अब्दुल हमीद ‘अदम’ की रचनाएँ

आगही में इक ख़ला मौजूद है

आगही में इक ख़ला मौजूद है
इस का मतलब है ख़ुदा मौजूद है

है यक़ीनन कुछ मगर वाज़ेह नहीं
आप की आँखों में क्या मौजूद है

बाँकपन में और कोई शय नहीं
सादगी की इंतिहा मौजूद है

है मुकम्मल बादशाही की दलील
घर में गर इक बोरिया मौजूद है

शौक़िया कोई नहीं होता ग़लत
इस में कुछ तेरी रज़ा मौजूद है

इस लिए तनहा हूँ मैं गर्म-ए-सफ़र
क़ाफ़िले में रह-नुमा मौजूद है

हर मोहब्बत की बिना है चाशनी
हर लगन में मुद्दआ मौजूद है

हर जगह हर शहर हर इक़्लीम में
धूम है उस की जो ना-मौजूद है

जिस से छुपना चाहता हूँ मैं ‘अदम’
वो सितम-गर जा-ब-जा मौजूद है.

ऐ साक़ी-ए-मह-वश 

ऐ साक़ी-ए-मह-वश ग़म-ए-दौराँ नहीं उठता
दुर्वेश के हुज्रे से ये मेहमाँ नहीं उठता

कहते थे के है बार-ए-दो-आलम भी कोई चीज़
देखा है तो अब बार-ए-गिरेबाँ नहीं उठता

क्या मेरे सफ़ीने ही की दरिया को खटक थी
क्या बात है अब क्यूँ कोई तूफ़ाँ नहीं उठता

किस नक़्श-ए-क़दम पर है झुका रोज़-ए-अज़ल से
किस वहम में सजदे से बयाबाँ नहीं उठता

बे-हिम्मत-ए-मर्दाना मसाफ़त नहीं कटती
बे-अज़्म-ए-मुसम्मम क़दम आसाँ नहीं उठता

यूँ उठती हैं अँगड़ाई को वो मरमरीं बाहें
जैसे के ‘अदम’ तख़्त-ए-सुलैमाँ नहीं उठता.

बस इस क़दर है ख़ुलासा 

बस इस क़दर है ख़ुलासा मेरी कहानी का
के बन के टूट गया इक हुबाब पानी का

मिला है साक़ी तो रौशन हुआ है ये मुझ पर
के हज़्फ़ था कोई टुकड़ा मेरी कहानी का

मुझे भी चेहरे पे रौनक़ दिखाई देती है
ये मोजज़ा है तबीबों की ख़ुश-बयानी का

है दिल में एक ही ख़्वाहिश वो डूब जाने की
कोई शबाब कोई हुस्न है रवानी का

लिबास-ए-हश्र में कुछ हो तो और क्या होगा
बुझा सा इक छनाका तेरी जवानी का

करम के रंग निहायत अजीब होते हैं
सितम भी एक तरीक़ा है मेहरबानी का

‘अदम’ बहार के मौसम ने ख़ुद-कुशी कर ली
खुला जो रंग किसी जिस्म-ए-अर्ग़वानी का.

ख़ैरात सिर्फ इतनी मिली है

ख़ैरात सिर्फ इतनी मिली है हयात से
पानी की बूँद जैसे अता हो फ़ुरात से

शबनम इसी जुनूँ में अज़ल से है सीना-कूब
ख़ुर्शीद किस मक़ाम पे मिलता है रात से

नागाह इश्क़ वक़्त से आगे निकल गया
अंदाज़ा कर रही है ख़िरद वाक़िआत से

सू-ए-अदब न ठहरे तो दें कोई मशवरा
हम मुतमइन नहीं हैं तेरी काएनात से

साकित रहें तो हम ही ठहरते हैं बा-क़ुसूर
बोलें तो बात बढ़ती है छोटी सी बात से

आसाँ-पसंदियों से इजाज़त तलब करो
रस्ता भरा हुआ है ‘अदम’ मुश्किलात से.

कुछ शेर

ऐ दोस्त मोहब्बत के सदमे तन्हा ही उठाने पड़ते हैं
रह-बर तो फ़क़त इस रस्ते में दो गाम सहारा देते हैं.

बढ़ के तूफ़ान को आगोश में ले-ले अपनी
डूबने वाले तेरे हाथ से साहिल तो गया.

देखा है किस निगाह से तू ने सितम-ज़रीफ़
महसूस हो रहा है मैं ग़र्क़-ए-शराब हूँ.

दिल अभी अच्छी तरह टूटा नहीं
दोस्तों की मेहरबानी चाहिए.

दिल ख़ुश हुआ है मस्जिद-ए-वीराँ को देख कर
मेरी तरह ख़ुदा का भी ख़ाना ख़राब है.

गुलों को खिल के मुरझाना पड़ा है
तबस्सुम की सज़ा कितनी बड़ी है.

इंसाँ हूँ अदम और ये यजदाँ को ख़बर है
जंनत मेरे असलाफ़ की ठुकराई हुई है.

कहते हैं उम्र-ए-रफ़्ता कभी लौटती नहीं
जा मै-कदे से मेरी जवानी उठा के ला.

लोग कहते हैं के तुम से ही मोहब्बत है मुझे
तुम जो कहते हो के वहशत है तो वहशत होगी.

महशर में इक सवाल किया था करीम ने
मुझ से वहाँ भी आप की तारीफ़ हो गई.

मर ने वाले तो ख़ैर हैं बे-बस
जी ने वाले कमाल करते हैं.

मुझे तौबा का पूरा अज्र मिलता है उसी साअत
कोई ज़ोहरा-जबीं पी ने पे जब मजबूर करता है.

साक़ी मुझे शराब की तोहमत नहीं पसंद
मुझ को तेरी निगाह का इल्ज़ाम चाहिए.

सवाल कर के मैं ख़ुद ही बहुत पशेमाँ हूँ
जवाब दे के मुझे और शर्म-सार न कर.

सिर्फ़ एक क़दम उठा था ग़लत राह-ए-शौक़ में
मंज़िल तमाम उम्र मुझे ढूँढती रही.

ज़ाहिद शराब पी ने दे मस्जिद में बैठ कर
या वो जगह बता दे जहाँ पर ख़ुदा न हो.

ज़बान-ए-होश से ये कुफ़्र सरज़द हो नहीं सकता
मैं कैसे बिन पिए ले लूँ ख़ुदा का नाम ऐ साक़ी.

ज़रा एक तबस्सुम की तकलीफ़ करना
के गुलज़ार में फूल मुरझा रहें हैं.

ज़िंदगी नाम है रवानी का
क्या थमेगा बहाव पानी का.

मैकदा था चाँदनी थी मैं न था

मैकदा था चाँदनी थी मैं न था
इक मुजस्सम बेख़ुदी थी मैं न था

इश्क़ जब दम तोड़ता था तुम न थे
मौत जब सर धुन रही थी मैं न था

तूर पर छेड़ा था जिसने आप को
वो मेरी दीवांगी थी मैं न था

मैकदे के मोड़ पर रुकती हुई
मुद्दतों की तश्नगी थी मैं न था

मैं और उस ग़ुंचादहन की आरज़ू
आरज़ू की सादगी थी मैं न था

गेसूओं के साये में आराम-कश
सर-बरहना ज़िन्दगी थी मैं न था

रदै-ओ-काबा में ‘अदम’ हैरत-फ़रोश
दो जहाँ की बदज़नी थी मैं न था

जब गर्दिशों में जाम थे

जब गर्दिशों में जाम थे
कितने हसीं अय्याम थे

हम ही न थे रुसवा फ़क़त
वो आप भी बदनाम थे

कहते हैं कुछ अर्सा हुआ
क़ाबे में भी असनाम थे

अंजाम की क्या सोचते
ना-वाक़िफ़-ए- अंजाम थे

अहद-ए-जवानी में ‘अदम’
सब लोग गुलअन्दां थे

सुबू को दौर में लाओ बहार के दिन हैं

सुबू को दौर में लाओ बहार के दिन हैं
हमें शराब पिलाओ बहार के दिन हैं

ये काम आईन-ए-इबादत है मौसम-ए-गुल में
हमें गले से लगओ बहार के दिन हैं

ठहर ठहर के न बरसो उमड़ पड़ो यक दम
सितमगरी से घटाओ बहार के दिन हैं

शिकस्ता-ए-तौबा का कब ऐसा आयेगा मौसम
‘अदम’ को घेर के लाओ बहार के दिन हैं

ऐ मैगुसारों सवेरे सवेरे

ऐ मैगुसारों सवेरे सवेरे
बड़ी रोशनी बख़्शते हैं नज़र को

ख़राबात के गिर्द फेरे पे फेरे
तेरे गेसूओं के मुक़द्दस अँधेरे

किसी दिन इधर से गुज़र कर तो देखो
बड़ी रौनक़ें हैं फ़क़ीरों के डेरे

ग़म-ए-ज़िन्दगी को ‘अदम’ साथ लेकर
कहाँ जा रहे हो सवेरे सवेरे

बातें तेरी वो वो फ़साने तेरे 

बातें तेरी वो वो फ़साने तेरे
शगुफ़्ता शगुफ़्ता बहाने तेरे

बस एक ज़ख़्म नज़्ज़ारा हिस्सा मेरा
बहारें तेरी आशियाने तेरे

बस एक दाग़-ए-सज्दा मेरी क़ायनात
जबीनें तेरी आस्ताने तेरे

ज़मीर-ए-सदफ़ में किरन का मुक़ाम
अनोखे अनोखे ठिकाने तेरे

फ़क़ीरों का जमघट घड़ी दो घड़ी
शराबें तेरी बादाख़ाने तेरे

बहार-ओ-ख़िज़ाँ कम निगाहों के वहम
बुरे या भले सब ज़माने तेरे

‘अदम’ भी है तेरा हिकायतकदाह
कहाँ तक गये हैं फ़साने तेरे

आप अगर हमको मिल गये होते

आप अगर हमको मिल गये होते
बाग़ में फूल खिल गये होते

आप ने यूँ ही घूर कर देखा
होंठ तो यूँ भी सिल गये होते

काश हम आप इस तरह मिलते
जैसे दो वक़्त मिल गये होते

हमको अहल-ए-ख़िरद मिले ही नहीं
वरना कुछ मुन्फ़ईल गये होते

उसकी आँखें ही कज-नज़र थीं ‘अदम’
दिल के पर्दे तो हिल गये होते

अब दो आलम से सदा-ए-साज़ आती है मुझे 

अब दो आलम से सदा-ए-साज़ आती है मुझे
दिल की आहट से तेरी आवाज़ आती है मुझे

या समात का भरम है या किसी नग़्में की गूँज
एक पहचानी हुई आवाज़ आती है मुझे

किसने खोला है हवा में गेसूओं को नाज़ से
नर्मरौ बरसात की आवाज़ आती है मुझे

उस की नाज़ुक उँगलियों को देख कर अक्सर ‘अदम’
एक हल्की सी सदा-ए-साज़ आती है मुझे

तेरे दर पे वो आ ही जाते हैं 

तेरे दर पे वो आ ही जाते हैं
जिनिको पीने की आस हो साक़ी

आज इतनी पिला दे आँखों से
ख़त्म रिंदों की प्यास हो साक़ी

हल्क़ा हल्क़ा सुरूर है साक़ी
बात कोई ज़रूर है साक़ी

तेरी आँखें किसी को क्या देंगी
अपना अपना सुरूर है साक़ी

तेरी आँखों को कर दिया सजदा
मेरा पहला क़ुसूर है साक़ी

तेरे रुख़ पे ये परेशाँ ज़ुल्फ़ें
इक अँधेरे में नूर है साक़ी

तेरी आँखें किसी को क्या देंगी
अपना अपना सुरूर है साक़ी

पीने वालों को भी नहीं मालूम
मैकदा कितनी दूर है साक़ी

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