अरविन्द कुमार खेड़े की रचनाएँ

पराजित होकर लौटा हुआ इन्सान

पराजित होकर लौटे हुए इन्सान की
कोई कथा नहीं होती है
न कोई क़िस्सा होता है
वह अपने आप में
एक जीता-जागता सवाल
होता है

वह गर्दन झुकाये बैठा रहता है
घर के बाहर
दालान के उस कोने में
जहाँ सुबह-शाम
घर की स्त्रियाँ
फेंकती है घर का सारा कूड़ा-कर्कट

उसे न भूख लगती
न प्यास लगती है
वह न जीता है
न मरता है
जिए तो मालिक की मौज
मरे तो मालिक का शुक्रिया

वह चादर के अनुपात से बाहर
फैलाए गए पाँवों की तरह होता है
जिसकी सज़ा भोगते हैं पाँव ही ।

तुम कहती हो कि… 

तुम कहती हो कि
तुम्हारी ख़ुशियाँ छोटी-छोटी हैं

ये कैसी
छोटी-छोटी हैं ख़ुशियाँ हैं
जिनकी देनी पड़ती हैं
मुझे क़ीमत बड़ी-बड़ी
कि जिनको ख़रीदने के लिए
मुझे लेना पड़ता है ऋण
चुकानी पड़ती हैं
सूद समेत किश्तें
थोड़ा आगा-पीछा होने पर
मिलते हैं तगादे
थोड़ा नागा होने पर
खानी पड़ती घुड़कियाँ

ये कैसी
छोटी-छोटी हैं ख़ुशियाँ हैं
कि मुझको पीनी पड़ती है
बिना चीनी की चाय
बिना नमक के भोजन
और रात भर उनींदे रहने के बाद
बड़ी बैचेनी से
उठना पड़ता है अलसुबह
जाना पड़ता है सैर को

ये कैसी
छोटी-छोटी हैं ख़ुशियाँ हैं
कि तीज-त्योहारों
उत्सव-अवसरों पर
मैं चाहकर भी
शामिल नहीं हो पाता हूँ
और बाद में मुझे
देनी पड़ती है सफ़ाई
गढ़ने पड़ते हैं बहानें
प्रतिदान में पाता हूँ
अपने ही शब्द

ये कैसी
छोटी-छोटी हैं ख़ुशियाँ हैं
कि बन्धनों का भार
चुका नहीं पाता हूँ
दिवाली आ जाती है
एक ख़ालीपन के साथ
विदा देना पड़ता है साल को
और विरासत में मिले
नए साल का
बोझिल मन से
करना पड़ता है स्वागत

भला हो कि
होली आ जाती है
मेरे बेनूर चेहरे पर
ख़ुशियों के रंग मल जाती है
उन हथेलियों की गर्माहट को
महसूसता हूँ अपने अन्दर तक
मुक्त पाता हूँ अपने आप को
अभिभूत हो उठता हूँ
तुम्हारे प्रति
कृतज्ञता से भर जाता हूँ
शुक्र है, मालिक !
कि तुम्हारी ख़ुशियाँ छोटी-छोटी हैं

जब भी तुम मुझे 

जब भी तुम मुझे
करना चाहते हो जलील
जब भी तुम्हें
जड़ना होता है
मेरे मुँह पर तमाचा
तुम अक्सर यह कहते हो —
मैं अपनी हैसियत भूल जाता हूँ
भूल जाता हूँ अपने आप को

और अपनी बात के
उपसंहार के ठीक पहले
तुम यह कहने से नहीं चुकते —
मैं अपनी औक़ात भूल जाता हूँ

जब भी तुम मुझे
नीचा दिखाना चाहते हो
सुनता हूँ इसी तरह
उसके बाद लम्बी ख़ामोशी तक
तुम मेरे चेहरे की ओर
देखते रहते हो
तौलते हो अपनी पैनी निगाहों से

चाह कर भी मेरी पथराई आँखों से
निकल नहीं पाते हैं आँसू
अपनी इस लाचारी पर
मैं हँस देता हूँ
अन्दर तक धँसे तीरों को
लगभग अनदेखा करते हुए
तुम लौट पड़ते हो
अगले किसी
उपयुक्त अवसर की तलाश में ।

उस दिन…उस रात..

उस दिन अपने आप पर
बहुत कोफ़्त होती है
बहुत गुस्सा आता है
जिस दिन मेरे द्वार से
कोई लौट जाता है निराश

उस दिन मैं दिनभर
द्वार पर खड़ा रहकर
करता हूँ इन्तज़ार
दूर से किसी वृद्ध भिखारी को देख
लगाता हूँ आवाज़
देर तक बतियाता हूँ

डूब जाता हूँ
लौटते वक़्त जब कहता है वह —
तुम क्या जानो, बाबूजी !
आज तुमने भीख में
क्या दिया है

मैं चौंक जाता हूँ
टटोलता हूँ अपने आप को
इतनी देर में वह
लौट जाता है ख़ाली हाथ
साबित कर जाता है मुझे
कि मैं भी वही हूँ
जो वह है

उस दिन अपने आप पर……
उस रात
मैं सो नहीं पाता हूँ
दिन भर की तपन के बाद

जिस रात
चाँद भी उगलता है चिंगारी
खंजड़ी वाले का
करता हूँ इन्तज़ार
दूर से देख कर
बुलाता हूँ
करता हूँ अरज —
ओ खंजड़ी वाले
आज तो तुम सुनाओ भरथरी
दहला दो आसमान
फाड़ दो धरती
धरा रह जाए
प्रकृति का सारा सौन्दर्य

वह एक लम्बी तान लेता है
दोपहर में सुस्ताते पंछी
एकाएक फड़फड़ा कर
मिलाते है जुगलबन्दी
उस रात..

बिटिया 

बिटिया मेरी,
सेतु है,
बाँधे रखती है,
किनारों को मजबूती से

मैंने जाना है,
बेटी का पिता बनकर,
किनारे निर्भर होते हैं,
सेतु की मजबूती पर ।

कुछ नहीं आएगा हाथ हमारे

जो भी सच है
भला या बुरा
ख़ुदा करे
इसी अँधेरे में दफ़न हो जाए ।

वर्ना टूटेगी हमारी धारणाएँ
और गुम हो जाएँगे हम इन अन्धेरों में ।
जी भी कहा-सुना गया है
अच्छा या बुरा
ख़ुदा करे
विसर्जित हो जाए
वर्ना जन्म देगा एक नए विमर्श को ।

अपनी तमाम बौद्धिकता को धता बताते हुए
कूद पड़ेंगे हम अखाड़े में ।
तुम अपना सच रख लो
मैं अपना झूठ रख लेता हूँ.
वर्ना इस नफ़े-नुक़सान के दौर में
कुछ नहीं आएगा हाथ हमारे…

बताओ ख़ुदा

एक भयानक दुःस्वप्न
नींद उचट जाती है एकाएक
धड़कनें हो जाती है तेज
पसीने से हो जाता हूँ लथ-पथ
उससे ज्यादा भयावह
मंजर को देख
लगभग
अनदेखा करते हुए
नाप लेता हूँ अपना रास्ता
या ख़ुदा
बताओ तो सही
स्वप्न में कौन जिया
मेरे अंदर
जागृति में
कौन मरा मुझमें
बताओ ख़ुदा.

जड़ों की ओर 

कुछ स्मृतियां
हरदम साथ रहती हैं
कुछ छूट गयी हैं पीछे
जिन्हें मैं
भेजता रहता हूँ
हर रोज सन्देश
जिस दिन
कह दिया जिंदगी ने
लौट पड़ूँगा
अपनी जड़ों की ओर

पत्ते तो सूख जाते हैं मगर 

एक सूखा पत्ता
झड़ कर गिरा मेरे ऊपर
पत्ते को हाथ में लिए
अचरज पूर्वक देखा मैंने
हरे-भरे पेड़ की ओर
पेड़ सकपका गया
गोया कि
इसमे मेरी कोई गलती नहीं है
पत्ते तो सूख जाते हैं मगर
उन्हें झरने में समय लगता है
यकीं नहीं आता है तो
आप देख सकते हो
पतझर कब का बीत चुका है
ठण्ड की शुरुआत के इस मौसम में भी
चिपके हैं कुछ सूखे पत्ते मुझसे
निरुत्तर होकर आहिस्ता से
मैंने पत्ते को
अपने कुरते की जेब में रख लिया
घर लौटकर
उस पुरानी किताब में
जिसमें मैंने रखा था
तुम्हारा भेंट किया हुआ गुलाब
जिसमें आज भी कायम हैं
खुश्बू उस गुलाब की
पत्ते को रख बंद कर दी किताब
कुछ दिनों के बाद देखा
पत्ता हरियाने लगा है
दौड़ा-दौड़ा गया उसी वृक्ष के पास
यह कहते हुए पेड़ ने
जताया बेहद अफ़सोस
अब कुछ नहीं हो सकेगा
घर लौटा तो
वह पुरानी किताब गायब थी.

दादाजी

अपने बालपन में
अपने दादाजी से पूछा था कि-
आपने काकाओं के नाम
भगवानोँ के नाम पर क्यों रखे
दादाजी ने बताया था-
किसी ने अपने अंतिम समय में
अपने बेटे “नारायण” को पुकारा था
दौड़े चले आये थे “नारायण”
दो साल तक चारपाई पर ही
बुढ़ापा भोगने के बाद
किसी सुबह चारपाई से नहीं उठे थे दादाजी
अपने अंतिम समय में कोई उन्हें
धरती पर नहीं सुला पाया था
खबर लगते ही गांव के
“डेबरिया” और “डेचरिया” काका
फ़ौरन चले आये थे
उन्होंने ही हम सब को खबर दी
आस-पास के दूर-दराज़ के सारे
रिश्तेदारों के आने के बाद
“राम” काका पहुंचे थे
“मुरारी” काका दूसरे दिन
“विष्णु” काका तीसरे दिन आये थे
और “नारायण” काका तो
दादाजी के “दसवें” में ही आ सके थे।

मेंढक

पहले मैं
मेंढक हुआ करता था
अक्सर मुझे लोग चिढ़ाते थे-
कि मैं कूपमंडूक हूँ
एक दिन मैंने गुस्से में आकर
कुआँ छोड़ दिया
और एक गहरे
तालाब में आ गया
किसी दिन मेरी जीभ
किसी कीड़े को देखकर लपलपाई
कि कुआँ छोड़ते वक्त
याद आई एक बुजुर्ग मेंढक की नसीहत-
चूँकि तुम एक मेंढक हो
किसी कीड़े को देखकर
जब तुम्हारी जीभ लपलपाए
तो थोड़ी देर रुकना
और देखना अपने आसपास
मैंने पानी की सतह पर आकर देखा
कांटा डालकर किनारे पर
चुपचाप खड़े लोग मछली के फंसने का
कर रहे थे इंतजार
उस दिन मैं
बच गया था कांटा निगलने से निरर्थक
गर्मी में जब तालाब का पानी हुआ कम
मैं ग्रीष्म की सुषुप्तावस्था में चला गया
उन्हीं दिनों सूखे तालाब में मिटटी खोदते
कुदाल की नोक से बाल-बाल बचा था दूसरी बार
मैंने फौरन तालाब छोड़ दिया
चला आया समुन्दर मेँ
यहाँ आकर देखा और जाना
कि हर छोटा जीव
बड़े जीव की अनिवार्य खुराक है
मैं वापस लौट आया
अपने कुएं मेँ
अब मुझे कोई कूपमंडूक
कहता है तो
मुझे बिलकुल गुस्सा नहीं आता
बल्कि मुझे तरस आता है उनपर
कि ये कब जानेंगे
तालाब और समुन्दर की हकीकत।

भूख के खिलाफ

गरीबी
बचपन से ही
करती है युद्ध का अभ्यास
बिना अस्त्र-शस्त्र के
सीखती है
युद्ध की कला-बाजियाँ
युद्ध की बारीकियां
युद्ध के दांव-पेंच
युद्ध की कूटनीति
भूख के खिलाफ
गरीबी इतनी आसानी से
हारती नहीं है।

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