अमीर इमाम की रचनाएँ

अब इस जहान-ए-बरहना का इस्तिआरा हुआ 

अब इस जहान-ए-बरहना का इस्तिआरा हुआ
मैं ज़िंदगी तिरा इक पैरहन उतारा हुआ

सियाह-ख़ून टपकता है लम्हे लम्हे से
न जाने रात पे शब-ख़ूँ है किस ने मारा हुआ

जकड़ के साँसों में तश्हीर हो रही है मिरी
मैं एक क़ैद सिपाही हूँ जंग हारा हुआ

फिर इस के बाद वो आँसू उतर गया दिल में
ज़रा सी देर को आँखों में इक शरारा हुआ

ख़ुदा का शुक्र मिरी तिश्नगी पलट आई
चली गई थी समुंदर का जब इशारा हुआ

‘अमीर’ इमाम मुबारक हो फ़तह-ए-इश्क़ तुम्हें
ये दर्द-ए-माल-ए-ग़नीमत है सब तुम्हारा हुआ

छुप जाता है फिर सूरज जिस वक़्त निकलता है

छुप जाता है फिर सूरज जिस वक़्त निकलता है
कोई इन आँखों में सारी रात टहलता है

चम्पई सुब्हें पीली दो-पहरें सुरमई शामें
दिल ढलने से पहले कितने रंग बदलता है

दिन में धूपें बन कर जाने कौन सुलगता था
रात में शबनम बन कर जाने कौन पिघलता है

ख़ामोशी के नाख़ुन से छिल जाया करत हैं
कोई फिर इन ज़ख़्मों पर आवाज़ें मलता है

रात उगलता रहता है वो एक बड़ा साया
छोटे छोटे साए जो हर शाम निगलता है

हर एक शाम का मंज़र धुआँ उगलने लगा 

हर एक शाम का मंज़र धुआँ उगलने लगा
वो देखो दूर कहीं आसमाँ पिघलने लगा

तो क्या हुआ जो मयस्सर कोई लिबास नहीं
पहन के धूप मैं अपने बदन पे चलने लगा

मैं पिछली रात तो बेचैन हो गया इतना
कि उस के बाद ये दिल ख़ुद-ब-ख़ुद बहलने लगा

अजीब ख़्वाब थे शीशे की किर्चियों की तरह
जब उन को देखा तो आँखों से ख़ूँ निकलने लगा

बना के दाएरा यादें सिमट के बैठ गईं
ब-वक़्त-ए-शाम जो दिल का अलाव जलने लगा

काँधों से ज़िंदगी को उतरने नहीं दिया

काँधों से ज़िंदगी को उतरने नहीं दिया
उस मौत ने कभी मुझे मरने नहीं दिया

पूछा था आज मेरे तबस्सुम ने इक सवाल
कोई जवाब दीदा-ए-तर ने नहीं दिया

तुझ तक मैं अपने आप से हो कर गुज़र गया
रस्ता जो तेरी राह गुज़रने नहीं दिया

कितना अजीब मेरा बिखरना है दोस्तो
मैं ने कभी जो ख़ुद को बिखरने नहीं दिष

है इम्तिहान कौन सा सहरा-ए-ज़िंदगी
अब तक जो तेरे ख़ाक-बसर ने नहीं दिया

यारो ‘अमीर’ इमाम भी इक आफ़्ताब था
पर उस को तीरगी ने उभरने नहीं दिया

यूँ मिरे होने का मुझ पर आश्कार उस ने किया

यूँ मिरे होने का मुझ पर आश्कार उस ने किया
मुझ में पोशीदा किसी दरिया को पार उस ने किया

पहले सहरा से मुझे लाया समुंदर की तरफ़
नाव पर काग़ज़ की फिर मुझ को सवार उस ने किया

मैं था इक आवाज़ मुझ को ख़ामुशी से तोड़ कर
किर्चियों को देर तक मेरी शुमार उस ने किया

दिन चढ़ा तो धूप की मुझ को सलीबें दे गया
रात आई तो मिरे बिस्तर को दार उस ने किया

जिस को उस ने रौशनी समझा था मेरी धूप थी
शाम होने का मिरी फिर इंतिज़ार उस ने किया

देर तक बुनता रहा आँखों के करघे पर मुझे
बुन गया जब मैं तो मुझ को तार तार उस ने किया

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