अरविन्द श्रीवास्तव की रचनाएँ

अंगूठे 

बताओ, कहाँ मारना है ठप्पा
कहाँ लगाने हैं निशान
तुम्हारे सफ़ेद—धवल काग़ज़ पर

हम उगेंगे बिल्कुल अंडाकार
या कोई अद्भुत कलाकृति बनकर
बगैर किसी कालिख़, स्याही
और पैड के

अंगूठे गंदे हैं
मिट्ती में सने हैं
आग में पके हैं

पसीने की स्याही में ।

अंटार्कटिका का एक हिमखण्ड

अभी खड़ा था
यही कोई लाख वर्षों से
समुद्र की देह पर
चुपचाप
निहार रहा था हमें

हार-थक कर एक झटके में
वह टूटा
पिघला
और मिनटों में खो गया
समुद्र में ।

सुखद अंत के लिए 

महत्त्वपूर्ण बातें अंत में लिखी जाती हैं
महत्त्वपूर्ण घोषणाएँ भी अंत में की जाती हैं
और महत्त्वपूर्ण व्यक्ति भी अंत में आता है

हम बहुत कुछ शुरूआत भी अंत में करते हैं

अंत से हमारा रिश्ता आरम्भ से ही होता है
जैसे कोई परिणाम या पका फल
हमें अंत में मिलता है
प्रेम में भी हम
अंत पर पहुँचने को उतावले होते हैं

निर्णायक संघर्ष और अंतिम विजय
चाहता है खंदक में छिपा
चौकन्ना सैनिक
अंतिम गोली बचाए रखता है
अपराधी और पुलिस भी
कई तरह के अंतिम अस्त्र
छिपाए रखता है
कुशल राजनीतिज्ञ दिमाग़ में
महामहिम का निर्णय भी अंत में आता है

हमारे लिए जिज्ञासा और उम्मीदों से भरा होता है अंत

हम अंत सुखद चाहते हैं
बच्चे जुटे होते हैं
सुखद अंत के लिए
शुरुआत से ।

श्राद्ध-भोज 

उदासी छँट चुकी थी
जैसे कई-कई दिनों बाद
छँटता है माघ में कुहासा

दुख भरे बारह दिन
और कोई फल पककर तैयार हो चुका हो
तेरहवें दिन
कि जैसे छप्पर पर लदे कोहड़े में
अचानक आ गई हो मिठास
कटहल कटने को हो तैयार
लहलहा उठा हो बाड़ी–झाड़ी का साग
और शुरू हो चुकी हो बच्चों की धमा-चौकड़ी
पिछवाड़ों में कुत्तों की चहलकदमी
भोज-भंडारे की हो-हो
दही-घर में बिल्लियों पर सख़्त नज़र
लपलपाती जीभ
सबने खाए श्राद्ध-भोज
उदासी ढोने का
मीठा फल !

उलझन सुलझते ही 

उलझन सुलझते ही
कुछ ने फेर लिया मुँह
कुछ ने तोड़ लिया नाता
कुछ जुट गए
उलझन से त्रस्त लोगों की तलाश में
और कुछ आ धमके
उलझन भरे दिनों में
मुझ पर खर्च किए गए
शब्दों को वापस मांगने।

मज़े में हैं सारे

मज़े में हैं ईश्वर सारे
ब्रह्मांड के ज्ञात-अज्ञात सहचर
कीट-पतंग, अंधे-बहरे
बाबा-भिखारी, ग्रीष्म और शरद
माउस की-बोर्ड
प्रेमी युगल
साँसें धड़कनें
पत्ते टहनियाँ
शब्द मुहावरे
सुख दुख
स्वर्ग नरक
समुद्र हवा
उम्मीद और सपने सारे
मज़े में हैं
कविता परिवार का हिस्सा होने से!

कौवे के बारे में 

नहीं लगती कौवे की पंचायत
बिजली के तारों पर
घर के आस-पास
काँव-काँव करते हुए

कौवे ने अपनी मियाद पूरी कर ली है
या कि अनायास खत्म हो गया
उसके गले में अटकी

अमृत बूंदों की किंवदंती या फिर
किसी पैंतरे की तरह चुपके-से लुप्त हो रहे हैं
हमारे छप्पर-आँगन से या नहीं तो
व्यस्त हैं वे सुदूर हिस्सों में
धान सूखने की खबरिया बन कर

लुप्त हो रहे हैं कौवे
बगैर किसी अल्टीमेटम के
या कि हमारी नगर सभ्यता से
मोह-भंग हो गया उनका
नहीं दे पा रहे हम उन्हें
साबुन-चम्मच जैसी छोटी-छोटी चीज़ों को
उड़ा ले जाने की इजाज़त

ब्रह्मांड के किस ग्रह की ओर पलायन कर रहे हैं कौवे
किस नई दुनिया की तलाश में
इस धरती से अपने अनुबन्धों को तोड़ते हुए
कूच कर रहे हैं कौवे
चुप हैं पर्यावरणविद्!

होता है संशय यह कि
किसी ऋषि ने शापित किया है इन्हें
किसी काग बाबा ने हरण कर लिया इनका
किसी तांत्रिक क्रिया का हिस्सा बनने से आ गई इन पर शामतें
किसी बहेलिये की आंखों में कांटा बन चुभ गये कौवे
कि मोबाइल के लिए एसएमएस साफ्टवेयर बनानेवाली कंपनियों ने
किसी साज़िश के तहत खदेड़ दिया इन्हें
कि किसी आगंतुक-आगमन की सूचना
अब नहीं पहुंच पाएं चौखट तक किसी की
कि सूचना पौद्योगिकी महकमें में गोपनीय बैठक हुई
इनके खिलाफ कोई

होता है संशय यह कि
इन्होंने किसी केमिकल लोचे में पड़कर
खो तो नहीं दी अपनी प्रजनन क्षमता
या कि उन्होंने बोल दिया बिन्दास-सा कोई शब्द
संशय यह भी है कि
किसी गुप्त अभियान का टार्गेट तो नहीं बन रहे वे
आखिर किस घात की चपेट में लुप्त हो रहे
हर वक्त विपत्तियों को भेदने में माहिर कौवे

खुशफहमी यह नहीं कि कौवे ने ही सिखाया हमें
छोटी-छोटी चीज़ों को छप्पर में छिपाने की कला
घड़े में कंकड़ डाल, पानी पीने का हुनर
अध्ययन के लिए ‘काग चेष्टा’ वाली नसीहत
और झूठ बोलने पर काट खाने का डर

दूर हो रहे हैं हमारी सभ्यता से कौवे
नहीं पूछता कोई कौवे की खैरियत
नहीं ली जा रही कोई नोटिस
चर्चा में नहीं हैं कौवे
नहीं हो रही कोई गोष्ठी–कोई सम्मेलन
बयानबाजी भी नहीं हो रही इनके पक्ष में

लाख चिंताओं के बावजूद
आखिर क्यों नहीं आ रहा
कोई राष्ट्रीय वक्तव्य कौवों के लिए

अफ़सोस के लिए कुछ शब्द

हमें सभी के लिए बनना था
और शामिल होना था सभी में

हमें हाथ बढ़ाना था
सूरज को डूबने से बचाने के लिए
और रोकना था अंधकार से
कम से कम आधे गोलार्ध को

हमें बात करनी थी पत्तियों से
और इकट्ठा करना था तितलियों के लिए
ढेर सारा पराग

हमें बचाना था नारियल के लिए पानी
और चूल्हे के लिए आग

पहनाना था हमें
नग्न होते पहाड़ों को
पेड़ों का लिबास
और बचानी थी हमें
परिन्दों की चहचहाट

हमें रहना था अनार में दाने की तरह
मेहन्दी में रंग
और गन्ने में रस बनकर

हमें यादों में बसना था लोगों की
मटरगश्ती भरे दिनों सा
और दौड़ना था लहू बनकर
सबों की नब्ज़ में

लेकिन अफ़सोस कि हम ऐसा
कुछ नहीं कर पाए
जैसा करना था हमें।

तानाशाह

सुनता है तानाशाह
टैंकों की गड़गड़ाहट में
संगीत की धुन
फेफड़े को तरोताज़ा कर जाती है
बारुदी धुएँ की गंध
उसके लिए नींद लाती है
धमाकों की आवाज़

तानाशाह खाता है
गाता है
और मुस्कुराता है

तानाशाह जब मुस्कुराता है
लोग जुट जाते है
मानचित्रों पर
किसी तिब्बत की तलाश में !

वक्त बूँदों के उत्सव का था

वक्त बूँदों के उत्सव का था
बूँदें इठला रही थी
गा रही थीं बूँदें झूम – झूम कर
थिरक रही थीं
पूरे सवाब में

दरख्तों के पोर – पोर को
छुआ बूँदों ने
माटी ने छक कर स्वाद चखा
बूँदों का

रात कहर बन आयी थी बूँदे

सबेरे चर्चा में बारिश थीं

बूँदें नहीं

संकट टला नहीं है 

संकट टला नहीं है
सटोरियों ने दाँव लगाने छोड़ दिए हैं
चौखट के बाहर
अप्रिय घटनाओं का बाजार गर्म है
खिचड़ी नहीं पक रही आज घर में
बंदूक के टोटे
सड़कों पर बिखरे पड़े हैं
धुआँधार बमबारी चल रही है बाहर

समय नहीं है प्यार की बातें करने का
कविता लिखने, आँखे चार करने का

यमदूत थके नहीं हैं
यहीं कहीं घर के बाहर खड़े
प्रतीक्षा कर रहे हैं
किसी चुनाव-परिणाम की !

तस्वीर में माँ और उनकी सहेलियाँ 

अक्सर कुछ चीज़ें
हमारी पकड़ से दूर रहती हैं

अगली गर्मी फ्रिज खरीदने की इच्छा
और बर्फ़बारी में गुलमर्ग जाने की योजना

कई बार हमसे दूर रहता है वर्तमान

कई-कई खाता-बही रखती हैं स्मृतियाँ

एक ब्लैक एण्ड व्हाइट तस्वीर दिखी है
अभी-अभी पुराने एलबम में
जिसमें अपनी कुछ सहेलियों के साथ
शामिल है माँ
उन्होंने खिंचवाई थीं ये तस्वीरें
सम्भवतः आपस में बिछुड़ने से पहले

तस्वीर में एक लड़की ने
अपने गाल पर अंगुली लगा रखा है
दूसरे ने एक लट गिरा रखा है चेहरे पर
एक ने जैसे फोटोग्राफर से आग्रह कर
एक तिल बनवा रखा है ललाट पर
चौथी खड़ी है स्टैच्यु की मुद्रा में
और पांचवी ने, जैसा कई बार होता है
अपनी आँखें झपका ली है
आँख झपकाने की बात
उस सहेली को हफ़्तों सालती रही थी
जैसा कि माँ ने मुझे बताया था

कमोबेश एक सी दिखनेवाली ये लड़कियाँ
माँ-दादी और नानी बनकर
बिखर चुकी हैं दुनिया में

उन्होंने अपने नाती-पोतों के लिए
जीवित रखी है वह कथित कहानी
– कि जब कुआं खुदा रहे थे हमारे पूर्वज
अंदर से आवाज आयी थी तब
– ये दही लोगे….

एक और दुनिया बसती है हमारे आसपास
राक्षस और परी की

उन्होंने बचाये रखा है स्मृतियों में
मुग़ल-ए-आज़म और बैजू बावरा के साथ
शमशाद व सुरैया के गीतों को
नितांत अकेले क्षण के लिए
जैसे मिट्टी में दबी होती है असंख्य जलधारा

उनकी निजी चीज़ों में
सहेलियों की दी गयी चंद स्वेटर के पैटर्न
रुमाल और उस पर कढाई के नमूने,
हाथ के पंखे, प्लास्टिक तार के गुलदस्ते
और बेला, चंपा जैसे कई उपनामों सहित
उनकी ढेर सारी यादें थीं

माँ और उनकी सहेलियाँ बिछुड़ी थीं
अच्छे और बुरे वक्त में मिलते रहने की
उम्मीद के साथ

लेकिन ऐसा नहीं हो सका था
तस्वीर के बाहर!

आधा सेर चाउर 

आधा सेर चाउर पका
बुढ़वा ने खाया — बुढ़िया ने खाया
लेंगरा ने खाया — बौकी ने खाया
कुतवा ने खाया चवर-चवर

आध सेर चाउर नहीं पका
बुढ़वा ने नहीं खाया, बुढ़िया ने नहीं खाया
रह गया लेंगरा भूखा, बौकी भूखी
कुतवा भूखा, बकरिया भूखी

जो गया था चाउर लाने
लौट कर नहीं आया आज तक !

शहर जंगल

उसकी साँसे गिरवी पड़ी हैं मौत के घर
पलक झपकते किसी भी वक़्त
लपलपाते छुरे का वह बन सकता है शिकार

पिछले दंगे में बच गया था वह

अभी उसने रोटी चुराई है
उसके जिस्म पर चोट के और
नीचे पत्थर पर
ख़ून के ताज़े निशान हैं
उसने गुत्थमगुत्थी-सा प्रयास छोड़ दिया है
उसकी आँखें आँसू से लबालब हैं
वह तलाश रहा है किसी मददगार को

कुछ वहशियों ने पकड़ रखा है उसे
पशु की मानिंद
उनकी मंशाएँ ठीक नहीं लगतीं

चाहता हूँ मैं उसे बचाना
पास खडे़ पुलिसवाले की गुरेरती आँखें
देख रही हैं मुझे !

प्रेमियों के रहने से 

प्रेमियों के रहने से
मरे नहीं शब्द
मरी नहीं परम्पराएँ
कंसर्टों में गाए जाते रहे प्रेमगीत
लिखी जाती रही प्रेम कविताएँ
बचाए जाते रहे प्रेमपत्र
डोरिया कमीज़ के कपड़े
मूंगफली के दाने
पार्क व लान वाले फूलों को
और बचाया जा सका
उजाले से रात को

प्रेमियों के रहने से
मरी नहीं चार्ली चैप्लिन की कॉमेडी
अभिनेत्रियाँ नहीं हुईं कभी वृद्ध
चालीस के दशक वाले सहगल के गीतों को
बचाए रखा प्रमियों ने

प्रेमियों के रहने से
एक आदिम सिहरन जीवित रही
अपने पूर्ण वजूद के साथ
हर वक़्त

डाल दिए प्रेमियों ने पुराने और भोथरे हथियार
अजायबघर में
संरक्षित रही विरासत
जीवित रही स्मृतियाँ
आषाढ़ के दिन और पूस की रातें
कटती रही
बगैर फजीहत के
प्रेमियों के रहने से

प्रेमियों के रहने से
आसान होती रही पृथ्वी की मुश्किलें
और अच्छी व उटपटांग चीज़ों के साथ
बेखौफ जीती रही पृथ्वी ।

एक डरी और सहमी दुनिया में

सुन ली जातीं हमारी प्रार्थनाएँ
तो सूर्य उदय से पहले
लाल नहीं दिखता

पत्ते कभी पीले नहीं होते
नहीं छिपाना पड़ता नारियल को अपनी सफ़ेदी
नाटक के सारे पात्र
पत्थरों में आत्मा का संचार करते
नदियाँ रोती नहीं
और समुद्र हुंकार नहीं भरते
शब्द बासी नहीं पड़ते और
संदेह के दायरे से प्रेम हमेशा मुक्त होता
स्वप्न हुकूमतों के मोहताज नहीं होते
बुलबुले फूटने के लिए जन्म नहीं लेते
धरती की सुगबुगाहट और प्रकृति की भाषा
साधारण और गैर जरूरी चीज़ों में शामिल नहीं होतीं
एकाकीपन के सारे हौसले पस्त होते

एक डरी और सहमी दुनिया में
हमारी प्रार्थनाएँ सुन ली जातीं
तब शायद चूक जाता मैं
कवि होने से !

चर्चा की समाप्ति पर

नेहयुक्त लफ़्जों के साथ
समेटी गई किस्म-किस्म की छप्पनछुरी
नीयत और संदेहों के खुले ताले और
बंद हुए जिरह के पन्ने

चर्चा की समाप्ति पर
अदबी तकरीम
मिले उत्तप्त हाथ

चूँकि पहन रखे थे सबों ने
हाथों में दस्ताने
सो संदेह की हल्की परत
हमेशा की तरह
स्पर्श के बीच कायम रही ।

बंद नाक

किरकिरा है मन
नासिका मार्ग को अवरूद्ध कर
समझौता कर लिया है आपस में
इड़ा और पिंगला ने
बगैर किसी घोषणा के

अभी आइसक्रीम को हाथ नहीं लगाया
गाँव से आए दही में
मुँह नहीं डाला था
भींगा नहीं मेघ मे झमाझम
धूल-धुएँ से बचाए रखा सबकुछ
बगैर किसी चेतावनी के
बन्द हो गई नाक

कमाल था यह
हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था का ।

नींद के बारे में उनींदा विचार

सेहत के लिए नींद की ज़रूरत थी
लेकिन नींद के लिए
सेहत की नहीं

नींद सनातनी थी
सभी के लिए बिस्तर पर
आलिंगन में, धरती और कंधों पर
आषाढ़ के दिन और पूस की रातें
देती थी दावत महामहिम को
कौवे और बाबा की कानी कुतिया को
सदियों से आती है नींद दबे पाँव
नयी बहुरिया-सी
तानाशाह और कवियों की आँखों में भी
सभ्यताओं का अनुबंध पक्का था
नींद से
बगैर किसी लिखित दस्तावेज़ के ।

बचपन

जब मैं
बहुत छोटा था

खेलता था

आकाश के साथ !

गुस्से भरा समय 

किसी खचाखच भरी यात्री गाड़ी में
इंच भर टसकने के लिए
बगल वाले से मिन्नतें और हाथ में
मछलियों भरा एक्वेरियम

चप्पे-चप्पे पर शिनाख़्त करती आँखें
लड़खड़ाते पैर
अंतड़ियों की कुलबुलाहट
उलाहनों से लपलपाती जीभ
हर कोई अपने में अनुपस्थित
हाथ सूत्र की तलाश में
हर जगह, जगह के लिए उठा-पटक
स्त्री-स्पर्श की ललक

घर में किरासिन नहीं
गैस के लिए गुहार
कार्बन से भरा पेट
सुबह कश्मीर पर अमरीकी मध्यस्थता का भय
दोपहर पड़ोसी से कच-कच
रात ड्रेगन की चिंता
सब कुछ इसी सफ़र में
जीवाश्म मन पर
उम्मीदों का लोथा
एजेण्डे में सभी कुछ
लीडरों की लफ़्फ़ेबाजी
दिन राई, रात राई
पहाड़ कहीं नहीं

शेष समय
सेटेलाइट चैनलों की चिल्ल-पों
सुन्दरियों की मस्त-मस्त मुस्कान
आकर्षक-लुभावनी बड़ी-बड़ी दुकान

गुस्से भरा समय
क्रोध से फटती सर की नस
नब्ज टटोली ब्लड-प्रेशर-लो
हाय ! हाय !
ये हालात कितने नपुंसक हैं
छी !

चवन्नी का लोकतंत्र 

यह क्रूर समय की बेचारगी थी
सम्बन्ध फाहे थे और रिश्ता
एक निविदा !
यूज़ एण्ड थ्रो आचरण की एक शिष्ट-शैली, जो
परिपाटी बन चुकी थी
अब चूँकि चवन्नी अपनी औकात और स्टेटस में
सबसे निचले पायदान पर
बुढ़िया याचक-सी बैठी थी
अतः सामर्थ्यवानों ने ग्लोबल-साइनिंग के लिए
उसे वित्त-व्यवस्था और सुसंस्कृत कही जाने वाली
इस सभ्यता से खदेड़ दिया था ।
इस लोकतांत्रिक हत्या पर लोगों की सहमति थी
और कहें तो जश्न-सा माहौल भी
जिसे बड़े ध्यान से देख रही थी सिर्फ़ और सिर्फ़
कमज़ोर व बीमार अट्ठनी ।
तमाम किस्म के कथित विलापों से
इतना तो स्पष्ट था कि अब नहीं होगा पुनर्जन्म
नहीं दिखेगी किसी रंग-रूप में चवन्नी !
दिखेगा भी तो
म्यूजियम के किसी कोने में चवन्नी की मृत-शरीर !

उन्होंने अपनी हैसियत में इजाफ़ा कर लिया है
जो कभी चवनिया मुस्कान बिखेरने के लिए
बदनाम थे
बदल डाले गए चूरन और लेमनचूस के रैपर
अब राजा क़िस्म के लोग
दिल नहीं माँगते थे चवन्नी उछाल कर

चवन्नी का खेल त्म हो चुका है
हत्या हो चुकी है उसकी
जैसे हमारे लोकतंत्र में
सपने, उम्मीद और हौसले की हत्या होती है
यह वही चवन्नी थी जो चुटकी में सलटा देती थी
पान, बीड़ी और खैनी की तलब
घोरनदास का बेटा दिनभर मटरगश्ती करता था
चवन्नी लेकर रामोतार का पोता खिलखिला कर हँस देता
लाल आइसक्रीम उसकी आँखों में तैर जाती
गर दादी जीवित होती तो चवन्नी के हत्यारे पर ख़ूब बरसती

बिल्कुल छम्मक-छल्लो बनकर आई थी कभी चवन्नी
चवन्नी-चैप लोगों ने भी अरसा लुत्फ उठाया था इसका
सिनेमा के थर्ड-क्लासी दर्शकों से साहूकारों तक दबोचा था इसे
गुल्लक की चहेती थी कभी चवन्नी

तंगहाली मे जी रही थी इधर पीलिया-पीड़ित चवन्नी
लोग इसे छूने को तैयार नहीं थे
बनिया नहीं पूछ रहा था इसकी ख़ैरियत
बच्चे कतराने लगे थे इसे देखकर
वित्त-मंत्रालय की भृकुटि तनी थी
आर०बी०आई० की आँखों की किरकिरी या फिर
चवन्नी ढालनेवाली टकसालों ने हाथ खड़े कर दिए थे
चवन्नी के नाम पर
माहौल प्रतिकूल था ।

चली गई चवन्नी इस लोकतंत्र से
कई-कई भाषा, लिपि और जातियों-सी
पेड़-पौधे, पहाड़ व तितली-सी
सभ्यता और संस्कृति-सी
लुप्त हो गई लोकतंत्र से चवन्नी
सरस्वती बन हमारी रगों में बहने के लिए !

विवशता 

वह धीरे से सरका
क़रीब आया
हल्की मुस्कान के साथ
दबी किन्तु सख़्त जुबान मे बोला-
‘स्मैक लोगे?’

मै कहता नहीं
तो भी मुझे लेना पड़ता ।

ख़ुशी की बात

इससे अधिक खुशी की बात
और क्या हो सकती है
कि इस वक्त भी
कौए को मिल जाता है
भरपेट भोजन
बिन पगार के
पहरेदारी करने से
नहीं चूकता कुत्ता

और हमारे यहाँ
विनम्र लोग
अभी भी बाँट कर खा रहे हैं तम्बाकू

कि धूप-चाँदनी
हवा और पानी ने
निर्मम लोगों के प्रति
तनिक भी नहीं बदला है व्यवहार

इससे अधिक खुशी की बात
और क्या हो सकती है
कि अभी भी गर्म है आँच
और बर्फ़ अभी भी है ठंडी।

नृपति उदास है

नृपति उदास है
उसकी बेटी ने
आज कोई कत्ल नहीं किया

रक्त से आचमन
ड्राइंग कक्ष में
चांद-सितारों को क़ैद नहीं किया

वाद्य यंत्रों की धुनाई,
मौसमों को
पिंजरे में बंद नहीं किया
विरासती फ़ौजों का
‘ऑनर‘ नहीं लिया

खलबली है नृपतंत्र में
कल बेटी
कामग़ारों की बस्ती क्यों गई

नहीं आ रही
भुने हुए काजू की ख़ुशबू
आज उसके
गू से !

चर्चा में

वक़्त बूँदों के उत्सव का था
बूँदें इठला रही थीं
गा रही थीं बूँदें झूम-झूमकर
थिरक रहीं थीं
पूरे सवाब में

दरख्तों के पोर पोर को
छुआ बूँदों ने
माटी ने छक कर स्वाद चखा
बूँदों का

रात कहर बन आई थी बूँदें
सवेरे चर्चा में बारिश थी
बूँदें नहीं।

वेंटिलेशन

चिड़ियाँ बतिया रही थी
कि हमारे हँसी-खुशी के सुकोमल दिन
ख़त्म हो चले है

जी घबरा रहा है
इस सदी को देख कर
इस बीच हमारे कई परिजनों ने
धरती से अपना रिश्ता
तोड़ दिया है

हमारे लिए यह धरती
अब नहीं रह गयी निरापद

चिड़िया बतिया रही थी
बगैर किसी तामझाम के
बगैर किसी घोषणा-पत्र के

जीने की इस उम्मीद के साथ
कि बड़ी-बड़ी इमारतों में भी
रखी जाए
कम से कम
एक वेंटिलेशन !

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