‘अमानत’ लखनवी की रचनाएँ

आग़ोश में जो जलवा-गर इक

आग़ोश में जो जलवा-गर इक नाज़नीं हुआ
अंगुश्तरी बना मेरा तन वो नगीं हुआ

रौनक़-फ़ज़ा लहद पे जो वो मह-जबीं हुआ
गुम्बद हमारी क़ब्र का चर्ख़-ए-बरीं हुआ

कंदा जहाँ में कोई न ऐसा नगीं हुआ
जैसा के तेरा नाम मेरे दिल-नशीं हुआ

रौशन हुआ ये मुझ पे के फ़ानूस में है शमा
हाथ उस का जलवा-गर जो तह-ए-आस्तीं हुआ

रखता है ख़ाक पर वो क़दम जब के नाज़ से
कहता है आसमाँ न क्यूँ मैं ज़मीं हुआ

रौशन शबाब में जो हुई शम्मा-ए-रु-ए-यार
दूद-ए-चराग़ हुस्न-ए-ख़त-ए-अम्बरीं हुआ

या रब गिरा उदू पे अमानत के तू वो बर्क़
दो टुकड़े जिस से शहपर-ए-रूहुल-अमीं हुआ

बानी-ए-जोर-ओ-जफ़ा हैं सितम-ईजाद

बानी-ए-जोर-ओ-जफ़ा हैं सितम-ईजाद हैं सब
राहत-ए-जाँ कोई दिल-बर नहीं जल्लाद हैं सब

कभी तूबा तेरे क़ामत से न होगा बाला
बातें कहने की ये ऐ ग़ैरत-ए-शमशाद हैं सब

मिज़ा ओ अबरू ओ चश्म ओ निगह ओ ग़म्ज़ा ओ नाज़
हक़ जो पूछो तो मेरी जान के जल्लाद हैं सब

सर्व को देख के कहता है दिल-बस्ता-ए-ज़ुल्फ़
हम गिरफ़्तार हैं इस बाग़ में आज़ाद हैं सब

कुछ है बे-हुदा ओ नाक़िस तो ‘अमानत’ का कलाम
यूँ तो कहने को फन-ए-शेर में उस्ताद हैं सब

भूला हूँ मैं आलम को सर-शार इसे

भूला हूँ मैं आलम को सर-शार इसे कहते हैं
मस्ती में नहीं ग़ाफ़िल हुश्यार इसे कहते हैं

गेसू इसे कहते हैं रुख़सार इसे कहते हैं
सुम्बुल इसे कहते हैं गुल-ज़ार इसे कहते हैं

इक रिश्ता-ए-उल्फ़त में गर्दन है हज़ारों की
तस्बीह इसे कहते हैं ज़ुन्नार इसे कहते हैं

महशर का किया वादा याँ शक्ल न दिखलाई
इक़रार इसे कहते हैं इंकार इसे कहते हैं

टकराता हूँ सर अपना क्या क्या दर-ए-जानाँ से
जुम्बिश भी नहीं करती दीवार इसे कहते हैं

दिल ने शब-ए-फ़ुर्क़त में क्या साथ दिया मेरा
मोनिस इसे कहते हैं ग़म-ख़्वार इसे कहते हैं

ख़ामोश ‘अमानत’ है कुछ उफ़ भी नहीं करता
क्या क्या नहीं ऐ प्यारे अग़्यार इसे कहते हैं

ज़मज़मा किस की ज़बाँ पर ब-दिल-ए-शाद 

ज़मज़मा किस की ज़बाँ पर ब-दिल-ए-शाद आया
मुँह न खोला था के पर बाँधने सय्याद आया

क़द जो बूटा सा तेरा सर्व-ए-रवाँ याद आया
ग़श पे ग़श मुझ को चमन में तह-ए-शमशाद आया

ले उड़ी दिल को सू-ए-दश्त हवा-ए-वहशत
फिर ये झोंका मुझे कर देने को बर्बाद आया

किस क़दर दिल से फ़रामोश किया आशिक़ को
न कभी आप को भूले से भी मैं याद आया

दिल हुआ सर्व-ए-गुलिस्ताँ के नज़ारे से निहाल
शजर-ए-क़ामत-ए-दिल-दार मुझे याद आया

हो गई क़ता असीरी में उमीद-ए-परवाज़
उड़ गए होश जो पर काटने सय्याद आया

हो गया हसरत-ए-परवाज़ में दिल सौ टुकड़े
हम ने देखा जो क़फ़स को तो फ़लक याद आया

रूह को राह-ए-अदम में मेरा तन याद

रूह को राह-ए-अदम में मेरा तन याद आया
दश्त-ए-ग़ुर्बत में मुसाफ़िर को वतन याद आया

चुटकियाँ दिल में मेरे लेने लगा नाख़ुन-ए-इश्क़
गुल-बदन देख के उस गुल का बदन याद आया

वहम ही वहम में अपनी हुई औक़ात बसर
कमर-ए-यार को भूले तो दहन याद आया

बर्ग-ए-गुल देख के आँखों में तेरे फिर गए लब
ग़ुंचा चटका तो मुझे लुत्फ़-ए-सुख़न याद आया

दर-ब-दर फिर के दिला घर की हमें क़दर हुई
राह-ए-ग़ुर्बत में जो भूले तो वतन याद आया

आह क्यूँ खींच के आँखों में भर आए आँसू
क्या क़फ़स में तुझे ऐ मुर्ग़-ए-चमन याद आया

फिर अमानत मेरा दिल भूल गया ऐश ओ तरब
फिर मुझे रौज़ा-ए-सुलतान-ए-ज़मन याद आया

ख़ाना-ए-ज़ंजीर का पाबंद रहता हूँ

ख़ाना-ए-ज़ंजीर का पाबंद रहता हूँ सदा
घर अबस हो पूछते मुझ ख़ानमाँ-बर्बाद का

इश्क़-ए-क़द-ए-यार में क्या ना-तवानी का है ज़ोर
ग़श मुझे आया जो साया पड़ गया शमशाद का

ख़ुद-फ़रामोशी तुम्हारी ग़ैर के काम आ गई
याद रखिएगा ज़रा भूले से कहना याद का

ख़त लिखा करते हैं अब वो यक क़लम मुझ को शिकस्त
पेच से दिल तोड़ते हैं आशिक़-ए-ना-शाद का

इश्क़ पेचाँ का चमन में जाल फैला देख कर
बुलबुलों को सर्व पर धोका हुआ सय्याद का

क़ामत-ए-जानाँ से करता है अकड़ कर हम-सरी
हौसला देखे तो कोई सर्व-ए-बे-बुन्याद का

बे-ज़बानी में अमानत की वो हैं गुल-रेज़ियाँ
नातिक़ा हो बंद ऐ दिल बुलबुल-ए-ना-शाद का

उलझा दिल-ए-सितम-ज़दा ज़ुल्फ़-ए-बुताँ

उलझा दिल-ए-सितम-ज़दा ज़ुल्फ़-ए-बुताँ से आज
नाज़िल हुई बला मेरे सर पर कहाँ से आज

तड़पूँगा हिज्र-ए-यार में है रात चौधवीं
तन चाँदनी में होगा मुक़ाबिल कताँ से आज

दो-चार रश्क-ए-माह भी हम-राह चाहिएँ
वादा है चाँदनी में किसी मेहर-बाँ से आज

हंगाम-ए-वस्ल रद्द-ओ-बदल मुझ से है अबस
निकलेगा कुछ न काम नहीं और हाँ से आज

क़ार-ए-बदन में रूह पुकारी ये वक़्त-ए-नज़ा
मुद्दत के बाद उठते हैं हम इस मकाँ से आज

खींची है चर्ख़ ने भी किसी माँग की शबीह
साबित हुई ये बात मुझे कहकशाँ से आज

अँधेर था निगाह-ए-‘अमानत’ में शाम सहर
तुम चाँद की तरह निकल आए कहाँ से आज

सुब्ह-ए-विसाल-ए-ज़ीस्त का नक़्शा

सुब्ह-ए-विसाल-ए-ज़ीस्त का नक़्शा बदल गया
मुर्ग़-ए-सहर के बोलते ही दम निकल गया

दामन पे लोटने लगे गिर गिर के तिफ़्ल-ए-अश्क
रोए फ़िराक़ में तो दिल अपना बहल गया

दुश्मन भी गर मरे तो ख़ुशी का नहीं महल
कोई जहाँ से आज गया कोई कल गया

सूरत रही न शक्ल न ग़म्ज़ा न वो अदा
क्या देखें अब तुझे के वो नक़्शा बदल गया

क़ासिद को उस ने क़त्ल किया पुर्ज़े कर के ख़त
मुँह से जो उस के नाम हमारा निकल गया

मिल जाओ गर तो फिर वही बाहम हों सोहबतें
कुछ तुम बदल गए हो न कुछ मैं बदल गया

मुझ दिल-जले की नब्ज़ जो देखी तबीब ने
कहने लगा के आह मेरा हाथ जल गया

जीता रहा उठाने को सदमे फ़िराक़ के
दम वस्ल में तेरा न ‘अमानत’ निकल गया

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