अनूप अशेष की रचनाएँ

आवाजों के खो जाने का दुख कितना

आस-पास की आवाज़ों के खो जाने का
दुख कितना।
खालीपन कितना-कितना?

बाँस-वनों के साँय-साँय
सन्नाटों-सा
सब डूबा-डूबा,
खुद में होकर भी
जाने क्यों
बस्ती का मन ऊबा-ऊबा।

एक टेर थी नदी किनारे
गीला-मन
कितना-कितना?

यह आंतरिक प्रसंग
हुआ जाता
कुछ बाहर,
बूढ़ों से बच्चों तक जुड़ते
पेड़ों के रिश्ते
जैसे घर।

थोड़ी देर हवा का रुकना
काँपा तन
कितना-कितना?

अब भी बाक़ी है

अब तो यह मत कहो
कि तुममें रीढ़ नहीं है

तुम में ज़िन्दा
अब भी
पतली मेंड़

गई जोत में
फिर भी आधी अब भी बाकी है
ढेलों में साँसों की ख़ातिर
घर की चाकी है

एहसासों के हर किवाड़ को
रखना
मन में भेड़

सुलगा कर
कोनों में रखना देहों की तापें
खुद से दूर न होंगी
अपनी पुश्तैनी
नापें

बिस्वे होंगे बीघे होंगे
खेती
अपनी छेड़

इस अरण्य में पैदल

झाड़ी पकती झरबेरी
पत्थर फूटे झरने
दिन आए है
पैदल चलकर
बीहड़ घाट उतरने ।

पके बाँस की रगड़
घास में आग फूटती है
बूढ़ी लकड़हारनी
भूखे-हाथ कूटती है

ऐसी नई व्यवस्था
जंगल
कौन जाए चरने ।

बाघ शेर तेंदुए बस्ती में
इस अरण्य में हम
चले कौन आँखों के रस्ते
खुले रास्ते कम
कोल भील के पाँव
कहाँ जाएँ
पेटों को धरने ।

पानी के बाहर भी

दिन हथकड़ियों के
बेड़ी में पाँव फँसे।।
सुबह-सुबह भी जैसे
काली रात खड़ी,
इस स्वाधीन
समय में
मुर्दा जात बड़ी।
पानी के बाहर भी
कोई जाल कसे।।
छोटों के दिन
बड़े-बड़ों के पेटों के,
भीतर धँसी
सलाखों
बाहर आखेटों के।
चीन्ह-चीन्ह कर मारा
उनके घाव हँसे।।
जिनके शासित हम
भूमंडल के पाखी,
आसमान में उनके
लटकी
अपनों की बैसाखी।
ताक़त की सत्ता में
आदम कहाँ बसे।।

यह लम्बा सफ़र है 

मोड़ इसमें कई यह
लम्बा सफ़र है।।

देह डूबी हुई
धानी धान सी
जीन सूखी
रची
बासी पान-सी।

एक कोने में छिपा
दुर्दिन का डर है।।

आलता रंग-सी
सुए की चोंच-सी
ऊँचे-नीचे
दिनों की
यह मोंच-सी।

छाँह के संबंध में भी
धूप-फर है।।

आँख ओठों बीच
बैठी सदी-सी,
ज़िन्दगी है
बाल खोले
नदी-सी।

जीने-मरने को कहीं
रस्ते का घर है।

बहुत गहरे हैं पिता

बहुत गहरे हैं पिता
पेडों से भी बड़े
उँगलियाँ
पकड़े हुए हम
पाँव में उनके खड़े ।

भोर के हैं उगे सूरज
साँझ-सँझवाती,
घर के हर कोने में उनके
गंध की थाती ।

आँखों में मीठी छुअन
प्यास में
गीले घड़े ।

पिता घर हैं बड़ी छत हैं
डूब में है नाव,
नहीं दिखती
ठेस उनकी
नहीं बहते घाव ।

दुख गुमाए पिता
सुखों से
भी लड़े ।

धार हँसिए की रहे
खलिहान में रीते,
ज़िन्दगी के
चार दिन
कुछ इस तरह बीते ।

मोड़ कितने मील आए
पाँव से
अपने अड़े ।

दुख पिता की तरह

कुछ नहीं कहते
न रोते हैं
दुख
पिता की तरह
होते हैं
इस भरे तालाब से
बाँधे हुए
मन में
धुआँते से रहे ठहरे
जागते तन में
लिपट कर हम में
बहुत चुपचाप
सोते हैं।
सगे अपनी बाँह से
टूटे हुए
घर के
चिता तक जाते
उठा कर पाँव
कोहबर के
हम अजाने में जुड़ी
उम्मीद
बोते हैं।

नदी बाढ़ के 

हम सूखे बादल को जीते
किन दरवाज़ों
दिन आषाढ़ के।

अपने भीतर धूप उगी-सी
दूब किसी जंगल में,
टेर टिटिहरी की
खोते-से
सुबह-शाम
हर पल में।

दरकी छाती में बोए-से
किस्से कितने
नदी-बाढ़ के।

रेत झाड़ कर उड़े पखेरू
खोल-खोल डैने,
ऐसा शाप
सभी जन्मों में
पाया है मैंने।

उँगली का गीलापन सूखा
गर्म-हवा में
फूल काढ़ के।

सीढ़ी लगे उतरने

किनके पंजों
पाँव-पाँव हम
घुनी सीढ़ियाँ लगे उतरने।

उम्र उठी
चल कर आई
वैसाखी थामे,
बैठे रहे सहोदर
बेटे
अपने नामे।

सूखे पत्तों में
चमके चिंगारी
आए बाँहों भरने।

कोई किसी नाम का
ऐसे गुन
क्यों गाए,
पोथी-पत्रा
आखर-बानी
सुख तरसाए।

हिरनों के छौने
घाटी में
ऊपर झरने।

मकड़ी के जाले

मकड़ी के जाले हैं
बाँस की अटारी
सीने में बैठी है
भूख की कटारी।

माँ के घर बेटी है
दूर अभी गौना
चूल्हे में
आँच नहीं
खाट में बिछौना,
पिता तो किवाड़ हुए
सांकल महतारी।

खेतों से बीज गया
आँखों से भाई
घर का
कोना-कोना
झाँके महँगाई,
आसों का साल हुआ
सांप की पिटारी।

पीते घुमड़े बादल
देहों का पानी
मथती
छूँछी मटकी
लाज की मथानी,
बालों का तेल हुई
गाँव की उधारी।

इतने बरसों बाद 

इतने बरसों बाद भले से
लगते गीले घर।।

गौरैया के पंख भीग कर
निकले पानी से,
कितने गए अषाढ़
देह के
छप्पर-छानी से।
बिटिया के मन में उगते
चिड़ियों के पीले-पर।।

अबके हरे-बाँस फूटें
आँगन शहनाई में,
कितने छूँछे
हर बसंत
बीते परछाई में।

अंकुराई है धान खेत के
सूखे-डीले पर।।

लाज लगे कोई देखे तो
फूटे पीकों-सी,
दूध-भरी
फूटी दोहनी के
खुलते छींकों-सी।
माँ की आँखों में झाँके-दिन
बंधन ढीले कर।।

आम के हैं पेड़ बाबा

आम के हैं पेड़ बाबा
पिता फल
नाती टिकोरे हैं ।

भात में है दूध
रोटी में रहे घी,
पोपले मुँह की
असीसें
हम रहे हैं जी ।

नीम की हैं छाँह बाबा
खाटें अपनी
रहे जोरे हैं ।

खेल में घुटने
दुकानों रहे खिसे,
मीठी गोली
बात में बादाम-से पीसे ।

शाम की ठंडई बाबा
धूप दिन के
रहे घोरे हैं ।

भूख की कोरों में गीले
फूल में सरसों,
पिता में कुछ ढूँढ़ते
जैसे रहे बरसों ।

खेतों की हैं मेंड़ बाबा
धान-गंधों
रहे बोरे हैं ।

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