अरविन्द भारती की रचनाएँ

जाति का नाग 

मानवता का पाठ
पिता ने उसे पढ़ाया
पर स्कूल के फॉर्म में
हिन्दू मुस्लिम का कॉलम आया
फिर जाति का नाग धीरे से
फुस्कारते हुए मुस्कुराया
हैरान परेशान पिता ने
अपना फ़र्ज़ निभाया

पहले दिन मैडम ने
उसको पाठ पढ़ाया
वो हिन्दू है
राज ये उसको बतलाया

एक दिन बिटिया रानी
रोते रोते घर आई
चमरिया कहके सबने उसकी
खिल्ली खूब उड़ाई

रोते रोते बोली बिटिया
पापा पापा ये चमरिया क्या होता है?
क्या मैं चमरिया हूँ?
मासूम के सवालों से विचलित पिता
उसके सिर पर हाथ फेरता है
और बिटिया रानी सर गोदी में रखकर
बस एक ही रट लगाती रही
मुझे चमरिया नहीं बनना पापा
मुझे चमरिया नहीं बनना।

कैद में हूँ

कभी मेरे आगे
कभी मेरे पीछे
कभी साथ-साथ चलती है
मै दो कदम बढ़ाता हूँ
वो चार कदम चलती है
जहाँ नहीं होता मौजूद
वहाँ भी पहुंच जाती है
मुझ से पहले ही पहुँचती है
जाति मेरी

और
जहाँ नहीं पहुँच पाती
वहाँ पूछते है नाम
पूरा नाम और पता
करते है एक्सरे
कभी इस एंगिल से
कभी उस एंगिल से
जैसे मैं किसी और गृह का प्राणी हूँ
असल में जानना चाहते है जाति मेरी

उसके बाद
जाति दिखाती है अपना रंग
ये सिलसिला अब से नही
तब से है जबसे मैं गर्भ में था
तभी से पीछे पड़ी है जाति मेरे
और पैदा होते ही
कर लिया है अपहरण मेरा
तभी से मैं उसकी कैद में हूँ

मै बेचैन हूँ
छटपटाता हूँ
चाहता हूँ उससे मुक्ति
मेरी इस मूर्खता पर
वो हंसती है
खिलखिलाती है

मै धुनता हूँ अपना सर
क्योंकि मरने के बाद भी
नही मरती है जाति।

शक्ति संतुलन 

अभिशप्त थे जो खेत
कभी बंजर जमीं के लिए
चल रहे है हल वहाँ
बोये जा रहे है बीज
उग रही है फसलें
पंख जो कतर दिए थे
सदियों पहले
फड़फड़ाने लगे है
तूफान उठा रहे है
पिंजरे में

खूंटे से बंधे
एक ही परिधि में घूमते
पहचानने लगे है
अपना वजूद
करने लगे है बगावत
रस्सियों के बल
टूटने लगे है

परिवर्तन
विद्रोह है उनके लिए
कुचलने को जिसे
उठा लेते है वो
पारंपरिक हथियार
एक तरफ़ा युद्ध
शक्ति संतुलन तक
जारी है।

नस्लभेद 

वो एक रात थी
मासूम सी
निर्दोष सी

जिसके होंठों पर
लोरियाँ थी
और था एक वादा
मीठी नींद का

वो एक रात थी
उसका आना
निश्चित था
चाहे चाँद साथ हो
या ना हो
वो अपने वादे की
पक्की थी

पर
लोगो ने
उसे
बदनाम कर दिया
किसी ने काली कहा
किसी ने खौफनाक
और
किसी ने हत्यारी तक
कह दिया

वो फूट-फूट के
रोती रही
अपनी किस्मत पर
किसी से कुछ ना बोली
बस रोती रही
और सोचती रही
जिसके लिए
उसे बदनाम किया गया
वो सब काम तो
दिन में भी होते है
तो फिर उस पर ही
ये तोहमत क्यों?
क्या वह भी हो गई है शिकार
औरों की तरह
नस्लभेद की।

मनु का तिलिस्म

शुक्राणु अंडाणु की
प्रेम कहानी में
चाँद
जब अपने
पूरे शबाब पर था

नदी गुनगुना रही थी
गज़ल

ठीक तभी
एकाकार होते वक़्त
एक और तत्व
चुपके से
प्रविष्ट होता है
समा जाता है
गर्भ में

भ्रूण बनते ही
ले लेता है
आकार
धर्म और जाति के रूप में।

वो नही है 

वो नहीं है
सिर्फ उसके नाम का
छलावा है

पत्थरों में कैद
भगवान नहीं होते
कण कण में विराजमान है
तो इतने शोषण अत्याचार नहीं होते

वो नहीं है
वो हो ही नहीं सकता
और अगर वह है
तो ऐसे धृतराष्ट्र की
सत्ता
मै
स्वीकार नहीं करता।

युद्ध

आँख मूंदने से
विपत्तियाँ नहीं जाती
ना भागने से

कबूतर ने देखा
मौत ठीक सामने खड़ी है
उसने जंग पर जाते
सैनिक की तरह
बच्चों से प्यार किया

फिर
बाज की आँखों से आँखे मिलाई
उसकी आँखों में
यकबयक खून उतर आया
और उसने पंख खोल दिए।

मुर्दे 

बारूद की गंध
कारतूस के खोखे
टूटी चप्पलें
टूटे चूल्हे

सुलगते घर
चूड़ियों के टुकड़े
सिसकती आहें

मंडराते गिद्ध
उल्लुओं की बैठक
गीदड़ों की फ़ौज

मजबूर पिता
बेबस माँ
लाचार प्रशासन

पेड़ पर लटकती
लाश मोहब्बत की

सभ्यता, संस्कृति का
ढ़ोल पीटते
नाचते गाते मुर्दे।

युद्ध अभी जारी है 

जैसे ही पता चलती है
जाति मेरी
उनके चेहरे की रंगत
डूबते सूरज की तरह
खो जाती है क्षितिज में कहीं
छा जाता है सन्नाटा
ठीक तूफान आने के पहले की तरह
टूटता है उम्मीदों का बांध
बह जाती है योग्यता मेरी
जैसे बहता है पानी
दरिया में कहीं

शुरू होता है एक अघोषित युद्ध
वो सभी झुण्ड में है
और मैं अकेला
युद्ध अभी जारी है।

तुम और ईश्वर 

तुम्हारी पीठ
चीख चीख के
तुम्हारे ऊपर हुए
जुल्म की दास्तान कहती है
मगर तुमने पी लिए आंसू
सी लिए होंठ

सुनो!
तुम में और ईश्वर में
एक समानता है
ना तुम कुछ करते हो
और ना वह।

सुनो ईश्वर

सुनो ईश्वर
जब तुम्हे
नहलाया जा रहा था
दूध से
ठीक तभी
एक माँ
जिसकी छाती सूख चुकी थी

अपने दुधमुंहे बच्चे
जिसकी एक-एक हड्डी
गिनी जा सकती थी
के लिए गिडगिडाती रही
मांगती रही
लोगों से दूध की भीख
पर ना तुम पिघले
ना तुम्हारे भक्त
दूध बहता रहा नाली में
बच्चा खामोश हो गया
हमेशा के लिए

सुनो ईश्वर!
मंदिर के अंदर
तुम्हे लगता रहा भोग
उधर
मंदिर के बाहर
सीढ़ियों पे
एक बूढ़ा भिखारी
तुम्हारा नाम लेकर
तड़पता रहा भूख से
पर भूख़ बड़ी निकली
तुम छोटे

तुम इतने छोटे क्यों हो ईश्वर?
क्यों नहीं थाम लेते हाथ
मजलूमों का
गरीबों का
भूखों का
बेसहारों का

क्या तुम बूढ़े हो गए हो?
मर गए हो?
या फिर हो गए हो गुलाम
चंद लोगों के?

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