अनीता सिंह की रचनाएँ

फिर छाई है कारी बदरिया

फिर छाई है कारी बदरिया
ओ पावस! बिन बरसे ना जा।

दूर क्षितिज पर आँख गड़ाये
फिर से बादल लौट न जाये
रह जाये न आस अधूरी
सोच-सोच हियरा घबराये।
चमक उठी घन बीच बिजुरिया
ओ पावस! बिन बरसे ना जा।

किरणें आई थीं मुस्काती
मौसम ने भेजी थी पाती
लाज निगोड़ी राह खड़ी थी
बोलो, फिर मैं कैसे आती
छलक उठी फिर नयन गगरिया
ओ पावस! बिन बरसे ना जा।

पनिहारिन की गगरी खाली
बगिया कैसे सींचे माली
अमराई में खाली झूले
अब तो आ जाओ री आली
राह निहारूँ चढ़े अटरिया
ओ पावस! बिन बरसे ना जा।

 

जाने मन क्यूँ भाग रहा है 

सोते सोते
जाग रहा है
जाने मन क्यूँ
भाग रहा है।

कलतक थी मद्धम पुरवाई
सुरभित था आँगन अमराई
जबसे बैरी पछुआ आया
कोमल मन किसलय मुरझाया
दिन बदला
रातें भी बदली
कबतक रुककर
फ़ाग रहा है।

बिहँस रही थी क्यारी-क्यारी
महमह थी सारी फुलवारी
रूप भी कबतक साथ निभाता
उन फूलों से कैसा नाता
डाल से छूटी
पंखुरियों में
लिपटा कहाँ
पराग रहा है।

प्यासे बैठे रहे बेचारे
ढेरों पत्थर ताल किनारे
लहर-लहर है, छूकर जाती
लेकिन प्यास नहीं बुझ पाती
याचक था
पत्थर बन बैठा
दाता बना
तड़ाग रहा है।

 

रंग भर दे 

मन मेरा
कोरा पटल
इंद्रधनुषी रंग भर दे।

गुम गई-सी है हँसी, ढूंढते हर राग में
झाँक आये हैं कुँए में, देख आये बाग़ में।
बूटे बूटे को खबर थी, मन मेरा सूना हुआ
दिल में मेरे टिक न पाया, बांधते किस ताग में।
मेरे घर का
पता देकर
ख़ुशी से मनुहार कर दे।
रंग भर दे।

गहन सूनापन गगन का, उतर आया है नयन में
हो रहा निर्भाव-सा मन, शिला-सी सख्ती अयन में।
शून्य सारी हैं दिशाएं, चेतना भी शून्य है
घड़ी भर पलकें न लगती, नींद निर्वासित शयन में।
लालिमा उषा की लेकर
प्रीत का भिनसार कर दे।
रंग भर दे।

गीत कोई गुनगुना दे, पाखियों की चहक देकर
गंध पूरित देह कर दे, केवड़े की महक देकर।
ओढ़नी में टांक डाले, चाँद तारों की लड़ी
तेज को उद्दीप्त करदे, चिर सुहागन दहक देकर।
तितलियों के पंख से
रंग, चुटकी भर उठाकर
कोई तो शृंगार कर दे।
रंग भर दे।

 

और, हमदोनों

रात, चंदा का ईशारा
और, हमदोनों।

मगन मन वंशी गगन पर
जब बजाता है कलाधर
गोपिका-सी तारिकाएं
क्षितिज से आती निकलकर
रास जैसा हो नज़ारा
और, हमदोनों॥

दपदपाती फुसफुसाती
जुगनुओं की अनकही
सुन रही रजनी अकेली
चातकों की बतकही
रात ने आँचल पसारा
और, हमदोनों॥

मुस्कुरा कर एक भँवरा
सो गया है कमलदल में
थीर जल-सा थीर होकर
युग को जी लें एकपल में
रेत, दरिया का किनारा
और, हमदोनों॥

 

मुस्कुराते हैं बस हँसी लिखकर

मुस्कराते हैं बस हँसी लिखकर
रेत पर छोड़ दी खुशी लिखकर।

रात चुपचाप लौट जाती है
पत्ते पत्ते पे फिर नमी लिखकर।

जुगनुएँ रात को दे आईं हैं
अपने हिस्से की रोशनी लिखकर।

जिनके हिस्से में प्यास आई थी
जाम चूमे हैं तिश्नगी लिखकर।

जी उठेंगे जो मेरे मरने से
उनको आये हैं ज़िन्दगी लिखकर।

अपनी किस्मत की स्याह चादर को
ओढ़ लेते हैं चाँदनी लिखकर।

सबसे बेबस है कौन लिखना था
लौट आये हैं आदमी लिखकर।

 

सबसे जटिल कार्य दुनिया में,वचन का फ़र्ज़ निभाना भी 

सबसे जटिल कार्य दुनिया में, वचन का फ़र्ज़ निभाना भी
लेट के शर की शैय्या पर पड़ता है क़र्ज़ चुकाना भी।

मुश्किल में भी मुस्काने का, रखते हैं कुछ लोग हुनर
कमज़ोरी साबित करता है, ग़ुस्से में आ जाना भी।

सहनशीलता को कमज़ोरी जब भी समझा जाए तो
सहनशील को आवश्यक है तब ताक़त दिखलाना भी।

छली गई जब कोई अहल्या, प्रस्तर होकर दंड सहा
इंद्र को लेकिन शापित होकर, पड़ा वहीं पछताना भी।

कई बार प्रतिकूल समय में, वचन तोड़ना पड़ता है
कुरुक्षेत्र में केशव को, पड़ गया था शस्त्र उठाना भी।

 

अपनी रहमत की इक नज़र दे दे 

अपनी रहमत की इक नज़र दे दे
मेरी आवाज़ में असर दे दे।

आज की रात मुझपे भारी है
साथ मेरा तू इक पहर दे दे।

कल हमारा सितारा चमकेगा
आसमां को कोई ख़बर दे दे।

चांद-तारों की किसको ख़्वाहिश है
इक नशेमन ज़मीन पर दे दे।

जिसके दम पर मैं ज़िन्दगी जी लूं
इक मुलाक़ात मुख़्तसर दे दे।

 

 

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