अनिल कुमार मिश्र की रचनाएँ

वह भी तो इक बेटी ही है

जेठ माह की,
जैसे बदली,
वह भी तो इक बेटी ही है।

उँगली पकड़-पकड़ कर बढ़ना,
चलना यहाँ सिखाया जिसको,
दो पाए से चौपाया बन,
अपनी पीठ बिठाया जिसको,

आड़े-तिरछे झुक जाने पर,
टिक-टिक करते रुक जाने पर,

बाल खींच कर,
जो है झगड़ी,
वह भी तो इक बेटी ही है।
जेठ माह की,
जैसे बदली,
वह भी तो इक बेटी ही है।

आह्लादित हो अस्पताल में,
जिसने अपना कटा कलेजा,
उनकी जान बचाने खातिर,
पापा के सीने में भेजा,

सारी दुनियाँ से यह कह कर,
बची पिता की छाया सर पर,

गले लगी,
मुस्काई पगली,
वह भी तो इक बेटी ही है।
जेठ माह की,
जैसे बदली,
वह भी तो इक बेटी ही है।

मरघट सा घर बना दिया जो,
झुके शीश, पनियाईं आँखें,
उड़ती जैसे चिता भस्म सी,
जलते अरमानों की राखें,

कहने को कोई कुछ कह ले,
गढ़ने को कोई कुछ गढ़ ले,

सरे बजार,
उछाली पगड़ी,
वह भी तो इक बेटी ही है।
जेठ माह की,
जैसे बदली,
वह भी तो इक बेटी ही है।

सरस्वती वंदना (घनाक्षरी) 

श्वेत वस्त्र धारिणी हे शुभ्र हंस वाहिनी माँ,
वीणापाणि आ के आप उर में विराजिये।
सा रे ग म प ध नि सा, सा नि ध प म ग रे सा,
सप्त स्वर सप्त चक्र पे ही आ के साधिये।
षट् दोष दूर कर शुद्ध कीजिए ह्रदय,
सत्य शिव सुन्दर का मूल साज साजिए।
अनहद नाद के आरोह-अवरोह में ही,
मन रहे मुग्ध मातु इस भाँति बाँधिए।

मिसिरा जी!

बदल दो हो सके तो राजसी अंदाज मिसिरा जी
नहीं है कुछ धरा इसमें उतारो ताज मिसिरा जी

कि बहुतों को सुनाया और बहुतों को सुना तुमने
मगर खुद की कभीं क्या सुन सके आवाज मिसिरा जी

करोगे क्या जरा सोचो, कहोगे क्या जरा सोचो
दगा दे दे अभी यदि जिन्दगी का साज मिसिरा जी

बहुत भारी नहीं लगता कि इनका बोझ कन्धों पर
उतारो अब लबादों को कि जिन पर नाज मिसिरा जी

नहीं कुछ चाहिए जिसको वही है शाह शाहों का
फकीरों साथ बैठो और जानों राज मिसिरा जी

फिर से हम इतिहास लिखें 

भारत माँ का देशवासियों !
फिर से हम इतिहास लिखे।
अपना गौरव याद करें औ’,
संस्कृति की हर साँस लिखें।।

मुग़लों ने, अंग्रेजों ने जो,
छिन्न-भिन्न कर डाला है।
और उन्ही के भक्तों ने,
जो फेरी उनकी माला है।।

काटें उनके शब्द-जाल को
आओ अब कुछ ख़ास लिखे।
भारत माँ का देशवासियों !
फिर से हम इतिहास लिखें।।

विश्व वन्दिता भारत माता,
विश्व गुरू इसके सपूत थे।
किनने इसका शीश झुकाया,
कौन–कौन कायर-कपूत थे?

छद्म नायकों के पन्नों पर ,
उनका कुछ उपहास लिखे।
भारत माँ का देशवासियों !
फिर से हम इतिहास लिखें।।

उस नरेंद्र को याद करें हम,
जो विवेक बन जाता है।
हिन्दू धर्म और दर्शन को,
दुनिया को समझाता है।

राम-कृष्ण को समझे फिर से,
शंकर का संन्यास लिखे।
भारत माँ का देशवासियों !
फिर से हम इतिहास लिखें।।

अष्ट-अंग का योग दिया है,
पूण्यभूमि यह षट-दर्शन की।
सभी सुखी हों, सभी निरोगी,
जड़-चेतन में हरि चिंतन की।

उपनिषदों के अन्दर झांकें
वेदों का फिर भास् लिखे।
भारत माँ का देशवासियों !
फिर से हम इतिहास लिखें।।

ब्रह्मदंड की महिमा न्यारी,
कामधेनु साकार जहाँ पर।
चक्रसुदर्शन, ब्रह्म-अस्त्र के,
जैसे थे हथियार जहाँ पर।

गौरी-शंकर को पहचानें,
फिर श्रद्धा-विश्वास लिखें।
भारत माँ का देशवासियों!
फिर से हम इतिहास लिखें।।

चरण पड़ो चाणक्य खड़े हैं,
अर्थशास्त्र समझाने वाले।
नल अरु नील तिरा पत्थर को,
सागर सेतु बनाने वाले।

आर्यभट्ट का अब तो आओ,
अर्थ शून्य के पास लिखें।
भारत माँ का देशवासियों !
फिर से हम इतिहास लिखें।।

भारत माँ आज़ाद हुई है,
बलिदानों से जिनके जानें।
अब भी सरहद पर रातों-दिन,
खड़े हैं जो भी सीना ताने।

नमन करें गिन-गिन के उनको,
कुछ उन पर सायास लिखें।
भारत माँ का देशवासियों !
फिर से हम इतिहास लिखें।।

आईना हूँ

जो भी मेरे पास आता
मैं नहीं कुछ बोलता पर
उसकी आँखों से ही उसको
चेहरा उसका दिखाता |

जानता हूँ
मैं हक़ीक़त हर किसी की |

कौन असली, कौन नक़ली
कौन अपने चेहरे पर
किस तरह से और कितना
रंग दूजा है लगाए ?
कौन अपनी कालिमा को
किस तरह से और कब से
है मुखौटों में छिपाए ?

पर नहीं मैं बोल सकता
राज़ उनके खोल सकता
बेजुबां हूँ |

जानते हैं वे भी
वाणीहीन हूँ मैं, दीन हूँ मैं |

इसलिए ही
रोज मेरे पास आते
गुनगुनाते
बेहयाई से
वे मेरी आँख से आँखें मिलाते,
मुस्कुराते |

और मैं लाचार
रोके आँसुओं की धार
उनको देखता
चेहरे बदलते खेलते |

उस तरह से
जिस तरह से देखती है
शील खंडित एक क्वाँरी
बरी होता बलात्कारी |

न्याय के आँगन खड़ी हो
छटपटाती है वह उतनी
छटपटाई थी न जितनी
यह व्यवस्था है हमारी |

न्याय की देवी करे क्या ?
आँख पर पट्टी चढ़ाए
स्वयं की जंज़ीर से
जकड़ी हुई बेबस बेचारी
बन चुकी है गांधारी |

और वाणी पास जिसके
दृष्टि उसको दी नहीं
लगता विधाता
क्योंकि वह धृतराष्ट्र जैसा
कुछ नहीं है देख पाता |
कुछ नहीं है देख पाता ||

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