अपर्णा अनेकवर्णा की रचनाएँ

प्रेत-ग्राम

वो डूबता दिन.. कैसा लाल होता था..
ठीक मेरी बाईं ओर..
दूर उस गाँव के पीठ पीछे जा छुपता था
सूरज.. तनिक सा झाँक रहता..
किसी शर्मीले बच्चे की तरह

दिन भर अपने खेतों पर बिता..
‘समय माई’ को बताशा-कपूर चढ़ा..
जब लौटते थे हम शहर की ओर
यही दृश्य होता हर बार..
ठीक मेरी बाईं ओर..

मुझे क्यों लगता..
जैसे कोई प्रेत-ग्राम हो
मायावी सा.. जन-शून्य..
घर ही घर दीखते.. आस पास..
कृषि-हीन.. बंजर ज़मीन..

शायद भोर से झींगुर
ही बोला करते वहाँ…
सिहरा देता वो उजड़ा सौन्दर्य..
डरती.. और मन्त्रमुग्ध ताका भी करती..
लपकती थीं कई कथाएँ.. मुँह बाए..

कुछ भी कल्पित कहाँ था..
वो सच ही तो था.. हर गाँव का
कुकुरमुत्ते-सा उग आया था..
कौन बचा था जवान.. किसान..
सब मजूरा बन बिदेस सिधारे

बची थीं चन्द बूढ़ी हड्डियाँ
उनको संभालती जवान बहुएँ
जवान बहुओं की निगरानी में
वही.. चन्द बूढ़ी हड्डियाँ…
और घर वापसी के स्मृति-चिन्ह..
धूल-धुसरित कुछ बच्चे..

महानगर.. सउदिया…
लील गए सारे किसान.. जवान..
रह गए पीछे.. बस ये कुछ प्रेत-ग्राम..

डर 

आज रात में भी डर नहीं लगता..
आज जंगल झींगुर का शोर..
सियार की पुकार नहीं..
आज जंगल माँ की गोद है..
माँ कहाँ गई होगी..
काँपता है मन और
निचला होंठ मन की तरह ही
काँपने लगता है..
बाक़ी के दो चेहरे धुँधलाने लगते हैं..

बस वो शोर गूँजता रहता है
बकरियाँ जिबह हो रही हैं शायद..
उन्हें भूख लगी हो शायद..
शायद वो इसलिए नाराज़ हैं
बकरियां रोती भी हैं क्या?
बड़ी सी लाल पीली रौशनी..
रंग रही है रात

भुनी महक से पहले कभी कै नहीं हुई..
आज सालों बाद मुनीर ने निकर गीली की..
क्यों.. कौन… कुछ नहीं समझ आ रहा..

सब बहुत नज़दीक है..
बहुत..
मेरे ‘कम्फर्ट-जोन’ में दखल करता..
आँखें खुल जाती हैं..
अभी पढ़कर रखा अख़बार उठाकर
रद्दी के ढेर में पटक आती हूँ..
शब्द वहां से भी मुझे ललकार रहे हैं
जिनके अर्थ से कतरा रही हूँ..
मुझे दिन भी तो शुरू करना है..

एक ठेठ ढीठ औरत

सुबह से दिन कन्धे पे है सवार
उम्मीदों की फ़ेरहिस्त थामे
इसकी.. उसकी.. अपनी.. सबकी..
ज़रूरतें पूरी हो भी जाएँ..
उम्मीदें पूरी करना बड़ा भारी है..
जहाँ खड़ीं हूँ.. वहाँ से सब दिखतें हैं
दौड़ूँ जाऊँ.. नज़रें बचा के..
दो-एक बातें अपनी मन वाली भी.
कर आऊँ… बिना रोक-टोक..
पर वर्जनाएँ कुण्ठा बन गई हैं
बिना बुरा.. वीभत्स.. हार सोचे
किसी भी नतीजे पर नहीं पहुँचती
ख़ुद को पुरज़ोर अन्दाज़ में
सब ओर रखती हूँ
पर ऐसा करने में चालाकियाँ
दूसरों की नज़र आती हैं..
काटती हूँ उनको अपनी चालाकियों से…
जहाँ भाँप ली जाती हूँ..
लोमड़ी करार दी जाती हूँ
जहाँ नहीं.. वहाँ बेचारी का मुँह बनाना
अब खूब आता है मुझको..
इस पूरी स्वांग-लीला से
घिन आती रहती है.. धीरे-धीरे
पर चारा कुछ भी नहीं..
या तो बाग़ी घोषित हो जाऊँ
और अकेली झेलूँ रेंगती नज़रों..
टटोलते स्वरों को..
या ओढ़ लूँ औरतपन की चादर
और चैन की साँस लूँ अकेले..
और बेचारिगी पोत लूँ मुंह पर
जैसे ही कोई छेड़े उस छाते को…
मैं ऐसे ही एक ‘ढीठ’ औरत थोड़े हूँ..
मैं ऐसे ही एक ‘ठेठ’ औरत थोड़े हूँ…

नगर प्रवेश

गोधूली बीत गई थी
नौसढ़ के पुल से नीचे बहती
राप्ती को देखा
पूर्वोत्तर दिखीं
धू-धू जलती दो चिताएँ
मृत्यु और अग्नि
दोनों सम्मोहित करतीं हैं

तब दिखीं नदी में भी
जलती दो चिताएँ
इस दुगुने ताप से दग्ध
गुज़रती जाती
लहर प्रति लहर – एक नदी
पल-पल जीया एक जीवन
प्रसंग-प्रसंग एक बन्धन
पीछे छोड़ स्मृतियों के
राख-राख अस्थि-फूल

कुछ अग्नि
कुछ जल
कुछ वायु
कुछ आकाश
और कुछ पृथ्वी में
ढूँढ़ लेंगे अपनी जगह
स्थापित हो जाएँगे यूँ
इससे पहले कहीं और
कभी थे ही नहीं
बस, स्मृतियों में
कभी कहीं चुभते रहेंगे

जीवन-राग

हर दिन.. एक पर्व.. एक अध्याय..
किसी महाग्रन्थ का सा..
अपनी अनिश्चितता पर बन्द होता है
आप दिन भर अकेले रहे या भीड़ में
अवसादग्रस्त रहे.. या शान्त..
राग-मग्न या वियोग-व्यग्र..
कुछ ढूँढ़ते रहे… या फिर पा ही लिया..
कल भी यूँ ही होगा.. क्या पता…

हर जगह कुछ घेरे हैं..
हर घेरे में कुछ चेहरे..
कुछ जाने-पहचाने.. कुछ अनजाने..
कुछ तथाकथित अपने..
कुछ बड़े परिचित से दूजे
पहचान बने.. बनी रहे.. या रीत जाए..
उपक्रम जारी रहने तक जीवन जीवित है..

जीवन राग बेहद एकरस है…
जीवन्त सम्भावनाओं की तलाश..
जारी है…

शून्य 

यानी कुछ भी नहीं..
‘कुछ होने’ की पूर्णतः अनुपस्थिति…
पर जब अपनी पर आता है..
तो अपनी सभी कलाओं में
जगर-मगर
उपस्थित हो जाता है..

अंगड़ाइयाँ लेता है..
धीरे-धीरे सर घुमा कर
चारों तरफ़ का जायज़ा लेता है…
कहाँ तक फ़ैल जाना है?
किस हद तक डुबोना है?

जो न हो कर भी इतना होता है..
कि आप साँसों की पनाह माँगते
उपराते हैं.. उबरने की कोशिश फिसल जाती है..
आप फिर डूब जाते हैं..
अब आप हैं और आपका शून्य..
जब तक चाहेगा.. दबोचे रहेगा..

जब जाएगा तब भी किसी बाढ़ की कीच
की तरह अपने निशाँ छोड़ जाएगा..
कमाल है न.. कुछ नहीं होने के भी
होने के निशाँ होते हैं……

‘शून्य का घनत्व’ हम सबने भोगा है…
कहें न कहें.. ये निशाँ हम सबने पाले हैं

शाम और अवसाद

शाम हो चुकी..
उदास चाँद
गोल-गोल और
मुर्दा-सा पीला..
भीतर सोए भेड़िए
जाग उठे..
बदन को ऐंठा
हवाओं को सूँघ कर
पक्का कर लिया..
अवसाद पूरा पक चुका अब
आओ झुण्ड..सब आओ
मुँह उठाएँ और पुकारें
सब मिल कर
अनन्त को अनन्त में..
कुछ तो खर्च कर दें
और यूँ ही बचा लें
ज़िन्दगी अपनी….

प्रतीक्षा 

अब.. बदहवास हो..
परतें उधेड़ने लगी हूँ ज़हन की..
हर परत के भीतर..
तुम्हारे होने की आहटें हैं मौजूद..
बस एक तुम ही नज़र नहीं आते…

तुम्हारे होने की एक
उड़ती-सी ख़बर है मुझको
जब भी ख़ुद को आवाज़ें लगाईं हैं
सब ओर से जब भी लौटीं वो बारहा
तुम्हारी ही हो कर लौटी हर बार..

कितने ही सितारे टाँके..
ख़ुशफ़हमियों की रातों में..
कि रोशन रहें ये राहें तुम्हारी..
पर तमन्नाएँ भी सुर्खाब हुआ करती हैं
अपनी मर्ज़ी से परवाज़ हुआ करती हैं..

दियाले पे जलता है हरदम..
तुमसे तुमको ही माँगता हुआ…
तुम्हारे नाम का चराग़
मेरे अन्धेरों को रोशन करता
मेरे हौसलों को उजाला देता

इन बिखरीं परतों को समेटूँ, चलूँ..
ठहर गई ज़िन्दगी की ख़बर लूँ..
तुम तो फुर्सतों के मालिक ठहरे
जब आओगे.. तब ही आओगे…
आसमानों में रहने वाले..
भला तुम कब आओगे..

आदत 

सान्द्रता बढ़ती जाती है
हर उच्छ्वास से..

फाँकती हूँ मुट्ठी भर-भर
असहाय हो चुका दुःख

घोंटती हूँ.. कड़वी गोली-सी..
बिना पानी अटकी है हलक में…

घुल रही है कड़वाहट..
फैल रही है..

कड़वाहट जीना..
अब आदत बनती जा रही है..

कविता 

उँगलियों के नाखूनों के साथ ही..
चबा जाती हूँ ख़ुद पे भरोसा अपना..

आत्मसन्देह से आत्मविश्वास तक का पुल..
कच्चा-सा है.. डोलने लगता है

तब कुछ स्नेही बढ़ कर.. थाम लेते हैं
कुछ तो घबराए से.. पास आ जाते हैं

कुछ दूर से.. चमकती मुस्काने ओढ़े..
धड़कता दिल छुपाए.. भरोसा दिलाते हैं

इस तरह.. मैं थोड़ी-सी.. ज़रा-सी कविता
और बुन.. गुन.. कह.. लिख लेती हूँ…

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