‘अमीक’ हनफ़ी की रचनाएँ

ऐनक के दोनों शीशे ही अटे हुए थे 

ऐनक के दोनों शीशे ही अटे हुए थे धूल में
हाथ पड़ गया काँटों पर फूलों के बदले भूल में

छूते ही आशाएँ बिखरीं जैसे सपने टूट गए
किस ने अटकाए थे ये काग़ज़ के फूल बबूल में

इश्क़ के हिज्जे भी जो न जानें वो हैं इश्क़ के दावे-दार
जैसे ग़ज़लें रट कर गाते हैं बच्चे स्कूल में

अब रातों को भी बाज़ारों में आवारा फिरते हैं
पहले भँवरे हो जाते थे बंद कँवल के फूल में

मोटी डालों वाले पेड़ के पत्ते कैसे पीले हैं
किस ने देखा कौन रोग है छुपा हुआ जड़ मूल में

बीन हवा के हाथों में है लहरे जादू

बीन हवा के हाथों में है लहरे जादू वाले हैं
चंदन से चिकने शानों पर मचल उठे दो काले हैं

जंगल की या बाज़ारों की धूल उड़ी है स्वागत को
हम ने घर के बाहर जब भी अपने पाँव निकाले हैं

कैसा ज़माना आया है ये उलटी रीत है उलटी बात
फूलों को काँटे डसते हैं जो इन के रखवाले हैं

घर के दुखड़े शहर के ग़म और देस बिदेस की चिंताएँ
इन में कुछ आवारा कुत्ते हैं कुछ हम ने पाले हैं

एक उसी को देख न पाए वरना शहर की सड़कों पर
अच्छी अच्छी पोशाकें हैं अच्छी सूरत वाले हैं

रात में दिल को क्या सूझी है उस के गाँव को चलने की
जंगल में चीते रहते हैं राह में नदी नाले हैं

दोनों का मिलना मुश्किल है दोनों हैं मजबूर बहुत
उस के पाँव में मेहँदी लगी है मेरे पाँव में छाले हैं

कहने को शम्मा-ए-बज़्म-ए-ज़मान

कहने को शम्मा-ए-बज़्म-ए-ज़मान-ओ-मकाँ हूँ मैं
सोचो तो सिर्फ़ कुश्त-ए-दौर-ए-जहाँ हूँ मैं

आता हूँ मैं ज़माने की आँखों में रात दिन
लेकिन ख़ुद अपनी नज़रों से अब तक निहाँ हूँ मैं

जाता नहीं किनारों से आगे किसी का ध्यान
कब से पुकारता हूँ यहाँ हूँ यहाँ हूँ मैं

इक डूबते वजूद की मैं ही पुकार हूँ
और आप ही वजूद का अंधा कुँवाँ हूँ मैं

सिगरेट जिसे सुलगता हुआ कोई छोड़ दे
उस का धुवाँ हूँ और परेशाँ धुवाँ हूँ मैं

कौन है ये मतला-ए-तख़ईल पर

कौन है ये मतला-ए-तख़ईल पर महताब सा
मेरी रग रग में बपा होने लगा सैलाब सा

आग की लपटों में है लिपटा हुआ सारा बदन
हड्डियों की नलकियों में भर गया तेज़ाब सा

ख़्वाहिशों की बिजलियों की जलती बुझती रौशनी
खींचती है मंज़रों में नक़्शा-ए-आसाब सा

किस बुलंदी पर उड़ा जाता हूँ बर-दोश हवा
आसमाँ भी अब नज़र आने लगा पायाब सा

तैरता है ज़हन यूँ जैसे फ़ज़ा में कुछ नहीं
और दिल सीने में है इक माहि-ए-बे-आब सा

लम्बी रात से जब मिली उस की

लम्बी रात से जब मिली उस की ज़ुल्फ़-ए-दराज़
खुल कर सारी गुत्थियाँ फिर से बन गईं राज़

उस की इक आवाज़ से शरमाया संगीत
सारंगी का सोज़ क्या क्या सितार का साज़

मेरा क़ाइल हो गया ये सारा संसार
रंग-ए-नाज़ में जब मिला मेरा रंग-ए-नियाज़

साज़ों का संगीत क्या पाएल की झंकार
कौन सुने इस शोर में दिल तेरी आवाज़

उन आँखों में डाल कर जब आँखें उस रात
मैं डूबा तो मिल गए डूबे हुए जहाज़

फूल खिले हैं लिखा हुआ है तोड़ो

फूल खिले हैं लिखा हुआ है तोड़ो मत
और मचल कर जी कहता है छोड़ो मत

रुत मतवाली चाँद नशीला रात जवान
घर का आमद-ख़र्च यहाँ तो जोड़ो मत

अब्र झुका है चाँद के गोरे मुखड़े पर
छोड़ो लाज लगो दिल से मुँह मोड़ो मत

दिल को पत्थर कर देने वाली यादो
अब अपना सर उस पत्थर से फोड़ो मत

मत ‘अमीक़’ की आँखों से दिल में झाँको
इस गहरे साग़र से नाता जोड़ो मत

सावन आया छाने लगे घोर घन

सावन आया छाने लगे घोर घन घोर बादल
करते हैं फिर दिल को परेशान चित चोर बादल

जंगल जंगल सनकी हवा बाँस बन झूम उठे
नाचे कूदे गरजे मचाने लगे शोर बादल

ढोलक नक़्क़ारे बाँसुरी झाँझनें बज रही हैं
उस पर ये सत-रंगी धनक बन गए मोर बादल

बिजली का पहलू गुदगुदाया भरीं चुटकियाँ भी
झूमा झटकी कर के दिखाने लगे ज़ोर बादल

दिल में दुःख आँखों में नमी आसमाँ पर घटाएँ
अन्दर बाहर इस ओर उस ओर हर ओर बादल

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