अभिषेक शुक्ला की रचनाएँ

अब इख़्तियार में मौजें न ये रवानी है

अब इख़्तियार में मौजें न ये रवानी है
मैं बह रहा हूँ कि मेरा वजूद पानी है

मैं और मेरी तरह तू भी इक हक़ीक़त है
फिर इस के बाद जो बचता है वो कहानी है

तिरे वजूद में कुछ है जो इस ज़मीं का नहीं
तिरे ख़याल की रंगत भी आसमानी है

ज़रा भी दख़्ल नहीं इस में इन हवाओं का
हमें तो मस्लहतन अपनी ख़ाक उड़ानी है

ये ख़्वाग-गाह ये आँखें ये मेरा इश्क़-ए-क़दीम
हर एक चीज़ मिरी ज़ात में पुरानी है

वो एक दिन जो तुझे सोचने में गुज़रा था
तमाम उम्र उसी दिन की तर्जुमानी है

नवाह-ए-जाँ में भटकती हैं ख़ुशबुएँ जिस की
वो एक फूल कि लगता है रात-रानी है

इरादतन तो कहीं कुछ नहीं हुआ लेकिन
मैं जी रहा हूँ ये साँसों की ख़ुश-गुमानी है

अभी तो आप ही हाइल है रास्ता शब का

अभी तो आप ही हाइल है रास्ता शब का
क़रीब आए तो देखेंगे हौसला शब का

चली तो आई थी कुछ दूर साथ साथ मिरे
फिर इस के बाद ख़ुदा जाने क्या हुआ शब का

मिरे ख़याल के वहशत-कदे में आते ही
जुनूँ की नोक से फूटा है आबला शब का

सहर की पहली किरन ने उसे बिखेर दिया
मुझे समेटने आयाथा जब ख़ुदा शब का

जमीं पे आ के सितारों ने ये कहा मुझ से
तिरे क़रीब से गुज़रा है क़ाफ़िला शब का

सहर का लम्स मिरी ज़िंदगी बढ़ा देता
मगर गिराँ था बहुत मुझ पे काटना शब का

कभी कभी तो ये वहशत भी हम पे गुज़री है
कि दिल के साथ ही देखा है डूबना शब का

चटख़ उठी है रग-ए-जाँ तो ये ख़याल आया
किसी की याद से जुड़ता है सिलसिला शब का

दर-ए-ख़याल भी खोलें सियाह शब भी करें

दर-ए-ख़याल भी खोलें सियाह शब भी करें
फिर उस के बाद तुझे सोचें ये ग़ज़ब भी करें

वो जिस ने शाम के माथे पे हाथ फेरा है
हम उस चराग़-ए-हवा-साज़ का अदब भी करें

सियाहियाँ सी बिखरने लगी हैं सीने में
अब उस सितारा-ए-शब-ताब की तलब भी करें

ये इम्तियाज़ ज़रूरी है अब इबादत में
वही दुआ जो नज़र कर रही है लब भी करें

कि जैसे ख़्वाब दिखाना तसल्लियाँ देना
कुछ एक काम मोहब्बत में बे-सबब भी करें

मैं जानता हूँ कि ताबीर ही नहीं मुमकिन
वो मेरे ख़्वाब की तशरीह चाहे जब भी करें

शिकस्त-ए-ख़्वाब की मंज़िल भी कब नई है हमें
वही जो करते चले आएँ हैं सो अब भी करें

फ़सील-ए-जिस्म गिरा दे मकान-ए-जाँ से निकल

फ़सील-ए-जिस्म गिरा दे मकान-ए-जाँ से निकल
ये इंतिशार-ज़दा शहर में यहाँ से निकल

तिरी तलाश में फिरते हैं आफ़्ताब कई
सो अब ये फ़र्ज़ है तुझ पर कि साएबाँ से निकल

तमाम शहर पे इक ख़ामुशी मुसल्लत है
अब ऐसा कर कि किसी दिन मिरी ज़बाँ से निकल

मक़ाम-ए-वस्ल तो अर्ज़-ओ-समा के बीच में है
मैं इस ज़मीन से निकलूँ तू आसमाँ से निकल

मैं अपनी ज़ात में तारीकियाँ समेटे हों
तू इक चराग़ जला और अब यहाँ से निकल

कहा था मुझ से भी इक दिन हवा-ए-सहरा ने
मिरी पनाह में आ जा ग़ुबार-ए-जाँ से निकल

हम ऐसे सोए भी कब थे हमें जगा लाते 

हम ऐसे सोए भी कब थे हमें जगा लाते
कुछ एक ख़्वाब तो शब-ख़ून से बचा लाते

ज़ियाँ तो दोनों तरह से है अपनी मिट्टी का
हम आब लाते कि अपने लिए हवा लाते

पता जो होता कि निकलेगा चाँद जैसा कुछ
हम अपने साथ सितारों को भी उठा लाते

हमें यक़ीन नहीं था ख़ुद अपनी रंगत पर
हम इस ज़मीं की हथेली पे रंग क्या लाते

बस और कुछ भी नहीं चाहता था मैं तुम से
ज़रा सी चीज़ थी दुनिया कहीं छुपा लाते

हमारे अज़्म की शिद्दत अगर समझनी थी
तो इस सफ़र में कोई सख़्त मरहला लाते

ख़ला के जैसा कोई दरमियान भी पड़ता

ख़ला के जैसा कोई दरमियान भी पड़ता
फिर इस सफ़र में कहीं आसमान भी पड़ता

मैं चोट कर तो रहा हूँ हवा के माथे पर
मज़ा तो जब था कि कोई निशान भी पड़ता

अजीब ख़्वाहिशें उठतीं हैं इस ख़राबे में
गुज़र रहे हैं तो अपना मकानी भी पड़ता

हमीं जहान के पीछे पड़े रहें कब तक
हमारे पीछे कभी ये जहान भी पड़ता

ये इक कमी कि जो अब ज़िंदगी सी लगती है
हमारी धूप में वो साएबान भी पड़ता

हर एक रोज़ इसी ज़िंदगी की तय्यारी
सो चाहते हैं कभी इम्तिहान भी पड़ता

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