अब्दुल्लाह ‘जावेद’ की रचनाएँ

अश्क ढलते नहीं देखे जाते 

अश्क ढलते नहीं देखे जाते
दिल पिघलते नहीं देखे जाते

फूल दुश्मन के हों या अपने हों
फूल जलते नहीं देखे जाते

तितलियाँ हाथ भी लग जाएँ तो
पर मसलते नहीं देखे जाते

जब्र की धूप से तपती सड़कें
लोग चलते नहीं देखे जाते

ख़्वाब-दुश्मन हैं ज़माने वाले
ख़्वाब पलते नहीं देखे जाते

देख सकते हैं बदलता सब कुछ
दिल बदलते नहीं देखे जाते

करबला में रुख़-ए-असग़र की तरफ़
तीर चलते नहीं देखे जाते

चाँदनी का रक़्स दरिया पर नहीं 

चाँदनी का रक़्स दरिया पर नहीं देखा गया
आप याद आए तो ये मंज़र नहीं देखा गया

आप के जाते ही हम को लग गई आवारगी
आप के जाते ही हम से घर नहीं देखा गया

अपनी सारी कज-कुलाही दास्ताँ हो कर रही
इश्क़ जब मज़हब किया तो सर नहीं देखा गया

फूल को मिट्टी में मिलता देख कर मिट्टी हुए
हम से कोई फूल मिट्टी पर नहीं देखा गया

जिस्म के अंदर सफ़र में रूह तक पहुँचे मगर
रूह के बाहर रहे अंदर नहीं देखा गया

जिस गदा ने आप के दर पर सदा दी एक बार
उस गदा को फिर किसी दर पर नहीं देखा गया

आप को पत्थर लगे ‘जावेद’ जी देखा है ये
आप के हाथों में गो पत्थर नहीं देखा गया

दुनिया ने जब डराया तो डरने में

दुनिया ने जब डराया तो डरने में लग गया
दिल फिर भी प्यार आप से करने में लग गया

शायद कहीं से आप की ख़ुशबू पहुँच गई
माहौल जान ओ दिल का सँवरने में लग गया

इक नक़्श मौज-ए-आब से बरहम हुआ तो क्या
इक नक़्श ज़ेर-ए-आब उभरने में लग गया

‘जावेद’ निज़्द-ए-आब-ए-रवाँ कह गया फ़क़ीर
दरिया में जो गया वो गुज़रने में लग गया

याद यूँ होश गंवा बैठी है 

याद यूँ होश गंवा बैठी है
जिस्म से जान जुदा बैठी है

राह तकना है अबस सो जाओ
धूप दीवार पे आ बैठी है

आशियाने का ख़ुदा ही हाफ़िज़
घात में तेज़ हवा बैठी है

दश्त-ए-गुल-चीं से मुरव्वत कैसी
शाख़ फूलों को गंवा बैठी है

कैसे आए किसी गुलशन में बहार
दस्त में आबला-पा बैठी है

शहर आसीब-ज़दा लगता है
कूचे कूचे में बला बैठी है

चार कमरों के मकाँ में अपने
इक पछल-पाई भी आ बैठी है

शाएरी पेट की ख़ातिर ‘जावेद’
बीच बाज़ार के आ बैठी है

समंदर पार आ बैठे मगर क्या

समंदर पार आ बैठे मगर क्या
नए मुल्कों में बन जाते हैं घर क्या

नए मुल्कों में लगता है नया सब
ज़मीं क्या आसमाँ क्या और शजर क्या

उधर के लोग क्या क्या सोचते हैं
इधर बसते हैं ख़्वाबों के नगर क्या

हर इक रस्ते पे चल कर सोचते हैं
ये रस्ता जा रहा है अपने घर क्या

कभी रस्ते ये हम से पूछते हैं
मुसाफ़िर हो रहे हैं दर-ब-दर क्या

कभी सोचा है मिट्टी के अलावा
हमें कहते हैं ये दीवार ओ दर क्या

यहाँ अपने बहुत रहते हैं लेकिन
किसी को भी किसी की है ख़बर क्या

किसे फ़ुर्सत के इन बातों पे सोचे
मशीनों ने किया है जान पर क्या

मशीनों के घनेरे जंगलों में
भटकती रूह क्या उस का सफ़र क्या

यहाँ के आदमी हैं दो रुख़े क्यूँ
मोहज़्ज़ब हो गए हैं जानवर क्या

अधूरे काम छोड़े जा रहे हैं
इधर को आएँगे बार-ए-दिगर क्या

ये किस के अश्क हैं औज-ए-फ़लक तक
कोई रोता रहा है रात भर क्या

चमन में हर तरफ़ आँसू हैं ‘जावेद’
तेरी हालत की सब को है ख़बर क्या”

फूल के लायक़ फ़ज़ा रखनी ही 

फूल के लायक़ फ़ज़ा रखनी ही थी
डर हवा से था हवा रखनी ही थी

गो मिज़ाजन हम जुदा थे ख़ल्क़ से
साथ में ख़ल्क़-ए-ख़ुदा रखनी ही थी

यूँ तो दिल था घर फ़क़त अल्लाह का
बुत जो पाले थे तो जा रखनी ही थी

तर्क करनी थी हर इक रस्म-ए-जहाँ
हाँ मगर रस्म-ए-वफ़ा रखनी ही थी

सिर्फ़ काबे पर न थी हुज्जत तमाम
बाद-ए-काबा करबला रखनी ही थी

कभी प्यारा कोई मंज़र लगेगा

कभी प्यारा कोई मंज़र लगेगा
बदलने में उसे दम भर लगेगा

नहीं हो तुम तो घर जंगल लगे है
जो तुम हो साथ जंगल घर लगेगा

अभी है रात बाक़ी वहशतों की
अभी जाओगे घर तो डर लगेगा

कभी पत्थर पड़ेंगे सर के ऊपर
कभी पत्थर के ऊपर सर लगेगा

दर ओ दीवार के बदलेंगे चेहरे
ख़ुद अपना घर पराया घर लगेगा

चलेंगे पाँव उस कूचे की जानिब
मगर इल्ज़ाम सब दिल पर लगेगा

हम अपने दिल की बाबत क्या बताएँ
कभी मस्जिद कभी मंदर लगेगा

अगर तुम मारने वालों में होगे
तुम्हारा फूल भी पत्थर लगेगा

कहाँ ले कर चलोगे सच का परचम
मुक़ाबिल झूट का लश्कर लगेगा

हलाकू आज का बग़दाद देखे
तो उस की रूह को भी डर लगेगा

ज़मीं को और ऊँचा मत उठाओ
ज़मीं का आसमाँ से सर लगेगा

जो अच्छे काम होंगे उन से होंगे
बुरा हर काम अपने सर लगेगा

सजाते हो बदन बेकार ‘जावेद’
तमाशा रूह के अंदर लगेगा

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