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अनिल पुष्कर की रचनाएँ

७२० / २५० असलहों का कारीगर-1

अख़बार की सुर्ख़ियों में पढ़ना
‘बिलाल’ मेरा नाम

किसी को
ख़बर नहीं, क्या हुआ ?

उसने कहा — निशाना चूकना नहीं चाहिए इस बार
जिन लोगों ने सुना, मन में सन्देह और डर,
किसे मारने की योजना है ?

कोई किसी को इस तरह षड्यन्त्र रचे मार सकता है ?
क़ातिल ने किसी भी टिप्पणी से इनकार किया ।

हैरानी इस बात पर है कि योजना के मुताबिक़
जिनकी मौत तय थी
उन्हें मार दिया गया ।

और क़तिल की ताजपोशी हुई ।

७२० / २५० असलहों का कारीगर-2

‘डाई अनदर डे’
इसी बीच रिलीज़ हुई ।

दूसरी ओर आस्था का बचपन बुरा गुज़रते देखा गया

किसी ने देखा, भरी पूरी नंगी आँखों से हुस्ना को
वो जान से मार देती मगर
विस्मरण से ग्रसित झाँकती है अतीत
एक नाव डूबती उतराती है समन्दर में

वो नए हालात तलाश में इधर उधर भटकती
उत्तर अमरीका, न्यूयार्क शहर और न्यूजीलैण्ड से होती हुई
हिन्दुस्तान आ पहुँची है
लगा रही है चक्कर

लार्ड आफ़ द रिंग्स की यादों के साथ
देखा साबरमती ट्रेन धधकती जल रही है

गिर रहा है गर्भ, मुल्क की कोख से
अनचाही ख़्वाहिशों को सदा के लिए मिटाया जाना तय हुआ है ।

 

७२० / २५० असलहों का कारीगर-3

वो ऐसी चौखट पर चढ़ा
जिसे दिव्य समझता है
उसने सर झुका माथे लगाया ।

अब वो जिन सम्पदाओं को बेचना चाहता है
ख़रीददार मिलते ही
हाथ बढाए, कन्धे मिलाता है

जिन लोगों से उसे नफ़रत है
उन पर आग के गोले बरसाता है

एक हत्यारा पल भर में
कितनी ज़िन्दगियाँ लील सकता है ?

विशेषज्ञ पड़ताल में लगे हैं
गणितज्ञ हल करने में जुटे हैं
या विज्ञान कह पायेगा ?

विरोध की जबान में बुदबुदाहट हो चली है
कविता कुछ तो कर सकती है ।

 

७२० / २५० असलहों का कारीगर-4

दर्ज हुआ
हत्यारे का कहा —
नई सोच नई उम्मीद
मैं देश नहीं झुकने दूँगा

नफ़ीस कवि, संगीतकार, कलाकार और अन्य
क़दमताल मिलाने की ख़ातिर
शान्ति का मसीहा कहकर बरसा रहे हैं फूल

शंखनाद के साथ
नई महाभारत कथा का आरम्भ
जिरह करने वाले माफ़ न किए जाएँगे
दुआ माँगने वाले नहीं बख़्शे जाएँगे
चुपचाप सहन करने वाले मारे जाएँगे ।

हर हत्या के बाद राजधर्म का अनुसरण किए हुए
हत्यारा आगे बढ़ रहा है ।

उसे दम्भ है इस अश्वमेघ यज्ञ पर ।

 

गीता का नया अनुवाद 

वो प्रजा-राजा और राजा-प्रजा का खेल
बड़ी चतुराई से दिखाता है
वो भारत का इतिहास बताता है और
इस बहाने इतिहास में अपनी जगह बनाता है
वो पुराण-कथाएँ सुनाता है
और जनता का मन बहलाता है
वो भविष्य का चित्र बनाता है
देश दुनिया का रंग बदलता जाता है
वो तरक्की के नए-नए पाठ लिखता जाता है

साथ ही बताता है
गीता का नया अनुवाद
किस देश में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है
और यह बताते हुए
देश का पहिया थोड़ा आगे खिसक जाता है

वो कहता है
प्रजा के हाथ में अधिकार आने से
राजा प्रजा एक हो गए

भला, तुम्हीं बताओ
ऐसा होता है क्या ?

 

प्रधानमंत्री ज़िद पर अड़ा है

ज़रा देखो तो झाँककर कि संसद चल रही है
लोकतन्त्र बार-बार कहता है मैं बैठक में हूँ
और वो सण्डास में बैठा हुआ बीड़ी फूँकता है
जहाँ देश के नीति-निर्माता अपने पुट्ठे धरे विराजमान हैं
प्रधानमन्त्री देश की नई-नई नीतियाँ उलटा रहा है
एक दुर्गन्ध उठ रही है एक उबाल आने-आने को है
एक अनकहा भभका बुलबुला-सा फूटने को है
एक अनचाहा गर्भ गिराया जा रहा रहा है मातृभूमि की कोख से
और एक अनचाही प्यास और भूख पर कार्रवाई होने को है
हुक़्मरानों का पतीला और हाण्डी में पकाया जा रहा है जनता का ख़ून
और वो देश की मूत्र-कोशिकाओं में जमा है

और जो बिकाऊ है
वो अभी तक बीच आँतों में बम की तरह फटने की प्रतीक्षा में है
संसदीय वाद-विवाद में कुशल आदमी कर रहा है नेतृत्व
वो ताक़तों का व्यापार करना भली-भाँति जानता है
वो अर्थ की मज्जमत को तरक्की बता रहा है
वो अपाहिज करती चिकित्सा को फ़ायदेमंद बताता है
नेस्तोनाबूद करती योजनाएँ कारगर और मुफ़ीद बता रहा है

वो जब भी दाख़िल होता है शाही द्वार के भीतर
साथ-साथ जाते हैं तमाम सुरक्षाकर्मी बिना असलहे
तमाम दलों के शीर्ष निर्वाचित सदस्य
और उनमें भी
संसद का अध्यक्ष — समर्थक और विपक्ष को इजाज़त देता है
मान्यवर कहें अपनी बात -– कम शब्दों और निर्धारित अवधि में कहें
कुर्सी पर बैठ या तो गम्भीरता से अनौपचारिक हलचलें ताकते हुए
सभा स्थगित कर देने का फ़रमान जारी करता है ठसक के साथ

देश की दाल रोटी पक रही है देश के इस सण्डास में
तरक्की चल रही है देश के सण्डास में
तय हो रहे हैं फ़ैसले देशहित-जनहित के इस सण्डास में

सामने एक शख़्स खड़ा है पुराने वाकयात दोहराता
गुज़रे ज़माने का वाहियात इतिहास दोहराता
और मुस्तकबिल की ओर देखता है
देखता है सवाल पेश हो रहे हैं
ख़याल आया किधर जाएँ कि ख़्वाहिशें कमज़ोरियों के हवाले न हों
वो दोहराता है दुनिया तेज़ी से बदल रही है
हमें उसी रास्ते पर चलना है पीछे छूट गई चीज़ें वापिस लाना है
इस तरह वो एक नए नक़्शे पर अपनी नज़र गड़ाता है
कहता है जितनी ताक़तें इंसान को मिली हैं
हम उसी दरवाज़े पर खड़े हैं इंसानियत खड़ी है
हमें वो ताक़त हासिल करना है
दुनिया के नक़्शे में आगे बढ़ना है

आइए, हम आपका रुख साफ़ करने को संसद के भीतर लिए चलते हैं
जहाँ इस वक़्त सत्र के आरम्भ में पक्ष, विपक्ष और निष्पक्ष सभी मौजूद हैं
सबके इरादे मज़बूत हैं और समर्थन के लिए सबकी हथेलियाँ खुली हैं
कि कब कितनी रहमत बरसे कि मुद्दा बहुसंख्यक सहमतियों के पार पहुँचे
याकि सर्वसहमति बने और सुविधाएँ बहाल हों यानि
संसद को तरीके से लोकतन्त्र खाने को मुहाल हो
एक ख़्वाहिश है

मुद्दा ये नहीं कि कितने मरे भूख से, कोई कहे
कितने दंगों के शिकार नीतियों की भेंट चढ़े
कितने मजहबी बँटवारे की रस्म में मारे गए
कितने अर्थतंत्र की उदारता में गुमशुदा हुए
उनकी इस बात में दिलचस्पी है कि राजनायकों के नफ़े और नुक़सान से
तय होगा सूचकांक और तय हो लोकतन्त्र का भविष्य
जो बिना रीढ़ और दाँत के जबड़े खोले खड़ा है

देखो जालिम के सिहासन पे उदारता का प्रतीक
तरक्की, बेहतरी की ख़ातिर देश का प्रधानमन्त्री ज़िद पर अड़ा है ।

 

उस रात

उस रात,
बारूद के गोले बरसे थे

उस रात,
कयामत बरसी थीं और हम
ख़्वाबगाह में जीने को
कतरा-कतरा तरसे थे

उस रात,
अनचाहे हत्याएँ जारी थीं

उस रात, इल्म के पर
अपने लहू में डूबे थे

उस रात,
कुफ्र की खुलेआम आजमाईश थी

उस रात,
ख़ुदगर्ज़ हुकूमत की नंगी घिनौनी नुमाइश थी
उसकी छाती पर चस्पा ढेरों क़ातिल ख़्वाहिश थीं

उस रात
आसमान से गुजारिश थी
कि बिजली कड़के, बादल बरसे,
घोर अन्धेरी स्याह रात के ओले टूट गिरें

मगर,
ये हो न सका

उस रात
क़ातिलों के साजिश की बेवजह कामयाबी थी

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