अनिल विभाकर की रचनाएँ

इंद्रजाल 

यह है इंद्रप्रस्थ का इंद्रजाल
इसमें भूखी-नंगी जनता सुनहरे सपने देखती है
और महारानी के दर्शन भर से धन्य हो जाती है ।
ग़रीब जनता गौर से निहारती है महारानी को
उनमें उसे सत्यहरिश्चंद्र की आत्मा नज़र आती है
उसे लगता है वे महारानी नहीं, सत्य हरिश्चंद्र की नया अवतार हैं

इंद्रप्रस्थ की रानी कहती है देश में भ्रष्टाचार बढ़ गया
करोड़पतियों की संख्या तो बढ़ी
ग़रीबों की आबादी में भी इजाफ़ा हुआ
रानी कहती है ग़रीबी और भ्रष्टाचार बेहद चिंता की बात
जनता जवाब नहीं माँगती
वह तो मंत्रमुग्ध है उनके सम्मोहन में

ऋषियों का यह देश चाणक्य का भी है
चंद्रगुप्त का भी
सपने तो टूट ही रहे हैं
जिस दिन टूटेगा इंद्रजाल जनता पूछेगी
रानी जी! फिर कलमाड़ी को क्यों बचाया ?
और राजा को क्यों हटाया?
महारानी जी! थरूर पर हुई थू-थू
फिर भी कम नहीं हुई मनमोहन की मुस्कान
ये सब के सब तो आप के ही प्यादे हैं न
राज आपका
बिसात आपकी प्यादे आपके
संविधान में सरकार भले ही चलती है संसद से
हक़ीक़त यह है कि दस जनपथ की इच्छा के बिना
सात रेस कोर्स का पत्ता तक नहीं हिलता

रानी जी, पूरा देश जानता है
आपकी मुस्कान से ही मुस्कुराते हैं करोड़पति-अरबपति
आपके चहकने से आमजन हो जाता है मायूस
दरअसल सिर्फ़ कहने को जनपथ में रहती हैं आप
भले ही इस देश में आपका अपना कोई घर-बार नहीं
हक़ीक़त में आप राजपथ की रानी हैं
तौर-तरीके और रहन-सहन से तो यही लगता है
आप इंद्रप्रस्थ की महारानी हैं ।

समय आने दीजिए महारानी जी!
भूखी-नंगी जनता करेगी आपकी करतूतों का पूरा हिसाब
पूछेगी क्या हुआ अफ़ज़ल का, कहाँ है कसाब ?
पूछेगी क्या संसद से भी बड़ा है होटल ताज ?
महारानी जी यही है आपका राज ?

ज़रूर टूटेगा एक दिन इंद्रजाल
और भूखी-नंगी जनता को लगेगा
आपमें नहीं बसती है सत्य हरिश्चंद्र की आत्मा ।

बीज

बस थोड़ी सी मिट्टी चाहिए
थोड़ी सी मिट्टी मिली नहीं कि उग जाते हैं बीज
जड़ें कितनी गहरी होंगी
कोई चिंता नहीं
उगने का उत्साह उनमें कभी कम नहीं होता
पता नहीं क्यों खत्म हो जाता है
आदमी का उत्साह

जब भी खत्म होने लगे उत्साह
बीज हमेशा देंगे आपका साथ
जब भी घटने लगता है उत्साह
हमें हमेशा याद आते हैं बीज
और घने पेड़ की तरह हरा हो जाता हूं मैं।

कस्तूरीमृग 

ये तृण तेरे हैं कस्तूरीमृग!
ये तृण दिल में उपजे हैं
दिल की पूरी ख़ुशबू और स्वाद है इनमें
पूरी गहराई है दिल की, गहरा प्यार है इनमें

रिश्ते की बुनियाद पद और पैसे से नहीं बनती
ब्रह्मे होटल वाले से मेरा सिर्फ़ तीन रुपए का रिश्ता है
हर सुबह सिर्फ़ तीन रुपए की चाय का
उसका कोई बड़ा ग्राह्क भी नहीं हूँ
दुनियादारी के हिसाब से
उसकी न तो मुझसे कोई बराबरी
न ही मेरे सामने उसकी कोई हैसियत
फिर भी रिश्ता है
गहरा रिश्ता, आदमीयत का
हर सुबह सिर्फ़ तीन रुपए की चाय ने मुझे उससे गहरे जोड़ रखा है
इतना गहरा कि पाँच सितारा होटल की हर चीज़ फीकी है उसके सामने
यही है रिश्ते की गहराई, यही है रिश्ते की बुनियाद

रिश्ते पैसे से नहीं बनते कस्तूरीमृग !
रिश्ते रंग से नहीं बनते
दिल का रिश्ता हर रिश्ते से बड़ा है, हर रिश्ते से ऊपर
ख़ून के रिश्ते से भी कहीं ज्यादा भरोसेमंद, कहीं अधिक टिकाऊ
दिल कभी अमीर-गरीब नहीं होता मृगनयनी !

ये तृण तो तेरे ही हैं, उगे हैं सिर्फ़ तेरे लिए
देखो इनकी हरियाली, देखो इनकी ताज़गी
महसूसो इनका स्वाद, सपनों के पंख लग जाएँगे
ये कभी पराए नहीं लगेंगे तुम्हें ।

ख़तरे की घंटी

दुनिया को बांटो
जितने हिस्से में चाहो बांटो

सड़कों को बांटो
पगडंडियों को बांटो
घरों को बांटो
दिलों को बांटो
समाज को बांटो
शहरों को बांटो
गांवों को बांटो
इसी तरह पूरी दुनिया को बांटो
जहां तक हो सके बांटो
बांटो … बांटो जल्दी बांटो
व्यवस्था बनाये रखने के लिए जरूरी है सबको बांटना
सिंहासन बचाये रखने के लिए भी जरूरी है सबको बांटना
एक राय और एक राह पर लोगों का चलना
तुम्हारे राजसिंहासन के लिए खतरे की घंटी है

बांटो, सबको बांटो, जल्दी बांटो

स्वाद 

मुझे उन आँखों में आँसू नहीं दिखने चाहिए जो मुझे प्रिय हैं
उन होंठों पर मुस्कान चाहिए जो मुझे प्रिय हैं
उस चेहरे पर उदासी नहीं, ख़ुशी चाहिए जो मुझे प्रिय है
उस दिल में हताशा नहीं चाहिए जिसमें मैं रहता हूँ
सागर की लहरों-सा प्यार हमेशा बुलंदियों की ओर ले जाता है
ज़िंदगी धरती पर तो होती है, देखती है हमेशा आसमान की ओर
आसमान में उड़ते हैं पंछी बिना धरती का सहारा लिए
यह नहीं कहता कि धरती ज़रूरी नहीं
बिना आसमान के धरती भी बेकार है

आसमान में सूरज होता है
तारे होते हैं
चाँद होता ख़ूबसूरत-सा बिल्कुल सोने जैसा
इन सब के बगैर सूनी हो जाएगी धरती
बिल्कुल ऊसर लगेगी रेगिस्तान की तरह

स्वाद के बगैर नहीं चलती ज़िंदगी
बिना किसी स्वाद के कैसे कटेगा यह पहाड़
पहाड़ नहीं पंछी बनने दो इसे ।

रीढ़

इस देश का कोई कोना नहीं बचा
कोई बाजार नहीं
हर जगह तलाशा-पूछा
लौटना पड़ा खाली हाथ

दौलत के बल पर गुर्दा मिला, जैसा चाहा वैसा
ख़ून मिला, बिल्कुल असली
शरीर के ढेर सारे अंग मिले
किराए पर मिली कोख भी

जहाँ भी की रीढ़ की बात
ढेर सारी रीढ़ दिखाई सौदागरों ने
पसंद नहीं आई एक भी
सब लुंज-पुंज

मुँहमाँगी क़ीमत देने को तैयार था
धरा रह गया पूरा खज़ाना
एक नहीं ढेर सारी मिलीं तनी हुई तर्जनियाँ
कहीं नहीं मिली तनी हुई रीढ़
दुकानदार ने कहा – यहाँ क्या कहीं नहीं मिलेगी
विष्णु के सात फनों वाले
शेषनाग की तरह दुर्लभ है यह ।

बिना तनी हुई रीढ़ के चल रहा है यह देश
यही है देशवासियों के दुख की असली वज़ह

स्वर्ग 

सिर्फ़ आस भर है आसमान
आसमान में नहीं है कहीं स्वर्ग

छान रहे हैं कब से हम अंतहीन आकाश
लौट आए अंतरिक्ष-यात्री चंद्रलोक से
देखा है करीब से कई ग्रह-पिंडों को
बंजर हैं सारे ग्रह-पिंड

कहीं नहीं मिला कोई जीवन

चाहे कितना भी बड़ा हो आसमान
जितना भी हो विस्तृत
किसी कल्पित स्वर्ग में नहीं
वह उतरता है तो इसी धरती पर

नदियों में उतरता है पूरा का पूरा आसमान
पसरता है झील में
दिन भर का थका-हारा सूरज विश्राम लेता है अरब सागर में
तरोताजा हो कर, सुबह-सुबह
निकलता है पहाड़ों के पीछे से

आसमान में नहीं है कोई सागर
जहां सूरज स्नान कर सके
थक-हारकर विश्राम कर सके
उसे प्रिय है बंगाल की खाड़ी स्नान के लिए
प्रिय है विश्राम के लिए अरब सागर

लहरों पर लचकने के लिए
चाँद को भी चाहिए झील और नदी
आसमान में नहीं है कहीं नदी, कोई झील
आसमान में नहीं है लुहार की भाथी
नहीं है हल

न तो करघे, न कपास, न सूत
न खुरपी, न कुदाल
न ढिबरी, न लालटेन
न ढोल, न शहनाई
खोमचे, लोखर-नरहनी
छेनी-हथौड़े कुछ भी तो नहीं है आसमान में

न बया के लिए तिनके
न गोरैया के लिए धान
न तितली के लिए फूल
न अलाव के लिए लकड़ियाँ
स्वर्ग के लिए ज़रूरी है इन चीज़ों का होना
बेज़रूरत की चीज़ भी नहीं है आसमान में ।

शबरी के बेर

जो जानते हैं शबरी के जूठे बेर का स्वाद
उन्हें कभी नहीं होता भरम
वे ख़ूब जानते हैं कि क्या होता है धरम
क्या होता है करम

जो नहीं खींचती अपनी लकीर
वह रुक्मिणी बनती है
जो खींचती है, वह राधा
मीरा भी बनती है वह
उसे कभी नहीं होता धूल और धरम का भरम

राधा बेहिचक दे देती है अपनी चरण-धूलि
पीड़ा से परेशान कृष्ण के लिए
मीरा बेहिचक पी लेती है प्याला ज़हर का
रुक्मिणी के दर से लौट जाते हैं नारद खाली हाथ
धर्म के भरोसे बैठी रुक्मिणी
मौक़ा मिलने पर भी नहीं समझ पाती कदम्ब की भाषा
लगता है एकतारा बजाने के बाद भी
भूल गए थे नारद शबरी को ।

निर्भरता

जैसे सीधे-सीधे देख नहीं सकते अपना चेहरा
जान नहीं सकते
सीधे-सीधे अपने चेहरे के बारे में
जानने के लिए या तो देखना होगा आईना
या विश्वास करना पड़ेगा किसी के बताए पर

वह जो बताएगा
कितना सही होगा, कितना ग़लत
यह जानने के लिए भी ज़रूरी है कोई न कोई माध्यम

यह माध्यम आईना भी हो सकता है
नदी का परदर्शी जल भी
नदी भी निर्भर है बादल पर
बादल भी निर्भर है सूरज पर
धूप, हवा, पानी सब कुछ निर्भर है
कहीं न कहीं किसी पर

बचा लीजिए अपनी नदी
उसका पारदर्शी जल
बोलने दीजिए आईने को सब कुछ सच-सच
अपने आपको जानने के लिए ज़रूरी है इन सबका होना।

कारगुजारियां

सेंध सब जगह लगी है
दो-एक जगह बची होगी
तो देर-सबेर वहां भी लग जाएगी

दूब पर बैठी तितली और वह तड़पने लगी
फीका पड़ गया उसका रंग
फूल पर बैठी तितली
और वह गश खा गई कीटनाशक की तेज़ गंध से

बच्चे ने पिया बाज़ार का दूध
और सूज गई उसकी आंत
चढ़ आया बुखार
डॉक्टर ने दी दवा उससे भी कोई फायदा नहीं
वह भी निकली नकली

किस-किस पर करें शक
किस-किस पर करें भरोसा
दूब हो या फूल या गाय
कैसे मढ़ें इन पर दोष
खुद तो नहीं बनती दवा भी

सत्तू हो या नमक
चाय हो या तेल
साबुन-सोडा कुछ भी हो
सेंध लगी मिलेगी सब जगह भरोसे पर

कहीं कोई उजड़ रहा है
कहीं कोई मर रहा है
दौलत की इस अंधी दौड़ में ये कारगुजारियां
हम आप में से ही तो कोई कर रहा है।

क़ातिल

ख़तरनाक से ख़तरनाक बातें कर जाते हैं लोग
बड़े ही खूबसूरत अंदाज़ में
यह खूबसूरत शैली उनमें जन्मजात होती है

कुछ-कुछ तो दिखने में वैसे ही होते हैं खूबसूरत
वे ख़तरनाक होते हैं या खूबसूरत
यह समझना आपका काम है

एक ने कहा आदमी और पौधे में
एक बहुत ही खराब आदत होती है
एक जगह रहने को थोड़ा-सा समय मिला नहीं कि पसारना शुरू
कर देते हैं अपनी जड़ें
थोड़े-थोड़े समय पर बदल देनी चाहिए इनकी जगह

यह खूबसूरत सूत्रवाक्य हो सकता है
हो सकता है सुनने में कुछ लोगों को अच्छा भी लगा हो
ऐसा कहनेवाला मुझे किसी क़ातिल से कम नहीं लगता

जड़ें नहीं पनपेंगी तो सूख जाएंगे पौधे
आदमी भी कैसे पनपेगा मजबूत जड़ों के बिना

हैरत की बात तो यह है
ऐसा कहनेवाला खुद नहीं बदलना चाहता अपनी जगह

बौने 

बौने चढ़ गए पहाड़
तोड़ लिया ज़मीन से रिश्ता

उनके पहाड़ चढ़ने से हमें क्या एतराज
पहाड़ पर चढ़े बौने और भी बौने नज़र आते हैं

इस युग में कठिन ज़रूर है मेरुदंड की रक्षा
मुश्किल में है नमक की लाज
घोंसले में कब घुस जायेंगे सँपोले
कठिन है कहना

सच तो यह भी है
बौने, बौने ही नज़र आएँगे राजसिंहासन पर भी

बड़े होने के लिए ज़रूरी है ख़ुद का क़द बढाना
बड़े कद वाले भी बौनों की तीमारदारी में
जब गाते हैं राग राज, पढ़ते हैं कसीदे
वे बौने हो जाते हैं ।

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