अफ़ज़ाल अहमद सय्यद की रचनाएँ

बहुत न हौसला-ए-इज़्ज़-ओ-जाह मुझ से हुआ 

बहुत न हौसला-ए-इज़्ज़-ओ-जाह मुझ से हुआ
फ़क़त फ़राज़-ए-नगीन-ओ-निगाह मुझ से हुआ

चराग़-ए-शब ने मुझे अपने ख़्वाब में देखा
सितारा-ए-सहरी ख़ुश-निगाह मुझ से हुआ

गिरफ़्त-ए-कूज़ा से इक ख़ाक मेरी सम्त बढ़ी
सफ़-ए-सराब कोई सद्द-ए-राह मुझ से हुआ

शब-ए-फ़साना-ओ-फर्संग उस से मिल आया
जो मावरा-ए-सफ़ेद-ओ-सियाह मुझ से हुआ

सर-ए-गुरेज़-ओ-गुमाँ उस ने इम्तिहान लिया
जो हम-कनार मिरा कम-निगाह मुझ से हुआ

कमान-ए-ख़ाना-ए-अफ़्लाक के मुक़ाबिल भी
मैं उस से और वो फिर कज-कुलाह मुझ से हुआ

जो सैल-ए-हिजरत-ए-गुल था मिरे क़दम से रूका
कमंद लम्हा-ए-सद-इश्तिबाह मुझ से हुआ

नियाम-ज़द न हुई मुझ से तेग़-ए-हैरानी
शिकस्त-ए-आइना-ए-इंतिबाह मुझ से हुआ

दुआ की राख पे मरमर का इत्र-दाँ उस का

दुआ की राख पे मरमर का इत्र-दाँ उस का
ग़जीदगी के लिए दस्त-ए-मेहरबाँ उस का

गहन के रोज़ वो दाग़ी हुई जबीं उस की
शब-ए-शिकस्त वही जिस्म बे-अमाँ उस का

कमंद-ए-ग़ैर में सब अस्प ओ गोस्फ़ंद उस के
नशेब-ए-ख़ाक में ख़ुफ़्ता-सितारा-दाँ उस का

तन्नुर-ए-यख़ मे ठिठुरते हैं ख़वाब ओ ख़ूँ उस के
लिखा है नाम सर-ए-लौह-ए-रफ़्तगाँ उस का

चुनी हुई हैं तह-ए-ख़िश्त उँगलियाँ उस की
खुला हुआ है पस-ए-रेग बादबाँ उस का

वो इक चराग़ है दीवार-ए-ख़स्तगी पे रूका
हवा हो तेज़ तो हर हाल में ज़ियाँ उस का

उसी से धूप है अम्बार-ए-धुँद है रू-पोश
गिरफ़्त-ए-ख़्वाब से बरसर है कारवाँ उस का

इक शाम ये सफ़्फ़ाक ओ बद-अंदेश जला दे

इक शाम ये सफ़्फ़ाक ओ बद-अंदेश जला दे
शायद कि मुझे शोला-ए-दर-पेश जला दे

इस दिल को किसी दस्त-ए-अदा-संज में रखना
मुमकिन है ये मीज़ान-ए-कम-ओ-बेश जला दे

किस क़हत-ए-खोर-ओ-ख़्वाब में मैं मोल के लाया
वो नान कि जो कास-ए-दरवेश जला दे

रूख़्सत को है दरिया-ए-दिल-आराम-ए-रवानी
जो कुछ है सफ़ीने के पस ओ पेश जला दे

शायद कि कभी ख़ाक-ए-कम-आमेज़ बाल ले
और मुझ को पस-ए-लौह-ए-कम-अँदेश जला दे

कोई न हर्फ़-ए-नवेद-ओ-ख़बर कहा उस ने 

कोई न हर्फ़-ए-नवेद-ओ-ख़बर कहा उस ने
वही फ़साना-ए-अशुफ़्ता-तर कहा उस ने

शिराकत-ए-ख़स-ओ-शोला है कारोबार-ए-जुनूँ
ज़ियाँ-कदे में किस अंजाम पर कहा उस ने

उसे भी नाज़-ए-ग़लत-कर्दा-ए-तग़ाफ़ुल था
कि ख़्वाब ओ ख़ेमा-फ़रोशी को घर कहा उस ने

तमाम लोग जिसे आसमान कहते हैं
अगर कहा तो उसे बाल ओ पर कहा उस ने

उसे अजब था ग़ुरूर-ए-शगुफ़्त-ए-रूख़्सारी
बहार-ए-गुल को बहुत बे-हूनर कहा उस ने

ये गुल हैं और ये सितारे हैं और ये मैं हूँ
बस एक दिन मुझे तालीम कर कहा उस ने

मिरी मिसाल थी सफ़्फ़ाकी-ए-तमन्ना में
सुपुर्दगी में मुझे क़त्ल कर कहा उस ने

मैं आफ़्ताब-ए-क़यामत था सो तुलू हुआ
हज़ार मतला-ए-ना-साज़-तर कहा उस ने

सितम की तेग़ पे ये दस्त-ए-बे-नियाम रक्खा 

सितम की तेग़ पे ये दस्त-ए-बे-नियाम रक्खा
गुल-ए-शिकस्त सर-ए-शाख-ए-इंतिक़ाम रक्खा

मैं दिल को उस की तग़ाफ़ुल-सरा से ले आया
और अपने ख़ाना-ए-वहशत में ज़ेर-ए-दाम रक्खा

निगार-ख़ाना-ए-तस्लीम क्या बयाबाँ था
जहाँ पे सैल-ए-ख़राबी को मैं ने थाम रक्खा

मिज़ा पे ख़ुश्क किए अश्क-ए-ना-मुराद उस ने
फिर आइने में मिरा अक्स-ए-लाला-फ़ाम रक्खा

इसी फ़साना-ए-वहशत में आख़िर-ए-शब को
मैं तेग़-ए-तेज़ रक्खी उस ने नीम जाम रक्खा

ये नहर-ए-आब भी उस की है मुल्क-ए-शाम उस का

ये नहर-ए-आब भी उस की है मुल्क-ए-शाम उस का
जो हश्र मुझ पे बपा है वो एहतिमाम उस का

सिपाह-ए-ताज़ा भी उस की सफ़-ए-निगाह से है
सफ़ा-ए-सीन-ए-शमशीर पर है नाम उस का

अमान ख़ेमा-ए-रम-ख़ुर्दगाँ में बाक़ी है
कि ना-तमाम है इक शौक़-ए-क़त्ल-ए-आम उस का

किताब-ए-उम्र से सब हर्फ़ उड़ गए मेरे
कि मुझ असीर को होना है हम-कलाम उस का

दिल-ए-शिकस्ता को लाना है रू-ब-रू उस के
जो मुझ से नर्म हुआ कोई बंद दाम उस का

मैं उस के हाथ से किस ज़ख़्म में कभी रक्खूँ
शुरू नाज़ भी उस का है इख़्तिताम उस का

आख़िरी दलील 

तुम्हारी मोहब्बत
अब पहले से ज़्यादा इंसाफ़ चाहती है
सुब्ह बारिश हो रही थी
जो तुम्हें उदास कर देती
इस मंज़र को ला-ज़वाल बन ने का हक़ था

इस खिड़की को सब्ज़े की तरफ़ खोलते हुए
तुम्हें एक मुहासरे में आए दिल की याद नहीं आई

एक गुम-नाम पुल पर
तुम ने अपने आप से मज़बूत लहजे में कहा
मुझ अकेले रहना है

मोहब्बत को तुम ने
हैरत-ज़दा कर देने वाली ख़ुश क़िस्मती नहीं समझा

मेरी क़िस्मत जहाज़-रानी के कारख़ाने में नहीं बनी
फिर भी मैं ने समंदर के फ़ासले तय किए
पुर-असरार तौर पर ख़ुद को ज़िंदा रक्खा
और बे-रहमी से शाएरी की

मेरे पास एक मोहब्बत करने वाले की
तमाम ख़ामियाँ
और आख़िरी दलील है

कौन शाएर रह सकता है

लफ़्ज़ अपनी जगह से आगे निकल जाते हैं
और ज़िंदगी का निज़ाम तोड़ देते हैं

अपने जैसे लफ़्ज़ों का गठ बना लेते हैं
और टूट जाते हैं
उन के टूटे हुए किनारों पर
नज़में मरने लगती हैं
लफ़्ज़ मरने लगती हैं
लफ़्ज़ अपनी साख़्त और तक़्दीर में
कमज़ोर हो जाते हैं
मामूली शिकस्त उन को ख़त्म कर देती है
उन में
टूट कर जुड़ जाने से मोहब्बत नहीं रह जाती
इन लफ़्ज़ों से
बद-सूरत और बे-तरतीब नज़में बन ने लगती हैं

सफ़्फ़ाकी से काट दिए जाने के बाद
उन की जगह लेने को
एक और खेप आ जाती है

नज़मों को मर जाने से बचाने के लिए
हर रोज़ उन लफ़्ज़ों को जुदा करना पड़ता है
और उन जैसे लफ़्ज़ों को हमले से पहले
नए लफ़्ज़ पहुँचाने पड़ते हैं

ये ऐसा कर सकता है
शाएर रह सकता है

समंदर ने तुम से क्या कहा

समंदर ने तुम से क्या कहा
इस्तिग़ासा के वकील ने तुम से पूछा
और तुम रोने लगीं

जनाब-ए-आली ये सवाल ग़ैर-ज़रूरी है
सफ़ाई के वकील ने तुम्हारे आँसू पोंछते हुए कहा

अदालत ने तुम्हारे वकील पर एतराज़
और तुम्हारे आँसू मुस्तरद कर दिए

आँसू रिकॉर्ड-रूम में चले गए
और तुम ने अपनी कोठरी में

ये शहर सतह-ए-समंदर से नीचे आबाद है
ये अदालतें शहर की सतह से थी नीचे
और ज़ेर-ए-समाअत मुलज़िमों की कोठरियाँ
इन से भी नीचे

कोठरी में कोई तुम्हें रेशम की एक डोर दे जाता है
तुम हर पेशी तक एक शाल बुन लेती हो
और अदालत बर्ख़ास्त हो जाने के बाद
उसे उधेड़ देती हो

ये डोर तुम्हें कहाँ से मिली
सुपरिटेंडेंट ऑफ़ प्रज़ेंस ने तुम से पूछता है
ये डोर एक शख़्स लाया था

अपने पाँव में बाँध कर
एक बला को ख़त्म करने के लिए
एक पुर-पेच रास्ते से गुज़रने के लिए

वो आदमी अब कहाँ है
ठंडे पानी में तुम्हें ग़ोता दे कर पूछा जाता है

वो आदमी रास्ता खो बैठा
समंदर ने तुम से यही कहा था

वो अपने आँसू एक नाज़ुक हेयर ड्रायर से सुखाती है 

वो अपने आँसू
एक नाज़ूक हेयर ड्रायर से सुखाती है
जब उस की मसनूई पलकें
उस का बदन छुपाने में ना-काम हो जाती हैं
दस-नाख़ून-तराश
उस के नाख़ुनों की देखभाल करते हैं
वो बच्चों की तरह बरते जाने से
तंग आ चुकी है

पुर-कशिश-बदन को मिलने वाले तमग़ों के दरमियान से
वो मछली की तरह
तैर कर निकल जाती है

अपने तलवों के नीचे
वो गहराई और ड्रामा चाहती है

उस के बाल
शैम्पू की शीशी पर लिखी हुई हिदायात पर
सख़्ती से अमल करते हैं

माहौलियाती आलूदगी का ख़याल करते हुए
वो कोई बोसा नहीं देती

उस का तकिया
दुनिया के तमाम आशिक़ों के आँसू
जज़्ब कर सकता है

ज़िंदगी हमारे लिए कितना आसान कर दी गई ही 

ज़िंदगी हमारे लिए कितना आसान कर दी गई ही
किताबें
कपड़े जूते
हासिल कर सकते हैं
जैसा कि गंदुम हमें इम्दादी क़ीमत पर मुहय्या की जाती है
अगर हम चाहें
किसी भी कारख़ाने के दरवाज़े से
बच्चों के लिए
रद करदा बिस्कुट ख़रीद सकते हैं
तमाम तय्यारों रेल गाड़ियों बसों में हमारे लिए
सस्ती नाशिश्तें रखी जाती हैं

अगर हम चाहें
मामूली ज़रूरत की क़ीमत पर
थिएटर में आख़िरी क़तार में बैठ सकते हैं
हम किसी को भी याद आ सकते हैं
जब उसे कोई याद न आ रहा हो

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