अरुणाभ सौरभ की रचनाएँ

कोसी कछार पर

वो बहती रहती है
हिलक लेकर
उबाल मारकर
लुप्त करना चाहती है
कुछ घरों को
उसमें सिमटे-चिपके
इतिहास के धूसर पन्ने
एक तफ़ानी लहर
बौराई आवाज़
अट्टहास
धिक्कार
और कई चिक्कार
समा लेना चाहती है अपने अंदर

चंद लमहों में
अपने गेसुओं में
उलझा लेती है
ज़िन्दगी के कई कश्तरे
और अपनी जबां पर
पोत लेती है
कई रातों की सिहरन
कई माहों की कसक
कई कलंकों की कालिख
कई घरों की बद्दुआ
क्योंकि वह चिड़ियाँ नहीं,
औरत नहीं,

हरहराती हुई
खौलती उबलती नहीं है
जिसकी कछार पर भी डर लगता है…।
क्योंकि वह नहीं जानती
सजीव संवेदनाएँ
वह जीवित है
अपनी लहरों के सहारे
बचपन, जवानी, बुढ़ापा
सब लहरों के नाम
वह नहीं जानती
कि उसके अल्हड़पन
और बेहया हुड़दंग
चाल से
हरेक साल
तबाह हैं
कई जान-माल
पर कैसे समझेगी तू
कैसे बुझेगी
तेरी प्यास-कोसी…?
तू तो
प्यास बुझाने
के बहाने आती है
प्यास ऐसी बुझाती है
कि गला फट जाता है
नाक से लहू टपकता है
यही एक मगजमारी है
कि तुम्हारे जाने के बाद
कई दिनों तक
बुख़ार की सिहरन
और तपती रहती है
उनकी देह
मच्छरों की घिनघिनी
मक्खियों की भिनभिनी
से गायब
उनके रातों की नींद
दिन का चैन
अजीब दुश्चिन्ता
और कँपकँपी

कि फसलें कहाँ गईं?
हरी-हरी फसलें…
और वे उठते हैं हतभागे
छाती भर पानी में जाकर
अपने भासे छप्पर को
उठाते हैं
बाँस के सहारे
गाड़ देने की
नाकामयाब कोशिशें करते
बार-बार, बारंबार
रोती रहती हैं
कई माँएँ, बहनें, पत्नियाँ और बच्चे
उनकी आँखों का पानी
टपटप गिरता है निरंतर
और तुम्हें
मज़बूती मिलती है
इन इंसानी आँसुओं से
रोओ-रोओ मेरे गाँव की माँ-बहनो
क्योंकि कोसी की हहराती धार
तुम्हारी आँखों से ही
निकली है
रोओ-रोओ कोसी कछार की ‘सीताओ’
क्योंकि ‘राम’ अनिश्चितकालीन
अज्ञातवास में गया है
तुम्हें छोड़कर
और तुम
चिग्घाड़-चिग्घाड़कर
बहो बरसात में
क्योंकि तुम्हें
मानवीय आँसुओं से
प्यार है, प्यार है, प्यार…।

एक गर्भस्थ शिशु
माँ के गर्भ से निकल
इसी धरती पर
आने को व्याकुल, जहाँ…
चारों तरफ फैली महामारी

भासी हुई ज़िन्दगी के कश्तरे
भासे छप्पर
तबाह फसलें और जान-माल
सड़ी-फूली लाश
चिक्कार करते हतभागे
चीख़ती माँ-बहनें, बच्चे-बूढ़े,
लाशों की पैरोकारी और
मुआवजे का थूक घोंटते परिजन
वो शिशु बिना दूध-दवाई के
जन्म लेने के बाद
अपनी नग्न आँखों से
कैसे देखेगा
कोसी की कछार…?

गुलमोहर की छाँव 

सन्नाटे में साँस
जैसे चलती हवाओं का स्वर
जैसे हरे पेड़ का धरती को चुंबन
गुलमोहर के हाथ टूटे हुए
बिखरे हुए
एक प्यारी लड़की के फूल से हाथ में
रख देता गुलमोहर का लाल-लाल फूल
उसके जूड़े में खोंसता
इसी हरी पहाड़ी के नीचे
धूप की ताप के विरुद्ध
गुलमोहर की छाँव में

लाल गुलमोहर की छाँव हो तुम
जो मेरा बोधिवृक्ष है
जिस छाँव में गहराइयाँ टटोलता हूँ अपनी
रोम-रोम को धूप से बचाकर
दुनिया की नज़रों से आँख चुराकर
इसी हरी पहाड़ी के ताल मे
इसी झील के किनारे
चलती हवाओं के साथ
इसी पत्थर पर बैठकर
गुलमोहर की छाँव में
तुम्हारी आँखों को पढ्ना चाहता हूँ

यह गुलमोहर सिर्फ एक पेड़ नहीं है
यह तो सभ्यताओं की कहानी है
आत्मा की कातर पुकार है
निःशब्द गवाही देता है
प्यार की,पूर्णता की
सम्पूर्ण कर देता है
मेरा-तुम्हारा प्यार
यह गुलमोहर आँख है
बेहद प्यारी आँखें

तुम्हारी आँखें जैसी
इसके हरे पत्ते की छांह से छनकर
आती धूप की टुकड़ियाँ
आँखें जैसी दिखती है ज़मीन पर
देह पर पड़ने पर
हजारों आँखें बनती हैं
समेट लूँ मुट्ठियों में
इन सभी धूप की टुकड़ियों को

आओ,कि इतने दिनों से
यह गुलमोहर तुम्हारा साथ पाने को व्याकुल है
तुम्हारे माथे पर प्यार से
टपकेगा
एक-एक , लाल फूल
आँचल मे भर और लाल हो जाएगा
माफ कर देना भूल-ग़लती
मेरा साथ
तुम्हारा साथ
अब हमारा साथ बनकर
गुलमोहर के साथ का
हिस्सा बन जाएगा

किसी और बहाने से

1.

मैंने तुमसे रात मांगी थी
और तुमने मेरे अंधेरे को
अपनी दूधियायी रोशनी से ढक दी
मैंने कहा-मुझे नींद चाहिए
और तुम जाग-जागकर अपने हिस्से की नींद
मेरे नाम करती रही
मैंने कहा-मुझे प्यास लगी है
तुम मेरी सारी तपिश को/सारे प्यास को
पी गयी गट-गट
और मेरे हिस्से
बादलों के कुछ टुकड़े छोड़ गई
मैंने कहा-मैं भूखा हूँ
और तुम थाली परोस चली गई चुपचाप

मैंने दर्द के हवाले से तुम्हें याद किया
तो ज़िस्म में कहीं दर्द का नामोनिशान नहीं था
मेरे रोम-रोम में सिहरन,
मांसपेशियों में गति,
नस-नस में लहू
भर देनेवाली
वो तुम ही थी

जाड़े की गहराती रात में
धुन्ध की हो रही थी जब बारिश
ठंढे होठों से सिसकियाँ भरकर
तेज़ साँसों से
काँपते हाथों से
जो मैंने कविता लिखी थी
उसमें,
हर जगह तुम ही थी

उसमें भी,
जहाँ एक आठ पैरों वाला या भुजाओं वाला ऑक्टोपस
ली फाल्क की मशहूर मैन्ड्रेक ज़ादूगर कामिक्स
से निकलकर अपनी हैरतंगेज़ कारनामों से
भविष्यवाणियाँ करके तुम्हें मेरी होने का
दावा करता करता रहा
और तुम्हारे मुँह से मेरे लिए बस निकलता रहा
“गिनिपिग-गिनिपिग ओह माइ डार्लिंग…किल मी…किल मी…”
और तुम मेरी बाहों में आकर खो गयी

और तुम,
ग्रीक के त्रासद नाटकों की नायिका जैसी
तुम कालीदास की विरहिणी यक्षिणी सी
जिसके लिए विधुर यक्ष ने मेघों को दूत बनाया था
जिसके लिए दुष्यंत छोड़ गए थे मुद्रिका
वो शकुंतला जैसी तुम

2.

और मैं,
तुम्हारे रेशमी दुपट्टे में
गूँथे हुए धागों के रेशे-रेशे में
मैं शामिल हूँ
जो तुम्हारी धड़कनों के साथ
हौले-हौले काँपता है,
तुम्हारी साँसों के उठने-गिरने की
गवाही में
समेटे ख़्वाब को बुनकर जो कुछ
कतरन जमा किया है कपड़ों का
उसके हर धागों में भी मैं ही हूँ

तुम्हारी आँखों में झाँकते सपनों के बीच
कई दिन,कई रात,कई मास
उनींदीयों में जागकर
कुछ सपने बुनती होगी तुम
उन सपनों की हक़ीक़त में
मैं ही हूँ,…..मैं हूँ ……..
तुम्हारे होठों के गाढ़े लिपस्टिक के रंग में
मश्करे/आइलाइनर के रंगों में
बिंदी के रंगों में
सोलहों शृंगार में
और होठों पर पसरी दो बूंद प्यास के बीच
होठों पर पसरी दो बूंद प्यास के बीच
चेहरे पर हल्की बूंदें पसीने की
जिन्हें रुमाल से पोछना चाहती हो तुम
उस रुमाल के रेशे-रेशे में गूँथा मैं ही हूँ

अब सांसें चलती हैं रोज़
जैसे पहले चलती थी
रात-रात जैसी नहीं है,
अब नींद,नींद की तरह नहीं है
आधी रात जागकर उनींदी में कई कसक को
गले से बाहर कर
जो गीत गाये थे मैंने
उसके हर रियाज़ में तुम हो

3.

समय किसी ठहराव से आगे
बढ़ नहीं पा रहा है
जिस-जिस चीज़ का विरोध
आत्मा के कोर से करता रहा-ताउम्र
उन चीजों के सहारे जीना
हमारी फितरत बन गयी
हमारे बीच में
भूत की दुर्दैव यातना है,
अंधेरे के बोझ तले वर्तमान झुका है
अज्ञात रोशनी की खोज में भविष्य
निर्वंश खेत की तरह सादा है,कोरा है

फिर भी हम हैं,कि जीए जा रहे हैं
जैसे जीता है-घोंघा
मिट्टी के तलघर में
जैसे जीता है-साँप
किसी और के बिल में
जैसे जीता है-घड़ियाल
पानी के अजायबघर में
जैसे जीता है-बिच्छू
डंक मारने के लिए
वैसे जीते हैं-हम
अपना वजूद तय करने के लिए

पर वजूद-एक नकली अहंकार
दब्बू संवेदना का प्रतिफल नहीं तो
और क्या है?
एक तुम हो जो
मुझसे प्रेम करना चाहती हो
एक मैं हूँ जो
प्रेम में होना चाहता हूँ

हम दोनों भाषा की छत पर
शब्दों की नाव में जुगलबंदी करते हैं

यह आइसक्रीम,जिसे हमलोग एकसाथ
खाना चाहते हैं
किसी मरघट से लाये अंग जैसा लगता है,
ये चॉकलेट, जिसे एकसाथ चबाना चाहते हैं हम
इसमें गर्भपात की हुई अजन्मी लड़की का भ्रूण है,
ये कोल्ड़कॉफी,जिसे एक में ही दो पाइप लगाकर
चूसना चाहते हैं हम,
इसमें बलत्कृत स्त्री के
छत-विछत योनि से बहे खून का रंग है,

4.

कई डर शामिल हो गया है, तुम्हारी ज़िंदगी में
कितने युगों से
कितने कालखण्डों में
अपरिमित आकार को अपने
अर्थ दिलाने की युक्ति से
तन पर,मन पर,
सुख-दुख का अंबार लेकर
जमाने की धौंस सहकर
जीने की तमीज़ विकसित कर
रूप-रस-गंध शामिल कर
इतिहास की किताब में शामिल
डर-शामिल,शामिल डर…..
भोगते जीवन का रंगमहल
शामिल ज़िंदगी में
जागती रातों का डर शामिल,
चाय पानी की तरह-डर
पूनम की चाँद में
अमावश का डर

महाकाव्य की पंक्तियों से भी
निकलकर आता है-डर
कुछ भी सुन सकने से-डर
षोडशी,सुधामयी,प्रेममयी,अभिसारिका,प्रेयसी
जीवन में पराजित होती गयी-अहर्निश
नियति मान ली हो-पराजय
बारंबार पराजय पैदा करती है-डर

अर्थ देकर जीवन का
धरम-करम का,
काम-मोक्ष का,
योग-भोग का,
संजोग-वियोग का,
माया-मोह का,
आशा का,तृष्णा का,
द्वेष-वितृष्णा का,
शामिल पुरुषार्थ को
जीवन की गति में
जीवन को ऊँचाइयों से
देख लेती हो-तुम
देखकर फिर पैदा होती है-
डर…

भीड़-भाड़ से भरी सड़क पर
पैदल पार करने की कोशिश में
दिन में,भरी दोपहरी में
गुजरनेवाली गाडियाँ
पैदा करती है-डर

आधी रात में चमकती जुगनू
कीट-फतिंगों,छिपकलियों की
टिक-टिक,चिक-चिक…टिक-टिक,चिक-चिक…
तुम्हारे लिए पैदा करती है-डर

आधी रात में
पुलिस वैन से,अंबुलेस से
निकलकर आती खौफ़नाक आवाज़ें
पैदा करती है-
डर….ड…र…डर…

और डर हिस्सा हो गया है-हमारी ज़िंदगी का
जैसे कि-प्यार

5.

कुछ पल छूट सा गया है ज़िंदगी में
कुछ रातें जैसे बीतकर जैसे
कर रही हो सुबह का इंतज़ार
कुछ ख़्वाब हक़ीक़त और फसाने की
दोहरी चादर ओढ़कर
ज़िंदगी से बाहर चला गया है,

अब तो मौसम सुनाता है
कोई शांत संगीत
अब तो राग धुनों की शुरुआत करने
जीवन में आ गए हैं सारे
अब तो हर रागों में आलाप तुम्हारा है
अब तो चिड़ियों के गान में
बगावत की अनसुनी आवाज़ है
अब तो मछलियाँ तालाब जल से
एक-एक फूट ऊपर उछलती है,
अब तो पतझड़ के बाद पेड़ की डाल पर
वसंत आनेवाला है
अब तो हवाओं में है
उन्मत्त करनेवाली त्वरा

–6
हर तरफ़ पसरते नकली जीवन में
सच का एक-एक कतरा
कहीं खो गया है
और झूठ ने मसल कर रख दी है मेरी आत्मा
आत्मा की कातर पुकार सुनकर दौड़ जाता हूँ
जहां गुलदश्ते में रखे लाल गुलाबों से
तुम मेरा इंतज़ार कर रही हो
जैसे लरजती पत्तियों से भरे बाग में
एक सुनहरे महल पर चहकती चिड़ियाँ
और तालाब में उछलती मछलियों से नज़र बचाकर
एक सूखे कनेर की टहनी से
हौले से मुझे मार रही हो
और मैं मुसकुराता जा रहा हूँ

और,
किसी और बहाने से तुम मिलती हो
और,हम बचाते हैं मिलकर
अपने हिस्से की
थोड़ी सी हवा
थोड़ी सी हरियाली
थोड़ा भूख
थोड़ी प्यास
थोड़ी बारिश…

चारण काल में एक कविता

चू जाऊँगा
टपककर ज़रदालू आम की बून्द सा
टभक जाऊँगा
टाभ नीम्बू सा
खखोरकर फेंक दिया जाऊँगा पपीते के बीज सा
उतार दिया जाऊँ
लीची के छिलके सा
खोंट लिया जाऊँ
बथुआ साग सा
महाराज !

तुम्हरे द्वारे आनन्द में भरथरी गाने आ जाऊँगा
मिरदंगिया बन जाऊँगा
झाल की तरह बजता रहूँगा
तुम्हरे द्वारे हरि कीर्तन में
पमरिया नाच नाचूँगा मुड़े की छठी मे

महाराज !
नौकरी बजा दूँगा द्वारपाल की
या बिछ जाऊँगा गलीचे सा तुम्हरे फ़र्श पर

महाराज !
तमस में हाथी से कुचलवा देना
रही जात से बार देना

महाराज !
काली किरिया
बरम किरिया
देब किरिया
बिसहर किरिया
चारण ना बनूँगा तुम्हरी ….

यह भरतनाट्यम का एक पोज नही है

यह कविता प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखिका अरुंधति राय के लिए ,जो कहती हैं ,कि- ‘’मेरी दुनिया मर गई है / मैं उसका मर्सिया लिख रही हूँ ।
”’जीशा भट्टाचार्य एक स्कूली छात्रा है ,जो मेरे स्कूल मे दसवीं मे पढ़ती है और भरतनाट्यम करती है उसकी माँ मुझे उसकी एक फ़ोटो देती है जिसमे जीशा अपनी उस बहन के साथ है जो चलने फिरने मे असमर्थ है। यह कविता जीशा के भरतनाट्यम और उसके जज्बे पर आधारित है……”’

तुम समय के खिलन्दड़ेपन से अनजान
समय मे ताल भरने के निमित्त
भर देती हो कुछ ध्वनि
जबकि तुम अपनी बेहद सुन्दर आँखों से
गोल-गोल देखती हो दुनिया
कभी कह नही सकती हो कि -–
‘’मेरी दुनिया मर गई है…..
मैं उसका मर्सिया लिख रही हूँ ।‘’
इस समय मे
जबकि टेलीविज़न से चलने वाली गोली ने
छलनी कर दी संगीत की छाती
और तुम गा रही हो…
‘’मधुकर निकर करम्बित कोकिल ….’’
जब नृत्य करने वाले पावों को काट कर
बाज़ार मे बेचा जा रहा है
लेगपीस
तुम भरतनाट्यम के एक पोज मे
थिरका देती हो पाँव
तुम्हें नृत्य करना है –- ताउम्र
गाना है –- ताउम्र
अबकी अरुंधति जी से कहीं भेट हुई तो कह दूँगा ,कि
किसी की दुनिया आसानी से नहीं मरती
जिसकी शिनाख़्त पर मर्सिये की कवायद हो
और एक लड़की ने
चौदह साल की उम्र मे ठान लिया है कि
वो अपनी दुनिया मे जम के जिएगी
एक ऐसी दुनिया गढ़ेगी जिसमे
गा सके खुलेआम
निःस्वार्थ कर सके भरतनाट्यम
शायद उसके बुलन्द हौसले को मिल ही जाए मंज़िल
वैसे शुक्रिया मेरी बच्ची
मैं गर्व से कहता हूँ कि
ईश्वर की कोई औक़ात है तो
मुझे ही नही,
हर किसी को
एक बिटिया ऐसी ही दे जो बिलकुल इसी कि तरह हो
बिलकुल इस लड़की की तरह…
गीत जिसका शौक
नृत्य जिसकी मंज़िल….

यह सिर्फ़ मायानगरी नहीं है मेरी जान

सिने तारिकाओं की मोहक हँसी
चमचमाकर जब देश में फैलती है
दलाल स्ट्रीट से निकलकर आता है
देश का भाग्यफल
मायाबी नियंता समूचे देश को
अपनी मुट्ठियों में क़ैद करना चाहता है
अपनी लपलपाती जीभ से वो
चाटने को आतुर है
समूचा देश………
डरावनी,दहकती लाल-लाल आँखों से
निरंतर माया की लपटें फेंककर
भष्म करना चाहता है-देश
कि मायाबियों के डर के मारे ही
मुंबई को मायानगरी कहते हैं-लोग

दिल्ली कल क्या करेगी
मुंबई इस पर आज ही विचार कर लेती है
उस विचार को हक़ीक़त बनाने के लिए
लाखों की भीड़
लोकल ट्रेन में हुजूम बनाकर चल देते हैं
तब जबकि समूचा देश सोया रहता है
हड़बड़ाकर जाग जाती है-मुंबई
गणपति बप्पा……मोरया……..
पर मुंबई
सिर्फ़ बांद्रा,जुहू,वर्ली में नहीं
कामकाज की तलाश में
भागते लोगों के जूतों में
जागती है

मयाबी नियंताओं की
बड़ी-बड़ी ईमारतों में नहीं
कसमसाती है-मुंबई
दिन भर की हाड़-पंजर तोडनेवाली
थकान के बाद
झुग्गियों में ऊँघती रात के
खर्राटे को निकालकर
कसकते दर्द का भी नाम मुंबई है
सार्वजनिक नल में पानी भरने के लिए लगी
लम्बी लाइन में होने वाली गाली-गलौज की
भाषा का भी नाम-मुंबई है
समुंदर किनारे सिंकते भुट्टे का स्वाद
हवा मिठाई का स्वाद
महालक्ष्मी में प्रवेश करने का द्वार
और ऐसा ही सबकुछ-मुंबई है
क्योंकि मुंबई होना ठाकरे होना नहीं है
अंबानी और टाटा-बिड़ला होना नहीं है

मैं तो कहता हूँ;
मुंबई सबको देखनी चाहिए
क्योंकि जितनी दिखायी जाती है
सिल्वर स्क्रीन पर वैसी ही नहीं है मुंबई
उससे बहुत-बहुत आगे
जिसे कोई दिखा ही नहीं सकता
और उससे आगे आप देख ही नहीं सकते
घिन के मारे,शर्म के मारे,डर के मारे,
गर्व के मारे,शान के मारे,ताकत के मारे

यह सिर्फ़ मायानगरी नहीं है मेरी जान
मुंबई तो रोज़मर्रा है,
हस्बेमामूल है,
रोज़नामचा में-
होड़म होड़, जोड़-तोड़, भागम-भाग होना है

क्योंकि, मुंबई होना देश होना है…

उस वसंत के नाम

वो वसंत की सरसराहट मुझे याद है
जिसमें कोयली कूक की जगह
कोयल की चोंच से खून टपका था
आम मंजर के धरती पर गिरने से
विस्फोट हुआ था
सरसों की टुस्सियों से बारूद बरसता था
और हवा में हर जगह
लाशों के सड़ने की गन्ध थी
झरने से रक्त की टघार
और शाम
शाम काली रोशनाई में लिपटी
एक क़िताबी शाम थी
रातों की दहशतगर्दी और सन्नाटे
कुत्तों की कुहू …कू…….कुहू…. से टूटने थे
एकाएक सारे कुत्ते जोर-जोर से भौंकने लगे थे
एक-एक कर चीथड़े कर रहे थे
इन्सानी माँस के लोथड़े
कहीं हाथ, कहीं पैर, कहीं आँख, कहीं नाक
और हर जगह ख़ून
ख़ून …ख़ू…न…ख़ू….ऊ…न
पानी की जगह ख़ून
एक वसंत के
रचने, बसने, बनने, गढ़ने, बुनने, धुनने की
क़िताबी प्रक्रिया से दूर…।

ऐ सुनो श्वेता !

सुनो श्वेता !
कुछ ही दिन पहले
आटा-चक्की पर -–
गेहूँ पिसवाने गए थे हम लोग
सगुनी (दूध वाली बुढ़िया) के पास
कुछ पैसे बचे हैं
जिन्हें लाना है वापिस
अभी-अभी धान की दुनाई-कटाई होनी है
और नर्गल्ला पे चोर-नुकइया, ढेंगा-पानी,
डेश-कोश, कनिया-पुतरा, अथरो-पथरो……
खेलना बाक़ी रह गया है — हमारा
नानी से कहानी सुननी है
बिहूला-बिसहरा की, नैका-बनिजारा की
शेखचिल्ली और गोनू झा की
या वो वाली कहानी जिसमे पाताल-लोक के अन्दर
लग्गी लगाकर बैगन तोड़ते हो –- बौने
कहानी के उस पाताललोक मे भी जाना बाक़ी है
आधी रात मे
अपने सपनों को दबा कर
चेंहा कर उठ-उठ जाना
और पेड़ों की झुरमुटों के बीच
छिपे चाँद को निहारना चुपचाप
और चाँदनी रात मे अट्ठागोटी खेल कर
मखाना का खीर पकाना भी बाकी है
और भी बाक़ी है / बहुत कुछ बाक़ी है
श्वेता !
ऐ सुनो श्वेता !!
तुम कितनी बड़ी हो गई अचानक
इतनी जल्दी इतनी बड़ी कि……
..अब…
….ब्याहने जा रही हो …..

यात्रा जो मुंबई के लिए होती है

इस सफर में
कुछ हिन्दू हैं
कुछ मुसलमान हैं
कुछ किस्से हैं
उनकी कहानियाँ हैं
कई हिस्से हैं
ज़िंदगी के

कई पेड़
कुछ में फूल
कई झाड़-झंखाड़
हरी घास और बंजर ज़मीन है
कई तालाब
कुछ में पानी

कई सपने
कई अरमान
और नसीब अपना-अपना है

दिन ढलने से पहले 

अंगड़ाई में कट गए फूलों से दिन
चिड़ियों की चहकन से शुरू हुआ दिन
आसमानी चादर ताने गुनगुने दिन
मखमली घास की सेज पर गीत गाते दिन
सूरज के जूते में फीता बान्धते दिन
या पीछे से हाथों से आँखेँ मून्दता दिन
भरी दुपहरी में सरसराता दिन

लोहित आकाश में कनात फैलाए दिन
सूरज को परदेस भेजकर सुबक रहा दिन
ढलने की पारी से लड़ रहा दिन
चान्द के चेहरे पर क्रीम लगाकर लौट आता दिन
चिड़ियों की चहक में फूलों की महक में
प्रभाती से आकाश से पाताल से
दसों दिशाओं से ऋतुओं से
नक्षत्रों से पक्षों से
मास-पहर और सातों घोड़ों से कह दो
कि सूरज के संग रोमांस करने का वक़्त हो गया है …

मैना के बहाने आत्मस्वीकारोक्ति 

पीली चोंच में हजारों साल का दंश
ह्रदय के कोने से चेंहाकर
मिरमिरायी आवाज़
आर्त्तनाद में कई आतंक/कई संशय
वक्ष में छिपाकर
सामने चहकती मैना- एक

अपने दल से अलग
पहाड़ी वनस्पतियों की हवा खाकर
उतरी है दरवाजे के पास
कुछ कहना चाहती हो जैसे
अपनी गोल आँखों से
चोंच खोलकर चें..चें..
जैसे किसी को बुला बुलाकर थक गयी हो
कोई कातर पुकार

मैना के करीब जाकर
उसके दुःख को टोहने की कोशिश करना चाहता हूँ
क्या पहाड़ के उजड़ने का उसे दुःख है?
या नदियों के पानी के सूखने चिंता ?
क्या हरियाली नष्ट होने का उसे दुःख है ?
या विस्तृत आकाश पर छाई परायी सौतन सत्ता से परेशान है वो

ऐसे अनगिनत प्रश्नों से घिरता जाता हूँ
अगर मैं सालिम अली होता तो
सब समझ जाता
कालीदास होता तो
उसके दुःख निवारण हेतु
आषाढ़ मास के बादल का पहला टुकड़ा
उसके नाम कर देता
और उसके नायक के विषय में पूछता ज़रूर
बुलेशाह होता तो भी
उस हीर की आँखों को पढकर
उसके प्यार को समझता
और भी बहुत कुछ होता तो
बहुत कुछ करता

पर अभी जो कुछ हूँ
उससे इतना ही कह सकता हूँ कि
इस वक्त ये मैना
बहुत दुःख में है
और हम हैं कि,
कुछ भी नहीं कर पाते इसके लिए
सिवाय इस कविता को लिखने के

बदलती दुनिया का भाष्य

किसी साज़िश के तहत
सिल जाए ज़ुबान
किसी अपराध के नाम पर
कोई और क़ैद हो जाए झूठ-मूठ में
तो परिवार के लोगो
मित्रो
साथियो
दुश्मनो
किसी भी बात पर रोना मत
यह समय रोती आँखों में लाल मिर्च रगड़ने का है
और हत्यारे हाथों से कविता लिखने का यह समय
बदलती दुनिया का भाष्य है
सूरज के गालों में फ़ेसियल करने
ब्लीच करने चन्द्रमा को पहुँच चुकी हैं क्रीम कम्पनियाँ
क़ैदख़ाने की समूची रात अपने भीतर समेटे बैठी है जनता
दिन में / दुपहरी में
अपने घोसले में माचिस की डिबिया जैसे घर में
इधर योजना और नीति पर चल रही है बहस
असली इण्डिया या असली मसाला
उधर माँग की लोच समझ नहीं पाई
अपनी प्यारी आर० बी० आई० ….

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