अनिता भारती की रचनाएँ

उड़ान

उसे
कितना भी बाँधो
घर-बार के
खूँटे से
भांड- बर्तन, कपड़े- लत्ते
प्यार- स्नेह के बन्धन से
या फिर अपनी
उदीप्त अभिशप्त आलिंगन में,

हमें तुम्हारी बेटियाँ पसंद हैं 

सुनो,
श्यामा गौरी
पार्वती ओमवती
निर्मला कमला बिमला
सुनीता बबीता गुड्डो गुड्डी
धन्नो बिल्लो रानी मुन्नी
बबली पिंकी शन्नो रानो

हमें पसंद है
तुम्हारी बचपना लाँघती बेटियाँ
स्पष्ट कहें तो
तुम्हारी जवानी की दहलीज पर खड़ी
बेटियाँ हमें बहुत भाती है
ठीक वैसे ही
जैसे खेत में कटने को तैयार खड़ी
दानों से भरपूर फसल

दुधारू गाय खरीदने-बेचने से पहले
तय होता है मोल-भाव
उसके दूध से
हमें भी करना है तुमसे
खरा-खरा मोल-भाव

सुनो…!
हमें करने दो न मोल-भाव
यह जरूरी भी है
हमारे बच्चों के साथ जो रहना है इन्हें
मिटाने दो हमें हमारे सारे संशय
कर लेने दो पूरी छानबीन हमें

किस जात
और नस्ल की हो तुम?
तुम्हारे पुरखों का क्या इतिहास है?
तुम्हारी बेटियां स्वस्थ तो है न?
उन्हें कोई बीमारी तो नहीं?
अब तक कुँआरी ही होगी न?

बताओ, तुम्हारी बेटियां
काम करने में कैसी हैं?
कामचोर तो नहीं?
साफ-सुथरे रहने की आदत है या नहीं?
लालची तो नहीं खाने की?
शौकीन तो नहीं हैं ना
मोबाइल लिपस्टिक टेलीविजन की?

हमें जरूरत है
ऐसी ही लड़कियों की
जो हों अल्प वयस्क
जो मन लगाकर काम कर सकें सारे

अब हम करें भी तो
क्या करे?
हमारे अपने बच्चे ठहरे
निपट निकम्मे
एक गिलास पानी तक
खुद नहीं पी सकते
अपने गंदे कपड़े उतार
फेंकने की आदत है उन्हें इधर-उधर
उठाती रहती हैं हम दिन भर उन्हें
रात-दिन खाने की फरमाईशें
पूरी करते करते थक जातीं हैं हम!

फिर तुम्हारे साहब के काम
सो अलग
प्रैस कपड़े, पॉलिश किए चमकते जूते
मोबाइल, घड़ी
अंगूठियां, वर्क-डायरी
सब सामान रहे व्यवस्थित
चुटकियों में
मांगने पर मिल जाये बजाते
जिनके न मिलने पर सुनने पड़ते है कटुवचन
पहले बजा लेती थी सारे हुक्म
अब नहीं कर पाती मैं
यह सब
घुटने भी तो जबाब दे चुके हैं हमारे

सुनो मुझे तुम्हारी बेटी चाहिए
जो कर सके मुझे भारमुक्त
संभाल ले मेरा घर-बार
अच्छा पैसा दूंगी मैं
उनसे ज्यादा, जो पहले दे रहीं है तुम्हें

सुबह की चाय
दोपहर की दो रोटी
शाम की चाय वह हमारे यहाँ ही पियेगी
दो बिस्कुट के साथ
साल में दो जोड़ी कपड़े बोनस के तौर पर
जितना मैं दे रही हूँ कोई नहीं देगा

देखो,
तुम अब ज्यादा जिद्द मत करो
कल से भेज देना बिटिया को मेरे घर

तुम निर्वस्त्र नहीं हो मनोरमा

छोटी सुन्दर
काली धौली आँखों वाली
गौरवर्णा, श्यामवर्णा
यौवन से गदराई
या फिर कृशरूपा
तुम्हें निर्वस्त्र किया देश रक्षकों ने
पर तुम निर्वस्त्र नहीं हो

तुम्हें वस्त्र पहनाने निकल आयी है
रणभूमि में
अनेक निर्वस्त्राएँ
तुम्हारे नंगे
क्षत-विक्षत शरीर ने
जगाई है क्रान्ति की अखण्ड लौ
जो रक्षकों-भक्षकों को
सालों-साल याद दिलायेगी
कि एक थी मनोरमा…

जहाँगीरपुरी की औरतें : १

जहाँगीरपुरी की औरतें
मेहनत की धूप में
तपकर
फीकी हो चुकी अरगनियों पर

झूलती कपड़ों- सी
लचक-लपक-झपक
लम्बे-लम्बे डग भरती
जल्दी-जल्दी
घरों में, दुकानों में, कारखानों में
काम करने के लिए खप जाती हुई

किसी दिन
मुश्किल से मिली छुट्टी में
कभी-कभी अपने नन्हें मुन्नों को
गोद में लादे
छाती से चिपकाये, उंगली थामे
खुशी से गालों में हजारों गुलाब समेटे
ले जाती हैं दिखाने
मैट्रो में लालकिला या कुतुब मीनार

जहाँगीरपुरी की औरतें
रोटी सेंकने के बाद
बुझे चूल्हे सी
मन में अंगार दबाये धधकती
हाथ लगाओ तो जल जाओ

जहाँगीरपुरी की औरतें
बार-बार धुलने से फीकी हुई
गली साड़ी सी
जो बार- बार सिलने पर भी
फट-फट पडे

जहाँगीरपुरी की औरतें
सुबह-सुबह
ताजा सब्जी- सी दमकती
पर शाम होते ही
मुरझायी बासी सब्जी- सी
जिनकी कीमत शाम होते होते
कम हो जाती है

जहाँगीरपुरी की औरतें
सर्दियों की रात में
सुनसान पडी सड़क की तरह
जिसमें चलना न चाहे कोई

पर वे चलती है उन पर
निडर बेखौफ
पार करती है उन्हें
हँसते-हँसते
जिन्दगी के अन्त से बेखबर

जहाँगीरपुरी की औरतें : २

जहाँगीरपुरी की औरतें
चल पडती है निन्हेबासी
और बच्चियाँ
झुग्गियों के अंधेरे कुएँ से निकल
फैल जाती हैं
आस-पास की पॉश कलोनियों में

महज झाडू-पोछा ही नहीं करतीं
करने निकलती है
मल की सफाई भी
पन्नी चुगने
और फैक्ट्रियों में ठुसने

ये काली गोरी पतली छोटी लम्बी
चेहरे पर वीरभाव रुआँसापन मुर्दानापन
तटस्थ- सा पीलापन लिए
बैठती हैं बस में
एक-एक रुपये के लिए
खाती हैं कंडक्टर से घुड़कियाँ
पहुँचती हैं अपने-अपने गंतव्य

सुबह से निकली
लौटेंगी शाम को
धूल-धूसरित सूरज के साये में
अलसायी, थकी टूटी देह लिए।

आठ मार्च 

बीते सालों की तरह
बीत जायेगा आठ मार्च

भागो कमला, सुनीता, बिमला
मुँहअंधेरे उठ
ले चलेगी ढोर-डंगर
जायेगी बेगार करने
खेत खलिहानों में
उठायेगी बाँह भर-भर ईंटें
खटेगी दिन भर पेट की भट्टी में
बितायेगी इस आस पर दिन
कि काम जल्दी निपटे—

फिर धूप में बैठ दो पल
एक छोटी सी बीड़ी के सहारे
मिटायेगी थकान
सच, महिला दिवस
इनके लिए अभी सपना है

बीतेगा उनके लिए भी
यह आठ मार्च
जो क्लर्क है, आया है
टीचर है सेल्सगर्ल है
जो खटती और बजती है
घर-बाहर के बीच
आधे दाम पर दिन-रात
काम करती है
इस उम्मीद से कि प्याला भर चाय
सकून से पी पायेगी
महिला दिवस
अभी भी उनकी ज़रूरत है।

कितनी सरिताएँ
कंधों पर झोले लादे
समाज बदलाव के विचार से
लबरेज
अपनी फटी जिन्स पर
आदर्श का मफलर डाल
मानवता के फटे जूते पहन
जायेंगी
गांव- देहात, स्लम
और एक दिन
मारी जायेंगी
शायद महिला दिवस
उनसे ही आयेगा…

झुनझुना 

जब भी मैं
आवाज उठाती हूँ
तुम तुरंत
जड़ देना चाहती हो
मेरे मुँह पर
नैतिकतावाद की पट्टी

मैंने तुम्हारे सामने
तुम्हारे बराबर खडे होकर
कुछ सवाल क्या पूछे
कि तुमने मुझे एक तस्वीर की भाँति
कई फतवों से मढ़ दिया
मसलन मर्द की सहेली
औरतों की आज़ादी की दुश्मन
पितृसत्ता की पैरोकार
आदि-आदि

मैने तुमसे पूछा
स्त्री आजादी का मतलब क्या है?
क्या अनेक मर्दों से
संबंध बनाने की स्वतंत्रता?
या फिर अपने निर्णय
स्वयं लेने की क्षमता?
या कोरी उच्छृंखलता?
तुमने मुझे स्त्री मुक्ति विरोधी
साबित कर दिया

मैंने तुमसे पूछा
हमारे समाज की औरतों पर
रेप दर रेप पर क्या राय है?
चुप्पी क्यों है तुम्हारी?
तुमने कहा
कर तो रही है हम
बलात्कार पर बात
जो रोज हो रहा है
हमारे घर पर हमारे साथ
और आस-पास

मैंने पूछा
क्यों नही लाती तुम
अपनी संवेदनशीलता के दायरे में
गरीब टीसती
दलित औरत का दर्द?
तुमने कहा
अरे रहती है वे हरदम
हमारे साथ
भीड़ में हमारी आवाज बनकर

मैने पूछा भीड़ कब
मंच का अभिन्न हिस्सा बनेगी?
तुमने झट कहा
अभी नही
अभी वक्त नही है
अभी हमें मत बाँटो
अभी हमें जाना है बहुत दूर
पहले ही देर से पहुँचे है यहाँ तक
अब तुम आगे से हटो
सब कुछ रौंदते हुए
आगे बढ़ने दो हमें
तुम्हारे बोलने से
हमारी एकता टूटती है
हमारा संघर्ष बिखरता है
अच्छा है तुम चुपचाप
हमारे साथ रहो
आँख मुँह कान पर पट्टी बाँधे
सब्र का फल हमेशा मीठा होता है
जब हम मुक्त होगी तब
तुम्हारा हिस्सा
तुम्हें बराबर दे देगीं

और तुम मुझे हमेशा
सब्र के झुनझुने से
बहलाना चाहती हो
पर अब इस झुनझुने के पत्थर
घिस चुके है
उनकी आवाज घिसपिट चुकी है
सुनो,
अब अपना झुनझुना
बदल डालो।

इस बार महिला दिवस

इस बार महिला दिवस
समर्पित है उन बच्चियों के नाम
जिन्होंने जन्म लेने से पहले
दम तोड़ दिया कोख में
और उन बच्चियों के नाम भी
जो जन्म लेकर
भूखे मरने और सोने को मजबूर है

इस बार महिला दिवस
उन पत्नियों के नाम
जिसकी सिसकी निर्दयी पति के कान
तक कभी नहीं पहुंची
जो अपने नन्हें- नन्हें बालकों को लिए
रात-दिन नाप रही हैं सीढ़ियाँ
पिता-पति और भाई की
अदालत में…

यह महिला दिवस समर्पित है
उन वधुओं के नाम
जिन्हें बेवज़ह, बेकसूर
दहेज कुंड में झौंक दिया गया
आज एक नहीं अनेक शैतान खड़े हैं
उन्हें
इस अग्निकुंड में ओमस्वाहा
करने के लिए

इस बार का महिला दिवस
समर्पित है उन कुंआरी कन्याओं के नाम
जो अपनी पूरी ऊर्जा, प्रतिभा के साथ
अपने शरीर को घिस रही है
दो कौड़ियों के लिए
किसी कुमार के इन्तज़ार में बैठी
वरमाला लिये
कितने नगरसेठ बैठे हैं
उनका चाम-दाम
बेचने को तत्पर

इस बार का महिला दिवस
समर्पित है उन दलित स्त्रियों के नाम
जिनके स्वाभिमान को
कलंकित करने के लिए
कितने धर्मवीर बैठे हैं
जिनके साथ सिर के बल
मजबूती से खड़े हैं
लोकतंत्र के सारे खम्भे

इस बार का महिला दिवस समर्पित है
उन सभी के नाम
जो संघर्षरत
रात से बैठी हैं सुबह की तलाश में।

ज़रूरत

मेरा मन कहता है
चलूँ
उन अंधेरी,
बदनाम गलियों में

जहाँ छटपटा रहा है
मेरी बहनों का जीवन
जिन्होंने ओढ़ा हुआ है
तार-तार इज्ज़त का पल्ला
जिन्हें रौंदा गया है
बार-बार

उन अंधेरी,
बदनाम गलियों में
खिली
मासूम कलियों को
बटोर लाऊँ मैं

खिलने के लिए उन्हें भी
साफ हवा खाद पानी की
ज़रूरत है
कि उन्हें भी एक
मुक्त आँगन की ज़रूरत है।

होना

अपने सपने
अपनी जान
अपने प्राण
स्पर्श कर
अपने आप को इक बार
फिर देख
औरत होना
कोई गुनाह नहीं।

तुम्हें लगता है

तुम चाहते हो
तुम्हारे सुर में मिला दे हम
अपना सुर
क्योंकि तुम्हे लगता है
हमारे सुर का अस्तित्व
तभी बचेगा

तुम चाहते हो
तुम्हारे ख्याब में हम
अपने ख्याब जोड़ दे
क्योंकि तुम्हारा मानना है
तभी पूरे होंगे हमारे ख्याब

तुम चाहते हो
तुम्हारी मंजिल के साथ खींच लाएँ हम
अपनी मंजिल
क्योंकि तुम्हारी धारणा है
तभी हमारी मंजिल को
दिशा मिलेगी

तुम चाहते हो
अपने मनपसंद रंग में रंगना हमको
क्योंकि तुम्हे लगता है
सबकी पसंद एक सी होनी चाहिए

पर हमें पसंद है
अपनी तरह के रंग में
रंगे ख्बाव, सुर और मंजिल

तेरा यश 

हे महामना अम्बेडकर!
अर्पित तुम्हें श्रद्धासुमन
दु:खों से कराहती
पिसती जनता को
किया तुम ने समुन्नत

हे महामना अम्बेडकर
अर्पित तुम्हें श्रद्धासुमन
महाड़ औऱ कालाराम मन्दिर संघर्ष
आदर्श हमारे आन्दोलन का़
कर ‘मनुस्मृति- दहन’
किया दहन हिन्दू धर्म का

हे महामना!
अर्पित तुम्हें श्रद्धासुमन
तुम्हारा कर्म आदर्श हमारा
तुम्हारे सिद्धान्त मार्ग प्रशस्त करे हमारा
तेरी करूणा
मानव को मानव बनाती
तुम्हारी लड़ाई
दलितों में स्वाभिमान जगाती
तुम्हारी चिन्ता
स्त्रियों को अधिकार दिलाती
तुम्हारा यश गा उठे जन-जन

हे महामना!
अर्पित तुम्हें श्रद्धासुमन!

हमारे भीतर

देखो,
मुझमें बसता है एक अम्बेडकर
देखो,
तुममें बसता है एक अम्बेडकर
जो हमारी नसों में दौड़ते
नीले खून की तरह
ह्रदय तक चलता हुआ
हमारे मस्तिष्क में
समा जाता है

अरे, साथी!
निराश न हो
हमें पता है
जो यहाँ घुला है
वही उठेगा
इस मिट्टी से एक दिन
फिर दुबारा
अपनी प्रतिमा गढ़ते हुए
नया भीमराव

कहने की बात 

कितनी अजीब बात है कि
जब हम सोचने लगते है
सिद्धांत केवल
कहने की बात है
चलने की नहीं

हम सत्य न्याय समता
लिख देना चाहते हैं किताबों में
होता है वह हमारे
भाषण का प्रिय विषय
पर उसे नहीं अपनाना
चाहते जीवन में

हम बार-बार कसम
खाते है अपने आदर्शों की
देते हैं दुहाई उनकी
भीड़ देख जोश
उमड़ आता है हमारा
जय भीम के नारों से
आँख भर आती है हमारी

गला अवरुद्ध हो जाता है
फफक कर रो उठते हैं हम
महसूस कर दुख तकलीफ
जो झेली थी भीम ने उस समय
पर हम आँख मीच लेते
उससे
जो अन्याय हमारी आँखों के
नीचे घट रहा है।

फ्रेश करने का तरीका 

सुनो,
आज जब सुबह
सोकर उठो
तो अपने आप को
तरोताजा करने के लिए
मत देखो
अपनी दोनों कोमल हथेलिेयाँ
मत जाओ किसी ईश्वर की
आरती उतारने
निकल जाओ
किसी भीड़ भरी
या सुनसान सड़क पर
जहाँ फुटपाथ पर सो रहा
मैले-कुचैले थके-हारे
जीवन की अमिट जिजीविषा की
चादर में लिपटे बचपन को
जाकर प्यार से उनके
गाल सहलाकर
उसको वहाँ से
निकालने की बात पर विचार करो
फिर देखो तुम्हारा दिन
कैसे बिना ब्रश
और नाश्ता किेए भी
चम्पा के फूलों सा ताज़ा हो
महक उठेगा

जरा उनकी ओर
ध्यान से देखो
जो अपनी फटी निकरों
और फ्राकों में
इस बेरंगी दुनिया में
रंग-बिरंगे फूल और गुब्बारे
बेचते नज़र आते है
और पास ही उनकी माँ
चिथड़ों में लिपटी
और एक नवजात को
तैयार कर रही होती है
कि वह भी बड़ा होकर
बेंचे गुब्बारे
या फिर फूल या अधनंगी
तस्वीरों वाली किताबें

उसकी इस
अधनंगी तस्वीरों वाली
बदरंगी दुनिया में
रंग भरने के लिए
पता नहीं
इन मैले-कुचैले थे गले जड़ी
अंधेरे की दुनिया में
कही छिपा बैठा हो
हमारा छोटा-सा भीमराव
या फिर छोटी सी सावित्रीबाई,महावीरी,
शर्मिला ईरोम, बछेन्द्री पाल,झलकारी -सी
मजबूत इरादों वाली
नरगिस, मीनाकुमारी-सी अदाकारा

ये भी हो सकता है कि इनमें ही
कोई बड़ा होकर बन जाए
भगत सिंह
और बोने लगे कही
बंदूक और गोलियाँ
संभव है कि
अभावों में पली पूरी की पूरी कौम
एक दिन बारूद बन कर
फूट पडे
इस बेहया निर्लज्ज हरामखोर
कमीनी जमात पर

अब भी समय है
चलो,
अपने आपको
फ्रेश करने के तरीके
बदल डालो।

झूठ

बंद करो
ये ढोल पीटना
कि तुमने बचपन में
बहुत संघर्ष किया
और अब
तुम्हारे आराम करने का समय है

जो तुम सुनाते हो धिक्कारते हो
उन मजलूमों को
कि तुम उनकी तरक्की के लिए
सोये ज़मीन पर
उन्हें ऊंचा उठाने के लिए
तुम रहे एक कपड़े में
उन्हें बराबर लाने के लिए
तुमने छोड़ दिए अपने बच्चे

क्या यह सब
अपने स्वार्थ के खोल में घुसने के लिए
तुम्हारे बहाने नहीं?
सोचो,
क्या तुम सच में खड़े थे
उन लोगों के हक में?
जो पिट रहे थे डूब रहे थे मर रहे थे
या फिर उनके डूबने पिटने
और मरने की शर्त पर
तुम्हारी महत्वकांक्षा के लालच का झंडा
लहरा रहा था
और उससे तुम
जो कमाना चाहते थे
नाम पैसा शोहरत
वह सब पा लेने के बाद कहते हो
कि हम काम कर करके
थक चुके हैं
अब हम बुझ चुके हैं
हमारा आँदोलन से मन उठ चुका है
और सब कुछ करने के बाद
यहाँ कुछ बदलने वाला नहीं है
कहीं नही आने वाली है
लाल-नीली क्रांति

यह कहकर तुम आँदोलन से
सदा के लिए हट जाना चाहते हो
ताकि तुम्हारी बेईमानी
अपराधबोध
और झूठ तड़पकर
बाहर ना कूद पड़े

पर सुनो,
सारी दुनिया के दलित शोषित मजबूर
जानते है कि
तुम थके बिल्कुल नहीं हो
और बुझे भी नहीं हो
पर हाँ, यह संभव जरूर है
कि अब तुम हमारे सपनों की
कीमत लगाकर
हमारे बलबूते इकट्ठी की गयी
कमाई पर
जरा अच्छे से पसर कर
आराम कर पाओगे
अपने मन में
छद्म शान्ति का भ्रम पाले

कि हमने
खूब मेहनत की
कीचड़ और दलदल में पड़े
समाज के लिए
उसे खूब उठाया
पर कुछ भी नही बदला
और अब थककर हमारे
आराम करने का वक्त है
दलित शोषित मजबूरों
जाओ! हमें चैन से सोने दो

जनभाषा

चलो, आज कुछ
सार्थक कर दिखायें
शब्दों के अर्थ बदल डालें
या उनमें नयी जान डालें

जितने भी मुहावरे हैं
लोकोक्तियाँ हैं किस्से गाने हैं
क्यों न उनको
जनपक्ष में खडा कर दिया जाये?

अरे वो अपना भइया
दशरथ माँझी था ना
जिसने सचमुच
मुसीबत का पहाड़ हटा डाला
क्यों न उसकी हिम्मत के नाम
पहाड़ जैसा सीना की जगह
दशरथ माँझी जैसा सीना क्यों न कर दें?
चने को छोटा समझ
हम हमेशा कहते है
अकेला चना भाड़ नही फोड़ सकता
पर अकेले अम्बेडकर ने तो
अपने दम पर
पूरी सनातनी भाड़ में सेंध लगा
उसे उड़ा दिया था
तो क्यों न हम कहें
चना हो तो अम्बेडकर जैसा…

स्याही की नदी

दरवाजे की घंटी बजती है
ये काम से लौट आए है
मैं लिखना छोड़
खड़ी हो जाती हूं
अपनी पत्नी होने की
जिम्मेदारी निभाने

ये घर में घुसते ही
पूछते हैं
कैसा रहा आज का दिन?
बच्चों ने तंग तो नही किया?
दिन में सो पाई?
कुछ नया लिख पायी?
बातें इनकी सुनकर
मन आह्लाद से
छलक उठा
लगा मानों मेरी कलम में
स्याही की नदी भर गई

नए पंख 

मुझमें जागी है
नयी आशा
मन चहक रहा है
उड़ने को बेताब
नये पंख मिले हैं मुझे
छोटा- सा घरौंदा क्यों
सारी दुनिया मेरी है

आँखों में भर लूँ
आसमान
दौड़ जाऊं इठलाकर
बादलों पर
सारी दुनिया मेरी है
मन की कलियाँ
सतरंगी सपने बुन रही हैं
सूरज की गमक आँखों में
भर रही है

भिक्षुणी- सा
उन्मुक्त ज्ञान
चारों ओर से बटोर लाऊँ
अंधेरे बुझे कोनों में
सौ-सौ दीप रख आऊँ मैं

दोस्त

दोस्त
जब भी मैं
अपनी आँखें
बंद करती हूं
तुम्हारा मनमोहक
चेहरा मेरे सामने
आ जाता है
तुम्हारे साँवले
चेहरे पर दो आँख चेतनशील
मानों सब कुछ
उलटने-पलटने को तैयार
तुम्हारी बंद मुठ्ठी की
हथेलियों में
तुम्हारी बैलोस
खिलखिलाती हँसी
वो तुम्हारी नाक पर
रखा गुस्सा
जंग खाए पुराने ख्यालात को
एकदम तहस-नहस करने को अमादा
बंदिशों से लदे-फदे टोकरे को
ढ़ोने को बिल्कुल तैयार नही हो तुम
न मेरे लिए न अपने लिए
कहते हो तुम बार-बार
दुनिया बदलेगी
बदलेगी दुनिया एक दिन जरूर
तुमसे शय पा कर
हज़ारों हाथ खड़े हो जाते है
तुम्हारे साथ
छोटे से साँवले चेहरे पर
छोटी सी गुस्सीली नाक वाले साथी
बदलाव के लिए जूझते हुए तुम
वाकई बहुत खुबसूरत लगने लगते हो

जकड़न

सबसे कठिन होता है
अपनों से लड़ना
एक बार मैंने कोशिश की
तुम्हारे सच के
दायरे के बाहर
अपना सच जानने की

और
तुमने मुझे जकड़ दिया
कांटो भरी बाड़ से
जिसके नुकीले किनारे
मुझे लहुलुहान करते रहे

अब जबकि मैंने तुमसे
जंग जीत ली है
फिर भी ना जाने क्यूं
उन बाड़ों से बने
जख्म अब भी
रह-रहकर
दर्द से टीस उठते हैं।

पहाड़ जैसे 

जब हाथ में
टूटे काँच की कीर्च गड़ जाती है
तब उसमें से धीरे-धीरे
टीसता है दर्द

जब उसे छेड़ो तब
और जोर से टीसता है
कभी तेज
तो कभी मध्यम

लेकिन
अगर मन में गड़ जाये
वो कचीली कीर्च
तो न केवल टीसता है
बल्कि ऐसा दर्द उठता है
जैसे हजारों पहाड़
दरक गये हो अपनी जगह से

क्या रिश्ते पहाड़ जैसे
नहीं होते?
खड़े रहे तो खड़े रहे
दिन प्रतिदिन, सालोंसाल
उगाते रहे
हरी नरम दूब, पेड़ और फल-फूल,
रंग-बिरंगे मनमोहक पक्षी
दरक जाए
तो पैदा कर दे
निपट बियाबान।

संभव

क्या ये संभव है
हम और तुम दोनों
जिये एक ऐसे रिश्ते में
न जिसमें
तुम रहो एक पुरुष
और न ही मैं औरत
दोनों
अपने अस्तित्व से परे
रहे बस बनकर
घनिष्ठ दोस्त
या फिर दो पक्की सहेलियाँ

तुम्हारी-मेरी बातें ऐसी हों
जिसमें
न शर्मिंदा हो जायें हम
कभी एक-दूसरे के सामने
और न हो जायें कभी
विचलित-विगलित
माँस के लोंदे की तरह

रहे सहज
हँसते बतियाते
खिलखिलाते
यूँ ही घास में लेटे
गुनगुनी धूप का आनंद लेते हुए
या फिर चिलचिलाती गर्मी में
किसी पेड़ की छाया तले
पसीने से तरबतर शरीर पर
शीतल हवा के झोंके
पीते हुए
किसी सड़क किनारे
छोटे से लिपे-पुते ढाबे पर
काँच के गिलास में
चाय की चुस्की लेते हुए
रहे सदा एक-दूसरे के साथ
मन में प्रगाढ़ विश्वास लिए

क्या ये संभव है?
अगर ये संभव है
तो आओ,
मर्द औरत की सारी परिभाषाएँ
ध्वस्त कर दें
जिसमें न तुम हो पुरुष
न ही मैं औरत
बस हम रहे महज इंसान।

मृग-मरीचिका

प्यार
ममत्व स्नेह
एक मृग-मरीचिका

जिसके पीछे
भागते-भागते हम
अंत में हाँफकर
थककर बैठ जाते है
जीवन के रेगिस्तान में

हरे पेड़
या फिर ताजे पानी से भरा तालाब
सच नही
सच है एक झुलसाते रेत की
मृग-मरीचिका

एक बच्चा जो जन्म लेता है 

एक बच्चा जो जन्म लेता है
फूल बन लाता है अपने साथ तमाम खूबसूरती
प्रतिभाशाली, सुन्दर, कोमल होता है वो
पर हमारी कौम के लिए
बच्चा है
एक झाडू, इक टोकरी
एक रस्सी, इक ढोल
एक रापी, एक ढोर
हम देते हैं उसे जन्म के साथ ढेका
दुनिया की गन्दगी ढोने का, साफ करने का
माथे पर लगाकर छाप
गुलामी दरिद्ररी की
जो चलती है पीढ़ी दर पीढ़ी

बिटिया मलाला के लिए-1

ओ सिर पर मंडराते गिद्धों,
सुनो!
अब आ गयी
तुम्हारे हमारे फैसले की घड़ी
छेड़ी है तुमने जंग
तुमने ही की है
इसकी शुरूआत

सुनो गिद्धों,
तुम्हारी खासियत है
कि तुम खुलकर कभी नहीं लड़ते
दूर से छिप कर
करते हो वार
आँख गड़ाए रखते हो हर वक्त
हमारे खुली आँखों से
देखे जा रहे सपनों पर

सुनो गिद्ध,
तुम्हें बैर है हर उस चीज से
जो खूबसूरत है
जो सुकून देती है
उस नन्हीं चिरैया से भी
जो खुशी से हवा में विचर रही है
खेल रही है हंस-गा रही है
नहीं पसंद आता तुम्हें उसका
उल्लास में भर कर चहकना
तुम अपने कंटीले अहंकार में झूम कर
अपने बारूदी नुकीली पंजों से
छीन लेना चाहते हो
उस नन्हीं चिरैया का वजूद
पर क्या सचमुच छीन पाओगे तुम?

सुनो गिद्ध!
जब आँधी तूफान
नहीं उड़ा पाती उसका वजूद
तब तुम्हारा क्या वजूद
उस नन्ही चिड़ियाँ के सामने?
जो तुम्हारे सामने फुदक रही
और नयी आने वाली सुबह का
आगाज़ कर रही है

बिटिया मलाला के लिए-2

सुनो गिद्धों, सुनो!
तुम लाख फैलाओ अपने पंजे
नहीं जकड़ पाओगे उस
नन्ही चिड़िया को
उसके इरादे, हिम्मत और जज्बे को
सुनो, तुम बहुत डरपोक हो
नहीं देते तुम तर्क का जबाब तर्क से
नहीं सुनते तुम
हक की बात हक से
तुम्हारे लिए
हक बराबरी
सबका मतलब
सिर्फ़ तुम्हारा रहम है
ताकि तुम्हारे खौफ की सत्ता
कायम रहे
ताकि एक भ्रम की सत्ता
कायम रहे

शिक्षा पहचान स्वतंत्रता
तुम्हारे लिए अपनी मौत
या मौत के फरमान से कहीं ज्यादा
खतरनाक वे सुबहें हैं
जिनसे उन अंधेरों का वजूद मिट जाये
जिनकी वजह से
तुम्हारे खौफ की सत्ता कायम है

सुनो,
स्वात घाटी पर मंडराते गिद्धों,
तुम्हारे सच के अलावा
कुछ और भी सच है
जिसे तुम सुनना नहीं चाहते
जिसे किसी ज़िंदगी के
गीत की तरह
सारे जहाँ के बच्चे गा रहे हैं।

बिटिया मलाला के लिए-3 

सुन रही हो बिटिया मलाला?
सारी आवाम रोते हुए कह रहा है —-
‘ओ प्यारी मलाला,
हम बड़े रंज में हैं

सुनो, बिटिया मलाला!
तुम्हारे जैसी हजारों बच्चियाँ
तुम्हारे लिए निकाल रही हैं
कैंडल मार्च
और सुनो, बिटिया मलाला!
मौलवी भी कर रहे हैं
तुम्हारे लिए दुआ की बरसात,
देश की सीमाओं से परे
उठ रहे हैं हाथ
तुम्हारी सलामती के लिए।

सुन रही हो, बिटिया मलाला!
अभी-अभी हमसे दूर गयी है
‘आरफा करीम रंधावा’
नहीं खो सकते हम तुम्हें

सुनो, मलाला बिटिया!
इन जंगली गिद्धों ने जबरन
बंद कराये थे
जो चार सौ स्कूल
उनकी नई चाभी खोजनी है तुम्हें
क्योंकि ये फ़क़त स्कूल नही
ये रोशनी की वे मीनारें है
जिस पर चढ़ना है
तुम्हारी नन्हीं सहेलियों को
जहाँ से नीचे झांकने पर
दुनिया के तमाम बदनुमा धब्बे
और ज्यादा साफ दिखायी देने लगते हैं
और उनसे लड़ना
ज्यादा आसान हो जाता है

सुनो, मलाला,
तुम भारत की नन्हीं
सावित्रीबाई फुले हो
वह भी चौदह साल की उम्र में
निकल पड़ी थी
दबी कुचली औरतों के लिए
उन स्कूलों के ताले खोलने
जिन्हें जड़ रखा था
धर्म, जाति की सत्ता में चूर
सिरफिरों ने

सुनो मलाला, सुनो सावित्री!
कितने नीचे गिर गए है
वो लोग
जो स्कूल जाती लड़कियों के
सिरों पर गोली मारकर
उन्हें हमेशा के लिए
फना करना चाहते हैं
कितने क्रूर हैं वो लोग
जो आगे बढ़ती स्त्री को
गोबर पत्थर लाठी डंडे
कोडों से मार रहे हैं

पर सुनो गिद्धों!
तुम्हारे कहर के बावजूद चिड़िया
जरूर उड़ेगी
और हर बार उसकी उड़ान
पहली उड़ान से ऊंची होगी…

बिटिया मलाला के लिए-4 

ओ मलाला,
क्या तुम जानती थी …
हमको इल्म महज इल्म
की तरह सीखना होता है
बस एक छोटे दायरे को छूना होता है
कैसे हंसे कैसे संवरे
कैसे परिवार की बेल को बढायें
कैसे आने वाले मौसम को
खुशगवार बनायें

पर मलाला,
तुम सच में बहुत समझदार निकली..
तुम तो सच में ही
इल्म को इल्म की तरह
पढ़ने लगीं
और उस पर कुफ्र ये किया कि
दूसरी अपनी जैसियों को
इल्म बाँटने चली
ओ शाबाश बच्ची मलाला…
तुमने अच्छा किया

देखो, अब जो चली हो
चलती जाना
बिल्कुल नहीं रुकना
पीछे देखो
कितनी चिंगारियाँ
भभककर जल उठने को तैयार हैं…

कितनी अजीब बात है

कितनी अजीब बात है
जब हम सोचने लगते हैं
सिद्धान्त केवल कहने की बात हैं
चलने की नही

हम सत्य न्याय समता
लिख देना चाहते है किताबों में
होता है वह हमारे
भाषण का प्रिय विषय
पर उसे नही अपनाना
चाहते जीवन में

हम बार-बार क़सम
खाते है अपने आदर्शों की
देते है दुहाई उनकी
भीड़ देख जोश
उमड़ आता है हमारा
जय भीम के नारों से
आँख भर आती है हमारी
गला अवरुद्ध हो जाता है
फफक कर रो उठते है हम

दुख तकलीफ उसकी याद कर
जो झेली थी भीम ने उस समय
पर हम आँख मींच लेते
उससे
जो अन्याय हमारी आँखों
नीचे घट रहा है

बाबा, तुम रो रहे हो

बाबा ! तुम रो रहे हो
राजनीति की कुचालों में
तुम्हारी दलित जनता
धक्के खाकर कुचली
भीड़-सी चीत्कार रही है

तुम सोच में हो
कुचली भीड़-सी जनता
अपना आकार ले रही है
उसके सोए भाव जाग रहे है
वह संगठित हो रही है

तुम हँस रहे हो
दबी-कुचली जनता
मिट्टी से उठना सीख गई है
फूल खिल रहे है चारों ओर
उठो ! यह भोर का आगाज़ है
हाँ, तुम हंस रहे हो, बाबा !

मछुआरा

मछुआरा खड़ा है हाथ में कांटा लिए
मिस वर्ल्ड मिसेस वर्ल्ड
और ना जाने
किस-किस साबुन तेल, बाईक के नाम पर
मछलियां फंसायेगा
फिर उन मछलियों को कीमती सोने-चांदी के तारों में मढ़
एक्वेरियम में सजायेगा
लगेगी उन पर संख्याओं की बोली
ये सांचों में ढली
नखरों में पली सौम्य सभ्यता की पुतली
अर्द्धनग्न पर खूबसूरती के मानदण्डों पर खरी
ये रंगबिरंगी बेजोड़ खूबसूरत मछलियां
ग्लैमरी सडांध के एक्वेरियम में
इत्मीनान से बैठ अपने सुन्दर पंख फड़कायेंगी
काली भूरी सुनहरी आंखों से
कैट-वाक करती हुई
एक्वेरियम की दुनिया में खो जायेंगी
पर मछुआरे को शौक है
विभिन्न साईज रंग-रूप वाली मछलियां पालने का
वह कुछ दिन बाद जब इनसे उकता जाएगा
तब इन पुराने घिसे-पिटे
रीति-रिवाजों-सी मछलियों को फेंक
नई हाई-फाई गले में बाहें डाले
बिकनी में कूल्हे मटकाने वाले
नयी ताज़ी फ्री मछलियां ले जायेगा
तब पुरानी मछलियां
रोयेंगी गिड़गिड़ायेंगी
प्रेस कांफ्रेंस में एक स्वर में चिल्लायेंगी
हमारा यौन-शोषण हुआ है
हम दर्ज करते हैं आज अपना बयान
हमें चाहिए न्याय…
तब अखबारों में हर पेज पर होगा
मछलियां-मछलियां और मछलियां
अर्धनग्न-हंसती-फ्लाइंग किस करतीं
और तब मछलियां बन जाएंगी
भारतीय नारी की प्रतीक
और तब ये भारतीय मछलियां
चली जाएंगी एक-एक कर घरों में
जहां ये रखेंगी करवाचौथ
मनाएंगी एकादशी और
धारण करेंगी लम्बे-लम्बे मंगलसूत्र…
बस एक मछुआरे के लिए!

साँपों के बीच 

साँप फिर जंगल छोड़
शहर में आ चुके हैं
विभिन्न रूपों में
बस गये है यहाँ-वहाँ
जिस-तिसके अंदर

अवसरवाद की बारिश में
बिना रीढ की हड्डी वाले
यह दोमुँही जीप लपलपाते
घूम रहे है

कह रहे है हमें
हम तटस्थ है
और और बढकर कह रहे है
हम हर जगह हर अवसर पर
तटस्थ हैं
क्योंकि उन्हें चलना है दोनों ओर
साधनी है
ज्यादा से ज्यादा जमीन
जिसमे भरा जा सके
ज्यादा से ज्यादा लिजलिजापन

खामोश,
साँपों की अदालत जारी है
करने वाले है वे फैसला
सुना रहे हैं फतवा
ऐसे हँसो, ऐसे बोलो
जैसा कहे वैसा कहो
होनी चाहिए सबमें एकरूपता
मतैक्य
सांचे में ढली
मौन मूर्तियों की तरह
कि जब चाहे उन्हे तोड़ा जा सके
नफ़रत है उन्हे भिन्नता से
नफरत है उन्हें असहमति से

एक-एक का स्वर कुचलेंगे वे
जो उन्हे बताएगा
उनकी टेढ़ी फुसफुसी
लपलपाती जीभ का राज़।

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