अम्बरीन सलाहुद्दीन की रचनाएँ

असीर-ए-ख़्वाब नई जुस्तुजू के दर खोलें 

असीर-ए-ख़्वाब नई जुस्तुजू के दर खोलें
हवा पे हाथ रखें और अपने पर खोलें

समेट अपने सराबों में बारिशों का जमाल
कहाँ का क़स्द है ये राज़ ख़ुश नज़र खोलें

करें यूँ फिर से उसे भूलने की इक साज़िश
चलो की आज कोई नाम-ए-दीगर खोलें

उलझती जाती हैं गिरहें अधूर लफ़्ज़ों की
हम अपनी बातों के सारे अगर मगर खोलें

जो ख़्वाब देखना ताबीर खोजना हो कभी
तो पहले पाँव से लिपटे हुए भँवर खोलें

इक ईंट सामने दीवार से निकाल तो लें
मगर ये डर की नया कोई दर्द-ए-सर खोलें

हम सितारों में तेरा अक्स न ढलने देंगे

हम सितारों में तेरा अक्स न ढलने देंगे
चाँद को शाम की दहलीज़ पे जलने देंगे

आज छू लेंगे कोई अर्श मेरे वहम ओ गुमाँ
ख़्वाब को नींद की आँखों में मचलने देंगे

हम भी देखेंगे कहाँ तक है रसाई अपनी
दिल को बहलाएँगे हम और न सँभलने देंगे

शब की आग़ोश में फैलें न गुमाँ के साए
अब निगाहों में कोई ख़ौफ़ न पलने देंगे

हो न जाए कहीं अंजाम से पहले अंजाम
इस कहानी को इसी तौर से चलने देंगे

अक्स-दर-अक्स मिलेंगे तुझे मंज़र मंज़र
तू अगर चाहे भी तुझ को न बदलने देंगे

नक़्श-दर-नक़्श यहीं ख़ाक हुए जाएँगे
ख़ुद को इस दश्त-ए-गुमाँ से न निकलने देंगे

जब अश्कों में सदाएँ ढल रही थीं

जब अश्कों में सदाएँ ढल रही थीं
सर-ए-मिज़्गाँ दुआएँ जल रही थीं

लहू में ज़हर घुलता जा रहा था
मेरे अंदर बालाएँ पल रही थीं

मुक़य्यद हब्स में इक मस्लहत के
उम्मीदों की रिदाएँ गल रही थीं

परों में यासियत जमने लगी थी
बहुत मुद्दत हवाएँ शल रही थीं

वहाँ उस आँख ने तेवर जो बदले
यहाँ सारी दिशाएँ जल रही थीं

ख़ार ओ ख़स की माह ओ अंजुम से यूँ निस्बत देखी

ख़ार ओ ख़स की माह ओ अंजुम से यूँ निस्बत देखी
मेरे ख़्वाबों की मेरे शहर ने क़ीमत देखी

कब मेरा रास्ता ऐसा था के तुझ तक पहुँचे
मैं ने ख़ुद चश्म-ए-तख़य्युल से रियाअत देखी

मैं ने लफ़्ज़ों को समेटा तो फ़साने फैले
ख़्वाब बिखरे तो मेरी आँख ने शोहरत देखी

वक़्त की आँधिया किस सम्त उड़ा ले आईं
उस ने देखा था मुझे मैं ने क़यामत देखी

गूँज रहती है दर ओ बाम में तन्हाई की
कब तेरे बाद किसी जश्न की फ़ुर्सत देखी

उस के लफ़्ज़ों के मुक़ाबिल मैं भला क्या कहती
मैं ने हैरान ही रहने में सुहूलत देखी

छू के आई तेरा पैकर जो निखरती हुई धूप
क्या से क्या मैं ने दर ओ बाम की रंगत देखी

क्यूँ अम्बर की पहनाई में चुप की राह टटोलें 

क्यूँ अम्बर की पहनाई में चुप की राह टटोलें
अपनी ज़ात की बुनत उधेड़ें साँस में ख़ाक समो लें

धूल में लिपटी इस ख़्वाहिश की सारी परतें खोलें
धरती अम्बर सहरा परबत पाँव बीच पिरो लें

अपने ख़्वाब के हाथों में तकले की नोक चुभो लें
किसी महल के सन्नाटे में एक सदी तक सो लें

एक सदा के लम्स में वक़्त के चारों खूँट भिगों लें
गूँज में लिपटे याद के कोहना रस्तों पर फिर हो लें

इक मंज़र में इक धुँदलें से अक्स में छुप के रो लें
हम किस ख़्वाब में आँखें मूँदें किस में आँखें खोलें

तीर तो ग़ैर की कमान के थे 

तीर तो ग़ैर की कमान के थे
हाथ पर एक मेहर-बान के थे

उस के लहजे में सच तो था लेकिन
रंग गहरे मेरे गुमान के थे

दूर तक भीगता हुआ जंगल
वा दरीचे तेरे मकान के थे

कुछ तिलिस्म-ए-नुजूम-ए-शब भी था
कुछ करिश्मे भी तेरे ध्यान के थे

था वो जादू सा आसमानों में
शौक़ उस से सिवा उड़ान के थे

मैं जब आई तो वो सफ़र में था
और इरादे भी आसमान के थे

मैं ठहरती या वो ठहर जाता
साए बस एक साएबान के थे

नींद ख़्वाबों को छू के लौट आई
आख़िरी मोड़ दास्ताँ के थे

जब हवा थम गई तभी जाना
तौर कुछ और बादबान के थे

फिर भला किस तरह मना करती
फ़ैसले चश्म-ए-मेहर-बान के थे

उस के ध्यान में दिल में प्यास जगा ली जाए

उस के ध्यान में दिल में प्यास जगा ली जाए
एक भी शाम न फिर उस नाम से ख़ाली जाए

आँखों में काजल की परत जमा ली जाए
सखियों से यूँ प्रीत की जोत छुपा ली जाए

रेत है सूरज है वुसअत है तन्हाई है
लेकिन कब इस दिल की ख़ाम-ख़याली जाए

आँखों में भर कर इस दश्त की हैरानी को
वहशत की उम्दा तस्वीर बना ली जाए

आप ने पहले भी तो मुझ को देखा होगा
आप के मुँह से आप की बात चुरा ली जाए

सोचों मैं गिर्दाब जो पड़ने लग जाते हैं
आँखों में फिर आठ-पहर न लाली जाए

दिल-आज़ारी की मिट्टी से उस्तादा घर
इन बे-फ़ैज़ दरों तक कौन सवाली जाए

यही मंज़र थे अन-जाने से पहले 

यही मंज़र थे अन-जाने से पहले
तुम्हारे शहर में आने से पहले

ज़मीं की धड़कनें पहचान लेना
कोई दीवार बनवाने से पहले

पलट कर क्यूँ मुझे सब देखते हैं
तुम्हारा ज़िक्र फ़रमाने से पहले

न जाने कितनी आँखें मुंतज़िर थीं
सितारे बाम पर आने से पहले

दरीचे बंद हो जाते हैं कितने
यहाँ मंज़र बदल जाने से पहले

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