अनिल गंगल की रचनाएँ

पोस्टमैन

एक दिन हो जाएंगे हम
दरवाज़े पर तुम्हारी दस्तक से महरूम ।

अनन्त में नहीं गूंजती होगी तुम्हारी पुकार
खिड़की पर बैठ कोई नहीं कर रहा होगा इंतज़ार
तुम्हारी वर्दी के ज़ुहूर का
तुम्हारी पदचापों को पहचानने के अभ्यस्त हमारे कान
इस शिनाख्त का कत्ल कर चुके होंगे ।

टुटही साइकिल की चेन की करड़-करड़ न होगी
सोलह-सोलह किलोमीटर की दूरी को हर राज़े
साइकिल पर नापने वाला अंफसुर्दा चेहरा
गायब हो जाएगा दृश्य से।

नहीं बचेगी हमारे जीवन में
तुम्हारी इतनी-सी भी ज़रूरत
जब लिखने और पढ़ने से ज़रूरी
सुनना और देखना लगेगा।
जिस जीवन-रस में सिक्त होकर
आती थी कोई चिट्ठी हमारी दहलीज़ पर
चौतरफ पसरी बेहिसी और बेनियाज़ी के आलम में
सहरा की रेत की मानिन्द
वह सूख चुका होगा।

तुम्हारी पुकार और कदमों की आहट के पार
नहीं बचेंगे इश्क और उल्फत
नहीं बचेगा चंद अल्फाज को कलमबंद करने का सब्र
तकिये के नीचे चिट्ठी को रख सोने की मुरब्बत
और एक अदद खत में अपना जिगर उड़ेलने की ज़हमत
नहीं बचेगी।

बेइंतिहा तरंगों के सैलाब में भी नहीं घुटती होगी हमारी सांस
इतने तारों और बेतारों की बेड़ियों में कसी होगी हमारी रूह
फिर भी कर रहे होंगे हम मुक्ति और मोक्ष का तस्सवुर
सट्टा बाज़ार में नथुने फुलाए डकराता
इतनी तेज़ी से दौड़ता होगा सांड
कि इस्तंकबाल के लिए दरवाजा खोलने
और लू से थके-हारे शख्स से
दो घूंट पानी के लिए पूछने की भी फुर्सत न होगी।

चीज़े ही चीज़े होंगी अपार
जिनके बोझ तले दबे हुए हम हाँफ रहे होंगे
फिर भी और ज़ियाद चीजों को पाने की ख्वाहिश
कम न होगी
एक दुनियावी गांव के अगरचे हम बाशिंदे होंगे
तिस पर भी नहीं पहचानते होंगे हम पड़ौसी को उसके नाम से
रिश्ते होंगे मो के दोनों तरंफ
मगर वे सिंर्फ दुकानदार और खरीदार की शक्ल में होंगे ।

यह वह वक्त होगा
जब एक लुप्त होती प्रजाति की भांति
तुम्हें भी जाना ही होगा धरती की कक्षा से बाहर
कहकशाँ में गायब हो जाने के लिए ।

करवा-चौथ का व्रत रखती एक औरत

अहंकार से तनी रीढ़ का सामना करती
एक मार खाई औरत रखती है करवा-चौथ का व्रत
लाल आँखों और तनी हुई मूछों के अन्धकार में
एक गाली खाती औरत करती है करवा….
कहीं किसी भी खली जगह में जैसे-तैसे अंटती
अपनी सही-सही जगह न खोज पाई एक अपमानित औरत
रखती है करवा…

जोड़-जोड़ टूटती पोर-पोर थकी
जनम-जनम से भूखी रही आई एक औरत
तीन वक्त के खाने से अघाए एक भरे पेट वाले पुरुष के लिए
रखती है व्रत…

व्रत करती औरत
निर्जला रह चाँद के दिखने की प्रतीक्षा करती है

दुर्दिनों से गुजरती औरत विश्वाश करती है
कि विश्वाश के सहारे फतह किये जा सकते हैं किले
और तीनों भुवन
हांफती-कराहती औरत करती है विश्वाश
कि सिर्फ वही है जिसके व्रत से नहीं मंडरायेंगी दुरात्मएं
उसके सुहाग के आस-पास भी
व्रत रखती एक औरत यम के हाथों से
एक पुरुष को छुड़ा लाने का रचती है मिथक
और खुद एक गाथा में बदल जाती है।

सारा-सारा दिन निर्जला रहने के बावजूद
सुर्खरू आँखों की ललामी नहीं होती कम
तनी हुई मूछों का कसाव जरा भी नहीं पड़ता ढीला
सदियों से अकड़ आई रीढ़ झुकाती नहीं जरा भी
सहस्त्र पीढ़ियों के अपमान के ठूंठ से
उगती नहीं एक भी हरी कोंपल

सिर्फ उस रात ही नहीं
ताउम्र दिखता नहीं औरत को चाँद

प्रहसन 

इतिहास पटल पर दमक रहे हैं
एक के बाद एक सैकड़ों प्रहसन
जिनके दरम्यान
ऊटपटाँग हास्य चल रहा है विमर्श के रँग में

उन्हें देखते-सुनते ग़ायब हो गई है
हँसने और रोने के बीच की विभाजक रेखा

एक विदूषक छड़ी के सिरे पर
अपनी टोपी नचा रहा है
एक और विदूषक चल रहा है हाथों के बल
एक विदूषक रो रहा है आँखों से गँगा-जमुना बहाते हुए

एक विदूषक दूसरे विदूषक से लगातार मार खा रहा है
एक विदूषक दूसरे विदूषक को लगातार शब्दों से पीट रहा है

नेपथ्य में गूँज रही एक नक़ली रिकॉर्ड की गई हँसी
जिसे सुन कर लोग मुँह में उंगली डाल
खिलखिलाने की मुद्रा में हैं
भूलते हुए
कि हर प्रहसन के पीछे छिपी हैं न जाने कितनी शोकाँतिकाएँ
एक विशालकाय मशीन के कलपुर्ज़ों की खड़खड़ाहट
सुनाई देती है उनकी हँसी में।

हक़ 

मुझे हक़ दो कि अपने हक़ माँग सकूँ
मुझे मेरे हक़ चाहिए

मुझे अपने और सिर्फ़ अपने हक़ चाहिए
इतने बरस सोता रहा मैं कुम्भकर्णी नींद
उम्र के इतने बरस मैं भूला रहा अपने हक़
अब जागा हूँ
तो मुझे मेरे हक़ चाहिए

आपने मुझे गालियाँ दीं
मैं सोता रहा
आपने मुझे ठोकरें मारीं
मैं चुप रहा
आपने मुझे बेघर किया
मैं कुछ नहीं बोला
आपने मेरी लँगोटी छीन कर मुझे नँगा कर दिया
मैं और गाढ़ी नींद की सुरँग में गुम हो गया

अच्छा किया
जो आपने मुझे दशाश्वमेध की दिशा में ले जाने वाली
युगों लम्बी नींद से जगा दिया

अब पूरी तरह जाग चुका हूँ मैं
और माँगता हूँ आपसे अपने हक़

मगर मैं नहीं चाहता
कि मेरे पड़ोसी को भी उसका हक़ मिले
मैं नहीं चाहता
कि मेरी देखादेखी पड़ोसी भी हक़ के मामले में ख़ुदमुख़्तार हो
किसी भी हक़ से नहीं बनता पड़ोसी का कोई हक़
कि वह भी अपने हक़ की माँग करे
दावे से कह सकता हूँ मैं
कि मेरा लोकतन्त्र सिर्फ़ मेरे लिए है
जिसमें पड़ोसी की हक़ की माँग एकदम नाजायज़ है

आसाराम, राम-रहीम, फलाहारी
आप जिसकी चाहें उसकी क़सम मुझसे ले लें
कि सिर्फ़ मेरा अपने हक़ की माँग करना ही
इस नाजायज़ दुनिया में जायज़ है

भले ही पड़ोसी का हक़ न आता हो मेरे हक़ के रास्ते में
फिर भी यही सही है
कि मैं पूरी शिद्दत के साथ पड़ोसी का विरोध करूँ

वैसे पड़ोसी से मेरा कोई ज़ाती बैर नहीं
मगर विरोध के लिए विरोध करना तो
मुझे मिले लोकतन्त्र का तक़ाज़ा है

गँगापुत्र की तरह दोनों हाथ आकाश की ओर उठा कर
ऐलान करता हूँ मैं —
अपने लिए हक़ को छीन लेना
मगर दूसरों के द्वारा उसी हक़ की माँग पर अँगूठा दिखा देना ही
सच्चा लोकतन्त्र है।

मेरे जाने के बाद

जब मैं पंचमहाभूतों के रूप में नहीं रहूँगा
तब सम्भव है
कि तुम्हारे आसपास मैं एक अदृश्य उपस्थिति के रूप में रहूँ

एक जर्जर फ्रेम के बीच झाँकता होगा मेरा प्रसन्नमुख चेहरा
हालाँकि सूख कर झरने लगे बासी फूलों की माला के बीच मैं
दसों दिशाओं में चल रहे खण्ड खण्ड पाखण्ड पर्वों’ का
मूक साक्षी रहूँगा

यही होगा कि मेरे जाने के बाद
मेरे मौन को ही आसपास घट रहे अपराधों के प्रति
मेरी मूक सहमति मान लिया जाएगा

जो भी सिर झुके होंगे श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए
सम्भव है कि वे मेरे सम्मान में नहीं
किसी अज्ञात भय से झुके हों
सम्भव है कि नतमस्तक कन्धों में सिर्फ़ एक ही कन्धा हो
मेरे आगे झुका हुआ
जिन्हें थपथपा सकती हों सान्त्वना में
तस्वीर के फ्रेम से बाहर निकली मेरी मृत हथेलियाँ

दुनिया से जाने के बाद हो सकता है
पल भर के लिए रुक जाए मेरे वक़्त की घड़ी
मगर तय है यह
कि बदस्तूर ज़ारी रहेगी तमाम यह भागमभाग और आपाधापी

इस बीच हो सकता है
कि ख़ूनख़राबे में आपादमस्तक डूबे ख़ूनालूदा चेहरों को दी जाए
हमारे वक़्त की सबसे महान ईजाद की संज्ञा
सम्भव है कि ग़ायब हो जाएँ सौन्दर्यशास्त्र के पन्नों से
सौन्दर्य की सभी सुपरिचित परिभाषाएँ

जहाँ-जहाँ धोंकनी की तरह धड़कता था मेरा हृदय
मेरी साँसों की गर्माहट से भरे रहते थे घर के जो-जो कोने
जानता हूँ कि मेरे जाने के बाद
वहाँ-वहाँ चिन दिए जाएँगे भाँति-भाँति के कबाड़ के अटम्बर

फिर-फिर जाना चाहूँगा इस जीवन की चारदीवारी के बाहर
जब दीवार पर सूख चुके फूलों से ढँकी मेरी तस्वीर
घर के सौन्दर्य पर कुरूप धब्बे की तरह लगेगी
और लोहे, प्लास्टिक और पुराने पड़ चुके अख़बारों की मानिन्द
कबाड़ में फेंक दी जाएगी.
______

(’स्मृतिशेष कवि मणि मधुकर की एक लंबी कविता का शीर्षक)

विमर्श 

तय तो यही हुआ था
कि लोकतन्त्र में किसी भी विवादित मुद्दे का समाधान
आरोप-प्रत्यारोप से नहीं
सिर्फ़ विमर्श से ही होगा
चीख़-चीख़ कर कहता था यही
इस गणतन्त्र का संविधान
जिसका अर्थ शायद यह होता था
कि विमर्श होगा
मगर सीखनी होगी कही गई हर बात पर
सिर हिलाने कि कला
जिसमें असहमति की कोई गुंजाईश नहीं होगी
बोले गए हर सफ़ेद झूठ पर कहना होगा —
हाँ हाँ हाँ हाँ
विमर्श के लिए
बिछाए जाएँगे आपके वास्ते लाल गलीचे
विमर्श के दौर जब आप हमारे मुँह पर
हमें ही दे रहे होंगे चुन-चुन कर गालियाँ
तो हम कहेंगे —
यही तो है इस लोकतन्त्र की दुर्लभ उदात्तता
जिसमें सामर्थ्य है पचाने की हर क़िस्म की आलोचना
मगर चूँकि फ़िलहाल सत्ता में हम हैं
इसलिए सिर्फ़ और सिर्फ़ हम ही जानते हैं
संविधान में दिए गए अनुच्छेदों के सही-सही मानी
आओ,
विमर्श आरम्भ होने से पहले करते हैं एक समझौता
विमर्श के बहाने से
हम दोनों ही मिल कर बिखेर दें उसके एक-एक वर्क़ को
चींथ कर हवा में
करते हुए संविधान को मटियामेट
विमर्श के अन्त में ज़ारी करनी होगी सिर्फ़ एक विज्ञप्ति —
‘बेहद सफल रहा विमर्श’
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अन्ततः 

कवि ने चाहा
वह लिखे कविता पेड़ के बारे में
कवि पेड़ बन गया
पेड़ बन कर कवि नहीं रह सकता था उन्मुक्त
सबसे पहले पहुँचा अपनी जड़ों में
जड़ों की शाखाओं में विभाजित होते हुए पहुँच गया
पृथ्वी के अन्धकार और अन्तःसलिला के मूल में
जल के साथ दौड़ता जड़ों की दुनिया से निकल कर
आ पहुँचा अन्ततः तने में शाखाओं में टहनियों में
पत्तों फूलों फलों में
बादल के बारे में कविता लिखने के लिए
कवि का बादल होना ज़रूरी था
और बादल होते हुए
वह नहीं रह सकता था जल बने बिना
आसमान को देख कवि ललचाया
कि वह लिखे कविता आसमान के बारे में
वह चिड़िया बन गया
चिड़िया के पंखों की ताक़त से
कवि ने जाना आसमान
अब वह चिड़िया नहीं खुला आसमान था
इन सब पर लिखने से क्या होगा कविता
पेड़ हो या बादल
चिड़िया हो या आसमान
कवि ने सोचा
कि वह लिखे कविता इनके उत्स के बारे में
इसलिए लाना होगा ईश्वर को कविता के केन्द्र में
ईश्वर था चालाक
कि वह मनुष्य की बुद्धि से खेलता था
जहाँ वह होता था अनुपस्थित वहाँ दीखता था
कई बार अपनी उपस्थिति के बावजूद
पकड़ में नहीं आता था
कवि को नहीं भाया जब विवादग्रस्त ईश्वर का यह खेल
कविता में होते हुए भी जब कवि
ईश्वर से नहीं मिल पाया
तो अन्त में सोचा कवि ने
कि लिखी जाए कविता अब मनुष्य के बारे में।

तर्क

तर्क से सिद्ध किया जा सकता है
रात को दिन
दो और दो का जोड़ पाँच
और एक और एक ग्यारह

दुःख को सुख में
होने को न होने में
फ़ैशन को ज़रुरत में
धारणा को यथार्थ में

काले को सफ़ेद में
बला को हूर में
भय को अनुशासन में
तानाशाही को लोकतन्त्र में

तर्क से दरिद्र धरती को
सिद्ध किया जा सकता है शस्य श्यामला
पोखर को महासागर
और अपराधी को क़ाज़ी

एक ही क्षण में
बदला जा सकता है तर्क से
बेहद बुरे दिनों को अच्छे दिनों में।

कुएँ

सदियों से
हाथों, बाल्टियों और घिरनी के घूमने के साथ
छलछलाते रहे हम जीवन से भरपूर
कितनी बार हमारे आकाश में सुनाई दिए मंगलगीत
हमारे जल में सिरजे गए कितनी ही बार
कुआँ पूजन करती स्त्रियों के स्वस्तिक
रखे गए हमारी मुण्डेरों पर सद्यप्रसूता स्त्रियों के
सर पर रखे गए मंगल-कलश
कुएँ नहीं
बार-बार वंशबीज धारण करती सुहागन स्त्रियों के
उर्वर गर्भ हैं हम
न जाने कितनी-कितनी दिशाओं से
आए कितने ही थके-हारे भूले-भटके राहगीर
हमारी जगत पर दो घड़ी बैठ उतारी उन्होंने राह की धूल
पिया हमारे गर्भ में संचित सप्तसिन्धुओं का जल
हमारे जल में घुला है
उनकी तृप्त आत्माओं के असंख्य आशीर्वादों का अमृत
समुद्रों झीलों नदियों नहरों के साथ
धरती से जुड़ी थी हमारी भी नाल
धरती को खोद पानी निकाल सकने वाले हाथों के पुरुषार्थ से
हम प्रकट हुए दृश्य में
धरती पर भूख-प्यास की उम्र जितनी ही है
हमारी भी उम्र
द्वापर में ब्रह्मास्त्र के प्रहार से
जब सूख चले थे जल के सारे स्रोत
तब भी हरे रहे आए हम
आने वाले वक़्त के लिए बाँझ नहीं हुई एकदम
हमारी कोख़
यूँ नहीं रहा चलन अब
हाथोंहाथ ताज़ा और ठण्डा पानी निकालने और पीने का
तो भी पाइपलाइनों में दौड़ते बासी पानी के युग में
जमे हैं हम अभी भी धरती की छाती पर
गाँव के भूले-बिसरे बुज़ुर्गों की तरह
हमारी गहराई में छिपी हुई है
उत्सव और उल्लास की गूँज
हमारी दीवारों से टकरा कर मुखर होती हैं
कुँआरी माँओं और हताश मृतात्माओं की चीख़ें।

भाषा

जिनके लिए दुनिया के क्रिया-व्यापार
सिर्फ़ भाषा थे
और तमाम विचार, दर्शन और सिद्धान्त
भाषा की विविध भंगिमाओं के सिवा कुछ न थे

अन्ततः भाषा सुविधा ही साबित हुई उनके लिए
आपदा के वक़्त
वही पाए गए भाषा के बंकरों में छिपे
भाषा को ओढ़ते-बिछाते
शब्दकोशों और भाषाविज्ञान को उलटते-पलटते

भारी-भरकम शब्दों से सज्जित भाषा के आयुधों से ज़ख़्मी करते
पंक्ति में आगे खड़े लोगों को धकिया कर
वही ले भागे अन्ततः लखटकिया पुरस्कार
वही दिखाई दिए भीतरघात करते
दुश्मन के साथ गलबहियाँ डाले।

लड़कियाँ

लोग उन्हें समझते रहे लड़कियाँ
जबकि वे थार में दमकती मरीचिका थीं
दरअसल वे फूल थीं
और फूल भी कहाँ
उन्हें फूल समझना भी ख़ुद को धोखे में रखना था
दरअसल वे पँखुरियाँ थीं बिखरी हुई
वनस्पतिशास्त्रियों के विश्लेषण का शिकार बनतीं
फिर पँखुरियाँ भी होतीं तो ग़नीमत थी
वे तो पत्तियाँ थीं हरियाती हुई
क्लोरोफिल, धूप और पानी से भोजन बनाती हुई
पत्तियों का जन्म अकारथ था
वे तो खिलखिलाते रंग होना चाहती थीं
झिलमिलाना चाहती थीं वे
उल्लासमय प्रसन्न रंगों में खिलते
एक रंग से दूसरे रंग के तिलिस्म में ग़ायब होते हुए
दरअसल सारा कुछ आँखों का धोखा था
लड़कियाँ खुद भी तो एक धोखा थीं।

१४ अक्टूबर २०००

एक आत्ममुग्ध व्यक्ति की कविता

वह नाच रहा है पंख फैलाए मुण्डेर पर
वह निरख रहा है सारंग-नील पंखों और
पूँछ पर बने चन्दोवों की छटा
वह देख रहा है भौहें तिरछी कर सर पर तनी कलगी
बादलों की ओर मुँह कर
वह लगा रहा है सुमधुर कण्ठ से बरखा की गुहार
वह देख रहा है अपनी आँखों की चमक को
किसी दूसरे की निगाहों से
और डूब रहा है उनकी अथाह गहराई में आकण्ठ
टूटी मुण्डेर पर बैठा वह
गर्दन उचका-उचका कर देख रहा है सर्वत्र
कौन छू सका इतनी ऊँचाई आज तक उसके सिवा
उसके क़द के आगे बौने दिखाई देते हैं यहाँ सारे क़द्दावर
कहाँ है ऐसी सुन्दरता तीनों भुवन में
आत्मरति में डूबा अपनी सुन्दरता के सम्मोहन में
रहता है वह हरदम मूर्छित
नहीं जाता उसका ध्यान एक बार भी
अपने भद्दे बदसूरत पंजों की ओर
जिनसे थामे हुए है फ़िलहाल वह
टूटी भरभराती मुण्डेर।

दस्तक 

वह आ रहा है

जब सुनाई देने लगी थी दूर से उसकी पदचापों की आहट
तुम निश्चिन्त थे कि यह महज़ एक अफ़वाह है
और अफ़वाहों के न सिर होता है, न पाँव
इसलिए नहीं किया जाना चाहिए उसके आने पर यक़ीन

जब पहली-पहली बार दिखाई दिया था
उपजाऊ ज़मीन पर पड़ा उसका बीज
तुमने देखते हुए भी किया उसे अनदेखा

‘इतने से तो हो तुम, एक बिन्दी से भी छोटे
चाहो, तो भी क्या बिगाड़ लोगे तुम मेरा’—
उपेक्षा से कहा था तुमने

एक दिन उसकी ओर संकेत कर
किया गया था तुम्हें सावधान
कि देखो
जिसे तुम समझते आए अभी तक नाचीज़ —
फूट आया है अब वह अँखुआ बन धरती से बाहर

सावधान करने वाली उँगली को तुमने कहा था
किसी सिरफ़िरे की उँगली

तुमने कहा था —
यहाँ की मिट्टी नहीं है इटली, जर्मनी, जापान या स्पेन की
मिट्टी की तरह मुफ़ीद
इस तरह के किसी भी ज़हरीले अँखुए के फूटने के लिए

मगर दूसरी तरफ़ तुम सींचते रहे अँखुए को
क़िस्म-क़िस्म के खाद-पानी से
तुम्हें लगता था
कि एक दिन अँखुआ जब वृक्ष बन जाएगा
तो इन्द्रधनुषी फूलों और मीठे फलों की शक़्ल में
दमकेंगे उस पर वसन्त के वस्त्र

अब अँखुआ नहीं रहा अँखुआ
रंगबिरंगी झण्डियों, टोपियों और अंगवस्त्रमों के बीच
वह बदलता जा रहा है कँटीले वृक्ष में
जिससे झड़ने लगे हैं यहाँ-वहाँ ज़हरबुझे फल

नहीं बची उसके आने की अब सिर्फ़ आहट भर
वह आ चुका है आपके चौमहलों की दहलीज़ पर
दरवाज़े पर सुनाई देने लगी है साफ़-साफ़ उसकी दस्तक
जिसे सुनने के लिए तुम्हारे कान अभी तक तैयार नहीं।

आपके प्रेम से अलग 

आपके प्रेम से अलग
मुझे चाहिए ढेर सारा प्यार
नहीं चाहिए मुझे
एक औरत द्वारा पुरुष को दिया गया माँसल स्पर्श
नहीं चाहिए मुझे
उर्वशियों और मेनकाओं के रिझाने वाले हाव-भाव
मुझे चाहिए प्यार
साथ-साथ गिट्टियाँ तोड़ते
साथ-साथ स्वप्न रचते
साथ-साथ ज़िन्दगी का सुन्दरतम चित्र खींचते
एक-दूसरे को दिया गया समूचा और अटूट प्यार
मुझे चाहिए
माँ की छाती में हुमकते दूध जितना प्यार
नाक सुड़कते नंग-धड़ंग धूल में सने बच्चे को देख
कालिखपुती औरत की आँखों में उतरा प्यार
मुझे चाहिए घोंसले के लिए तिनके बटोरती
चिड़िया जितना प्यार
गारे के तसले या ईंटें ढोते मज़दूर की
तनी हुई माँसपेशियों जितना प्यार
धूल-मिट्टी में सनी पेशानी से बहते पसीने जितना प्यार
थक कर चूर हाथों में थमी
सूखी रोटी, प्याज़ और मिर्च जितना प्यार
मुझे नहीं चाहिए टूटा हुआ ज़ंग खाया प्यार
मुझे नहीं चाहिए
परकोटों से घिरा सात पहरों में क़ैद रनिवासों का प्यार
मुझे चाहिए एकदम साबुत
सूरज की रोशनी में नहाया हुआ
पतझड़ में झड़े पत्तों से ढका
सावन की फुहारों में भीगता
उपजाऊ मिट्टी में सना खुला स्वच्छन्द प्यार
मुझे चाहिए दुनिया के सारे खेतों में फैली
हरियाली जितना प्यार
मुझे चाहिए दुनिया के तमाम विद्युत् केन्द्रों से
उपजी ऊर्जा जितना प्यार
मुझे चाहिए इतना विशाल और निश्छल प्यार
जितनी पृथ्वी
जितना समुद्र
जितनी भीतर की आग।

ब्लैक-होल

जो दौड़े जा रहे हैं बगटुट किसी अज्ञात अनन्त की ओर
नहीं पढ़ी हो उन्होंने शायद बचपन में
आसमान के धरती पर गिरने की कथा
फिर भी भागे जा रहे हैं वे
पता नहीं किसे पीछे छोड़ते हुए
और किससे आगे निकलने के लिए

क़यास है उनका
कि बस गिरने ही वाला है आसमान उनके सिरों पर

हालाँकि उनके मत से
हो चुका है सृष्टि के कोनों-अन्तरों में पसरे विचारों का अन्त
फिर भी भयभीत हैं वे
कि दिमाग़ की भूलभुलैयों में वयस्क हो रहे
ईर्ष्या, द्वेश ,हिंसा, प्रतिहिंसा और रक्तपात पर
बस गिरने ही वाला है आसमान

डर है उन्हें
कि बचा रहेगा पृथ्वी पर अगर एक भी सकारात्मक विचार
तो कैसे चल पाएगी उनकी अपराधों से अँटी दुकान

उन्हें देख
भागे जा रहे हैं दुनिया की आपाधापी में फँसे जन
अपने घर-मढ़ैयों, ज़मीनों, दुकानों को पीछे छोड़ते
और आख़िर में कहीं अन्तरिक्ष में खोए
किसी सुदूर ग्रह से सुनाई देती एक मासूम पुकार को
आसमान के तले दबी चीख़ के नीचे
दफ़्न होने से बचाने के वास्ते

बहुतेरे अजनबी चेहरे हैं इस भागमभाग में
जो नहीं जानते
कि क्यों दौड़े जा रहे हैं वे दुनिया के निर्वात में निरुद्देश्य
बस, दौड़े जा रहे हैं वे एक ही और अन्तिम लक्ष्य के साथ
कहीं भी न पहुँचने के लिए
ठीक वैसे ही
जैसे इस दौड़ में अपनी धुरी पर घूम रहे हैं धरती और ग्रह-नक्षत्र
ब्लैक-होल की तरफ़ लुढ़कते हुए।

पिता की तस्वीर 

घर के शो-केस में फ़्रेम में जड़ी तस्वीर
पिता की है

तस्वीर में पिता
आशीर्वाद की मुद्रा में मुस्करा रहे हैं
तथास्तु में उठा उनका दायाँ हाथ
परिजनों को आशीर्वाद दे रहा है
कि जैसे ईश्वर ने पूर्ण कीं उनकी तमाम मनोकामनाएँ
और लालसाएँ
वैसे ही हम सब भी हों पूर्णकाम

फ़्रेम से झाँकते हुए
निगाह रखते हैं वह हमारी कारगुज़ारियों पर
महावत के अंकुश की तरह रोकते हैं वह
हमारे पाँवों को डगमगाने और राह भटकने से

इसी तस्वीर में से झाँकता है
वल्कल वस्त्र धारण किए पिता का हमशक़्ल
जो विश्वात्मानन्द या अवधूतानन्द कुछ भी हो सकता है
मगर पिता नहीं

अपनी आख़िरी साँस तक मैं
फ्रेम में जड़ी तस्वीर में
सिर्फ़ और सिर्फ़ गृहस्थी की ज़िम्मेदारियाँ निभाते
बार-बार टूटते और टूट कर फिर-फिर खड़े होते
पिता को देखना चाहता हूँ।

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