अमित शर्मा ‘मीत’ की रचनाएँ

यूँ अपने दिल को बहलाने लगे हैं 

यूँ अपने दिल को बहलाने लगे हैं
लिपटकर ख़ुद के ही शाने लगे हैं

हमें तो मौत भी आसां नहीं थी
सो अब ज़िंदा नज़र आने लगे हैं

उदासी इस क़दर हावी थी हम पर
कि ख़ुश होने पर इतराने लगे हैं

सलीक़े से लिपटकर पाँव से अब
ये ग़म ज़ंजीर पहनाने लगे हैं

ग़मों की धूप बढ़ती जा रही है
ख़ुशी के फूल मुरझाने लगे हैं

जो देखी इक शिकारी की उदासी
परिंदे लौट कर आने लगे हैं

फ़क़त अब चंद क़दमों पर है मंज़िल
मगर हम हैं कि सुस्ताने लगे है

गहरा होता जाता है जब इश्क़ मुसलसल रिश्ते में 

गहरा होता जाता है जब इश्क़ मुसलसल रिश्ते में
ख़ुशबू भी गहरा जाती है ऐसे संदल रिश्ते में

ऐसा इश्क़ निभा पाना भी सबके बस की बात नहीं
सारी उम्र अधूरे रहना एक मुकम्मल रिश्ते में

दोनों ने ही इक दूजे को पूरी शिद्दत से चाहा
फिर क्यों झगड़ें! हम दोनों में कौन है अव्वल, रिश्ते में

ख़ामोशी में रहने वाली लड़की का ये शिकवा है
दिन भर शोर मचाते हैं अब चूड़ी पायल, रिश्ते में

देखो! अपने रिश्ते की तासीर न ठंडी पड़ जाए
इस ख़ातिर ये तड़प बनाए रक्खी हर पल रिश्ते में

कल तक जाग रही आँखों ने नींद की मंज़िल पा ली है
आज सुकूँ तारी है मुझ पर बेकल-बेकल रिश्ते में

पागलपन की हद से काफ़ी आगे निकल चुके हैं अब
हमने दोनों ओर मचा रक्खी है हलचल रिश्ते में

गलियों गलियों भटकी चीख़ें 

गलियों गलियों भटकी चीख़ें
अपना दुखड़ा रोती चीख़ें

दिल दहलाने वाली हैं ये
इतनी ख़ामोशी की चीख़ें

कैसा मंज़र देख रहा हूँ
कुछ लाशें हैं बाक़ी चीख़ें

अपने आप ही रो दीं आँखें
कानों पर जब लादी चीख़ें

जब जब भूख ने रंग दिखाया
आवाज़ों में घोली चीख़ें

कितनी हिम्मत कर बैठी हैं
दीवारों से उलझी चीख़ें

हमने भी ये तोड़ निकाला
ख़ामोशी से काटी चीख़ें

देखकर उसको अचानक उसमें खोया रह गया

देखकर उसको अचानक उसमें खोया रह गया
आँख में आँसू लिए मैं मुस्कुराता रह गया

वापसी के वक़्त कुछ भी कह नहीं पाया था मैं
और अब ये सोचता हूँ हाय क्या-क्या रह गया

उसकी यादों ने कुछ ऐसे कान मेरे भर दिए
रात भर मैं नींद से झगड़ा ही करता रह गया

क्या बताऊँ आपको बदक़िस्मती की दास्तां
साथ होकर भी नदी के मैं तो प्यासा रह गया

नम हैं आँखें और लब ख़ामोश हैं कुछ रोज़ से
इश्क़ कर के मैं भी कुछ इतना अकेला रह गया

ये ग़नीमत है कि हम जैसे अभी ज़िंदा हैं लोग
वरना दुनिया में मुहब्बत का दिखावा रह गया

इसको अगली बार मैं शायद मुकम्मल कर सकूँ
अब के जो ये इश्क़ का पन्ना अधूरा रह गया

ग़रज़ पड़ने पर उससे माँगता है

ग़रज़ पड़ने पर उससे माँगता है
ख़ुदा होता है या नी मानता है

कई दिन से शरारत ही नहीं की
मिरे अंदर का बच्चा लापता है

ये कच्ची उम्र के आशिक़ को देखो
ज़रा रूठे कलाई काटता है

गुनाहों की सज़ा सब दूसरों को
गरेबाँ कौन अपना झाँकता है

अजब कारीगरी है मीत उसकी
बदन को रूह पर वह टाँकता है

मैं केवल अब ख़ुद से रिश्ता रक्खूँगा 

मैं केवल अब ख़ुद से रिश्ता रक्खूँगा
मतलब मैं अब ख़ुद को तन्हा रक्खूँगा

दुनिया से हर राज़ छुपाने के ख़ातिर
मैं अपना चेहरा अन जाना रक्खूँगा

मंडी में ग़म का मैं ही सौदागर हूँ
इस ख़ातिर मैं दाम ज़ियादा रक्खूँगा

तेरी सूरत तेरी चाहत यादें सब
छोटे से इस दिल में क्या-क्या रक्खूँगा

एक नज़र तुम दिख जाओ, इस चाहत में
कब तक इन आँखों को प्यासा रक्खूँगा

‘मीत’ यहाँ जो सपने सारे बिखरे हैं
सोच रहा हूँ इनको बिखरा रक्खूँगा

ज़ेह्न-ओ-दिल पर हैरानी का पहरा है 

ज़ेह्न-ओ-दिल पर हैरानी का पहरा है
और इन आँखों पर पानी का पहरा है

एक तुम्हारे जाने से इस घर में अब
अंधेरे औ’ वीरानी का पहरा है

ध्यान लगाकर सोच नहीं पाता तुमको
ध्यान पर मेरे बे-ध्यानी का पहरा है

भीड़ में भी गुमसुम रखती है तन्हाई
मुझ पर इसकी मनमानी का पहरा है

जिस दरिया में मल्लाहों के साथ थे हम
उस दरिया पर तुग़्यानी का पहरा है

खुल जाती है इनकी रंगत सब पर ही
सब फूलों पर उर्यानी का पहरा है

इन साँसों में जबसे शामिल है वह मीत
इन साँसों पर आसानी का पहरा है

आँखों ने इक ख़्वाब अजब सा देख लिया

आँखों ने इक ख़्वाब अजब सा देख लिया
तड़प तड़प कर मौत को मरता देख लिया

तन्हाई की जान निकलने वाली है
तन्हाई ने ख़ुद को तन्हा देख लिया

चमक उठीं हैं भूखे बच्चे की आँखें
कूड़े में रोटी का टुकड़ा देख लिया

ग़म को दिल पर कब्ज़ा करना था लेकिन
चेहरे पर ख़ुशियों का पहरा देख लिया

घबराहट के मारे सहमा बैठा हूँ
यानी कुछ तो ऐसा वैसा देख लिया

भूख ग़रीबी ज़िल्लत दहशत वीरानी
छोटी सी इस उम्र में क्या क्या देख लिया

मीत समय ने धुंध हटा दी आँखों से
कौन है अपना कौन पराया देख लिया

दिल हमारा तो कहीं खोया नहीं था

दिल हमारा तो कहीं खोया नहीं था
हाँ! तुम्हारे पास बस ढूँढा नहीं था

उससे केवल दोस्ती चाही थी हमने
इश्क़ कर बैठेंगे ये सोचा नहीं था

उसकी नर्माहट अभी तक है लबों पर
वो महज़ इक आम सा बोसा नहीं था

एक लड़की दिल लगाये तबसे बैठी
इश्क़ करना जब मुझे आता नहीं था

अब कभी मिलना नहीं होगा हमारा
ख़त में ऐसा तो कहीं लिक्खा नहीं था

दर्द तन्हाई तड़प आँसू वग़ैरा
यार तेरे इश्क़ में क्या क्या नहीं था

आख़िरश दिल चल पड़ा उसकी ही जानिब
और कुछ इसके सिवा चारा नहीं था

तुम यक़ीं मानो, तुम्हारा ही असर है
वरना ये पत्थर कभी धड़का नहीं था

बिन तुम्हारे नाम हम लिखते भी कैसे
सो ग़ज़ल में जान कर मक़्ता नहीं था

इस मिट्टी को ऐसे खेल खिलाया हमने

इस मिट्टी को ऐसे खेल खिलाया हमने
ख़ुद को रोज़ बिगाड़ा रोज़ बनाया हमने

जो सोचा था वह तो हमसे बना नहीं फिर
जो बन पाया उससे जी बहलाया हमने

ग़म को फिर से तन्हाई के साथ में मिलकर
हँसते हँसते बातों में उलझाया हमने

नामुमकिन था उसको हासिल करना फिर भी
पूरी शिद्दत से ये इश्क़ निभाया हमने

उसकी यादें बोझ न बन जाएँ साँसों पर
सो यादों से अपना दिल धड़काया हमने

कह देते तो शायद अच्छे हो जाते पर
ख़ामोशी से अपना मर्ज़ बढ़ाया हमने

उसका चेहरा देख लिया था एक दफ़ा फिर
इन आँखों से सालों कर्ज़ चुकाया हमने

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