अनिल पाण्डेय की रचनाएँ

धार हैं हम

1.
धार हैं हम
रुकना हिस्से में नहीं आता
बहते रहना अनवरत
नियति है हमारी
कहीं स्थायित्व मिला तो
बहने की खुमारी में पता ही नहीं चला

2.
बहते रहने की जिद में
ऊबड़ खाबड़ रास्ते अधिक मिले
ढुलकते लुढ़कते
ख्वाहिश बरकरार रही मंजिल की
न दिल भरा न मंजिल मिली
हृदय से समतल की चाह
कब हो गए समाप्त
पता ही नहीं चला कभी

3.
लहरों के बहाव में
विद्रोह की स्वभाव में
कभी जुड़ा अलग हुआ कई बार

जुड़ने अलग होने की प्रक्रिया में
उम्र के इस पड़ाव तक
रास्ते मिले हैं बहुत
चाह सबसे जुड़ कर रहने की है
सब पर बराबर चलने की है

सब मुझे अपनाएँ
ये जरूरी तो खैर नहीं
मैं सब के हित रहूँ
कुछ ऐसा चाहता हूँ

4.
लहरों से कट जाने के बाद
कुछ मिल रहे हैं इधर
बिछुड़ रहे हैं बहुत
आँखें नम हैं
जो बिछुड़े हमारे अपने थे
मिल रहे हैं जो
न जाने कैसे होंगे लोगबाग

5.
अलग होने से गम तो है
खुशी भी है बहुत
इस अल्प समय के जीवन में
बहते हुए किसी और को
शीतल कर जाने की

कौन कहेगा आग को आग
इन दिनों के परिवेश में
समझेगा पानी को पानी ही
सोचता हूँ तो सिहर कर रह जाता हूं

हवाएं अचानक बदली हैं
खिलने की प्रक्रिया में चुभने लगी है धूप
मिट्टी जलने लगी है इधर
पानी में बुलबुले फूट रहे हैं कई दिनों से

कई दिनों से उलझे से हैं जन-जीवन
खौलने लगा है आसमान
तन-बदन कुछ के नहीं हैं कहने में जरा भी
जरा भी लोग नहीं चाहते शांत रहना कई दिनों से

इधर कई दिनों से समय नहीं है किसी के कहने में
अजनबी के-से हालात हुए हैं परिवेश के
घर, घर जैसा नहीं दिखा है
बाहर की हर चीज घर जैसी लगी है

ये समय ले-देकर कहने भर का समय है
पहले वाला समय नहीं रहा
प्रतिबद्ध होकर रहते थे जहाँ कुछ लोग
वही करते थे कहते थे जो कुछ व्यवहार में

कौन है जो करेगा वही कहता है जो कुछ
बड़बोलेपन में बड़े ही घमंड से
गलत को गलत कहेगा समझेगा सही को सही विवेक से
सोचता हूँ तो मौन रह जाता हूँ

 

राजा का फरमान है 

1.
राजा मुस्कुराए
निहारना एकटक जरूरी है हमारे लिए
ठठाकर हँसे
उसी अनुपात में मुस्कुराना विवशता है
चिंता करे राजा
जैसे गिर-पर पड़ना है सामने
सोचे किसी विषय पर
चिंतित दिखाई देना है उससे अधिक

गुनगुनाए कुछ
नाचने की क्षमता हममें हो
कुछ न करे, निर्धारित करके रखना है
जैसे सब कुछ ठीक दिखाई दे

हम स्वभाविक रूप से
किसी भी हालत और हालात में हों
खुश रखना उसे
स्वभाव की स्थाई नियति हो

तुम्हें केवल मुस्कुराना है
हंसना है दबी जुबान से
अँधा हो निहारना है
पघुराने की कला हो उसके इशारे पर

2.
नहीं होती कोई चिंता
राजा को
हमारे सुख-दुःख की

हम मरें
तो मरने की इच्छा हो हममें
घूमता है वह
मौत का नियंता बन

हम खुश हों कि
मरने के लिए जरूरी नहीं
ईश्वर का कृपापात्र होना
क्योंकि राजा सब निर्धारित करता है|

3.
विरोध करना
राजा के आदेशों का
धरती पर न रहने की पहली शर्त है

आसमान पर
पकड़ राजा की है
सूर्य उदित तभी होता है जब चाहता है वह

4.
अघोषित गुलाम रहना
संभव है
इक्कीसवीं सदी के लोकतंत्र में ही

गुलामी का प्रशिक्षण
स्वतंत्रता के नाम पर
दिया नहीं जाता
आजकल बांटा जाता है यहाँ

खुश हो जाओ
कि तुम भी अगली कतार में हो

5.
राजा का फरमान है
भूख की चिंता किये बगैर
अघाए लोगों को खिलाना है खाना
पेट को फुलाए रखना है
दबाये रखना है इच्छाओं को

वेल अप टू डेट हो
दिखना ऐसा है
सामने वाला सबसे सुखी समझे तुम्हें ही
तुम्हारे मुस्कुराने में
राजा के खुश होने के आसार हैं

6.
राजा नहीं चाहता
नियत समय से पहले सांस लो तुम
उठो कि बैठो, चलो कि सोचो
राजा जैसा चाहे
करना वैसा ही है
हर हाल में
तुम्हारा होना तुम नहीं
राजा की स्वीकृति की बात है|

 

हमारे समय के सांड

1.
चारा की तलाश में
गायब हुआ सांड लौट आया है
सब अचरज में हैं उसे देखकर
मौन है, शांत चित्त होकर देख रहा है

बच्चे चिंता में हैं
पहले की तरह खदेड़ नहीं रहा है
पूँछ हिला रहा है लगातार
औरतें दूर से ही भागना चाहती हैं

बुढ़ापे समझाए जा रहे हैं
सांड से बचने की तरतीबें लोगों को
खेत-कियारी सुरक्षित रखने की चिंता
परिवेश में अधिक बढ़ गयी है इन दिनों

सांड भी कुछ कहना चाहता है
यह कि वह मारता नहीं
यह कि वह दौड़ता नहीं
यह भी कि खेती कियारी पर नहीं डालता बुरी नजर

लोग रखवाली में हैं
घर-परिवार और जर-जमीन के
पता है उन्हें यह सांड की ईमानदारी नहीं
मजबूरी भले हो सकती है न चल पाने की

सांड भी जानता है
नहीं बदल सकता वह स्वयं को
चिल्लाना इसीलिए छोड़ा है कि लोग
नम्रता के भेष में उसके शिकार हों|

2.
पहले अकेले ही चल देता था
पूंछ उठाए
पघुराते हुए सांड

जिधर से गुजरता था
भाग खड़े होते थे सब के सब
भागने वाले निडर होने लगे, तो
सांड ने बदल लिया अपनी आदत

अब सांड अकेला नहीं है
साथ चलता है लाव-लश्कर को लेकर
चौकन्ना रहता है
हाथ पैर मारता रहता है आगे पीछे

सुना है पिछले दिनों
अभ्यास कर रहा था हथियार चलाने की
उसके ही पड़ोसियों ने हिदायत दी थी
सीखे रहोगे तो बचे रहोगे

हथियार कहाँ से पायेगा यह चिंता उसे थी
परिवेश में हलचल है कि हथियारों से लैस है वह
पड़ोसियों ने चंदे जुटा कर मुहैया कराया है
अब सांड घर-परिवार से लेकर देश-दुनिया के लिए एक सिरदर्द है
 
3.
इधर सांड को समाज में बड़ा परिवर्तन दिखा है
लोग बदलाव की चाहत में कैसे जड़ हो रहे हैं
वह देख रहा है जहाँ से सभ्य होते हैं लोग
वहां वेद नहीं जंतर मंतर लिखा है

अब मनुष्य वह मनुष्य नहीं रहा
जो डरता था अक्सर जानवर को देखकर
वह मान चुका है कि जानवर उसके पूर्वज थे
बूढ़ों की नवयुवक सुनते ही कब हैं आखिर

सांड शंसय में है
मनुष्य को जानवर समझे, तो
जानवर मनुष्य हैं आज के समय के
रोने-मुस्कुराने की कोशिश वह भी करने लगा है
  
सांड पहले नहीं डरता था अपनी विरादरी से
अब मनुष्य से भी डरने लगा है
सांड अब सांड नहीं रहना चाहता इसलिए
अपने अन्दर विचारधारा का विकास करने लगा है
 
पिछले दिनों ऐलान कर दिया था सांड ने
किसी भी मान्यताओं को नहीं मानेगा वह
उल्ट-पलट डालेगा अर्थ प्रतीकों का
हगने खाने की नीति में भी लाएगा परिवर्तन

सब उसे शंसय की दृष्टि से देख रहे हैं
गरिया रहे हैं उसके आस-पड़ोस के लोग
सांड हंस रहा है, उसे पता है जो गरिया रहे हैं
वो भी सांड बनने की प्रक्रिया में आ रहे हैं

4.
कुछ हुआ है इधर
कुछ हो रहा है कहीं
सब कुछ इतना शान्त है
किसी को कोई खबर नहीं

बच्चे
खेल कूद नहीं रहे हैं
सांड
बैठे बैठे पघुरा रहा है

चिड़िया
दूर भागने की कोशिश में है
कुत्ते
देहरी के आस पास नहीं आना चाहते

कोहरा भी नहीं है
ठंड भी रोज से कुछ कम है
महिलाएँ नहीं आ जा रही हैं
नल का रास्ते सूनसान है

घर के बड़े बुजुर्ग
बच्चों को नहीं सिखा रहे हैं
संस्कार-वंस्कार जैसी कोई चीजें
बच्चे भी दुबके पड़े हैं दरवाजे बन्द घर में

सजीवन भाई कहते हैं
ये सांड जो लगातार पघुराए जा रहा है
नहीं मानेगा बिना कुछ किये-कराये
पूंछ हिलाए जा रहा है जैसे टोना पढ़ रहा हो

आसमान तड़क भड़क रहा है
धरती सहमी सहमी है
भागम भाग मचा है पूरे परिवेश में
और यह है कि टस् से मस् तक नहीं हो रहा है

5.
ऑफिस में बैठा सांड
रह-रह कर मुस्कुरा रहा है
कम्प्यूटर पर हाथ फेरते
बार-बार नाक सुरुक रहा है. जुकाम हुई है
आभास ऐसा मिलने वालों को हुआ है

दलाली में कुछ नजर नहीं आया इस शहर
सांड पिछले महीने गया था
किसी घाटी के आस-पास की बस्ती में
आयोजन कोई विचार-विमर्श का था
वह साधना चाहता था व्यापार-लाभ

सामान के रूप में कुछ ख़ास नहीं था
वह कह सकता कि इसमें दम है
जो था पूछता भी नहीं था कोई उसे
हालांकि वह कहता रहा
क्रांति के सारे रास्ते यहीं से होकर निकलते हैं

कैसे कहता अपनी विरादरी में
इस बार नहीं मिली कोई ख़ास अहमियत उसे
अपने जैसे घूमते कुछ सांड़ों को इकठ्ठा किया
फोटो खिचाया फेसबुक पर छोड़ दिया
अब सभी सांड मिल कर क्रांति का नया पैमाना तय करेंगे

इधर समाज में आई चेतना से सभी सांड भयभीत हैं
सूचना मिली है खेतों में धोख नहीं मनुष्य खड़े हैं
दाग तो रहे ही हैं विधिवत मार-पीट कर भगा भी रहे हैं
इसलिए सांड़ों ने निकलना कर दिया है बंद
नारेबाजी के आयोजन अब फेसबुक से निभा रहे हैं

यह न समझ ले कोई
शहर से सांड गायब हो गया है, इसलिए
बार-बार आकर शपथ ले रहा है, यह कि
विरादरी के बाहर के लोगों को नहीं देगा प्राथमिकता
शपथ लेता है कि कूड़ा ही बनाएगा और वही बेचेगा
पुनरावृत्ति नहीं होगी, जो भी हो पहले से घटिया होगी||

6.
जब मैं नहीं बोलना चाहता
कुछ भी इधर कई दिनों से
सुनना चाहते हो तुम
वह सब कुछ जो है इस दुनिया में
और नहीं भी है अभी तक जो
जिसे लाना है हमें-तुम्हें, वह भी

ऐसा भी नहीं है कि
बोलना नहीं आता मुझे कुछ भी
लेकिन ज़रा ध्यान से सुनों
नहीं बोलना चाहता हूँ मैं

सच कह रहा हूँ
बोलने में आवाज होती है
आवाज में कोलाहल से भर उठता है
अपना परिवेश
कुछ पागल होकर नाचने लगते हैं
सब हंस-बोल क्यों रहे हैं एक दुसरे से?

सब नहीं होते
जिन्हें कोलाहल पसंद हो
चिड़ियों का कलरव
भौरों की गुंजार
कोयल की बोल
मनुष्य के परिहास
सब कहाँ पचा पाते
विरोध कर जाते हैं

यह भी नहीं है कि वे
बोलते नहीं कुछ भी कभी
दरअसल वह सब बन जाना चाहते हैं
फूल-कांटे, कौवा-कोयल,
तितली-भौंरा, खेत-फसल
आदमी-जानवर सब के रूप में दिखना चाहते हैं

भले कुछ न कर सकें वे
अपने पास रखना चाहते हैं
सबके अधिकार
सबका कर्तव्य स्वयं पूरा करना चाहते हैं
सब उन्हें सबकुछ समझें
सब का बनकर रहना चाहते हैं

सब जानते हैं
वे आदमी नहीं हैं
जानवर भी नहीं हैं
पंछी, पौधा, हवा, पानी, अग्नि
कुछ भी नहीं हैं वे

इन सबकी शक्ल में
वे हमारे समय के सांड हैं
पाला-पोषा जाता रहा है जिन्हें
सदियों से, इसलिए नहीं कि
उनका होना जरूरी है हमारे बीच
इसलिए कि लोग परेशान रहें

समाज की हर संस्थाओं में
विराजमान हो गये हैं सांड
कुछ आँख दिखाते हैं तो कुछ
मीठी बोली-वाणी से छलते हैं
वह तुम्हें कुछ भी कह दें, बोल दें, कर दें
तुम्हें अधिकार नहीं है कि कुछ सोच भी सको

कल्पना करने के अधिकार पर भी
अब उनका कब्ज़ा है
तुम मात्र महसूस सकते हो अपने समय के घाव को
हथियार, मलहम, कैंची-पट्टी
सब कुछ ही तो उनका है, उनकी दृष्टि में
तुम लावारिस देश के नाजायज औलाद हो
वे वारिस हैं सल्तनत के क्योंकि
उनके ऊपर सरकारी ठप्पा है|

7.
ये कौन कह रहा है
छोड़ दिया है कोयलों ने कूकना
गुंजार नहीं करते भौंरे
मधुमक्खियां नहीं लगातीं छत्ते
दुर्लभ हो गया है सन्तों का मिलना

ये कौन कह रहा है
कोई किसी को नहीं चाहता देखना
बतियाना, हँसना बोलना
सभी ने छोड़ दिया है एक-दूसरे से
नहीं चाहता कोई किसी के साथ उठना बैठना

ये जो कहते हैं
और कह रहे हैं लगातार
समझिए इन्हें कि बोलते हैं बस
शोर मचाते हैं नहीं रहते परिवेश में ये
सब यथावत है झूठ है इनका कहना

मुर्गे अब भी भोर में बोलते हैं
तितलियां मंडराती हैं फूलों के आसपास
अब भी कोयल कूकती हैं बागों में
रंभाती हैं गाय-भैंसे समय समय पर
मिमियाती हैं बकरियां परिवेश में

वे जो कहते हैं
किसी खास झंडे के पहरुवे हैं
पार्टीलाइन पर गढ़ते हैं सम्वेदनाएँ
हाई कमान जो कहता है वही मानते हैं
वही खाते बिछाते ओढ़ते पहनते हैं

बचना है इनसे अब
यही चाहते ही हैं वे कि न रहे कोई
सूनसान में रमकर बस्तियाँ बीरान हो जाएं
ये दिखाई दें और बोलें इनके झंडे
समाज रहे या जलकर श्मशान हो जाए….

8.
सांड नहीं चाहता
सामने से उसे देखकर
कोई सांड कह्कर पुकारे

मौन साध कर चुप-चाप रहता है जैसे
सांड को सबसे अधिक खतरा
सांड के वेश में रहने से नहीं है
सबसे बड़ी चिंता लोगों के दिलो-दिमाग में
सांड दिखने से है

वह चाहता है
नहीं समझे परिवेश उसे सांड
देखे उसे एक बैल की तरह
वह खेतों में भी ख़ट सकता है
दंवरी में भी खप सकता है

पेर सकता है ईख भी
बैल गाडी भी खींच सकता है
रीझ सकता है गायों पर
लड़ सकता है कुश्ती भी
जैसी जिसकी इच्छा हो आजमा सकता है

सांडों की बैठक बैठी है
आज कई दिनों से चर्चा है परिवेश में
सरकार के पास ये मुद्दा है
मुक्त किया जा सकता है उसे सरकारी ठप्पे से
समाज में इस बात की बड़ी चिंता है

सांड होता है सांड ही
सब द्वारा सबको समझाया जा रहा है
जो भूल चुके हैं उन्हें
उसका इतिहास याद दिलाया जा रहा है
हैरान है सांड मनुष्य के दिमाग में
सांड सांड ही कैसे दीखता है |

9.
लोग कहते हैं वरिष्ठ हैं वे
छोड़ दिए हैं संवाद करना
गाली शास्त्र रखते हैं अब सिरहाने
लांघ चुके हैं असभ्यता के सभी पायदान
खुद हैं जंगली
जानवर दूसरों को समझते हैं
साहित्यिक हैं वे
बताते हैं सबको अपनी उपलब्धि
उम्र बीत गयी है लिखते लिखते
जितने की हुई नहीं आधी आबादी
कर चुके हैं उतने आन्दोलन का बीजारोपण
हम जैसे तो जन्म ही नहीं लिए थे इस धरा-धाम पर

हम जैसे नहीं मानते उन्हें
सुना है वाम दर्शन के चितेरे बन
संस्कारों से व्यभिचार करते हैं इन दिनों
गाली का नायाब शेर कभी उन्होंने ही लिखा था
अकादमी वाकादामी में उनके नाम का हो-हल्ला भी मचा था
अब उनके समर्थक उसी का व्यापार करते हैं

वे सभ्य हैं इतना कि
समाज की माँ-बहन को जेब में लेकर चलते हैं
मंच से स्त्री-मुक्ति का पाठ करते हैं
फ़िल्मी गाना गाते हैं ऐसा कि पत्थर भी शरमा जाए
वे नहीं शरमाते क्योंकि वाम का झंडा साथ रखते हैं
कोई प्रतिवाद करे उसे शोषक औब्राह्मणवाद कहते हैं

कौन बताए वरिष्ठ को
उनके वाद से चलता नहीं लोक
अपनी रीतियों-नीतियों का स्वयं होता है निर्धारक
नहीं मानते उनके जैसे ठरकी
लोकवासी विधिवत उन्हें सुधार सकते हैं
वे वरिष्ठ जो घूमते हैं गलियों में साहित्य के नाम पर
हमारे यहाँ उन्हें छुट्टा सांड कहते हैं ||

10.
सांड मायूस था बहुत दिनों से
चर्चा में था परिवेश के
खुश है वह अब इधर
लोग चिंता में हैं

कौन-सी नीति लाएगा
सांड मुस्कुरा रहा है मंद मंद
घूर रहा है आदमी को
आदमी हंस रहा है धीरे धीरे
समझ रहा है सांड को
पशु-पक्षी हैरान सांड कैसी प्रीति बढ़ाएगा

कुछ पता नहीं सांड का
जैसे बदलता है मौसम
उसी तरह बदलता है व्यवहार वह
रोते हैं लोग वह हंसता है
लोग मनाते हैं मातम, मनाता है त्यौहार वह

11.
 वे लिखते रहे
पढने की इच्छा उन्हें होती रही
वे लिखते गये और मैं पढता गया
वे लिखने की नीयति लिए
बनने-ठनने की कोशिश में आ गये
मैं पढ़ता रहा फिर भी
कि परिवर्तन का कोई रास्ता जरूर देगा कवि यह

अब लिखने की जगह
दिखाने की कोशिश की उन्होंने
हाथ में दारू की बोतल
बगल में कन्या की जीती-जागती देह लिए
अटकते-भटकते प्रेम की दुनिया बनाई
दर्शन यह कि अमर है प्रेम
सच यही है जो मिला है
भोग करो आगे बढ़ो…जीवन कहाँ हजार वर्षों का

सीखने की कोशिश में फिर भी पढता रहा
कविता की रवानी यह कि बदलाव लाएगी जरूर
सोचकर गुनता रहा, बढ़ता रहा
अब जीती-जागती देह बन चुकी है वस्तु बाज़ार की
वाह-आह लूट रहा कवि क्रांतिकारी स्वभाव लिए
दर्शन यह कि उपेक्षित है गुदा
मैथुन उसका भी होना चाहिए
जड़ समाज सोचता नहीं कुछ
दुःख उसका आखिर कोई समझता नहीं

पढ़ने का मन नहीं किया उन्हें अब
उनके कहे को मानने से इनकार कर दिया
यह आभास हो गया कि कवि नहीं वह आदमी भी नहीं है
सांड है, छोड़ा गया है विधिवत परिवेश को नष्ट करने के लिए

विचार किया कि इसे यहाँ क्यों रहना है
सांड विरादरी में इसी बात पर हड़कम्प है
कहना यह कि सहवास-अह्वास, आसना-वासना सब तो कर रहा है मनुष्य
हमारे किए पर इतना आक्रोश क्यों
कविता मन की उपज है तन की प्यास पर इतना ऐतराज क्यों

अब सांड को कौन समझाए
जो कविता तुम्हारे लिए तन की प्यास है
वही कविता समाज के लिए अनुसरण-माध्यम है
तुम्हारे लिए व्यवहार है जो वही हमारे लिए दुराचार है
तुम्हारी सुबह गुदा मैथुन, दोपहर रूप-आकर्षण, शाम चेहरा मर्दन है
हमारी सुबह नया जीवन, दोपहर श्रम-साधना, शाम जीवन-संचरण है
यह कहना ही था कि शोर मचाया नंगा होकर उसने
उसके समाज के लोगों ने मुझे जड़वादी और पत्थरबाज बोले
उसकी पशुता को क्रांति और लम्पटता को जन-ताज बोले

उनकी दृष्टि में कविता नंगा होने का इतिहास है
मेरी जानकारी में कविता सही जीवन की तलाश है
वे मानते हैं कि देह-प्यास की अभिव्यक्ति ही कविता की मुक्ति है
मैं मानता हूँ कि उदास-जीवन की अभिव्यक्ति ही कविता की शक्ति है
वे स्वयं को भविष्य का प्रवक्ता बताते हैं
अपने कहे को ईश्वर-कृति-सत्य मानते हैं
वो चाहते हैं कि निर्वस्त्र घूमें किसी कोई आपत्ति क्यों हो

‘लोक’ उनके दावे को नहीं मानता है
उनकी भूख और प्यास की नीयति को पहचानता है
वे लोक को पागल कहते हैं, जड़ कहते हैं, अमानवीय कहते हैं
एक समय जब नहीं सुनता सौंदर्य उनका
अंततः गति लोक-नियम में ही पाते हैं

12.
सांड चाहता है
स्वच्छंद होकर जीना
स्वच्छंद होकर रहना
स्वच्छंद होकर चिल्लाना
स्वच्छंद होकर बढ़ते रहना
स्वच्छंद होकर चलते रहना
स्वच्छंद होकर घूमना पूरे परिवेश में
स्वच्छंद होकर घूरना पूरे आवेश में

वह नहीं चाहता
उसके जीने
उसके रहने
उसके चिल्लाने
उसके बढ़ने
उसके चलने
उसके घूमने
उसके घूरने में
बाधा कोई और बने
 
वह चाहता है
घर-बार को उजाड़ दे
वह चाहता है छान-छप्पड़ को फाड़ दे
वह चाहता है पेड़-पौधे को रौंद दे
वह चाहता है
कि वह सब कुछ कर दे
जिसमें उसे संतोष मिले
वह नहीं चाहता
उसके यह चाहने में
बाधा कोई और बने

उसके यह सब चाहने में
बल है उसके पास
पूरे परिवेश की फसलों पर
एकाधिकार समझता है वह
कोई उसे रोके
कोई उसे टोके
नहीं कर सकता बर्दास्त वह और
खदेड़ लेता है मारने के लिए
सभी जन-समाज-जीवन को
वह चाहता है स्वच्छंद होकर जीना
बंधन उसे स्वीकार नहीं

तो सुनों सांड
यह भी मनुष्य का परिवेश है
नियम और कायदे हैं यहाँ के
बकायदे चलना होता है उनसे जुड़कर
जो नहीं चल पाते
दाग दिया जाता है उन्हें
छुट्टू सांड से किया जाता है विभूषित और
कर दिया जाता है हवाले सरकार के

सुनों सांड
छुट्टू सांड इस तरह हो जाता है बाहर
पूरे सामाजिक व्यवहार से
आचार से, विचार से, संस्कार से
हो जाता है अलगाव उसका पूरी तरह
न कोई मारता है
न कोई डांटता है
न कोई चीखता है
न कोई चिल्लाता है
बंद कर देता है बोलना एकदम से

सुनों सांड
छुट्टू सांड की उपमा से विभूषित हो
जंगल-वन में रहने की इच्छा पूरी हो,
विधि विधान से इसलिए
छोड़ दिया जाता है उसे घूमने-फिरने के लिए

यह मनुष्य का आतंक नहीं है सांड
उसके समाज का नियम है
स्वभाव है उसका
वह चाहता है बनाने का अच्छा विवेक मिले
न कि उजाड़ मचाने के लिए खुला परिवेश मिले

 

हर त्यौहार ऐसे ही जाता है अब

माता जी जब शांत होती हो तुम
बढ़ती उम्रे के अवसान पर पहुँच कर
अपने समय की गति को पहचानने की भूमिका में
उद्विग्न रहता हूँ मैं उस समय
यह जानने की कोशिश में
कैसे रहती हो तुम और कैसे जी लेता हूँ मैं
विसंगतियों से भरे जीवन में रहते हुए एक ही समय में

ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब तुम्हारी याद न आए
हो सकता है बहुत व्यस्त हो आज माते
ढूंढी तिलवा और लेडुवा को रूप देने में
कल खिचड़ी है उधर, इधर लोहड़ी मनाई जा रही है
डीजे के धुन पर नाचते युवा मस्त हैं
परिवार के सदस्य सब योजनाओं में पस्त हैं और
हाथ माथे रख बैठा हूँ तुम्हारे हाथ से तैयार ढोंढे खाने की जिद में

व्यस्तताओं के मंजर में यादों की वेदना है
बचपन की स्मृतियों को हर हाल में झेलना है
त्यौहार है आज, तुम नहीं हो न तुम्हारी हंसी है
एकांत है शोर है घनघोर बेबसी है
सब पूछ रहे हैं दिखाई नहीं दे रहा मैं कहाँ हूँ
ढूंढता तुम्हें अनवरत माते न वहां हूँ न यहाँ हूँ
अच्छा नहीं लग रहा कुछ व्यथित हूँ जहाँ हूँ

सच कहूं माते यह एक त्यौहार की बात नहीं है
हर त्यौहार ऐसे ही जाता है अब
सब हँसते हैं खुशियाँ मानते हैं गाते हैं नाचते हैं
मैं तलाशता हूँ शहर का एकांत
बैठ जाता हूँ चलते हुए भी नीरवता लिए शांत
देखता हूँ कोई कोना घर का
खाली हो कोई देखे न और बैठ रो लूं अहक भर मैं

एक सच कहूं माता जी, सुनो !
आँसू नहीं गिरते अब न ही आँखें भीगती हैं
रोता हूँ फिर भी हिचक-हिचक कर
हकला हकला कर उड़ेलता हूँ यादों के पिटारे
बच्चे सोचते हैं मैं उन्हें खेला रहा हूँ
पत्नी सोचती है मैं उसे चिढ़ा रहा हूँ
उन्हें क्या पता माँ से दूर होने का गम मैं भुला रहा हूँ

 

ये दिन मेरे हिस्से के नहीं हैं

जहाँ जाना चाहते हैं
नहीं पहुँच पाते हैं अंत तक वहां
जहाँ नहीं होना चाहते हैं
स्थाई हो उठते हैं आजकल अक्सर

होना तो मेरे बस में नहीं है आखिर
न होना ही नियति हो गयी है
समय सब देखता है कौन किस हाल में है
सिखाता है समय ही
बनकर रहना है किस तरह

अक्सर लोग नाराज हो जाते हैं
भविष्य को छोड़ कर बस आज हो जाते हैं
कल, आज और कल में पड़कर
दिन अक्सर नाराज हो जाते हैं
किससे कहें कि मेरे पास
नाराज होने के अवसर नहीं हैं

सुनो! हो सके तो माफ़ करना
ये दिन मेरे हिस्से के नहीं हैं
जिनके थे वे खेल गये खेल अंत तक
करता कोई है और भरता कोई है
इस बात को भूलना भी समस्या ही है
न भूलना चालाकी तो है
सब चालाकी काफूर हो जाती है
जहाँ अपनत्व के भाव हों

 

अपनी तरह का सच 

हवा अब
हवा बनकर नहीं रहना चाहती
धूप बन खिलना चाहती है
जल बन बरसना चाहती है
बर्फ बन पिघलना चाहती है

धूप अब
धूप बनकर नहीं रहना चाहती
हवा बन उड़ना चाहती है
तपन की स्थिति को त्यागकर
शीतलता बरसाना चाहती है

बादल अब
गर्जना छोड़ना चाहता है
बरसने के गुण पर लगाना चाहता रोक
देना उसके स्वभाव से लगातार हो रहा है ख़ारिज
लेने की क्रिया में माहिर हो रहा है अधिक इन दिनों

धरती अब
निर्णय की भूमिका में है
वह नहीं मानती कि उसे जीवित रखने में
बादल का कोई योगदान है
उसे बनाने में उसका अपना संघर्ष है

पशु-पक्षी अब
अपने स्वरूप से स्वतंत्रता चाहते हैं
होना चाहते हैं मनुष्य इन दिनों
जीव-जंतु से लेकर खर-पतवार तक
पूर्व स्थिति को त्यागकर नवीन हो जाना चाहते हैं

मैं’ स्वयं
नहीं रहना चाहता हूँ ‘मैं’
हम और तुम में परिवर्तन की आकांक्षा है
जो हैं वह नहीं हो पा रहे हैं
जो नहीं हो पाते वही होने की कोशिश में हैं
यह भी अपनी तरह का एक समय है॥

 

अपनों और बेगानों के बीच

बेगानों में अपनों को खोजते
अपनों को बेगानों में महसूसते
तीन साल हो गए
उठते बैठते चलते झूलते

आज हम अकेले हैं
समझ रहे हैं
अकेले ही होते हैं सब
अपनों और बेगानों के बीच

भीड़-सा है चारों तरफ
शोर और भी अधिक हो रहा है
शांति कहीं नहीं है लगभग परिवेश में
हृदय सब्र खो रहा है

सभी कह रहे हैं
हम सही नहीं हैं इन दिनों
मानते हैं सब नहीं सही हैं
इधर हम सब के बीच
अपने भी बेगाने भी
खेल रहे हैं खेल
आँख मिचौली की जैसे
हम ही दोषी किस पर उछालें कीच

 

पिता 

आयी होती है बरात घर पर
पिता देख रहा होता है
सब खुश होकर झूम रहे होते हैं
पिता सोच रहा होता है
दिन एक आता है सबका कभी
पिता बोध रहा होता है
योजना बनाता दामाद कहीं दूर नजर आता है
दिन अपना वह, कर याद रहा होता है
सकुचाती हुई बिटिया उदास मुस्कान लिये
पिता अपने यौवन के दिनों की याद कर
लौट जाता है फिर से जीवन-बरात में
जुटा रहा होता है संवेदनाएं भावों के उद्गार में
बिटिया का गम, बरात की ख़ुशी
पिता होने का दुःख समेटे
दस्तूर है दुनिया की सोच लौट आता है
 फिर से अपने संसार में
वह होता है, बिटिया होती है, माँ होती है ॥

 

हम सब व्यापारी हैं

सुनो !
कुछ नहीं है संसार
कुछ नहीं है देश दुनिया
जीवन भी कुछ नहीं है
महज एक दुनियादारी है
व्यापार है सच
व्यापार है झूठ
व्यापार है पाप
व्यापार है पुण्य
व्यापार है सब कुछ
अंततः हम सब व्यापारी हैं

बाज़ार

आचार, शिष्टाचार, व्यवहार, परिवार
कितनी तीव्र हो रहा परिवर्तित संसार
घट रहा, बढ़ रहा, स्थायी नहीं, चल रहा
फिर भी सूना पड़ा मानवता का बाज़ार
  
है नहीं आता समझ क्या विस्तृत होगा
पैरा-पुतही, घास-फूस से नव-निर्मित मानव घर-बार
होगा यह चिरस्थायी क्या पुरानी ईंटों से गर्भित दीवार
या यूं ही रह जायेगा संकुचित कुंजड़े, बनिये का बाज़ार
  
नहीं सुरक्षित वैचारिक स्थिति, व्यावहारिक परिस्थिति से खण्डित आचार
छोटे छोटे खण्डों में, टुकड़ों में, हो रहा विभाजित बाज़ार
गया परिवार, लोपित शिष्टाचार, नश्वरता ही रह गया आधार
बनते-बिगड़ते शेयरों में विनष्ट हो रहा एक विस्तृत बाज़ार ॥

 

चुनावी प्रार्थना 

भगवान निवेदन तुम से है कुछ वोट मुझे भी दे देना
बदले में मुझ से लड्डू, फल जो दिल भाए ले लेना
वादा मेरा अटल रहेगा फूल कमल का रोज चढ़ेगा
कृपा पात्र हम सब हैं तेरे कृपा दृष्टि मुझ पर रखना
  
मैं साथ आपका हरदम दूंगा मरते दम तक नाम जपूंगा
हर भाषण में मैं याद करूंगा नाम आपका अमर करूंगा
मन्दिर के पास जो मस्जिद है, बस, इक पल में तुड़वा दूंगा
काम आपके मैं आऊंगा कृपा दृष्टि तुम भी रखना
  
यदि बहुमत आपका मिल जाए तो मैं कृतार्थ हो जाऊंगा
महिमा राम आपकी सबको भली-भॉति समझाऊंगा
अस्त-व्यस्त आवास आपका मैं ख़ुद जाकर बनवाऊंगा
सब रूका कार्य मैं पूर्ण करूंगा पर ख़्याल मेरा तुम भी रखना
  
चिकनी-चुपड़ी बातें सुनकर प्रभु का दिल भी बहल गया
कभी प्रचारक थे जिसके दिल उसके दिल से बदल गया
राम-नाम की अनुमति देकर प्रभु ने उनको सफल किया
ख़ुश होकर भक्त ये कहने लगा प्रभु साथ सदा मेरे रहना

मिला राज पद जब इनको सब वादों को ये भूल गए
नर तो क्या नारायण को भी बकवादी नर भूल गए
तारीख़ पड़ी न्यायालय में जब प्रभु के दिल में भी सूल किए
हो करके दुखी प्रभु कहने लगे अब साथ नहीं तेरे रहना

बदले मुझ से लड्डू फल जो दिल भाए ले लेना
जो भूल गये नारायण को अब क्या उम्मीदें उनसे है
हर सुख सुविधाएँ अपनी तो बस यार ख़ुदा के घर से है
पर एक दिन ऐसा आएगा हर काम जो उनका हमसे है

हम भी कह देंगेअनिल अब मत नहीं तुमको देना
बदले में दुआएं गिरने की चाहे तुम मुझ से ले लेना॥

 

तू अब भी वही पुजारिन

समझने लगी है यह दुनिया, माता तू हत्यारिन
नहीं समझता कोई ऐसा तू अब भी वही पुजारिन
लड़की क्या, क्या होता बेटा सबको ममता देती है
साल-साल भर कोख में रखकर महाकर्म तू करती है
  
जनती जब तू लड़का तो घर वाले भी ख़ुश होते हैं
अन्यथा लड़की होने पर असह्य ताड़ना देते है
सास-श्वसुर के ताने-बाने, पति अवहेलना करता है
देवर, ननद, आरी-पड़ोस बांझ तुझे सब कहता है
  
दिन दिन खटवाते काम कराते हो, न हो सब कुछ करवाते
पहले तो चूल्हा बरतन ही था अब गाय, भैंस, गोरू चरवाते
नहीं अन्त है, प्रारम्भ यह दुख भरे तेरे जीवन का
देखते हैं सब, जानते हैं आनन्द उठाते तुझ मज़॔बूरन का
  
फिर भी रे तू महाप्राण! जो इन सबको सह लेती है
पिसती-मरती, सब दुख सहती पर सुख संसार को देती है
ऐसे में क्या उचित है ऐसा कि तुझ को कहें हत्यारिन
नहीं, नहीं, नहीं रे, मॉ तू अब भी वही पुजारिन॥।

 

वह मज़दूर

जिसमें उत्साह था अदम
सह चुका जो हर सितम
रक्त नलिकाएं भी
दौड़ लगा रही थी
चुस्ती फुर्ती के साथ
जो था समाज की राजनीति से
बहुत दूर
वह मज़दूर
  

 

बाज़ार में 

बिक रहा था सब कुछ
‘कुछ’ के साथ ‘कुछ’
मिल रहा था उपहार में

आलू प्याज टमाटर की तरह
भाव, विचार, रीति, सुनीति
सबके लगे थे भाव
फुटकर नहीं थोक में
  
लोग ख़रीद रहे थे
सबके साथ सब
कुछ के साथ सब
एक के साथ सब
कुछ को मिल रहा था
कुछ व्यवहार में
  
मैं खोज रहा था शिष्टाचार
किसी ने चेताया
यह नहीं नीति संसार
तुम खड़े हो बाज़ार में ।

 

हम मनुष्य हैं

हम
कहते रहे
वे
सुनते रहे
उन्होंने
नहीं किया कुछ
हमने
न ही करने दिया कुछ
कुछ हुआ भी नहीं
जो हुआ भी
हम
कहते सुनते लड़ते रहे
गर्व है
हम मनुष्य हैं

 

दिन अच्छे आए हैं

जब समय की खूबसूरत बयार बह रही हो
जब मौसम हो शीतल
और गर्मी दूर दूर तक न ठिठक रही हो
दिन ऐसे ही आते हैं अच्छे
जैसे अब आए हैं
 
लाखों बुझे चेहरे पर खुशियां लाए हैं
मनहूस बने जीवन में रौनक लाकर
चेहरे को सुखी बनाए हैं
दिन अच्छे आए हैं

दिन अच्छे आएंगे
नियति हमारी सही हो
बशर्ते कि अच्छे दिन को स्वीकार करने की
हम मानते हैं स्वयं को अच्छे
और समय को मानते हैं बुरे

समय लाख बुरा हो
लेकिन दिन अच्छा आता है
खुशी का रंगत लाया है
आज आया है जैसे
लाखों चेहरे में खुशी का रंगत लाया है

 

दिन लद गये तुम्हारे कोयल

देखो! छोड़ दो सब
और इधर
बैठ जाओ चुप होकर
जगह नहीं मिलेगा छिपने के लिए

या तो चले जाओ अभी से मोह त्याग
परिवेश-परिधि से दूर बहुत दूर निकल कर
शकल पहले भी नहीं इतनी सुंदर
उलटे भीनी मधुर आवाज नहीं भाती किसी को
काँव काँव के हिमायती लोग खदेड़ ही दिये थे तुम्हें
ये तो कवि कुल परंपरा थी कर दिए थे बखान कूक की
नहीं तो पहले भी कहाँ सुनते थे तुम्हें किसे होती थी फुरसत

सुनो! रात को चिल्लाना छोड़ दो
दुपहरिया खराब करने की आदत से बाज आओ
सोने दो नींद वालों को नहीं तो ठप्पा लगेगा शोषक का
तहरीर दे देंगे तुम्हारे खिलाफ बच्चों की भावनाओं से खेलने का
बीमार बूढों को परेशान करने और जवानों को ब्लैक मेल करने का

वह दिन गया सुनकर तुम्हें याद आए
वियोगी अब तड़पा नहीं करते रहते हैं संयोग में
संदेशों के माध्यम बदल गये हैं इधर कई कई सालों से
प्रिय-प्रियाएं भी व्यस्त हैं नई सदी के तकनीकी प्रयोग में
नहीं सुनाई देता गाँव में घूम रहा है कोई बेचैन हो प्रेम-रोग में

दिन लद गये तुम्हारे कोयल!
गाँव नगर ये महानगर भ्रम हो गये हैं सब
कवि लेखक कलाकार सब भूलकर हो गये हैं विदूषक
शहनाई बाँसुरी सितार बन गये हैं सदी के सबसे बड़े प्रदूषक
उठो और देखो कोई और नगर नहीं तो बाद में रोवोगे विलखकर

 

बच रहे हैं तो रचने के लिए 

कुछ होना चाहिए
हम सब के बीच बार बार लगातार
वह हो रहा है हर बार
करना पड़ता है स्वीकार
होते रहने में ही होना है
होने में ही बचना है
बच रहे हैं हम और आप सभी
बचते हुए होना है
निमग्न होकर बचने की ख़ुशी में
 
बैठेंगे नहीं शांत होकर
यदि बचे हैं अभी तक
किन्हीं कारणों से छुट कर
रच रहे हैं एक दुनिया
एक जीवन और एक समय
रह रहे हैं जिसमें
जी रहे हैं जिसे
वर्तमान रहने का समय
है दे रहा जो हर बार

हम खुश हैं
संसार खुश है
दुखी हैं हम यदि अभी
सब के अन्दर दुःख है
सुख है कि जो है सबके साथ है
कोई अभी सनाथ है तो बाद में अनाथ है
नहीं हैं यदि इस दायरे में
स्वार्थ है या परमार्थ है

हम हंस रहे हैं
बच रहे हैं इसलिए
बच रहे हैं इसलिए कि
होने का हमें ज्ञान है
बचे रहना है आगे भी इसी तरह
इसीलिए रच रहे हैं

रच रहे हैं तो बचने के लिए
बच रहे हैं तो रचने के लिए

 

समय रोता नहीं चलता है

जब वे रो रहे थे
हंस रहे थे सब जोर जोर से
रोते सब हैं यह भूल गये थे शायद
बदल दिए थे सारा का सारा परिवेश
आवेश में इतना कि पलट देना चाहते थे
जर-जमीन-जीवन का पूरा नक्शा

भूल गए थे वे
इतिहास मिटता नहीं कभी भी
आता है घूमकर अपनी सार्थकता के साथ
उत्पीड़ित आँसू लाचार नहीं होता तब
फौव्वारा बनकर हंसी का फूटता है
सूखे जमीन से बीज बन अंकुरित होता है

बहुत दिन बाद
समय हंसा अपने पूरे जोर-जोश में
बहुत से लोग रो रहे हैं, भूल गए हैं बहुत से
रोने वालों की सुनता नहीं कोई
हंसने की तमीज में रोना भी तो आए भला
समय रोता नहीं चलता है अपने वेग से

बहना आता है
बहो दिल खोलकर समय के साथ
हंस रहे हैं सब, तुम रोओगे दुनिया हँसेगी
पगला गया है कहकर मारेगी पाथर
विस्थापित हो जाओगे अपने ही गाँव, घर, नगर से
सुनो! बहुत हँसे हो अभी तक रोएगा कौन??

 

वहीं कहीं 

मन वहीं कहीं भटक रहा था
टहल रहा था वहीँ कहीं
वहीं कहीं से हुआ था निरास
भ्रमण कर रहा है वहीं कहीं

वहीं कहीं से सीखा था चलना
अब रुका हुआ है वहीं कहीं
वहीं कहीं से जुड़ा था कभी यह
फिर जुदा हुआ है वहीं कहीं

वहीं कहीं से खुश था अब तक
दुखी हुआ है वहीं कहीं
वहीं कहीं था याद सब कुछ
सब भूला हुआ है वहीं कहीं

वहीं कहीं सब इसके अपने थे
सपने हुए हैं वहीं कहीं
वहीँ कहीं थे घर-घराने कभी
बेगाने हुए हैं वहीं कहीं

मन के हारे ही हार है अब
मन के जीते ही जीत है
मन के द्वारा ही घृणा है जीवन में
मन के द्वारा ही प्रीति है

मन कहता था सब अपने हैं
बेगाने हैं कहीं कहीं
अपनों से ही अपने हारे हैं
सपने हैं खाली वहीं कहीं

 

सुनो बादल

सुनो बादल !
गर्जना सुनकर तुम्हारी
बच्चे अब रोते नहीं
हँस पड़ते हैं खिलखिलाकर
आतंकित नहीं होते बड़े
समेटते नहीं सामान
कि तुम बरसोगे
खुश होते हैं नाचकर
तुम जब छाते हो
बिजली की तड़क में उन्मादित होकर
पंछी भागते नहीं नीड़ में अपने
कलरव करते हैं भर आह्लादित स्वर
चींटे ढोते नहीं चिउरारी
मदमस्त होकर
परिवार के साथ आराम करते हैं
बतलाते हैं सब परिवार
अच्छा है कि
परिवेश में बची है इज्जत
तड़कना भड़काना छोड़कर
सीख लो मुस्कुराना
नहीं तो जानते हो?
मनुज हैं हम
आता है हमें सिखाना ॥

 

प्रेम भी गुनाह है

प्रेम की बात करना
जीवन का बड़ा गुनाह है अब यहाँ
हमारे आका ने सुनाया है फरमान
कि देखना किसी को भी प्रेम से प्रेमी की तरह
गर्चे कि, जीव हो या मनुष्य, गुनाह है अब यहाँ

जो भी हो नहीं है अपना
कम से कम यह तो मानकर है चलना
विदेश का हो तो उसको यह कहना कि अपना है
हो अपने परिवेश का तो उसको यह मानना कि अपना है
सपना है वह सब कुछ आज के परिवेश में अब यहाँ

प्रीति की रीति के साथ पेश आना
किसी भी सूरत-शक्ल में नहीं है अपराध क्षम्य
हमारे हर क्रियाकलाप यहाँ के लिए हो सकते हैं बोधगम्य
अपने सुख के लिए आगत की फसलों को भी सुख देने की परिकल्पना
समय-समाज के नजरिये से जीवन-जगत में बड़ा अपराध है अब यहाँ

इसीलिए अब यहाँ कहीं भी
नहीं दिखाई देते आदमी इंसान की तरह
सभी चाहते हैं सुरक्षा सब से बचते हुए यहाँ अब
सभी के हैं अपने हथियार तने हुए अपनी देखभाल में आजकल
छोड़कर मनुजता के पथ सभी हो गये हैं आतंकवादी अब यहाँ

 

आओ अब

आओ अब
कि आ जाओ अब
आओ न करो अब देर
बीत गई रात हैवानियत की
 इधर की हो गई मानवीय सबेर

गाओ अब
कि गाओ बजाओ अब
गाओ न लखो मुंह अब फेर
सभी जग उठे हैं सब को है चिंता
इधर सभी ने कहा हुई बहुत अंधेर

आओ अब
कि आओ बस जाओ अब
बसाओ दुनिया न करो अब देर
हुए तुम विस्थापित दूनिया से मेरे जो
करो स्थापित स्वयं को हे प्रकृति के कुबेर

 

ठहरो तुम

ठहरो तुम !
देखो धारणाएँ कुंठित हो चुकी हैं
बुझ चुकी है बत्ती
घुप्प अँधेरा छा चुका है
जा चुकी है रोशनी चाँद की भी अब
सूर्य को भी मरा घोषित कर दिए हैं लोग कल की रात में

ठहरो तुम !
खदेड़कर चाँद को बस्ती से, जुगनू को
स्थापित करना चाहते हैं
नहीं भाता समय की गति
नियति सबकी यही कि
समय को साथ रखना चाहते हैं
घर रख कर छाता बादल को गाली दे रहे हैं लोग बरसात में

ठहरो तुम !
कि चलने जैसा कुछ भी नहीं है
तुम दौड़े जा रहे हो
अलानाहक लोग शक करेंगे
लौट आओ और जश्न मनाओ
तारे गुमनाम हुए हैं गीत गाओ मुक्ति का
सब बंधे हैं न बोलने की मजबूरी से मौन बैठे हैं सबके साथ में

ठहरो तुम !
मैं अभी आता हूँ घूमकर उधर से
परिवेश के हालात ठीक नहीं हैं
चोर लगातार घूम रहे हैं सिपाही के वेश में
पकड़े जा रहे हैं हंस
बगुले नृत्य कर रहे हैं ढपली बजाकर
डरे-सहमे मुर्गे बांग लगाना छोड़ चुके हैं इन दिनों प्रभात में

ठहरो तुम !
कि ठहरने जैसा कुछ भी नहीं है फिर भी
चलने की प्रक्रिया से तोबा करो
बुद्धिमानी ही नहीं है चलते रहना लगातार
ठहरना सही अर्थों में
अपने ढीले होने का सबूत देना ही नहीं है
समय के साथ सामंजस्य बिठाना भी है संग साथ में

 

 

कुछ नहीं होता

समय के पहले
या बाद समय के कुछ नहीं होता
जो भी होता है
अपने समय पर होता है

कोयल का कुहुकना
मुर्गे का बाग़ देना
मंडराना भौरें का
कौवे का काँव काँव करना

सब कुछ अपने समय पर होता है
नहीं होता कुछ भी अनिश्चित
कुछ भी आकस्मिक नहीं होता है

समय आता है
और बदलने लगता है सब कुछ
जो जानते हैं चुप रहते हैं
नहीं जानते हैं जो वे चिल्लाते हैं

सब को अंदाजा होता है
बसंत का महीना है तो कोयल ने कुहुकना है
बरसात का महीना है
करना है मेढक ने टर्रटोइ टर्रटोइ

वे चुप हैं
ऋतु के बीत जाने का इंतज़ार कर रहे हैं
वे हैरान हैं चुप्पी में सनसनी फैलाकर
अपने होने का ऐलान कर रहे हैं

 

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