अनिल जनविजय की रचनाएँ

आकाश का कायांतरण

आकाश रोगी को
दिखाता है
तरह-तरह के चित्र

कभी वो देखता है जहाज़
कभी रेफ़्रीजीरेटर,
कभी कोई केंचुआ तो
कभी सफ़ेद गाय हिन्दुओं की पवित्र
फिर कोई बेहूदा छड़ी पंख वाली
कोई चमकता हुआ शंख
फिर बाइबिल में लिखे युद्ध
और

आसमान में कविताएँ लिखी होती हैं
कोई नंगी मॉडल खड़ी होती है चित्रकार के सामने
कभी भागते घोड़े
तो कभी ख़ून भरा बलगम
लेकिन वो जिन्हें देखना चाहता है
वो फ़रिश्ते दिखाई नहीं देते।

मैं कमज़ोर हूँ 

मैं कमज़ोर हूँ
मैं लड़ नहीं सकता
ख़ुद जीने के लिए मैं दूसरों को
जाल में नहीं फँसा सकता

मैं कमज़ोर हूँ
लेकिन मुझे इतना नीचे गिरने में
आती है शरम
कि कत्ल करूँ दूसरों का
ख़ुद जीने के लिए

मैं कमज़ोर हूँ
लेकिन मुझे इतना नीचे गिरने में
आती है शरम
कि दूसरों के शब्दों को कह सकूँ
अपने शब्दों की तरह

मैं कमज़ोर हूँ
हमेशा सम्भाल कर रखूंगा अपनी कमज़ोरी ।

रूसी से अनुवाद : अनिल जनविजय

अविचल पेड़ / ज्यून तकामी

बहते समय के पार
समय शाश्वत दिखाई देता है
बहते बादलों के पार
नीला आकाश

बादल चलते रहते हैं
आकाश रहता अचल
हवा चलती रहती है
पेड़ अविचल

रूसी से अनुवाद : अनिल जनविजय

हर टहनी पर एक फूल / ज्यून तकामी

झपकी आ गई
और मैंने देखा एक सपना

हर पेड़ की
हर टहनी पर
खिला हुआ है एक फूल

जैसे खिला हो मन
इस दुनिया में
हर किसी का

जीवन और मौत की सीमारेखा पर / ज्यून तकामी

क्या है वहाँ
जीवन और मौत की सीमारेखा पर ?

युद्ध के दिनों की बात है यह
घने जंगलों से गुज़र कर मैं
पहुँच गया था वहाँ
बर्मा और थाईलैंड की सीमा है जहाँ
वहाँ कुछ भी ऎसा विशेष नहीं था
सीमारेखा का कोई अवशेष नहीं था ।

मैं गुज़रा कई बार
भूमध्य रेखा के पार
देखा नहीं वहाँ भी कोई नया संसार
सिर्फ़ समुद्र था विशाल, गहरा नीला अपार ।

बर्मा और थाइलैंड में थे
सब एक से मनुष्य
वर्षा के बाद आकाश में चमक रहा था इन्द्रधनुष ।

हो सकता है वहाँ भी उस मेखा पर
जीवन और मौत की सीमारेखा पर
इन्द्रधनुष हो कोई चमकीला
सात सौ रंगों वाला
हरा-लाल-नीला-पीला-रंगीला ।

रूसी से अनुवाद : अनिल जनविजय

आर्गन बज रहा है गिरजे में / इवान बूनिन

ऑर्गन बज रहा था गिरजे में
कभी-कभी गुस्सा आता है मन में
तो कभी उफ़नता उल्लास है
पर आज आत्मा उदास है
रो रही है, गा रही है
वह आज बेहद निराश है

वह हतभागी
शोक में कभी गाती है
तो कभी प्रभु से गुहार ये लगाती है-

ओ सुखदाता! ओ दुखदाता!
ओ दीनबंधु!
पृथ्वी के प्राणियों का भला कर
हम दरिद्र हैं, तुच्छ हैं, ग़रीब हैं
ईर्ष्या, द्वेष, डाह, बैर करते हैं सब
मन में तू हमारे नेकी और दया भर

ओ यीशु!
महिमा तेरी अपरम्पार
ओ सलीब पर लटके हुए रवि!
पीड़ा सही तूने अपार
सूली पर झुकी हुई है तेरी छवि
हृदय में हमारे भी छिपे हैं पवित्र-स्वर
सिर्फ़ तुझसे ही है आशा
दे हमारे मन के भावों को तू
पावन और पुनीत
जीवन की भाषा

(1889)
मूल रूसी भाषा से अनुवाद : अनिल जनविजय

शब्द / इवान बूनिन

मौन हैं समाधियाँ और क़ब्रें
चुप हैं शव और अस्थियाँ
सिर्फ़ जीवित हैं शब्द झबरे

अँधेरे में डूबे हैं महीन
यह दुनिया क़ब्रिस्तान है
सिर्फ़ शिलालेख बोलते हैं प्राचीन

शब्द के अलाबा ख़ास
और कोई सम्पदा नहीं है
हमारे पास

इसलिए
सम्भाल कर रखो इन्हें
अपनी पूरी ताक़त भर
इन द्वेषपूर्ण दुःख-भरे दिनों में

देना न इन्हें कहीं तुम फेंक
बोलने की यह ताक़त ही
हमारी अमर उपलब्धि है एक

(07 जनवरी 1915, मस्कवा)

मूल रूसी भाषा से अनुवाद : अनिल जनविजय

जूही / इवान बूनिन

खिली हुई है जूही हरे वन में सुबह-सवेरे
मैं तेरेक नदी पर से गुज़र रहा हूँ
दूर पर्वतों पर चमक रही हैं किरणें
इस रुपहली आभा से मन भर रहा हूँ

शोर मचाती नदी चिंगारियों से रोशन है
गरम जंगल में जूही ख़ूब महक रही है
और वहाँ ऊपर आकाश में गरमी है या ठंड है
जनवरी की बर्फ़ नीले आकाश में दहक रही है

वन जड़वत है, विह्वल है सुबह की धूप में
जूही खिली है पूरे रंग में, अपने पूरे रूप में
चमकदार आसमानी आभा फैली है अलौकिक
शिखरों की शोभा भी मोहे है मन मायावी स्वरूप में

(अप्रैल 1904)

मूल रूसी भाषा से अनुवाद : अनिल जनविजय

परायी / इवान बूनिन

तू परायी है फिर भी
मुझसे करती है प्यार
भूलेगी नहीं कभी जैसे
इतना करे दुलार

तू थी सीधी, सरल, समर्पित
जब विवाह हुआ था तेरा
पर तेरा सिर झुका हुआ था
वह देख न पाया चेहरा

तुझे स्त्री बना छॊड़ा उसने
पर तू मुझे लगे कुँवारी
तेरी हर अदा से झलके
तेरी सुन्दरता सारी

तू करेगी यदि विश्वासघात फिर..
तो ऐसा होगा एक बार
शर्मीली, संकोची है तू
तेरी आँखों में प्यार

तू छुपा नहीं पाती यह
कि अब उसके लिए परायी…
तू अब भूल नहीं पाएगी
मुझे कभी भी, मेरी मिताई !

(1903-1906)

मूल रूसी भाषा से अनुवाद : अनिल जनविजय

कविता नहीं है यह 

कविता नहीं है यह
बढ़ती हुई समझ है
एक वर्ग के लोगों में
दूसरे वर्ग के खिलाफ़

कविता नहीं है यह
आँखों में गुनगुना समन्दर है
निरन्तर फैलता हुआ चुपचाप
खौल जाने की तैयारी में

कविता नहीं है यह
बन्द पपड़ाए होंठों की भाषा है
लहराती-झिलमिलाती हुई गतिमान
बाहर आने की तैयारी में

कविता नहीं है यह
चेहरे पर उगती हुई धूप है
तनी हुई धूप
बढ़ती ही जा रही है अन्तहीन

कविता नहीं है यह
छिली हुई चमड़ी की फुसफुसाहट है
कंकरीली धरती पर घिसटते हुए
तेज़ शोर में बदलती हुई

कविता नहीं है यह
पसीना चुआंते शरीर हैं
कुदाल और हल लिए
ज़मीन गोड़ने की तैयारी में

कविता नहीं है यह
मज़दूर के हाथों में हथौड़ा है
भरी हुई बन्दूक का घोड़ा है
कविता नहीं है यह

कहारिन

वह कहारिन
काली लड़की
बहुत सुन्दर है

पानी भरते, बरतन मलते
काली लड़की
गीत कोई गुनगुनाती है
मुंडेर पर एक कोयल ठहर जाती है

छोटा कोठा, बड़ा कोठा
रसोईघर, कोठार, आँगन बुहारती है
काली लड़की
दुत-दुत कुत्ते को दुतकारती है
खिड़की में गिलहरी एक फुतकारती है

नीले-लाल, पीले-हरे, काले और सफ़ेद
निकर, धोती, ब्लाऊज, पैंट, कमीज़, चादर, खेस
कपड़ों को कूटती है
काली लड़की
चिनगी बन भीतर-भीतर
धीरे-धीरे, चटक-चटक फूटती है
नेवले-सी चुपचाप साँपों को ढूँढ़ती है

बहुत सुन्दर है
वह कहारिन
एक कोयल
गिलहरी
नेवले-सी
काली लड़की ।

तुम भी आओ

अपने को खतरनाक
घोषित करते हुए
नारे उछालना
मैंने नहीं सीखा

मैंने नहीं सीखा
यूक्लिप्टस का पेड़ हो जाना
जब जंगल के अन्य सारे पेड़
नीम और बबूल बन
महामारी का विरोध कर रहे हों

मैं नदी नहीं हो सका
बढ़ी हुई-चढ़ी हुई / आवेग में-उन्माद में
प्रलय बन खड़ी हुई
तालाब बना रहा / या फिर झील
ठण्डी-गर्म रातों को

मैंने पहाड़ बनने की भी
कोई कोशिश नहीं की
कठिन था मेरे लिए
सूरज को रोज़-रोज़ डूबते देखना
और फिर सारी रात
सुबह की प्रतीक्षा करते रहना
आकाश टटोलते हुए

मैं ज़मीन बना रहा
नीम और बबूल उगाता रहा
तालाब और झील के पानी को
उबालता रहा
सूरज बनाता रहा अपने ही बीच
निरन्तर रोशनी के लिए

आओ
तुम भी
ज़मीन बन जाओ

कमरे में धूप 

कमरे में एकान्त है
फूल है
उदासी है
अंधेरा है
बेचैनी है कमरे में
क्या नहीं है
क्या है कमरे में
रात है धूप नहीं है

सुबह होगी
निकलेगा सूरज
कमरे में छिटकेगी धूप
फूल से गले मिलेगी
धूप को चूमेगा फूल
शोर होगा
ख़ुशी होगी
गूँजेंगी किलकारियाँ
हँसी होगी
रोशनी होगी
कमरे में

बसन्त के लिए युद्ध 

मौसम बहुत तल्ख़ है
और लोग सख़्त उदास
उस सन्त की याद में
जो वसन्त चाहता था
अपने साथियों के लिए
सुनहरा वसन्त

वह सन्त यहाँ आया था
बेबाक और छलछलाती हँसी होठों में छिपाए
साहसी और प्यारी आँखों वाला
एक क़द्दावर पेड़
लोगों के बीच उग आया था

उसने उन ख़ामोश आँखों में
बेपनाह तकलीफ़ देखी थी
और सोचा था कि
वह उन क्यारियों में रक्तमुखी फूल उगाएगा

उसने लोगों से कहा था —
सोचो ज़रा !
सबके लिए एक-सा आता है वसन्त
फिर हमारा मौसम
इतना तल्ख़ क्यों होता है ?

प्रार्थनारत जनपद
प्रतिज्ञाबद्ध हुआ था तब
तल्ख़ मौसम से
अन्तिम मुक्ति के लिए

उसने लोगों के सुर्ख़ रक्त में
ईंधन भर दिया था
और वे दहकने लगे थे
सूरज की तरह
अपने सिर हाथों में थामे
सड़कों पर निकल आए थे

दिनानुदिन
फैलने लगा था
सुर्ख़ ख़ून का सैलाब
सारे देश में
उबलते लावे की मानिन्द

यह युद्ध का आदिकरण था
सुनहरे वसन्त के लिए युद्ध

उन्होंने मधुपर्व को चुना था
वसन्त की अन्तिम लड़ाई के लिए
और मधुमक्खियों को
छत्ते में घेरने का निर्णय लिया था

यकायक
युद्ध की तैयारियाँ / धूमधाम
सब कोहराम में बदल गई थीं

कद्दावर सन्त
कटे पेड़-सा गिर पड़ा था
उबलते लावे का उछलता-डोलता सोता
सफ़ेद बुराक़ बर्फ़ में बदल गया था
नदियों के भीगे किनारों पर
श्मशान की आत्मा झुकी हुई थी
घनघना रही थीं घण्टियाँ
ताज़ा बिछी क़ब्र पर

अब
मौसम की तल्ख़ी बहुत बढ़ गई है
और लोग
वसन्त के लिए लड़ाई पर हैं

गुरिल्ला

तुम्हारे खेत उनके पास हैं
चुप रहो
तुम्हारे खेत जोते जा रहे हैं
जोतने दो
उनमें बीज डाले जा रहे हैं
डालने दो
अंकुर फूट गए हैं
देखते रहो
फ़सल बढ़ रही है
इन्तज़ार करो
फ़सल पक गई है
हथियार तेज़ करो
फ़सल कट रही है
तैयार हो जाओ
फ़सल गाड़ी पर लाद दी गई है
कूद पड़ो, वार करो
उनकी लाशें बिछा दो
यह फ़सल तुम्हारी है
तुम्हारे खेत की
अब ये खेत भी तुम्हारे हैं ।

भय 

जब
सारी चिड़ियाँ
गुम हो जाती हैं
आकाश
काला पड़ जाता है
मैं डर जाता हूँ

चिरविदा 

अलविदा अलविदा

आकाश वाली लड़की
अलविदा

फूलों-सी प्यारी लड़की
चिरविदा

रोली

आकाश से तोड़कर एक ताज़ा फूल
बढ़ रही हो तुम दुनिया की तरफ़
ओ मेरी नन्हीं बिटिया
ख़ूब ज़ोर-ज़ोर से हँसो तुम
कि हिलने लगे समूची पृथ्वी
पेड़ों में फूट जाएँ नए कल्ले
नदियों में उतर आएँ पक्षियों के झुँड

ओ नन्हें फूल !
इस्पात बनो तुम
कबूतर बनकर उड़ों
अपने ही डर से ख़ामोश
इस चट्टान के भीतर

1988

एक रात में 

एक रात में कवि

कितनी कविताएँ लिख सकता है

एक रात में कवि

कितनी बातें सोच सकता है

एक रात में कवि

कितने गाँवों, कितने शहरों, कितने देशों, कितनी दुनियाओं

के चक्कर लगा सकता है

एक रात में कवि

किन-किन लोगों को किस-किस तरह के पत्र लिख सकता है

एक रात में कवि

किस-किस के विरूद्ध किस तरह लड़ सकता है

क्या-क्या कर सकता है कवि

एक रात में ?

अकाल

अकाल
जब आता है
अपने साथ लाता है
अड़ियल बैल से बुरे दिन

अकाल भेद नहीं करता
खेत, पेड़, पशु और आदमी में

बाज की तरह आकाश से उतरता है
हरे-भरे खेतों की छाती पर
फसल को जकड़ता है पंजों में
खेत से खलिहान तक सरकता है

अँधेरे की तरह छा जाता है
लचीली शांत हरी टहनियों पर
पत्तियों की नन्ही हथेलियों पर
बेख़ौफ़ जम जाता है
जड़ तक पहुँचने का मौका ढूँढ़ता है

बोझ की तरह लद जाता है
पुट्ठेदार गठियाए शरीर पर
खिंचते हैं नथुने, फूलता है दम
धीरे-धीरे दिखाता है हाथ, उस्ताद

धुंध की तरह गिरता है
थके हुए उदास पीले चेहरों पर
लोगों की आँखों में उतर आता है
पेट पर हल्ला बोलता है, शैतान

जब भी आता है
लाता है बुरे दिन
कल बन जाता है अकाल

1981 में रचित

सुख

अचानक पीछे लौट कर

अपने बचपन से हाथ मिलाना

कुछ देर बोलना-बतियाना

और उसके साथ-साथ तुतलाना

मेले में खो गए

किसी बच्चे के साथ लुका-छिपी खेलना

आज वह नहीं है 

आज वह नहीं है

घर उदास है

अलगनी पर लटके हैं गंदे कपड़े

फ़र्श पर जमी है धूल

मेज़ पर पड़े हैं तीन सूखे गुलाब के फूल

गंदे बर्तनों का ढेर है रसोई

बुझी हुई अंगीठी में राख भरी हुई है

शराब की खाली बोतल लुढ़की हुई पड़ी है

अचार की शीशी का ढक्कन खुला हुआ है

माचिस की तीलियों और बीड़ी के टोटों से

फ़र्श पूरा भरा है

इधर-उधर बिखरी पड़ी है किताबें

वहाँ कोने में आज का अख़बार मरा पड़ा है

आज वह नहीं है

उदास हूँ मैं

1988 में रचित

प्रार्थना 

कवि राजा खुगशाल के लिए

यह दुनिया
औरतों के हाथों में दे दो

रोटी की तरह गोल और फूली
इस पृथ्वी पर
प्रेम की मधुर आँच हैं
रस माधुर्य का स्रोत हैं
इस सृष्टि में
जीवन की पवित्र कोख हैं औरतें

औरतों के हाथों में
सम्हली रहेगी यह दुनिया
बेहतर और सुन्दर बनेगी

रचना की प्रेरणा हैं औरतें
सूर्य की ऊष्मा हैं
ऊर्जा का उदगम हैं
हर्ष हैं हमारे जीवन का
उल्लास हैं
उज्ज्वल, निर्द्वन्द्व ममता की सर्जक हैं

हे पुरुषो !
एक ही प्रार्थना है तुमसे
यह हमारी दुनिया
औरतों के हाथों में दे दो
अगर तुम सुरक्षित रखना चाहते हो इसे
अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए

(2001)

तुझमें बसते हैं मेरे प्राण 

(स्वेतलाना कुज़्मिना के लिए)

तुझको मैंने चाहा है
सम्पूर्ण हृदय से

तुझमें बसते हैं मेरे प्राण
गाता है जीवन सहज गान
किरण तरुणा रूप है तू
सुगंध है तू, धूप है तू
देह मन शीतल करे है
वसंत की मृदु छवि धरे है

तुझको मैंने पाया है
निज विमल हृदय से

तन कंपित, सप्तक का तार
मन झंकृत, सुख का विस्तार
तुझको पा उर फूल खिला
घोर तिमिर में रवि मिला
रजत हास करे मेरा मन
तेरे जादू से बदला जीवन

मैं मुदित हूँ, प्रिया रक्तांगी
तेरी इस विजय से

(2003)

तेरी कविता में तुझको देखा 

तेरी कविता में तुझको देखा
तू कितनी बदल गई नभरेखा

पहले थी तू चंचल बाला
जीवन दे वो अर्क निराला
उन वर्षों ने तुझको बदला
मिला मुझे जब देश-निकाला

अब तू कातर पीड़ा की छाया
और जीवन का दर्द तमाम
तू हिन्दी कविता की अख़्मातवा
और मैं उसका कवि मंदेलश्ताम

लिखती कविता में जीवन-लेखा
तू कितनी बदल गई नभरेखा

1997 में रचित

दिन पतझड़ का

दिन पतझड़ का
पीला-सा था झरा-झरा

छुट्टी का दिन था
वर्षा की झड़ी थी भीग रहा था मस्कवा
चल रही थी बेहद तेज़ ठंडी हवा
खाली बाज़ार, खाली थीं सड़कें
जैसे भूतों का डेरा
खाली उदास मन था मेरा

तुमको देखा तो झुलस गया तन
हुलस गया मन
बिजली चमकी हो जो घन
लगने लगा फिर से जीवन यह भरा-भरा

तुम आईं तो आया वसन्त
दिन हो गया हरा

1996 में रचित

एक दिन 

एक दिन
एक चित्र बनाऊँगा मैं
और उसका नाम रखूँगा
सुनहरी धुँध

उसमें
मैं होऊँगा
तुम होंगी
और होंगे ढेर सारे बच्चे

पतझर के
पीले सूखे पत्तों पर
लेटे होंगे हम
पूरी तरह सुखी

(1996)

नया वर्ष 

नया वर्ष
संगीत की बहती नदी हो
गेहूँ की बाली दूध से भरी हो
अमरूद की टहनी फूलों से लदी हो
खेलते हुए बच्चों की किलकारी हो नया वर्ष

नया वर्ष
सुबह का उगता सूरज हो
हर्षोल्लास में चहकता पाखी
नन्हें बच्चों की पाठशाला हो
निराला-नागार्जुन की कविता

नया वर्ष
चकनाचूर होता हिमखण्ड हो
धरती पर जीवन अनन्त हो
रक्तस्नात भीषण दिनों के बाद
हर कोंपल, हर कली पर छाया वसन्त हो

(रचनाकाल : 1995)

अनमने दिन 

दिन बीते
रीते-रीते
इन सूनी राहों पे

मिला न कोई राही
बना न कोई साथी
वन सूखे चाहों के

याद न कोई आता
न मन को कोई भाता
घेरे खाली हैं बाहों के

कलप रहा है तन
जैसे भू-अगन
दिन आए फिर कराहों के

(रचनाकाल : 2005)

ज़िन्दगी उपहास बन गई

ज़िन्दगी उपहास बन गई
चन्द वर्षों में ताश बन गई ।

भूख और प्यास को समेटकर
शब्द में समास बन गई ।

पहनकर भी जिसको नंगे रहे
झीनी चादर का लिबास बन गई ।

छोटे-छोटे टुकड़ों में छपी हुई
एक मोटा उपन्यास बन गई ।

पहले थी मात्र एक घटना
अब पूरा इतिहास बन गई ।

सोचते थे ईख बन जाएगी
खोखला इक बांस बन गई ।

अन्धेरे से निकलने की जानिब
नए रास्तों की तलाश बन गई।

विरह-गान

कवि उदय प्रकाश के लिए

दुख भरी तेरी कथा
तेरे जीवन की व्यथा
सुनने को तैयार हूँ
मैं भी बेकरार हूँ

बरसों से तुझ से मिला नहीं
सूखा ठूँठ खड़ा हूँ मैं
एक पत्ता भी खिला नहीं

तू मेरा जीवन-जल था
रीढ़ मेरी, मेरा संबल था
अब तुझ से दूर पड़ा हूँ मैं

(2004 में रचित)

बहुत दिनों में धूप 

बहुत दिनों में धूप निकली
दिन आज का भरा-भरा है
पत्ते झर चुके पेड़ों के
पर मेरा मन हरा-हरा है
दसों दिशाएँ भरी हुई हैं सौरभ से
मौसम त्रिलोचन का ’नगई महरा’ है
यह शरद की धूप कितनी कमनीय है
चारों ओर जैसे स्वर्ण ही स्वर्ण फहरा है

(मस्क्वा, 2018)

प्रेम 

तुम
इस बात से
अनजान थीं
और मैंने भी तुम्हें
कुछ नहीं बताया था

तुम रोती रहीं
और हाथ हिलाती रहीं
मैं तुमसे
प्रेम करते हुए
लौट आया था

पाँच आलोचक

पाँच आलोचक हिन्दी में हैं पाँचों है लट्ठमार
कवि-कथाकार उनसे कहते तुम सब हो बेकार ।

आलोचक अपनी लुँगी खोलकर मारें ऊँची धार
हमसे कुछ लिखवाना है तो मालिश करो, यार ।

कवि उन्हें धमकाते हैं — जाओ, बेचो आलू-चना
ज़रूरत नहीं तुम्हारी, किताब बिके समीक्षा बिना ।

कथाकार भी उनसे लड़ते, जा लोचक तू जा
भगा देते उन्हें अपने पास से, बकवास मत सुना ।

पाँच आलोचक हिन्दी में हैं, सब पाँचो बेरोज़गार
लिखना-पढ़ना बन्द हो गया, ढूँढें कोई जुगाड़ ।

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