अरविन्द कुमार की रचनाएँ

प्यारी सी सुंदर हैँ मछली

इठलाती मठराती
बल खाती लहराती
जल मेँ
चलती हैँ मदमाती
मनमौजी हैँ मछली

नील कमल पर उड़ती सी
झुंडों मेँ मँडराती
जल मेँ
तिरती हैँ परियोँ सी
जल की रानी हैँ मछली

उन का चलना ही गाना है
रंगोँ से भरा तराना है
गाने मेँ
सरगम है रंगोँ की
चुप चुप – क्‍या गाती हैँ मछली

चपटी हैँ – मोटी हैँ
लंबी हैँ – छोटी हैँ
तन पर
चित्ती है – धारी है
प्‍यारी सी सुंदर हैँ मछली

जल के बाहर भी दुनिया है
प्‍यारे प्‍यारे बच्‍चे हैँ…
हैँ घाती मछुआरे भी
क्‍या जानेँ
फँस जाती हैँ मछली
भोलीभाली हैँ मछली
प्‍यारी प्‍यारी हैँ मछली

हवा जो चलती रहती है

हवा जो चलती रहती है
आँख से देख नहीं पाते
हवा को मैं ने देखा है

हवा नटखट सी बच्‍ची है
सदा इठलाती रहती है
सदा बल खाती रहती है
नए नित रूप दिखाती है
हवा को मैं ने देखा है

ग़रीबी जब ठिठुराती है
अमीरी मौज मनाती है
हवा तब सनसन रोती है
हवा तब शोक मनाती है
हवा को मैं ने देखा है

धूल जब ऊपर चढ़ती है
गर्व से सब पर हँसती है
ज़माना हैरत करता है
हवा मन मेँ मुसकाती है
हवा को मैं ने देखा है

हवा को किस ने देखा है?

पेड़ जब शीश नवाते हैँ
पात जब गौरव गाते हैँ
हवा सिंहासन पर चढ़ कर
सवारी ले कर आती है
हवा को सब ने देखा है

पतंग जब ऊपर चढ़ता है
ठुमकता है, बल खाता है
हवा तब घुटनोँ पर झुक कर
गीत आशा का गाती है
हवा को सब ने देखा है

तितलियाँ चंचल उड़ती हैँ
गुलाबोँ पर मँडराती हैँ
हवा तब बासंती हो कर
गीत यौवन का गाती है
हवा को सब ने देखा है

पात जब पीले पड़ते हैँ
शाख से नीचे गिरते हैँ
उड़ते, खड़खड़ करते हैँ
हवा बूढ़ी बन आती है
हवा को सब ने देखा है

विक्रम सैंधव पृष्ठ-1

बड़े लोग जो बना देते हैँ चलन,
रचते हैँ जो कलाएँ, और फिर छोड़
देते हैँ जो जूठन, उन्हेँ सहेज
कर रखते हैँ केतुमाल जैसे लोग.

धारावती. आनंद के भवन का एक कक्ष.

(आनंद, भरत और केतुमाल.)

आनंद
तो इन लोगोँ को मारा जाएगा. इन के
नाम पर निशान लगा दिया है.
भरत
तुम्‍हारा भाई भी मरना चाहिए, केतुमाल.
सहमत हो तुम?
केतुमाल
सहमत हूँ मैँ.
भरत
लो दाग़ दो इसे, आनंद.
केतुमाल
एक शर्त पर,
मित्र आनंद. नहीँ बचेगा तुम्‍हारा
भांजा गोपाल भी.
आनंद
लो दाग़ दिया मैँ ने
उसे भी. केतुमाल, विक्रम के घर जा कर
वसीयत ले आओ. देखेँ तो
क्‍या बचा सकते हैँ हम अपने वास्‍ते…
केतुमाल
यहीँ मिलोगे?
आक्‍टेवियस
यहाँ या संसद.
(केतुमाल जाता है.)

आनंद
गुणहीन बंदा है यह. बस, चाकरी
जोगा है… संसार की संपदा को
बाँटना तीन भागोँ मेँ, और उन मेँ से
एक दे डालना इसे – क्योँ, ठीक है क्‍या?
भरत
आप ही का तो विचार था यह. आप ने
ही माँगा था काली सूची मेँ उस
का परामर्श.
आनंद
भरत, वह चाल थी
नीति की. हम ने लादे हैँ उस पर
मान सम्‍मान, क्योँ कि लादना था उस पर
हमेँ अपनी निंदा का बोझा.
लद्दू खरहे के जैसा ढोएगा
वह हमारा बोझा, हाँफेगा वह,
पसीने से तरबतर होगा. जब
जैसे जिधर चाहेँगे, हाँकेँगे
हम. लक्ष्य पर पहुँच कर माल
उतारेँगे हम. फिर हकाल देँगे
हिनहिनाने को और चरने को घास.
भरत
जो चाहेँ करेँ. है वह भरोसे
का सैनिक.
आनंद
हाँ, वह तो मेरा घोड़ा
भी है. इस के लिए मैँ देता हूँ
उसे उत्तम दाना पानी. उसे
मैँ साधता हूँ, सिखाता हूँ दम रोकना,
दौड़ना, कूदना, झपटना. अनुशासन
मेरा है उस पर. बस, वैसा ही है
केतुमाल! उसे साधो, उस से काम
लो. अपनी चेतना नहीँ है उस मेँ.
बड़े लोग जो बना देते हैँ चलन,
रचते हैँ जो कलाएँ, और फिर छोड़
देते हैँ जो जूठन, उन्हेँ सहेज
कर रखते हैँ केतुमाल जैसे लोग.
उसे स्‍वतंत्र मत समझो. वह एक
वस्‍तु है. उस का उपभोग करो… यह
सब छोड़ो, सुनो बड़े समाचार!
शतमन्‍यु और कंक कर रहे हैँ
शक्ति का संचय. हम भी चेतेँ,
अपनी ताक़तेँ मिलाएँ, औरोँ को
साथ लाएँ. अज्ञात संकटोँ को समझेँ.
जो ज्ञात हैँ, उन आपदाओँ को झेलेँ.
भरत
हाँ. तत्‍काल. दाँव पर लगे हैँ हम.
शत्रु से घिरे हैँ हम. ऊपर से
जो हमारे मित्र हैँ, उन के भी
मन मेँ छिपे हैँ घातक इरादे.

जूलियस सीजर पृष्ठ-1

उल्‍लास क्योँ? आनंद क्योँ? किस की
विजय? किस पर विजय? कैसी विजय?
रोम. एक मार्ग.

(फ़्‍लावियस और मारूलस आते हैँ. कुछ नगरजन आते हैँ.)

फ़्‍लावियस
जाओ! आज छुट्टी है क्‍या? कर्मकार हो
तुम. नहीँ जानते तुम – अनुचित है
काम के दिन निकलना यूँ कर्म
चिह्नोँ से हीन?… बोल, कौन है तू?
बढ़ई
बढ़ई हूँ, जी.
मारूलस
कहाँ है तेरा रंदा, नपैना?
क्योँ निकला हैँ योँ सजधज कर?… और तू?
क्‍या है तेरा काम?
मोची
अजी, मेरा भी क्‍या काम! कहाँ ये गुणी कर्मकार, कहाँ मैँ कोरा चर्मकार!
मारूलस
सीधे मुँह बता – क्‍या है तेरा काम?
मोची
मेरा काम, श्रीमान? बड़ा ही भला है मेरा काम – बुरे से बुरे को कर देना तले तक ठीक.
मारूलस
क्‍या है तेरा काम? पाजी, बता क्‍या
है तेरा धंधा?
मोची
न, न, यूँ मत फटिए, श्रीमान! ख़ैर, फट ही गए तो क्‍या है? ठीक कर दूँगा.
मारूलस
यह हिम्‍मत! ठीक कर देगा, पाजी!
बदमाश!
मोची
जी, फट गया तला तो मैँ ही तो गाँठूँगा!
फ़्‍लावियस
मोची है तू?
मोची
जी, हाँ, श्रीमान. सूजा है मेरा धंधा. नहीँ है मुझे किसी और के धंधे से काम. मुझे तो बस काम है सूजे से. श्रीमान, शल्‍यक हूँ मैँ पुराने जूतोँ का. जब भी पड़ती है संकट मेँ उन की जान, मैँ ही आता हूँ काम. बड़े से बड़ोँ के चरणोँ की शोभा हैँ जो, मेरे ही हाथोँ का कौशल हैँ वे.
फ़्‍लावियस
तो क्योँ नहीँ सी रहा जूते?
भटका रहा है लोगोँ को क्योँ?
मोची
श्रीमान, मैँ निकला हूँ जूते घिसवाने? घिसेँगे जूते तो मुझे मिलेँगे दाम! सच कहूँ तो आज हम निकले हैँ सीज़र का स्‍वागत करने, विजय का उल्‍लास मनाने.
मारूलस
उल्‍लास क्योँ? आनंद क्योँ? किस की
विजय? किस पर विजय? कैसी विजय?
कौन सा धन जीत कर लाया है वह? है
कौन जो बंदी बना? रथ कौन उस का
खीँचता? बोलो! चुप क्योँ हो? पत्‍थर हो
तुम, पाषाण हो. तुम भावना से हीन हो.
क्‍या भूल गए तुम – बीते अच्‍छे दिन?
बच्चोँ को गोदी मेँ ले कर चढ़ना
वह भवनोँ पर,
दीवारोँ पर…
भूल गए – वह रुकना पूरे पूरे दिन,
वह इंतज़ार…
कब आएगा अपना प्रिय नायक
पोंपेई? कब शोभित होगा उस से
यह रोम नगर का राजमार्ग?
देखा जो उस का विजय यान –
वह आकाश उठा लेना सिर पर.
क्‍या भूल गए वह गुंजन, अनुगुंजन
उन नारोँ का जिन से थर थर कंपित
कर देते थे तुम गहरी टाइबर
का शांत सलिल. अब तुम फिर से सज धज
कर निकले हो? इस सीज़र का स्‍वागत
करते हो! कर डाले सारे काम बंद.
पुष्पोँ से भर डाला राजमार्ग…
जाओ. घर जाओ. देवोँ से माँगो
क्षमा दान. बरसेगा तुम पर कोप प्रबल.
होगा धरती पर वज्रपात.
फ़्‍लावियस
जाओ, जाओ. भाई, जाओ. एकत्र करो
सब कामगार. टाइबर तट पर सब के सब
रोओ मिल कर. रोओ इतना… इतना
रोओ… आँसू से ऊपर तक चढ़
आए जल की धारा…
(सब नगरजन जाते हैँ.)

देखा तुम ने?
कैसे सब चले गए. हैँ सब के सब कितने
लज्‍जित! हैँ कैसे पश्‍चात्ताप भरे.
तुम इधर दुर्ग की ओर चलो. इस
ओर चला जाता हूँ मैँ. छीनेँ
प्रतिमाओँ से हम विजय चीर.
मारूलस
यह सब करना ठीक रहेगा क्‍या? है आज
नगर मेँ लूपरकल. है आज बसंत
आगमन का उत्‍सव.
फ़्‍लावियस
उत्‍सव है तो
होने दो. बस, यह देखो सीज़र का
स्‍वागत चिह्‍न न कोई बच पाए.
लोगोँ से ख़ाली कर दूँगा मैँ सब
सड़केँ. भीड़ जहाँ भी तुम देखो –
दो भाषण. नोँचो सीज़र के पंख.
हम भी देखेँ. कैसे – वह उड़ता है
ऊपर नभ मेँ! कैसे करता है हम
को वह पराधीन.
(जाते हैँ.)

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