अमरजीत कौंके की रचनाएँ

पता नहीं 

पता नहीं
कितनी प्यास थी उसके भीतर
कि मैं
जिसे अपने समुद्रों पर
बहुत गर्व था
उसके सामने
पानी का एक छोटा-सा
क़तरा बन जाता

पता नहीं
कितनी अग्नि थी उसके भीतर
कि मैं
जिसे अपने सूरजों पर
बहुत गर्व था
उसके सामने
एक छोटा-सा
जुगनू बन जाता

पता नहीं
कितना प्यार था उसके भीतर
कि मैं
जिसे अपनी बेपनाह मोहब्बत पर
बहुत गर्व था
उसके सामने
मेरा सारा प्यार
एक तिनका-मात्र रह जाता

पता नहीं
कितनी साँस थी उसके भीतर
कि मैं
जिसे अपनी लम्बी साँसों पर
बहुत गर्व था
उसके पास जाता
तो मेरी साँस टूट जाती

पता नहीं
कितने मरूस्थल थे उसके भीतर
कि मैं
जिसे अपने जलस्रोतों पर
बहुत गर्व था
उसकी देह में
एक छोटे से झरने की भाँति
गिरता और सूख जाता

पता नहीं
कितने गहरे पाताल थे उसके भीतर
कि मैं
जिसे बहुत बड़ा तैराक होने का भ्रम था
उसकी आँखों में देखता
तो अंतहीन गहराइयों में
डूब जाता
डूबता ही चला जाता।

मूल पंजाबी से हिंदी में रूपांतर : स्वयं कवि द्वारा

उत्तर आधुनिक आलोचक

जब मैंने
भूख को भूख कहा
प्यार को प्यार कहा
तो उन्हें बुरा लगा

जब मैंने
पक्षी को पक्षी कहा
आकाश को आकाश कहा
वृक्ष को वृक्ष
और शब्द को शब्द कहा
तो उन्हें बुरा लगा

परन्तु जब मैंने
कविता के स्थान पर
अकविता लिखी
औरत को
सिर्फ़ योनि बताया
रोटी के टुकड़े को
चांद लिखा
स्याह रंग को
लिखा गुलाबी
काले कव्वे को
लिखा मुर्गाबी

तो वे बोले-
वाह ! भई वाह !!
क्या कविता है
भई वाह !!

मूल पंजाबी से हिंदी में रूपांतर : स्वयं कवि द्वारा

खोये हुए रंग

(होली पर विशेष)

जाने अनजाने हमसे
जो रंग अचानक खो गए
हो सके तो
उन रंगों को ढूंढ़ कर लाएँ
आओ इस बार
होली फिर रंगों से मनाएँ।

कुछ रंग
रंगों की खोज में निकले
वापस नहीं लौटे
घर उनकी ख़बर ही लौटी
कुछ रंग ख़ूनी ऋतुओं ने निगले
कुछ रंग सरहदों पर बिख़रे
कुछ रंग खेतों में तड़पते
कुछ रंगों की रूहें
अभी भी सूने घरों में तिलमिलातीं
कुछ रंगों को
अभी भी उनकी माँएँ बुलातीं
ये रंग जितने भी खोए
हमारे अपने थे
इन रंगों के बिना
हमारे आंगन में
मातम है
शोक है
सन्ताप है
इन रंगों के बिना
होली रंगों की नहीं
जख़्मों की बरसात है

कोशिश करें
कि कच्चे जख़्मों को
फिर हँसने की कला सिखाएँ
हो सके तो
उन रंगों को
ढूँढ़ कर लाएँ
और होली इस बार फिर
रंगों से मनाएँ।

मूल पंजाबी से हिंदी में रूपांतर : स्वयं कवि द्वारा

कलाइडियोस्कोप

उन्होंने कहा
कलाइडियोस्कोप ही तो है-
ज़िन्दगी
थोड़े से
चूड़ियों के टुकड़े डालो
आँख से लगाओ
और घुमाओ

मैं देर तक सोचता रहा
कि रंग-बिरंगे
काँच के टुकड़ों के लिए
मैं कौन-सी
खनखनाती कलाइयों को
सूना करूँ…।

मूल पंजाबी से हिंदी में रूपांतर : स्वयं कवि द्वारा

फूल खिलेगा 

तूने एक रिश्ते पर
कितनी आसानी से
मिट्टी डाल दी
तेरे साथ वालों ने
मिट्टी फेंक-फेंक कर
इक रिश्ते की क़ब्र बना दी

शायद तुझे भ्रम है
कि रिश्ते यूँ खत्म हो जाते
लेकिन
बरसों बाद
सदियों बाद
जन्मों बाद
इस क़ब्र में से
फिर इस रिश्ते की
सुर्ख़ कोंपल फूटेगी

फिर इस क़ब्र में से
प्यार का महकता फूल खिलेगा।

मूल पंजाबी से हिंदी में रूपांतर : सुभाष नीरव

माँ के नाम का चिराग़ 

घर को कभी न छोड़ने वाली माँ
उन लम्बे रास्तों पर निकल गई
जहाँ से कभी कोई लौट कर नहीं आता

उसके जाने के सिवा
सब कुछ उसी तरह है

शहर में उसी तरह
भागे जा रहे हैं लोग
काम-धंधों में उलझे
चलते कारखाने
काली सड़कों पर बेचैन भीड़
सब कुछ उसी तरह है।

उसी तरह
उतरी है शहर पर शाम
ढल गई है रात
जगमगा रहा है शहर सारा
रौशनियों से

सिर्फ़ एक माँ के नाम का
चिराग़ है बुझा…।

मूल पंजाबी से हिंदी में रूपांतर : सुभाष नीरव

धीर-धीरे

इसी तरह धीरे-धीरे
ख्वाहिशें ख़त्म होती हैं
इसी तरह धीरे-धीरे
मरता है आदमी

इसी तरह धीरे-धीरे
आँखों से सपने
सपनों से रंग ख़त्म होते
रंगों से ख़त्म होती है दुनिया
सफ़ेद कैनवस पर काली चिड़ियाँ
मृत नज़र आती हैं

इसी तरह धीरे-धीरे
इबारतें कविताओं में सिमटतीं
कविताएँ पंक्तियों में सिकुड़तीं
पंक्तियाँ शब्दों में लुप्त होतीं
और शब्द शून्य में खो जाते

इसी तरह धीरे-धीरे
इन्तज़ार करते
आँखों में इन्तज़ार ख़त्म होता
तड़पते-तड़पते
होठों का लरजना भूल जाता
छुअन को ललकते
पोरों से कम्पन गायब हो जाता

इसी तरह धीरे-धीरे
घर इन्सान को खा जाते
दीवारें उसकी मज़बूरी बन जातीं
रिश्ते जो उसके पाँव की बेडियाँ होते
आदमी उन्हें
पाजेब बना कर थिरकने लगता है

इसी तरह धीरे-धीरे
व्यवस्था के खिलाफ़ जूझता आदमी
व्यवस्था का अहम् हिस्सा बन जाता
रंगों की दुनिया में
मटमैला-सा रंग बन जाता
और कैनवस से एक दिन लुप्त हो जाता

इसी तरह धीरे-धीरे
सोचते-सोचते
आदमी जड़ हो जाता है एक दिन
पता ही नहीं चलता
कब कोई
उसके हाथों से क़लम
कोई कागज़
छीन कर ले जाता

इसी तरह धीरे-धीरे
एक कवि
कवि से कोल्हू का बैल बन जाता
और आँखों पर पट्टी बांध कर
मुर्दा ज़िन्दगी की
परिक्रमा करने लगता।

मूल पंजाबी से हिंदी में रूपांतर : स्वयं कवि द्वारा

शब्दों का इन्तज़ार

शब्द जब मेरे पास नहीं होते
मैं भी नहीं बुलाता उन्हें
दूर जाने देता हूँ
अदृश्य सीमाओं तक
उन्हें परिंदे बन कर
धीरे-धीरे
अनंत आकाश में
लुप्त होते देखता हूँ

नहीं !

जबरन बाँध कर
नहीं रखता मैं शब्द
डोरियों से
जंज़ीरों में
पिंजरों में कैद करके
नहीं रखता मैं शब्द

मन को
खाली हो जाने देता हूँ
सूने क्षितिज की भाँति

कितनी बार
अपनी ख़ामोशी को
अपने भीतर गिर कर
टूटते हुए
देखता हूँ मैं
लेकिन इस टूटन को
अर्थ देने के लिए
शब्दों की मिन्नत नहीं करता

टूटने देता हूँ
चटखने देता हूँ
ख़ामोशी को अपने भीतर
मालूम होता है मुझे
कि कहीं भी चले जाएँ चाहे
अनंत सीमाओं में
अदृश्य दिशाओं में
शब्द

आख़िर लौट कर आएँगे
ये मेरे पास एक दिन

आएँगे
मेरे कवि-मन के आँगन में
मरूस्थल बनी
मेरे मन की धरा पर
बरसेंगे रिमझिम
भर देंगे
सोंधी महक से मन

कहीं भी हों
शब्द चाहे

दूर
बहुत दूर

लेकिन फिर भी
शब्दों के इन्तज़ार में
भरा-भरा रहता
अंत का खाली मन ।

मूल पंजाबी से हिंदी में रूपांतर : स्वयं कवि द्वारा

लालटेन

कंजक कुँआरी कविताओं का
एक कब्रिस्तान है
मेरे सीने के भीतर

कविताएँ
जिनके जिस्म से अभी
संगीत पनपना शुरू हुआ था
और उनके अंग
कपड़ों के नीचे
जवान हो रहे थे
उनके मरमरी चेहरों पर
सुर्ख आभा झिलमिलाने लगी थी

तभी अतीत ने
उन्हें क्रोधित आँखों से देखा
वर्तमान ने
तिरछी नज़रों से घूरा
और भविष्य ने त्योरी चढ़ाई

इन सुलगती हुई निगाहों से डर कर
मैंने उन कविताओं को
अपने मन की धरती में
गहरा दबा डाला
अपनी तरफ़ से उन्हें
गहरी नींद सुला डाला
और कहा-
कि अभी कविताओं को
प्यार करने का समय नहीं

लेकिन टिकी रात के
ख़ौफ़नाक अंधेरे में
मेरे भीतर अब भी
उनकी भयानक हँसी गूँजती
दिल दहला देने वाली चीख़ें
विलाप की आवाज़
मेरे मन की दीवारों से
टकरा-टकरा कर लौटती
और पूछती-
कि हमारा गुनाह क्या था ?
आवाज़ पूछती
तो मेरे मन की मिट्टी काँपती
काँपती और तड़पती
और मैं
घर से छिपकर
समाज से छिपकर
पूर्वजों से छिपकर
हाथों में
स्मृतियों की लालटेन पकड़े
सारे क़ब्रिस्तान की परिक्रमा करता।

और कंजक कुँआरी
कविताओं की कब्रों पर
अपने लहू का
एक-एक चिराग
रोशन करता।

मूल पंजाबी से हिंदी में रूपांतर : स्वयं कवि द्वारा

आवाज़

बहुत उदास होता हूँ

साँझ को
घर लौटते
परिन्दों को देखकर
अपना घर याद आता है
खुली चोंचें याद आती हैं
जिनके लिए
मैं चुग्गा चुगने का
वादा कर
एक दिन चला आया था

उदास होता हूँ बहुत
जब अपने
बेबस पंखों की तरफ देखता हूँ
अपने पाँव में पड़ी बेड़ियाँ
किश्तों में बँटा हुआ
अपना जीवन देखूँ
उस दौड़ की रफ़्तार देखूँ
जिस में मैं महज़
एक रेस का घोड़ा बनकर
रह गया हूँ

उदास होता हूँ बहुत
जब अपनी अंगुलियों के पोरों में
जगमगाती कविताओं की
याद आती है
वह शब्दों का आकाश
जो उदासी के समय
मेरे सिर पर फैल जाता था
सघन छाँव बनकर
और मैं
कविता लिखकर
जीवन की मुक्ति तलाश लेता था

बहुत उदास होता हूँ
इस उदासी में
तुम्हारी आवाज़ सुनता हूँ
तो मेरे भीतर पिघलने लगती
उदासी की बर्फ़
बूँद-बूँद
रिसने लगता है
समुद्र

तुम्हारी आवाज़ सुनता हूँ
तुम्हारी आवाज़
किसी पेन-किलर की तरह
थोड़ी देर के लिए
मुझे मेरा
दर्द भुला देती है
मेरी जाग रही आत्मा को
कुछ देर के लिये फिर
गहरी नींद सुला देती है ।

मूल पंजाबी से हिंदी में रूपांतर : स्वयं कवि द्वारा

सपने नहीं मरते

बहुत बार देखे
इन आँखों ने सपने
और बहुत बार देखा
टूटते हुए उन्हें

चटखते देखा
फिर देखा टूटते
किरचों में बँटते हुए
और किरचों को आँखों में चुभते
देखा बहुत बार

किरचों को देखा
लहू में तैरते हुए
अंगों में चलते हुए
जिस्म की गहराईयों तक उतरते

फिर जिस्म में साँस लेते
देखी काँच के टुकड़ों की फसल
सपने किरचों में बँटते हुए
जिस्म में उगते
देखे कितनी ही बार

पर नयन हैं बावरे
कि सपने देखने की
आदत नहीं तजते

सपने नहीं मरते ।

मूल पंजाबी से हिंदी में रूपांतर : स्वयं कवि द्वारा

अपने घर में 

अपने घर में बैठ कर
पहली बार मैंने धूप देखी
जो सुबह-सवेरे
उतर कर सीढ़ियाँ
आँगन में उतर आई

धूप को अपने ऊपर ओढ़ते जाना मैंने
कि जीने के लिए
यह चमकती और गुनगुनी धूप
कितनी ज़रूरी थी

अपने घर में उगे फूलों की
दबे पाँव वलती
खुशबू को सूँघते
मैंने पहली बार महसूस किया
कि मुर्दा हो रहे जीवन के लिए
फूलों की यह महक
कितनी लाज़मी थी

अपने घर में मैंने पहली बार
फूलों पर
गुनगुनाती तितली देखी
और सोचा
कि रंगों का मनोविज्ञान
समझने के लिये
प्रकृति की
इस रंगीन कारीगरी को
समझना कितना आवश्यक था

अपने घर में बैठकर
मुझे पहली बार
अहसास हुआ
कि दुनियाँ में
सब बेघरों के लिए
सचमुच
कितने ज़रूरी हैं घर ।

मूल पंजाबी से हिंदी में रूपांतर : स्वयं कवि द्वारा

मैं तुम्हारे पास नहीं होता

मैं
तुम्हारे पास नहीं होता
भले ही
तुम मुझे असीम प्यार करती
मुझ पर
अपना तन मन निछावर करती
लेकिन तुम्हारे संग लिपटा हुआ भी
मैं तुम्हारे पास नहीं होता

वैसे तो मैं भी
तुमसे बहुत प्यार करने का
दंभ करता हूँ
बार-बार किसी प्यासे मरूस्थल की तरह
तुम्हारी गोद में आकर गिरता हूँ
पूरे का पूरा अपनी रेत संग
तुम्हारे नीर में भीगने के लिए

लेकिन भीतर
मन के, ठीक भीतर
वह कौन सी जगह है
जो बिल्कुल खुश्क रहती है
जो पानी की बूँद से भी डरती है
सच मानना
वह जगह बिल्कुल खुश्क रहती है

मैं मन के उस खुश्क टुकडे़ पर
समुद्र बिछा देना चाहता हूँ
एक नखलिस्तान
लहरा देना चाहता हूँ

पर मन की कितनी
परतों में बँटा हुआ मैं
आज का मानव
तुम्हारे नीर में भीग कर भी
भीतर से
बिल्कुल खुश्क रहता हूँ ।

मूल पंजाबी से हिंदी में रूपांतर : स्वयं कवि द्वारा

तुम्हारी देह जितना

देखे बहुत मैंने
मरूस्थल तपते
सूरज से अग्नि की बरसात होती
देखी कितनी ही बार
बहुत बार देखा
खौलता समुद्र
भाप बनकर उड़ता हुआ
देखे ज्वालामुखी
पृथ्वी की पथरीली तह तोड़कर
बाहर निकलते

रेत
मिट्टी
पानी
हवा
सब देखे मैंने
तपन के अंतिम छोर पर

लेकिन
तुम्हारी देह को छुआ जब
महसूस हुआ तब
कि कहीं नहीं तपन इतनी
तुम्हारी काँची देह जितनी

रेत
न मिट्टी
पानी न हवा
कहीं कुछ नहीं तपता

तुम्हारी देह से ज़्यादा ।

मूल पंजाबी से हिंदी में रूपांतर : स्वयं कवि द्वारा

हम यहीं रहेंगे

हम यहीं रहेंगे सदा
यह पृथ्वी हमारी है
यह मिट्टी हमारी है

हमने इस पृथ्वी को सींचा
इसे जोता
इसे आबाद किया है

यह पृथ्वी हमारी है
हमने इसकी मिट्टी को
ख़ून से सींचा है
यह खिले हुए फूल
लहलहाती फसलें
हमारे ख़ून और पसीने का बदल हैं

इस पृथ्वी की ख़ूबसूरती के लिए
हम ऋतुओं से झगड़े
हम तूफ़ानों से जूझे
हम सलीबों को कँधों पर उठा कर
मक्तल तक गए
हमने ज़हर के प्याले पिए
भर-भर कर
हम देग़ों में उबले
हथेलियों पर शीश रखकर
लड़ते रहे हैं हम

इसके तिनके-तिनके में हम हैं
इसके कण-कण में हमारा ख़ून है

हमने जीवित रहते
इस मिट्टी में फूल उगाए
हम मर कर भी
इस मिट्टी में
फूल बन कर खिलेंगे

क्योंकि
यह पृथ्वी हमारी है
यह मिट्टी हमारी है

हम यहीं रहेंगे सदा ।

मूल पंजाबी से हिंदी में रूपांतर : स्वयं कवि द्वारा

मैं कविता लिखता हूँ 

मैं कविता लिखता हूँ
क्योंकि मैं जीवन को
इसकी सार्थकता में
जीना चाहता हूँ

कविता ना लिखूँ
तो मैं निर्जीव पुतला
बन जाता मिट्टी का
खाता पीता सोता
मुफ्त में डकारता
पेड़ों से मिली आक्सीजन
छोड़ता काबर्न-डाईआक्साईड
हवा दूषित करता
खराब करता अन्न
पृथ्वी पर बोझ जैसा
बन जाता हूँ मैं
खुद अपने को
लगने लगता पाप जैसा

लेकिन जब मैं कविता लिखता हूँ
पृथ्वी का दर्द
शब्दों में पिरोता हूँ
धरती पर रहते मनुष्यों के
दर्द में उनके साथ दुखी होता
उनकी खुशी में
मेरा अँग अँग खिल जाता

मैं कविता लिखता जब
उनके दर्द
उनकी खुशी के
गीत गाता
मैं शब्द शब्द जुड़ता
कविता बन जाता
मेरा अंदर बाहर
अजीब सी खुशी से भर जाता

मैं पृथ्वी का अन्न खाता हूँ
हवा से साँस लेता हूँ
जमीन के टुकड़े ने मुझे
रहने के लिये जगह दी है
कर्ज़दार हूँ मैं पृथ्वी का

मैं कविता लिखता हूँ
कि पृथ्वी का
कुछ ऋण उतार सकूँ।

अगर

अगर मेरी कविताएँ
किसी के दर्द का
बयान नहीं करती
तो उड़ने दो
मेरी कविताओं को
सड़कों और गलियों में
कूड़े के ढेरों पर
जिनको कूड़ा चुनते बच्चे
बेच कर
अनाज की मुट्ठी खरीद सकें

अगर मेरी कविताएँ
किसी समस्या का ज़िक्र
नहीं करतीं
तो बिकने दो
मेरी कविताओं को
रद्दी की दुकानों पर
जिन में दुकानदार
थोड़ा-थोड़ा सौदा डाल कर बेचें

अगर मेरी कविताएँ
किसी के दर्द की
कहानी नहीं कहतीं
तो दे दो मेरी कविताएँ
बच्चों के हाथों में
जिन में तिनके जोड़ कर
वे उन की पतंग
बना कर उड़ाएं

अगर मेरी कविताएँ
किसी मुहब्बत भरे दिल की
बात नहीं करतीं
तो करके इन का
पुर्ज़ा पुर्ज़ा
कर दो
जल प्रवाह
नदी के जल में

बिल्कुल
हमदर्दी न करना
मेरी कविताओं के साथ

अगर यह
आम आदमी के
किसी काम की नहीं
तो इनको
लाईब्रेरियों में
सँभाल कर
क्या करना।

अजनबी औरत 

समंदर में उतरने के लिए
हमने अभी कदम ही रखा था
कुछेक कदम ही चले थे
कि उसने समंदर के ऐन बीच
लहरों की भयंकरता देखी
उसकी आंखों में
सहम की परछाई सी उभरी
उसने मेरे हाथ से अपना हाथ
पीछे खींचा
और बोली-
मुझे वापिस जाने दो…

मैंने हैरान हो कर
उसकी आंखों में देखा
लेकिन वहाँ तो
‘वह’ कहीं नहीं थी
जिस पर विश्वास करके मैं
खौलते
गहरे समुंदर में उतर पड़ा था
उस की आँखों में
‘वह’ तो कहीं भी नहीं थी

वहाँ तो खड़ी थी अब कोई
अजनबी सी औरत
अन्जाना बेपहचाना सा
कोई वजूद
जिसके भीतर कितने ही युद्व
लड़े जा रहे थे एक साथ
कितने ही रिश्तों का
मचा था घमासान वहाँ

उसकी आँखों में
उन युद्धों की
तसवीर झलकती थी
वहाँ मेरा अक्स तो
कहीं भी नहीं था

मैं
जो उस पर विश्वास करके
हिलोरे खाते
गरजते समंदर में
उतर पड़ा था।

पहला प्यार नहीं लौटता

पक्षी उड़ते
जाते हैं
दूर दिशाओं में
लौट आते
आखिर शाम ढलते
फिर अपने
घोंसलों में पंख पैफलाये

गाड़ियां जातीं
वापिस आ जातीं
स्टेशनों पर
लंबी सीटियां बजातीं

मौसम आते
लौट जाते
दिन चढ़ता
छिप जाता
फिर चढ़ता

बर्फ पिघलती
नदियों में नीर बहता
समुंदरों में पानी
भाप बन कर उड़ता
बादल बनता
फिर पहाड़ों की
चोटियों पर
बर्फ बन कर चमकता

उड़ती आत्मा
शून्य में भटकती
फिर किसी जिस्म में
प्रवेश करती

सब कुछ जाता
सब कुछ लौट आता

नहीं लौटता
इस ब्रहामाण्ड में
तो सिर्फ
पहला प्यार नहीं लौटता

एक बार गुम होता
तो मनुष्य
जन्म-जन्म
कितने जन्म
उस के लिए
भटकता रहता…।

सिर्फ एक शब्द

अपने पैरों के नीचे की
ज़मीन छोड़ कर
वह
आसमान में
बहुत ऊँचा उड़ रहा था

कोई भी तीर
उसको बेंध् नहीं था सकता
कोई भी गोली
उसको छलनी नहीं थी कर सकती
कोई भी गुलेल
उस तक मार नहीं थी करती

लेकिन किसी ने
उसको सिर्फ
‘एक शब्द’ ही कहा
कि वह परकटे पक्षी की तरह
लड़खड़ाता
तिलमिलाता

ज़मीन पर आ गिरा…।

मंगलवार

मंगलवार का दिन है
मंदिर के दरवाज़े के बाहर
बैठे हैं बच्चे
हाथ फैलाए

लोग आते
माथा टेक कर
बाँट देते
मन्नतें मांगा प्रसाद
हाथ फैलाए बच्चों के बीच
बच्चे खाते
खुश हो रहे

लोग खुश हैं
कि बाँट चले हैं
दुख अपना
छोटे-छोटे बच्चों के बीच

और बच्चे खुश हैं
कि बहुत दिनों बाद
आज मिला है
खाने को पेट भर।

पत्थर 

तितली
उड़ती उड़ती आई
आ कर एक पत्थर पर
बैठ गई

पत्थर उसी क्षण
खिल उठा
और
फूल बन गया।

वैक्यूम क्लीनर

छुट्टी वाले दिन
बीवी मेरी
वैक्यूम क्लीनर से
करने लगती सफाई घर की

छतों के कोने में
सोफे की नुक्क्ड़ों में
छुपी जमी धूल
मकड़ियाँ नज़रें चुरा कर
बना लेतीं जाले
बार-बार खींच लेता
वैक्यूम क्लीनर

कहता हूँ उस से
मेरे भी ज़हन में
सदियों से जमी है गर्द
संस्कारों की
फलसफों के जाले
लटकते जगह-जगह
बासी यादों की लगी फफूंद
रिश्तों की मैल दीवारों पर
मन के अँधेरे तहखानों में

कहता हूँ
खींच लो
वैक्यूम क्लीनर के साथ
मेरे दिमाग में फँसी
सब यादों की मकड़ियां
बुनती रहतीं हैं जाले हमेशा
उलझा रहता है मन

गर्द संस्कारों की
जीने को बना देती
रसहीन
बेस्वाद

खींच लो
मेरे भीतर से
सारी फ़लसफ़ों की धूल

बना दो मुझे
एक बार फिर से
नया…नवेला…।

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