अब्दुल ग़फ़ुर ‘नस्साख़’ की रचनाएँ

नक़्श-ए-दिल है सितम जुदाई का

नक़्श-ए-दिल है सितम जुदाई का
शौक़ फिर किस को आशनाई का

चखते हैं अब मज़ा जुदाई का
ये नतीजा है आशनाई का

उन के दिल की कुदूरत और बढ़ी
ज़िक्र कीजिए अगर सफ़ाई का

देख तो संग-ए-आस्ताँ पे तेरे
है निशाँ किस की जबहा-साई का

तेरे दर का गदा जो है ऐ दोस्त
ऐश करता है बादशाई का

दुख़्तर-ए-रज़ ने कर दिया बातिल
मुझ को दावा था पारसाई का

करते हैं अहल-ए-आसमाँ चर्चा
मेरे नालों की ना-रसाई का

काट डालो अगर ज़बाँ पे मेरे
हर्फ़ आया हो आशनाई का

कर के सदक़े न छोड़ दें ‘नस्साख़’
दिल को धड़का है क्यूँ रिहाई का

पीरी में शौक़ हौसला-फ़रसा नहीं रहा

पीरी में शौक़ हौसला-फ़रसा नहीं रहा
वो दिल नहीं रहा वो ज़माना नहीं रहा

क्या ज़िक्र-ए-महर उस की नज़र में है दिल वो ख़्वार
शायान-ए-जौर-ओ-ज़ुल्म दिल-आरा नहीं रहा

झगड़ा मिटा दिया बुत-ए-काफ़िर ने दीन का
अब कुछ ख़िलाफ़-ए-मोमिन-ओ-तरसा नहीं रहा

उश्शाक़-ओ-बुल-हवस में नहीं करते वो तमीज़
वाँ इम्तियाज़-ए-नेक-ओ-बद असला नहीं रहा

क्यूँ बहर-ए-सैर आने लगे गुल-रुख़ान-ए-दहर
पीरी में दिल सज़ा-ए-तमाशा नहीं रहा

कह दो के क़ब्र-ए-नाश भी की उस की पाएमाल
नाम-ओ-निशान-ए-आशिक़-ए-रुसवा नहीं रहा

अब तक यहाँ है इज्ज़ ओ नियाज़ ओ वफ़ा की धूम
वाँ लुत्फ़ ओ इल्तिफ़ात ओ मदारा नहीं रहा

कश्ती बग़ैर दश्त-नवर्दी हो किस तरह
अश्कों से बहर हो गया सहरा नहीं रहा

मस्ती में रात वो न खुले मुझ से हम-नशीं
कुछ ऐतबार-ए-नश्शा-ए-सहबा नहीं रहा

क्यूँ जाएँ फिर के काबे से ‘नस्साख़’ दैर को
वो सर नहीं रहा वो सौदा नहीं रहा

ज़ाहिरन मौत है क़ज़ा है इश्क़

ज़ाहिरन मौत है क़ज़ा है इश्क़
पर हक़ीक़त में जाँ-फ़ज़ाँ है इश्क़

देता है लाख तरह से तस्कीन
मर्ज़-ए-हिज्र में दवा है इश्क़

पूछते हैं बुल-हवस से वो
मुझ से पूछे कोई के क्या है इश्क़

ता-दम-ए-मर्ग साथ देता है
एक महबूब-ए-बा-वफ़ा है इश्क़

इश्क़ है इश्क़ जिधर देखो
कुफ़्र ओ ईमाँ का मुद्दआ है इश्क़

देख ‘नस्साख़’ गर न होता कुफ़्र
कहते बे-शुबा हम ख़ुदा है इश्क़

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