अमिताभ बच्चन की रचनाएँ

हमारा दर्शन

थोड़ी-बहुत सम्पत्ति अरजने में कोई बुराई नहीं
बेईमानी से एक फ़ासला बनाकर जीना सम्भव है
ईमानदारी के पैसे से घर बनाया जा सकता है
चोर-डाकू सुधर सकते हैं
किराएदारों को उदार मकान-मालिक मिल सकते हैं
ख़रीदार दिमाग ठण्डा रख सकता है
विक्रेता हर पल मुस्कुराते रहने की कला सीख सकता है
ग़रीब अपना ईमान बचा सकते हैं
जीने का उत्साह बनाए रखना असम्भव नहीं
लोगों से प्यार करना मुमकिन है
बारिश से परेशान न होना सिर्फ़ इच्छा-शक्ति की बात है
ख़ुश और सन्तुष्ट रहने के सारे उपाय बेकार नहीं हुए हैं
लोग मृत्यु के डर पर काबू पाने में सक्षम हैं
पैसे वाले पैसे के ग़ुलाम न बनने की तरक़ीब सीख सकते हैं
कारोबार की व्यस्तताओं के बीच एक अमीर का प्रेम फल-फूल सकता है
समझौतों के सारे रास्ते बन्द नहीं हुए
बेगानों से दोस्ती की सम्भावनाएँ ख़त्म नहीं हुई
बच्चों और नौकरों को अनुशासन मे रखने के उपायों का कोई अन्त नहीं
चूतड़ के बिना भी आदमी बैठ सकता है
निरन्तर युद्ध की स्थिति में भी दुनिया बची रह सकती है

जिन्हें प्रेम नसीब नहीं हुआ

जिन्हें प्रेम नसीब नहीं हुआ
उन्हें रसायनशास्त्र से प्रेम नहीं हुआ
उनके हाथ लगा रसायनशास्त्र
जैसे जीवशास्त्र पढ़ते हुए
किसी को बैंक किसी को सेना हाथ लगे

उन्हें प्रेम नहीं हुआ
वह स्वयं
एक ज़िम्मेदार, अनुशासित औरत के
हाथ लगे

दोनों को फाटक वाला घर
सुरक्षा की चिन्ता
हाथ लगी

जिस दिन
रसायनशास्त्र खो गया
बचा सिर्फ़ चाबियों का एक बड़ा-सा गुच्छा
कुछ फ़ौलादी ताले
चोरों का डर

उन्हें प्रेम नहीं हुआ
सुरक्षा की सुरक्षा करते हुए
उन्होंने अन्तिम साँस ली
00

वे फुदकते रहे
घर के अन्दर
जैसे पिंजरे में तोता

उनके आकाश में
चील-बाजों का आतंक था

वे पूछते कौन
आवाज़ पर यकीन नहीं करते
आदमी के मुँह पर टॉर्च जलाते
कोई ख़तरा न देख
मेहमानों को
घर के अन्दर ले लेते

उन्होंने दो-एक ज़रूरी यात्राएँ की
हालाँकि अजनबियों से फ़ासला बनाकर रखा
किसी का कुछ नहीं चखा
घर से ही पानी ले गए

कभी किसी पर उनका दिल नहीं आया
पर वे मुस्कुराए
हँसे भी
खतरों का सामना करने के लिए
बिना प्रेम के
पचासी साल तक
वे रोटियाँ निगलते और पचाते रहे
00

प्रेमियों को
वे पसन्द नहीं कर पाए

प्रेमियों को
उन्होंने बड़े ख़ौफ़नाक तरीके से
नफ़रत करते हुए देखा

बारूद और तूफ़ान से भी ज़्यादा
वे प्रेम से डरते

जिनका मकान नहीं बना
जिन्हें औरत छोड़कर चली गई
जो खुले में हिरण जैसा दौड़ते
जो आवारा घूमते
जिन्होंने शराब से किडनी ख़राब कर ली
जो आधी रात तारों को निहारते
आदमियों का बखान तीर्थस्थल की तरह करते
मौत की तारीख़ याद नहीं रखते
फाटक खुला छोड़कर निकल जाते
उन्हें वे बहुत दूर से
और किसी बड़ी मज़बूरी में ही
हाथ जोड़कर नमस्कार करते

तरह तरह के हिन्दू

सारे हिन्दू हिन्दू नहीं होते
जो हिन्दू नहीं होते
वे भी हिन्दू होते हैं
क्योंकि वे मुसलमान नहीं होते
लंगोट बाँधने,
राख लपेटने वाले
हिन्दुओं में भी
कुछ कम कुछ ज़्यादा हिन्दू होते हैं
एक खद्दरधारी गांधीवादी
कब खतरनाक हिन्दू में बदल जाए
क्या पता

गरम होता नरम हिन्दू
नरम पड़ता गरम हिन्दू
जनवादी हिन्दू
कम्युनिस्ट हिन्दू
मुक्त हिन्दू उन्मुक्त हिन्दू
जीवन के आख़िरी वक़्त में जगा हिन्दू
अछूत हिन्दू सवर्ण हिन्दू
गँवार हिन्दू सुसंस्कृत हिन्दू
दलितों के हिन्दू बने रहने की अपील करता हिन्दू
भ्रष्ट, अवसरवादी, धर्मनिरपेक्ष हिन्दू
टीक रखने और ठोप लगाने वाला हिन्दू
दिमाग ठण्डा रखने के लिए
माथे पर चन्दन लगाने वाला हिन्दू
भेदिया, प्रचारक, शूटर हिन्दू
संहार करने वाला हिन्दू
संहार देखता हिन्दू
अपने हिन्दू होने पर सुरक्षित महसूस करता हिन्दू
मुस्लिम लड़की के इश्क़ में गिरफ़्तार हिन्दू
उग्र हिन्दुओं से सम्पर्क वाला हिन्दू
जन्म से हिन्दू
सिर्फ़ नाम का हिन्दू
ख़ुद को हिन्दू बताने में शरमाता हिन्दू
झूठा हिन्दू सच्चा हिन्दू
मुसलमानों का डर समझने वाला हिन्दू
मुसलमानों को कसाई समझने वाला हिन्दू
क्या हिन्दुओं की ये अवास्तविक श्रेणियाँ हैं
नहीं, हिन्दू तरह-तरह के होते हैं
और यक़ीन मानिए
उतने ही तरह के मुसलमान भी होते हैं

मेरे पिता को कभी किसी द्वंद्व ने नहीं घेरा

मेरे पिता को कभी किसी द्वंद्व ने नहीं घेरा
जैसे कि पहले नहा लूँ या पहले खा लूँ
घूस लूँ या न लूँ
होली में गाँव जाऊँ या न जाऊँ
खाने के बीच पानी पीऊँ या नहीं
खद्दर पहनना छोड़ दूँ या पहनता रहूँ
पहले बिना माँ-बाप की भतीजी का ब्याह करूँ
या साइकिल खरीदूँ
दो दिन पहन चुका कपड़ा तीसरे दिन भी पहन लूँ या नहीं पहनूँ
शाम में खुले आकाश के नीचे बैठूँ या न बैठूँ
कुर्सी ख़ुद उठा लाऊँ या किसी से मँगवा लूँ
पड़ोस में अपनी ही जात वालों को बसाऊँ या न बसाऊँ
डायरी लिखता रहूँ या छोड़ दूँ
भिण्डी पाँच रूपए सेर है
डायरी में दर्ज करूँ न करूँ
गर्भ-निरोध का आपरेशन करवा लूँ या रहने दूँ
संशय से परे
उन्होंने कुछ अच्छा किया, कुछ बुरा
मैं सिर्फ संशयों में घिरा रहा
कवि मौन मुझे देखता रहा, देखता रहा

विडम्बनाओं के बारे में 

विडम्बनाओं के बारे में
मेरी बुनियादी समझ साफ़ थी
क़लम को सब पहले से पता होता
थोड़ा ख़ुद को कोसता
थोड़ा अपने जैसों को
कुछ उलाहना समाज सरकार को देता
कुछ ग़रीबों को गरियाता
थोड़ा पुलिस माफ़िया पर गरज़ता
फिर आदमी के जीने के हौसले को याद करता
फिर लोकतन्त्र में सुधार के लिए शोर मचाता
फिर दफ़्तर से बाहर निकल पान चबाता
और सहकर्मियों से कहता
इससे अधिक हम क्या कर सकते हैं
कवि को ये ढर्रा रास न आता

महामारी के पहले 

एक बजबजाती नाली के साथ लगे
एनडीएमसी के एक कचरे के पहाड़ पर वे दुकान सजाते थे

पुलिस उन्हें माँ-बहन की गालियाँ देती
वे हंसते और उनके लिए सिगरेट लेकर दौड़ते

अच्छे पुलिस वाले बता देते
एकाध दिन के लिए लॉक डाउन कर लो सालो, भोसड़ी वालो
हमारी गाँड़ मत मारो

ओह, बहुत सारे अपमान और दुख और झिड़कियाँ थीं
जो उन्हें कितनी प्रिय थीं
ये उनकी थीं, उनकी सांसों की तरह थीं

कचरे के उस पहाड़ पर
ज़िन्दा मछली, तली मछली
और पिसे मसाले बेचने वालों के बीच
कैसी भयंकर मारा-मारी थी
फिर भी वह कितनी प्यारी थी

घर : छह कविताएँ 

1.

उन्होंने बेईमानी से कुछ पैसे कमाए
ज़मीन का एक टुकड़ा ख़रीदा
कुछ और बेईमानियाँ की
एक घर बनाया
कुछ और बेईमानियाँ की
घर को रहने लायक बनाया
तक़दीर ने साथ दिया
बड़ी बेईमानी के कुछ और मौक़े निकल आए
पुराना घर गिरा दिया
नए में हाथ लगाया
वे कुछ नई बेईमानियाँ कर रहे हैं
उनका नया घर खड़ा हो रहा है

2.

वे बेसहारा बेघरों के लिए काम करते हैं
इसके उन्हें कुछ वाजिब पैसे मिलते हैं
कुछ वे बेघरों के पैसे चुराते हैं
इस तरह चोरी से
अपना घर बनाते हैं

3.

जिसका कोई न हो
उसका ज़रूर एक घर हो
घर ही उसका ख़ुदा हो
न आए कोई उसके घर
न जाए वह कहीं घर छोड़कर
मगर हो ज़रूर उसका एक घर

4.

हमारे पास घर था
मगर वह अपना नहीं था
घर हमारे लिए सपना भी नहीं था
हमारे पास घर ख़रीदने के पैसे थे
हमारे लिए घर कहीं भाग नहीं रहे थे
घरों के बाज़ार में हम शान से घूम सकते थे
हमने बहुत सारे घर देखे
घर देखने का हमें नशा हो गया
घर के ऊपर हम आज़ाद परिन्दों की तरह उड़ते
हमने देखा लाखों घर ख़ाली थे
और उन्हें हमारा इन्तज़ार था
ख़ाली घरों ने हमारा दिमाग़ ख़राब कर दिया
ये समन्दर वाला लें
या वो जंगल वाला
या पहाड़ से नीचे उतरते हुए
वह जो तुमने देखा था
अरे वह घर तुम इतनी जल्दी भूल गई
घर जहाँ तीन तरफ़ से हवा आती थी
घर जहाँ छह घण्टे सूरज मिलता था
घर जिसे कोई दूसरा घर छुपा नहीं सकता था
वह घर जो दूर से ही दिखता था
तुम उसे भूल गई
वह सस्ता मगर बहुत बड़ा घर

5.

घर तो बहुत सारे ख़ाली हैं
पर वे हिन्दुओं के घर हैं
वे मुसलमानों को नहीं मिलेंगे
कुछ घर चमारों को
कुछ दुसाधों को नहीं मिलेंगे
कुछ घरों को
शुद्ध शाकाहारियों का
करना पड़ेगा इन्तज़ार
कुछ घर
एडवांस के चक्कर में छूट जाएँगे
कुछ घरों को पण्डित
प्रेतात्माओं से छुड़ाएँगे

6.

आइए
आपको हम अपना घर दिखाते हैं
बड़े-बड़े कमरे देखिए
सब आपस में जुड़े हैं
आप इधर से भी
और उधर से भी आ-जा सकते हैं
खिड़कियाँ भी कम नहीं हैं
बड़ी-बड़ी भी हैं
घर में जैसे आकाश हो
लकड़ी बहुत लगी
एक विशाल पेड़ ही समझिए
कि पूरा घर में समा गया
सोने से भी महंगी है लकड़ी
लेकिन एक सपना था
पूरा हो गया
देखिए यहाँ बैठ जाइए
यहां सायँ-सायँ आती है हवा
जैसे घर में रहकर भी घर से बाहर हैं
समझिए कि किसी तरह बन गया ये घर
मेरे वश का नहीं था
इसे ईश्वर ने ही बनाया है
लाख से ऊपर बुनियाद में ही दब गया
तब है कि एक घर हो गया
अब कहीं जाना नहीं है
अब कहीं भटकना नहीं है
बेटे न जाने क्या करें
रखें न रखें
बुलाएँ न बुलाएँ
तीन साल तक समझिए
कहीं का नहीं छोड़ा इस घर ने
चाँदी-सोना सब इसी में भस गए
कहाँ-कहाँ हाथ फैलाना पड़ा
लेकिन आज सन्तोष है
अपना घर है तो देखिए
रसोईघर भी कितना बड़ा है
मरेंगे तो घर तो साथ नहीं ले जाएँगे
लेकिन ख़ुशी है
मरेंगे तो अपने घर में मरेंगे

कलमघिस्सू पत्रकार

जैसे कि हम क़लमघिस्सू पत्रकार हैं
जैसे कि बातें बनाकर हम भरते हैं अपना पेट
जैसे कि क़लम घिसने के लिए
हमारे पास कई तकिया क़लाम हैं
जैसे कि हालात अभी बेकाबू नहीं हुए
जैसे कि चीज़ें दुरूस्त करने के लिए अभी हमारे पास वक़्त है
जैसे कि अभी जून ही गुज़रा है जुलाई अगस्त बाक़ी हैं
जैसे कि सितम्बर तक कर सकते हैं इन्तज़ार
जैसे कि याद करो पिछले साल भी हमने धोखा खाया था
जैसे कि अभी कुछ कहना जल्दीबाज़ी होगी
जैसे कि अभी सूरत बदल सकती है
जैसे कि लम्बा वक़्त पड़ा है
जैसे कि हमारा देश बहुत बड़ा है
जैसे कि औसत बुरा नहीं है
जैसे कि अनिश्चितता बनी हुई है
जैसे कि हालत सुधर भी रही है
जैसे कि संकेत बुरे नहीं हैं
जैसे कि नुक़सान की भरपाई की पूरी उम्मीद है
जैसे कि नुक़सान भी इतना बड़ा और घातक नहीं है
जैसे कि डरने की कोई बात नहीं है
जैसे कि संकट का सामना करना इतना मुश्किल भी नहीं होगा
जैसे कि कुछ लोग नाराज़ हो सकते हैं
जैसे कि अंत में नतीज़ा अच्छा ही आएगा
जैसे कि दौड़ रही है गाड़ी पटरी पर
दौड़ रही है गाड़ी कलमघिस्सू पत्रकार की

माँ 

हालाँकि मैं सबसे छोटा था
ग़रीब दुर्बल
पर माँ सर्वाधिक मेरे हिस्से में आई
मैं ही था उसका अशिष्ट सेवक
लापरवाह प्रेमी
मैं ही अकेला चूम सकता था उसके गाल
और वही जानती थी बस कि मैं कवि हूँ

ग़रीबों का होटल

ग़रीबों के छुपे हुए होटल
अक्सर मियाँ-बीवी मिलकर चलाते हैं
मियाँ कमज़ोर नशेबाज़ अवसादग्रस्त दिखता है
बीवी ग्राहकों को चुड़ैल मालूम पड़ती है

ग़रीबों के होटल में खाने और खिलाने वाले का पसीना
कभी नहीं रुकता

हवा रोशनी कम ज़मीन कच्ची
शोर मचाते नाकारा पंखे को
लात मार गिरा देने का मन करता है

ग़रीबों के होटल में हर आदमी पूछता है
उसका गिलास कौन सा है
उसका कटोरा कहाँ चला गया

ग़रीबों के होटल में लगता है कि जैसे कोई दाल नहीं दे रहा
अपने घर की बुनियाद का पत्थर डाल रहा है

मुसलमान 

मैं न अच्छे से देख पाती हूँ, न सुन पाती हूँ
न इशारे समझ पाती हूँ
मगर तुम्हारे लिए बस मैं एक मुसलमान हूँ
मैं एक दो साल की सेरेब्रल पॉलसी की मरीज हूँ
मगर तुम्हारे लिए बस एक मुसलमान हूँ
मैं दिल्ली आई हूँ डाक्टर मेरी रिपोर्ट देखकर निराश हैं
और मेरे ये भारी अफ़सोस में डूबे दादा-दादी
ज़रा देखो, ये किस कातर निगाह से मुझे देख रहे हैं
ये भी हैं तुम्हारे लिए बस दो मुसलमान

समस्तीपुर 

समस्तीपुर से मेरा प्यार एक भ्रम था
वह कोई ज़िला-विला नहीं है
मैं वहाँ कभी नहीं गया

फिर वह कौन था जो कहता था
पंजाबी कॉलोनी गली नम्बर एक में आ जाइए
या रुकिए मैं अभी रेलगुमटी पर हूँ वहीं मिल लेते हैं

ये सब एक ग़ायब हो गई लड़की के चक्कर में हुआ
समस्तीपुर उसी का मायालोक था
उसी के साथ ग़ायब हो गया

कमला नदी के पश्चिमी तटबन्ध पर 

बहुत सारे बच्चे तटबन्ध की मिट्टी में दफ़्न हैं
मुश्किल से एक हाथ नीचे

उनकी ताज़ा क़ब्र पर तिकोना लाल काग़ज़
तेज़ हवा में फड़फड़ाता है

बारिश हो रही है
अन्धेरा घिर आया है
केले के भींगे पत्तों के झुरमुट से मैं गुज़रता हूँ

विस्थापितों की झोपड़ियों तक ले आया है कुत्ता
ज़मीन से खींचकर किसी बच्चे का हाथ

बच्चे हाथों से
कुत्ते को भगा रहे हैं

Share