अरविन्द अवस्थी की रचनाएँ

दरार में उगा पीपल

ज़मीन से बीस फीट ऊपर
किले की दीवार की
दरार में उगा पीपल
महत्त्वाकांक्षा की डोर पकड़
लगा है कोशिश में
ऊपर और ऊपर जाने की
जीने के लिए
खींच ले रहा है
हवा से नमी
सूरज से रोशनी
अपने हिस्से की
पत्तियाँ लहराकर
दे रहा है सबूत
अपने होने का

धूल

कल तक
पैरों के नीचे
जीवन तलाशती धूल
जाग उठी
पाकर हवा का स्पर्श
चढ़ गई धरती से
आसमान तक
फैल गया
धूल का अपना संसार
बंद हो गई
घूरती आँखें
उसका सामना करने के
डर से

ब्लैक होल 

धरती का ब्लैक होल
हो गई है
आज की राजनीति
जहाँ सब कुछ
हो जाता है हज़म
बदल जाती है पूर्णिमा
अमावस में
नहीं ढूंढ़ पातीं
सूरज की किरणें
निकलने को रास्ता
उलझकर मुर्झा जाती है
उनकी ऊर्जा
और बनकर रह जाती है
उस ‘अंधकार’ का एक हिस्सा ।

मिट्टी का कलश

विवाह के मंडप में
दिये के साथ
स्थापित कलश
क्या-क्या नहीं सहा
उसने वहाँ पहुँचने के लिए
बार-बार रौंदा गया
कुम्हार की थाप और
धूप सहकर भी
उसे पकने के लिए
जाना पड़ा है अग्नि-भट्ठी में
उतरना पड़ा है खरा
हर कसौटी पर
रंग जाना पड़ा है
चित्रकार की तूलिका से
तभी तो मिट्टी का कलश
बन गया है मूल्यवान
तपकर, सजकर
सोने के कलश-सा ।

एक बच्चा अनेक सवाल

अख़बार की हेडिंग की तरह
रोज़-रोज़ देखता हूँ
देश के इस नन्हे भविष्य को
जो बहुत कुछ जानता है
लेकिन नहीं जानता
तिजोरी की चाभी का नम्बर,
स्विस बैंक के एकाउंट
और वर्दी पर लगे
स्टारों की संख्या से भी
दूर-दूर तक कोई नाता
नहीं है इसका

सोचता हूँ
चीरकर सौदागरों की भीड़
क्या यह रच पाएगा
कछुआ और खरगोश की कहानी !
क्या देख सकेगा अपनी मंज़िल
बिना कोटा की पावरफुल ऐनक लगाए !

कब हरियाएगा इसका कामना-तरु
कब लटकेंगे फलों के गुच्छे
स्वर्ण-पुत्रों की होड़ में
कुछ सिक्कों के सहारे
कैसे पहना सकेगा
अपने सपनों को
ओहदों का परिधान
जाड़े की लम्बी रात-सी बाधाएँ
कहीं लील न लें
इसका उजला सपना

निराश मत होना धरती पुत्र !
क्योंकि सुरसा के मुँह में गए बिना
कोई हनुमान
सागर भला कैसे पार करेगा ?

भूख

कोई व्यक्ति
धर्म-निरपेक्ष नहीं होता
कोई जाति
धर्म-निरपेक्ष नहीं होती
कोई ढिंढोरा भले ही पीटे
लेकिन, इतिहास भी
धर्म-निरपेक्ष कहाँ होता है !

धर्म-निरपेक्ष होती है तो
केवल और केवल भूख.
जिसकी न कोई जाति है
न बिरादरी,
न धर्म है न संप्रदाय ।
निस्संग भाव से
करती है वरण
बिना किसी पक्षपात के
छोटे-बड़े, अमीर-गरीब
सभी का ।

छुआछूत के भेदभाव से भी
भूख का
कोई रिश्ता नहीं होता ।

कोई रिश्ता नहीं होता
वाम-पंथ और दक्षिण-पंथ से,
संन्यासी या गृहस्थ से ।
मान-सम्मान की अनुभूति से भी
परे होती है भूख
तभी तो बिना बुलाए ही
आ टपकती है ।
दुख में, सुख में
सर्दी में, गर्मी में
देर-सबेर भले कर दे
लेकिन ज़रूर आती है
नियम से सबके पास ।

हमें लगता है
अतिशयोक्ति न होगा
यह कहना
कि भूख एक सत्य है
बिलकुल मृत्यु की तरह
अटल सत्य ।
जिसका स्वागत करता है
कोई हॅंसकर
तो कोई विवश होकर
तो कोई
भूख की गोद में ही
समा जाता है
उसका कौर बनकर ।

रेखाएँ

वे रेखाएँ ही तो हैं
जो खींच देती हैं
सफ़ेद काग़ज़ पर
छोटे-बड़े देशों का
मानचित्र ।
नदी, पहाड़, सागर
सब जगह तो है
इनकी पहुँच ।

ये हल कर देती हैं
गणित के टेढ़े- मेढ़े सवाल.
सिद्ध कर देती हैं
उलझे हुए सामाजिक प्रमेय
कभी आयत, कभी वर्ग
तो कभी वृत्त बनकर ।

इतनी कारगर होकर भी
ये रेखाएँ
बड़ी असहाय हैं
क्योंकि इनके पास
सिर्फ़ लम्बाई है
चौड़ाई नहीं है ।

काश ! रेखागणित की
दुनिया में
गढ़ी जाती
फिर से
रेखाओं की परिभाषा
जिसमें उन्हें भी मिलता
भरपूर चौड़ाई का हक ।

लेकिन रेखाएँ भी
अब नहीं करेंगी इंतज़ार ।
उन्हें पता है
चौड़ाई की क़ीमत
इसलिए मिलकर लड़ेंगी
समाज के रेखागणित से
अपनी चौड़ाई के लिए ।

शहनाइयाँ

यदि इसी तरह
चलता रहा वक्त
निरंकुश, अमर्यादित
तो छिन जाएँगी
आँगन की किलकारियाँ ।
सूनी हो जाएँगी
भाइयों की कलाइयाँ
खाने दौड़ेंगी
ऊँची इमारतें ।

नहीं सजेंगी ड्यौढ़ियाँ
रंगोली से
किसी त्योहार पर
नहीं खनकेंगी
काँच की गुलाबी चूड़ियाँ ।
ऋतुएँ उलाहना देंगी
आकर लौट जाएँगी
बार-बार दरवाज़े से
कि नहीं सुनाई पड़ते
कोकिलाकंठियों के गीत
हमारी अगवानी में ।

उदास हो जाएगा
मनभावन सावन ।
नहीं गूँजेंगी
दरवाज़े पर शहनाइयाँ ।
आख़िर कब चेतेगा
संवेदनहीन समाज ।
कब तक करता रहेगा क़त्ल
इन कोंपलों का ।
इनका दोष क्या ?
यह कि ये
बन जाना चाहती हैं
नवसृजन के निबंध की
भूमिका ।

जाड़े की धूप 

कई दिन तक घिरे
घने कुहासे के बाद
खिली धूप जाड़े की ।
देखकर
खिल उठा मन
जैसे
छठें वेतन आयोग के अनुसार
मिली हो तनख़्वाह की पहली किस्त ।
जैसे
साठ रुपये किलो से
बारह पर आ गया हो
प्याज का भाव ।
धूप से मैं
और धूप मुझसे
दोनों एक दूसरे से
लिपट गए
जैसे स्कूल से पढ़कर
लौटे नर्सरी के बच्चे को
लिपटा लेती है माँ ।
धूप सोहा रही थी
जैसे जली चमड़ी पर
बर्फ़ का टुकड़ा ।
धूप खिलने की ख़बर
आतंकी अफ़ज़ल कसाब की
गिरफ़्तारी के समाचार-सी
फैल गई
गाँव-गाँव, शहर-शहर ।
लोग बाँचने लगे
उलट-पुलट कर
एक-एक पृष्ठ.

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