है यह थाती। उषा गीत सुनाती॥
पंछी हैं उड़ जाते। संध्या नीड़ सजाते॥

संध्या हो अलबेली। झूमे शाख चमेली॥
होली ईद मनाते। सारे रंग लगाते॥

प्यारे दृश्य सुहाते, सारे रंग लुभाते।
माटी है अति प्यारी, न्यारी है फुलवारी॥

सारे ही जन आला, प्यारा देश निराला।
माथा आज झुकायें। गाथायें यश गायें॥

शारदे निखार दे (शिव छंद)

शारदे निखार दे, शब्द-शब्द धार दे।
लेखनी सदा चले, सत्य को लगा गले॥

हों सगे न गैर के, गीत छंद बैर के.
इक वृथा न हो कथा, दीन की कहें व्यथा॥

बात प्रेम की कहें, विश्व क्षेम की कहें।
छंद-छंद आस हो, बस यही प्रयास हो॥

बेटियाँ (छंद विमोहा)

गीत हैं बेटियाँ, मीत हैं बेटियाँ।
प्रीति के छंद-सी, नेह आनंद-सी॥

मातु की लाड़ली, नाज से हैं पली।
हैं घटा सावनी, आयतें पावनी॥

ये जले दीप-सी, शुभ्र हैं सीप-सी.
पाक ये हव्य-सी, ज्योति हैं भव्य-सी॥

मारियेगा नहीं, भूल से भी कहीं।
बेटियाँ शान हैं, सृष्टि की जान हैं॥

विधाता छंद

1-

जुगत मिलकर करो ऐसी न मानव और नंगा हो।
न नस्ली भेद हो कोई न लफड़ा हो न दंगा हो॥
न नफरत की बयारें हों सभी का स्वास्थ्य चंगा हो।
न धर्मों के गड़ें झंडे, लगा केवल तिरंगा हो॥

2-

बहाकर स्वेद वह अपना नई फसलें उगाते हैं।
सदा भूखे रहें लेकिन क्षुधा सबकी मिटाते हैं।
दबे कर्जे गरीबी से नहीं वे चैन पाते हैं।
कृषक थक चूमते फंदा तमाशा वह बताते हैं॥

3-

कहीं कपड़ा नहीं तन पर कहीं मिलती नहीं रोटी.
नहीं मिलता निवाला तो कहें तकदीर ही खोटी॥
जहाँ में दीन का जीवन रहा घनघोर काला है।
मिला है तम उसे पग-पग न तिनकाभर उजाला है॥

4-
जलाकर प्रेम की बाती, दिया मिल प्रीति का बारो।
वहम का तम हरो सारा, अहम अपने सभी हारो॥
रहें सब लोग मिल जग में, सभी पर नेह तुम वारो।
लगा सबको गले अपने, बढ़ो संदेह को मारो॥

5-
जहाँ में जो ज़रूरी है, वही सब काम कर डालो।
सदा सद्भाव से अपना जगत में नाम कर डालो॥
सदा ही प्रेम से बोलो न तुम बनना अहंकारी।
मधुर वाणी रखो अपनी, इसी में है समझदारी॥

6-
शिकागो की सभा ने जो, सुना जयघोष भारत का।
दिखा था विश्व को सारे, समेकित रोष भारत का।
विवेकानंद का कौशल, युवाओं को सबक-सा है,
दिखा दें आज फिर बढ़कर, वही है जोश भारत का॥

श्री राम-जन्म

दोहा-

हाथ थाम ली लेखनी, धर शुभदा का ध्यान।
रखना कर मम शीश पर, माता रखना मान॥

सुमिरन कर ले राम का, जब तक तन में प्राण।
लिये राम के नाम बिन, ‘अना’ असंभव त्राण॥

चौपाई-

चैत मास नवमी तिथि आई.
पड़ी अजब हलचल दिखलाई॥
नखत पुनर्वसु सुंदर साजे.
कर्क लग्न में भानु विराजे॥

पीर उदर कौशल्या आई.
भागीं दासी लाने दाई॥
प्रसव वेदना सहती रानी।
आँखों में आया था पानी॥

नंगे पैरों आयी दाई.
जय-जय-जय कौशल्या माई॥
राम जन्म का जब पल आया।
सुर मुनियों ने शंख बजाया॥

दशरथ घर गूँजी किलकारी।
हुए सभी हर्षित नर-नारी॥
रामचंद्र श्यामल छवि प्यारी।
देख-देख माता बलिहारी॥

समाचार शुभ सुन सब धाए.
सुर नर संत सभी हर्षाए॥
अवधपुरी आनंद। समाया।
दिग दिगंत ने मंगल गाया॥

आँगन-आँगन बजी बधाई.
जन्मे कौशल्या रघुराई॥
मातु शारदे हुईं सहाई.
‘अना’ जन्म की कथा सुनाई॥

सारी नगरी सज गयी, जले सुभग शुचि दीप।
कानन-कानन झूमतीं, शाख मंजरी नीप॥

कौशल्या अति हर्ष से, भीग गये दृग कोर।
राम जन्म का हो गया, नगर ढिंढोरा शोर॥

घाव बड़े ही गहरे हैं 

अश्रु छलक कर आज हमारे, जो गालों पर ठहरे हैं।
प्रतिनिधि हैं ये विरह व्यथा के, घाव बड़े ही गहरे हैं॥

अहरह अब नव घात हृदय पर, बेकल सुधियाँ करती हैं
एहसासों की लुटी चिंदिया, दीप द्वार नित धरती हैं।
हुआ स्वप्न में स्वप्न विखंडित, निलय प्रीति का सूना है।
पीड़ातप उपहार मिला जो, बढ़ता निशि-दिन दूना है॥

सूखे अधर नाम के तेरे, पढ़ते सतत ककहरे हैं।
अश्रु छलक कर आज हमारे, जो गालों पर ठहरे हैं॥

विगत चुंबनों के अंकन नित, सुमिरे हृदय वीथिका है।
अधराधर जो रच डाली थी, वो लयहीन गीतिका है॥
रोम-रोम पर विह्वल हो जो, छंद प्रणय थे रच डाले।
अश्रु बूँद हो व्याकुल उनको, स्मृतियों में खंगाले॥

अब तक अंकित वह मानस पर, सारे चित्र सुनहरे हैं।
अश्रु छलक कर आज हमारे, जो गालों पर ठहरे हैं॥

अटल हुई पीड़ा पर्वत सम, टूटे क्यों अनुबंध सभी।
दृश्य हुए सारे वह झूठे, जो देखे थे साथ कभी॥
श्वासें सारी तुझे समर्पित, कर दूँ गलियों हाटों में।
करूँ प्रीति का तर्पण जाकर, फिर गंगा के घाटों में॥

इन्द्रिय के सब तंतु रसायन, तुम बिन गूँंगे बहरे हैं।
अश्रु छलक कर आज हमारे, जो गालों पर ठहरे हैं॥

मोहन खेलत फाग 

लख वृंदावन भाग, मोहन खेलत फाग।
नभ पर रहे उछाल, रंग अबीर गुलाल॥

डारे झगा अजानु, लली लखत वृषभानु।
केशव करत किलोल, बाजत हैं ढप ढोल॥
त्याग दई सब लाज, रंग लिए कर आज।
दौड़त हैं हर छोर, भीगे बदन किशोर॥

मन मा उठत सवाल, देखि ढंग सब ग्वाल।
नभ पर रहे उछाल, रंग अबीर गुलाल॥

डारे घूँघट माथ, ले मटकी दधि हाथ।
राधा सखियन संग, देख रही हुडदंग॥
लिए ग्वाल तब घेर, लगी न पल भर देर।
भागी बच पुरजोर, फगुअन का सुन शोर॥

राधा भाग निढाल, पूछो नहीं हवाल।
नभ पर रहे उछाल, रंग अबीर गुलाल॥

कान्हा ने बरजोर, मटकी दी धर फोर।
और छोर पिचकार, रंग दिया सब डार॥
भीज गए सब अंग, चोली चूनर संग।
अद्भुत माधव रंग, जागी अजब उमंग॥

किये लाल सब गाल, निर्लज बहुत गुपाल।
नभ पर रहे उछाल, रंग अबीर गुलाल॥

मधुमास खिला कानन-कानन 

मधुमास खिला कानन-कानन।
रति का है दीप्त सुभग आनन॥
ले पंचशरों को साथ फिरे।
मदहोश मदन सँभले न गिरे॥

उपवन-उपवन किंशुक कुसुमित।
महुआ कचनार सभी प्रमुदित॥
कलियों ने घूँघट पट खोले।
अलि बौराये इत उत डोले॥

तरु शाख खिलीं शुचि मंजरियाँ।
चहुँ ओर सुवासित हैं कलियाँ॥
हौले मधुगंध बयार बही।
दुल्हन सम लगती सद्य मही॥

कुसुमाकर ने हृद घाव दिये।
नित विरहन कटु विष चषक पिये॥
पी तुम बिन कैसे ‘अना’ जिये।
आ अधर लिखो अभिलेख प्रिये॥

नूतन साल

सकल विश्व में फहरे परचम, उन्नत हो भारत का भाल।
समरसता का शुभ संदेशा, लेकर आये नूतन साल॥

ऊँच-नीच का, हर कुरीति का,
मिलजुल कर हम करें विरोध।
द्वेष दिलों के सकल मिटाकर,
करें प्रीति पर नूतन शोध॥
जाति-वाद और वैमनस्य की,
नहीं गले अब कोई दाल॥

समरसता का शुभ संदेशा, लेकर आये नूतन साल॥

हर थाली में रहे निवाला,
अश्रु नहीं हों द्वय दृग कोर।
नित चौके में खदके अदहन,
सुलगें चूल्हे भोर अछोर॥
भूखा मरे न निर्धन कोई,
निठुर क्षुधा न करे बवाल॥

समरसता का शुभ संदेशा, लेकर आये नूतन साल॥

दहलीज़ों से बाहर आकर,
‘आधी आबादी’ ले श्वास।
रहे सुरक्षित प्राण, अस्मिता,
खंड न हो उसका विश्वास॥
अवरोधों को करे पराजित,
बने स्वयं ही सक्षम ढाल॥

समरसता का शुभ संदेशा, लेकर आये नूतन साल॥

चुप -चुप चिड़िया रानी 

चुप-चुप दिखते कौए सारे, चुप-चुप चिड़िया रानी।
ठूँठ हो गए बरगद पीपल, गया रसातल पानी॥

जहाँ-तहाँ कंक्रीट उगा है, वृक्ष हो गये बौने।
बेबस खोज रहे हरियाली, नित पशुओं के छौने॥
उभरी रेती सरिता तल की, तड़पे मछली रानी।
ठूँठ हो गए बरगद पीपल, गया रसातल पानी॥

धुआँ-धुआँ-सी हुई ज़िंदगी, हुआ धुआँ जग सारा।
भरी फेफड़ों में है कालिख, गया शीर्ष पर पारा॥
फिर भी सोयी है अवाम क्यों, होती है हैरानी।
ठूँठ हो गए बरगद पीपल, गया रसातल पानी॥

कहीं अधिकता जल प्लावन की, पड़े कहीं पर सूखा।
प्रकृति संग खिलवाड़ किया नित, मानव बिलखे भूखा॥
पर्यावरण बिगाड़ा हमने, कौन हमारा सानी।
ठूँठ हो गये बरगद पीपल, गया रसातल पानी॥

जाग-जाग रे सोते मानव, आ कुछ पौधे रोंपें।
आने वाली संतति को हम, नहीं कटारें घोंपें॥
जो बोयेगा वही कटेगा, मत कर अब मनमानी।
ठूँठ हो गए बरगद पीपल, गया रसातल पानी॥

जल बिन जीवन तपता मरुथल, तथ्यसभी यह जानें।
प्राणदायिनी घटक जगत का, मोल नहीं पहचानें॥
विनत ‘अना’ कहती कर जोडे़, तज दो कारस्तानी।
ठूँठ हो गये बरगद पीपल, गया रसातल पानी॥

संरक्षित करने का प्रण लें, जल का सीकर-सीकर।
तभी श्वास ले पाये संतति, भावी मृदु जल पीकर॥
लघु प्रयास से संभव मानव, मत कर आना-कानी।
ठूँठ हो गये बरगद पीपल, गया रसातल पानी॥

उषा गीत 

असित निशा चल दी समेटकर, तम की चादर काली।
लो पूरब में हँसा दिवाकर, लिये भोर की लाली॥

खग वृन्दों ने पंख पसारे, नापा गगन परिधि को।
विहंस शरण दी नभ वितान ने, धरती के प्रतिनिधि को॥
शक्ति अपरिमित ले डैनों में, थाह गगन की पा ली।
लो पूरब में हँसा दिवाकर, लिये भोर की लाली॥

नत शाखों प्रति पुष्प मंजरी, पर आयी तरुणाई.
भ्रमर विहंस लो करने आये, कलिका की पहुनाई॥
देख झूमते शाख पर्ण को, स्मित आनन है माली।
लो पूरब में हँसा दिवाकर, लिये भोर की लाली॥

लिये फावड़े और कुदालें, चले खेतिहर घर से।
दो-दो गज के डग भरते हैं, बाँधे साफा सर से॥
बाट जोहता शुष्क खेत कल, बूँद स्वेद की डाली।
लो पूरब में हँसा दिवाकर, लिये भोर की लाली॥

पुष्ट पाल्य खेलें घर आँगन, कज्जल लगे ढिठौने।
बजे किंकणी दुग्ध पी रहे, पूज्य सुरभि के छौने॥
उषा जन्म की ब्रह्म बजाते, सकल सृष्टि में थाली।
लो पूरब में हँसा दिवाकर, लिये भोर की लाली॥

व्योम विस्तृत प्रीति का

शब्द का तूणीर लघु है, व्योम विस्तृत प्रीति का।
भाव बौने लिख न पाऊँ, प्रेम पर शुचि गीतिका॥

कथ्य इसका है अपरिमित, बाँच कैसे लूँ भला।
कौन है जग में न जिसके, भाव नेहिल हृद पला॥
ढाई आखर में समाहित, गीत नेहिल नीति का।
शब्द का तूणीर लघु है, व्योम विस्तृत प्रीति का॥

प्रेम राधे का लिखूँ पर, लेखनी सक्षम नहीं।
गोपियों का लिख विरह दूँ, भाव इतने नम नहीं॥
लग रही प्रस्तुति अधूरी, नयन ओझल वीथिका।
शब्द का तूणीर लघु है, व्योम विस्तृत प्रीति का॥

सृष्टि के यह केन्द्र में है, माप कैसे लूँ परिधि।
प्रेम पावन भाव हृद का, लेख लिक्खूँ कौन विधि॥
प्रेम में पहला शगुन है, डूबने की रीति का।
शब्द का तूणीर लघु है, व्योम विस्तृत प्रीति का॥

रूपमाला छंद

 (1)
सुप्त हैं सब भाव मन के, लेखनी है मौन।
श्वास क्यों बोझिल हुई अब, पूछता यह कौन॥
व्यर्थ है संताप करना, क्या वृथा है बात।
झेलने है अब स्वयं ही, वक़्त के आघात॥

(2)
शीत नित नश्तर चुभाये, बैर ठाने वात।
कँपकपाते दिख रहे हैं, मुफलिसों के गात॥
लेख किस्मत का लगाये, हर ख़ुशी पर दाग।
सर्द पड़ती नाड़ियाँ हैं, पर उदर में आग॥

(3)
चित्त है बेचैन हर दिन, क्षुब्ध मन के भाव।
भ्रात ने ही ख़ुद दिये हैं, बांधवी को घाव॥
विधि कहाँ ऐसी ‘अना’ है, कर सके जो न्याय।
बोझ रुपयों का करेगा, बंद हर अध्याय॥

(4)
क्यों नहीं घाटी खिलाती, केसरी शुभ फूल।
सोचकर यह नित सिसकते, हैं नदी के कूल॥
हो रहे हैं नित धमाके, मौन है डल झील।
द्वेष की कुत्सित अनल में, बुझ गये कंदील॥

कुकुभ छंद 

1-

ऊँच नीच की सोच जगत में, है मानवता पर भारी।
छुआछूत की कटें सलाखें, नहीं बनी अब तक आरी॥
जाति-धर्म का हरदिन झगडा, लगते हैं हरदिन नारे।
बदलें यह हालात अगर तो, लोग रहें हिलमिल सारे॥

2-
देवालय में पूजी जाती, लुटती सड़कों पर नारी।
घूम रहे हैं खुले सपोले, लंपट कामी व्यभिचारी॥
नहीं गर्भ में नहीं धरा पर, रही सुरक्षित अब मादा।
सोती हैं फिर भी सरकारें, भूल गईं हैं हर वादा॥

3-
नहीं सुरक्षित रहे निकेतन, बहुत बढ़ी है बदहाली।
लुटे अस्मिता उसके द्वारा, जिसके जिम्मे रखवाली॥
आश्रयदाता ही करते हैं, शरणागत की बिकवाली।
पहन मुखौटे रौंद रहे हैं, कलियों को अब ख़ुद माली॥

श्यामल घटा (मधुमालती छंद)

घिरने लगी, मनभावनी,
श्यामल घटा, शुभ सावनी।
छम-छम गिरें, बूँदें धरा,
तृण-तृण मुदित, झूमे हरा॥

तरु वृंद पिक, का गान है,
भू का हरित, परिधान है।
शाखें मुदित, हैं झूमती,
अलकें गगन, घन चूमती॥

बैरन हवा, गसने लगी,
तन के वसन, कसने लगी।
चुभने लगीं, पुरवाइयाँ,
होने लगीं, रुसवाइयाँ॥

मृदु सुधि हृदय, तेरी बसी,
हैं क्लांत दिन, हिय बेकसी.
कटती नहीं, घन यामिनी,
गिरती हृदय, नित दामिनी॥

परदेश में, मेरे पिया,
संदेश ले, जा डाकिया।
तत्क्षण मिलें, मनमीत आ,
रच दें प्रणय, के गीत आ॥

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