अमीन अशरफ़ की रचनाएँ

कभी कभी जो वो मिलता तो 

कभी कभी जो वो मिलता तो दिल में जा करता
विसाल-ए गोश-ए बाब-ए सुख़न भी वा करता

वो ख़ुदशनाश भी,खूवे तलब से वाकिफ़ भी
अलम शनास भी होता तो आसरा करता

ये इत्तेदाल तकाज़ाए ज़िन्दगी भी है
मिज़ाज-ए संग को शीशे से क्यूँ जुदा करता

ज़रो ज़मीं की नहीं जंग ये अना की थी
मैं उस से झुक के न मिलता तो और क्या करता

सबूत ला न सका अपनी बेगुनाही का
वो शर्मसार न होता तो और क्या करता

न पड़ती उस पे जो गर्द-ए मुआमलात-ए जहाँ
जराहतों का चमन ख़ुद बख़ुद खिला करता

न जाने शोख़ी-ए फ़ितरत है ये खसार-ए दिल
उमीद-ए अफ्व न होती तो क्यूँ ख़ता करता

हरीस-ए आरिज़-ओ लब हूँ तो कशमकश क्या है?
फ़क़ीर-ए शहर तिरे हक़ में भी दुआ करता

किसी ख़याल की रौ में था मुस्कुराते हुए

किसी ख़याल की रौ में था मुस्कुराते हुए
मगर वो चौंक पड़ा था नज़र मिलाते हुए

चमक थी इक पस-ए-दीवार साइक़ा-बर-दोश
कि ताक़ ओ दर थे शब-ए-माह में नहाते हुए

मगर नविश्‍ता-ए-दीवार ला-ज़वाली है
ज़माना करवटें लेता है आते जाते हुए

कभी कभी कोई लम्हा भी जावेदानी है
गुज़र गईं कई सदियाँ यही सुनाते हुए

जो रह गया था कहीं इक साहाब-ए-ना-रफ़्ता
बिखर के ख़ाक हुआ पाँव लड़खड़ाते हुए

मैं डगमगाया तो साहिल का था न मौजों का
चमक रही थी नदी आसमाँ उड़ाते हुए

ज़रा सी रौशनी फूटी तो सुब्ह-दम सूरज
फ़ज़ा में डूब गया आस्तीं चढ़ाते हुए

कोई किसी का नहीं इस सरा-ए-फ़ानी में
कोई चराग़ बुझा ये सदा लगाते हुए

लरज़ रहा था फ़लक अर्ज़-ए-हाल ऐसा था

लरज़ रहा था फ़लक अर्ज़-ए-हाल ऐसा था
शिकस्तगी में ज़मीं का सवाल ऐसा था

कमाल ऐसा कि हैरत में चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम
शजर उठा न सका सर ज़वाल ऐसा था

किसी वजूद की कोई रमक़ न हो जैसे
दराज़ सिलसिला-ए-माह-ओ-साल ऐसा था

खिला हुआ था बदन पर जराहतों का चमन?
कि ज़ख़्म फैल गया इंदिमाल ऐसा था

कभी ये तख़्त-ए-सुलेमाँ कभी सबा रफ़्तार
नशा चढ़ा तो समंद-ए-ख़्याल ऐसा था

घिरे हुए थे जो बादल बरस के थम भी गए
बिछा हुआ था जो तारों का जाल ऐसा था

कभी वो शोला-ए-गुल था कभी गुल-ए-शोला
मिज़ाज-ए-हुस्न में कुछ एतिदाल ऐसा था

वो आँखें क़हर में भी कर गईं मुझे शादाब
फ़रोग-ए-बादा में रंग-ए-जमाल ऐसा था

किसी से हाथ मिलाने में दिल नहीं मिलता
तलब में शाइबा-ए-एहतिमाल ऐसा था

मलाल-ए-ग़ुचाँ-ए-तर जाएगा कभी न कभी

मलाल-ए-ग़ुचाँ-ए-तर जाएगा कभी न कभी
वो ख़ाक उड़ा के गुज़र जाएगा कभी न कभी

मैं लाला-ए-सर-ए-सहरा मकाँ नहीं रखता
कि दश्‍त है मिरे घर जाएगा कभी न कभी

बरहना शाख़ हवा ज़र्द बे-ज़मीन शजर
परिंदा सू-ए-सफ़र जाएगा कभी न कभी

कहीं भी ताइर-ए-आवारा हो मगर तय है
जिधर कमाँ है उधर जाएगा कभी न कभी

किसी के हाथ से टूटे न शीशा-ए-सद-रंग
ये रेज़ा रेज़ा बिखर जाएगा कभी न कभी

गुज़िश्‍तनी है ये सब कुछ जो होने वाला है
वो हादसा भी गुज़र जाएगा कभी न कभी

वो नौ-बहार भी आफ़त है दस्ता-ए-सुंबुल
ज़-फ़र्क़-ता-ब-कमर जाएगा कभी न कभी

ये इश्‍क है कि ख़ुमार-ए-तलब है क्या मालूम
ख़ुमार है तो उतर जाएगा कभी न कभी

है किस के लिए लुत्फ़ ग़ज़ब किस के लिए है

है किस के लिए लुत्फ़ ग़ज़ब किस के लिए है
ये ज़ाब्ता-ए-नाम-ओ-नसब किस के लिए है

मेरे लिए अफ़्सुर्दगी-ए-नख़्ल-ए-तमन्ना
ये सिलसिला-ए-ताक-ए-तरब किस के लिए है

सच पर जो यक़ीं है तो उसे क्यूँ नहीं कहते
आख़िर ये ज़बाँ मोहर-ब-लब किस के लिए है

है जिस पे मोहब्बत की नज़र होगा परेशां
ऐ साना-ए-गुल हिज्र की शब किस के लिए है

जब दिल का तअल्लुक न रहा कू-ए-सनम से
ये कशमकश-ए-तर्क-ओ-तलब किस के लिए है

इस कार-ए-नज़र ने किया तक़दीर का क़ाइल
शब किस के लिए हासिल-ए-शब किस के लिए है

पेच-दर-पेच सवालात में उलझे हुए हैं

पेच-दर-पेच सवालात में उलझे हुए हैं
हम अजब सूरत-ए-हालात में उलझे हुए हैं

ख़त्म होने का नहीं मारका-ए-इश्‍क़-ओ-हवस
मसअले सारे मफ़ादात में उलझे हुए हैं

किस ख़सारे में नज़र है कि सिमट जाती है
कुछ अभी दाएरा-ए-ज़ात में उलझे हुए है

इन में तो मुझे से ज़ियादा है परेशां-नज़री
आईने शहर-ए-कमालात में उलझे हुए हैं

इस पे दावा भी कि ये कार-ए-मसीहाई है
सारे अज़हान ख़ुराफात में उलझे हुए हैं

कुर्रा-ए-ख़ाक पे पड़ते ही नहीं उन के क़दम
दीदा-वर सैर-ए-तिलिस्मात में उलझे हुए हैं

नूर-ए-मुतलक़ की है तशबीह न तमसील मगर
हम इशारात ओ किनायात में उलझे हुए हैं

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