Poetry

अनुप्रिया की रचनाएँ

पहचान

जब होती हूँ
पंख
उड़ जाते हो थामकर मुझे
नीले विस्तार में
जब
होती हूँ ख़्वाब
भर लेते हो अपनी आँखों में
जब
होती हूँ बूँद
सागर बन समेट लेते हो
अपने आग़ोश में
जब
होती हूँ सुबह
भर देते हो हुलसते फूल
मेरी हथेलियों में
पर जब होती हूँ मैं
अपनी पहचान
तोड़ लेते हो
मुझसे
पहचान के सारे नाते…।

एक माँ की डायरी

तुम हँसती हो
हँस उठता है मेरा सर्वांग
तुम्हारी उदासी
बढ़ा देती है मेरी बेचैनियाँ
तुम उड़ती हो
उड़ जाता है मेरा मन
आकाश की खुली बाँहों में बेफ़िक्री से
तुम टूटती हो
टूट जाता है मेरा अस्तित्व
भड़भड़ाकर
तुम प्रेम करती हो
भर जाती हूँ मैं
गमकते फूलों की क्यारियों से
तुम बनाती हो
अपनी पहचान
लगता है
मैं फिर से जानी जा रही हूँ
तुम लिखती हो कविताएँ
लगता है
सुलग उठे हैं
मेरे शब्स
तुम्हारी क़लम की आँच मैं।

अँधेरों के विरुद्ध

पिघलने दो
बर्फ़ होते सपनों को
कि
बनते रहें
आँखों में उजालों के नए प्रतिबिम्ब
छूने दो
अल्हड़ पतंगों को
आकाश की हदें
कि गढ़े जाएँ
ऊँचाई के नित नए प्रतिमान
बढ़ने दो
शोर हौंसलों का
कि
घुलते रहें
रोशनी के हर नए रंग
ज़िन्दगी में
हर अँधेरे के विरुद्ध।

माँएं 

सबसे बचा कर
छुपाकर
रखती है संदूक में
पुरानी,
बीती हुई ,
सुलगती, महकती
कही
अनकही बातें
मन की
मसालों से सने हाथों में
अक्सर छुपाकर ले जाती हैं
अपने
गीले आंसू
और ख्वाबों की गठरियाँ
देखते हुए आईना
अक्सर भूल जाती हैं
अपना चेहरा
और खालीपन ओढ़े
समेटती हैं घर भर की नाराजगी
चूल्हे का धुआं
उनकी बांह पकड़
पूछता है
उनके पंखों की कहानी
बनाकर कोई बहाना
टाल जाती हैं
धूप की देह पर
अपनी अँगुलियों से
लिखती है
कुछ …
रोक कर देर तक सांझ को
टटोलती है
अपनी परछाइयाँ
रात की मेड़ पर
देखती है
उगते हुए सपने
और
ख़ामोशी के भीतर
बजती हुई धुन पहनकर
घर भर में
बिखर जाती है !!

घर गृहस्थी

गृहस्थी की
पगडण्डी पर
निकल पड़ी हूँ थाम कर
तुम्हारा साथ
कभी डगमग डोलती सी
कभी चुपचाप नजरों से
देखती है मुझे मेरी
घर गृहस्थी
कभी नमक
तो कभी आटे का बर्तन
उदास मिलता है
कभी दाल
कभी तरकारियों का स्वाद
जंचता नहीं है
रह जाते हैं कई कई काम अधूरे
चिपकी रह जाती है धूल
खिडकियों पर
मैले परदे
चिढाते हैं मुंह
कभी सख्ती से
कभी होकर नाराज
करती हूँ बातें
खुद से
बदलना होगा
नए नए तरीके होंगे सीखने
घर दुरुस्त रखने के
पर
रह जाती है हर सीख अधूरी
मन तो बांध कर
अपना डेरा डंडा
निकला पड़ता है
अक्षरों की टोलियों संग
मिटटी की यह देह
अधूरी
चलती है
चलती रहती है
घर के कामों के पीछे
दिन भर जुटी रह कर भी
रोज कई नए कामों की
नयी फेहरिश्त बनायीं जाती है
कि
परेशान हूँ आजकल
आखिर ये गृहस्थी कैसे चलायी जाती है

सूरज

रात का
स्याह और गहरा रंग
अब
बदल रहा है
सुना है
उसकी कोख में
सूरज पल रहा है।

अंत 

सपनों का अंत
महज़
एक घटना नहीं
लुप्त होना है
हरेपन का
जंगलों के अस्तित्व से

ईश्वर 

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