अरुणा राय की रचनाएँ

दुनिया को बोलती-बतियाती / अरुणा राय

दुनिया को
बोलती-बतियाती,
घूमती-फिरती,
हंसती-ठहहाती,
बूझती-समझती,
चलती-उडती,
सजती-सवरती,
गुनती-बुनती,
नकारती-फुफकारती
औरतें चुभती हैं!

मौन भी अपना

मौन भी अपना
हवाएँ गुन रहीं
बिना बोले ही
वो सब कुछ सुन रहीं

बोले से
पल को
मुकर भी ले कोई
पर अबोले से
कहाँ निस्‍तार है
अबोला
आस का संसार है

ज़िन्‍दा इंसान हूँ मैं

ज़िन्‍दा इंसान हूँ मैं

सोहबत
चाहिए तुम्‍हारी
मुकम्‍मल

लाश नहीं हूँ
कि
शब्‍दों के फूल

चढ़ाते
चली जाओ…।

मुझे पाने की हवस में

मुझे पाने की हवस में
बेतरह चीख़ेगा वह
बाहुपाश में ले त्रस्‍त कर देगा
अंत में
गड़ा डालेगा अपने बनैले दाँत
मेरे हृदय प्रकोष्‍ठ में
चूस जाएगा सारा रक्‍त

वहाँ रहना तुम
मेरे साथ
हवा से

जब रक्‍तश्‍लथ, हताश
अपने दाँत निकालेगा वह
उसी राह
निकल आना तुम
मेरे साथ
अपने होने की सुगंध लिए
और समा जाना
गीतों में धुन बनकर…

मेरे सपनों का राजकुमार 

मेरे सपनों का
राजकुमार
बनना चाहता है वह
पर उसके पास
ना तो
भावनाओं को
अपनी टापों से रौंदने वाले
घोड़े हैं
ना ही
वह तलवार है
जिसे वह मेरे
जिगर के पार
उतार सके।

कहीं यही तो नहीं है प्यार

सोचती हूं अगली बार
उसे देख लूंगी ठीक से
निरख-परख लूंगी
जान लूंगी
पूरी तरह समझ लूंगी

पर
सामने आने पर
निकल जाता है वक्त
देखते-देखते
कि देख ही नहीं पाती उसे पूरा
एक निगाह
एक स्वर
या आध इंच मुस्कान में ही
उलझकर रह जाती हूं
और
वह भी
किसी बहाने लेता है हाथ हाथों में
और पूछता है
क्या इसी अंगूठे में चोट है…
कहां है चोट … ओह … यहां
अरे
तुम्हारी मस्तिष्क रेखा तो सीधी
चली जाती है आर-पार
इसीलिए करती हो इतनी मनमानी
खा जाती हो सिर
और फिर … वक्त आ जाता है
चलने का
कि गर्मजोशी से हाथ मिलाता है वह
भूलकर मेरा चोटिल अंगूठा
ओह…
उसकी आंखों की चमक में
दब जाता है मेरा दर्द
और सोचती रह जाती हूं मैं
कि यह जो दबा रह जाता है दर्द
जो बचा रह जाता है
जानना
देखना उसे जीभर कर
कहीं यही तो नहीं है प्यार …

जीवन अभी चलेगा

धूल-धुएं के गुबार…
और भीड़ भरी सडक
के शोर-शराबे के बीच
जब चार हथेलियां
मिलीं
और दो जोड़ी आंखें
चमकीं
तो पेड़ के पीछे से
छुपकर झांकता
चौदहवीं का चांद
अवाक रह गया
और तारों की टिमटिमाती रौशनियां
फुसफुसायीं
कि सारी जद्दोजहद के बीच
जीवन
अभी चलेगा!

कहाँ हो तुम 

ओ मेरी रोशनी की टिमटिम बूँद
खोई सी धडकन मेरी
कहाँ हो तुम

कि यह चाँद, पेड
मौसम में बची हल्‍की-सी खुनक
इस बारे में
कोई मदद नहीं कर पा रही मेरी
कि इस वक्‍त मेरा मन
बहुत हल्‍का हो रहा है
कि जैसे वही वजूद हो मेरा
कि जैसे मैं होऊँ ही नहीं

तो मैं
कहाँ हूँ इस वक़्त

और इस आधी रात को जागते
ओ मेरे मंदराग
तू कहाँ है
किस दिशा को गुँजा रहे हो ।

रिक्‍शा टुनटुनाता है 

रिक्शा टुनटुनाता है

मटियाले औ गुलाबी रंगों की
है रौशनी सर पर
इसमें डूबता उतराता
वो भागा जाता है

रिक्शा टुनटुनाता है

क्षण को धूप उगती है
क्षण को छाती है बदली
उमडती और ढलती है
कैसी रूत है ये पगली
खुलता बंद होता
तरनाता शरमाता
खुलता है इक छाता
रिक्शा टुनटुनाता है

कहां जाना है …

पता ही नहीं उसको
कहां जाना है कब किसको
पर वो चलता जाता है

रिक्शा टुनटुनाता है

कभी लगते हैं कुछ झटके
गुलाबी रंग में नजरें
सभी की बारहा अटके
मटियाला थामे गुलाबी हाथ
सबकी नजरों में ये खटके
पर किसको है परवा
दिशाएं हौसलों से पस्त
सब पीछे छूटता जाता है
गुलाबी रंग में रंगा
वो रिक्शे को भगाता है

रिक्शा टुनटुनाता है

उसकी सांस है भारी
पर ऐसी सहसवारी रंगों की
जाने मिले कब
औ उस पर हौसला यह
चला चल
जहां तक कारवां यह
चलता जाता है…

कि अपनी हज़ार सूरतें निहार सकूँ

जिस समय
मैं उसे
अपना आईना बता रही थी
दरक रहा था वह
उसी वक़्त
टुकड़ों में बिखर जाने को बेताब सा
हालाँकि
उसके ज़र्रे-ज़र्रे में
मेरी ही रंगो-आब
झलक रही थी
पर मैं क्या कर सकती थी
कि वह आईना था
तो उसे बिखरना ही था
अब भी मैं उसकी आँखें हूँ
और हर ज़र्रे से
वे आँखें
मुझे ही निहार रही हैं
पर क्या कर सकती हूँ मैं
कि मैंने ही बिखेर दिया है उसे
कि अपनी हज़ार सूरतें
निहार सकूँ…

आज तूने 

आज तूने स्वप्न की शुरूआत कर दी
रात ही थी रात तूने प्रात कर दी
निपट खाली था यह अपना हृदय भी
तूने तो बस चंपई सौगात कर दी
आज…
स्वप्न था या के सचमुच था वो तू ही
बेले गेंदा चमेली चंपा सोनजूही
छलकते खुशबुओं से नेत्र थे वो क्या लबालब
तूने तो इस मरूथल में बरसात कर दी
आज…
तस्वीर में बैठा है तू तो अब भी सम्मुख
हथेली पर टिकाए ठुड्डियां कुछ सोचता सा
लीले डालती हैं इन निगाहे की भंवर तो
किस अनोखे अनमने से दर्द की यह बात कर दी
आज…

बीच में थी एक लट

एक
दूधिया चेहरा
एक
तांबई
बीच में थी
एक लट
काली सी
दोलती …

मेरा काबुलीवाला 

वो
जो इक
छोटी सी बच्ची है
जिसकी निगाहें
मेरी आत्मा के
हरे चिकने पात पर
गिरती रहती हैं अनवरत
बूंदों की तरह
वो ही
मेरी छोटी सी बच्ची
अपनी सितारों सी टिमकती आँखें
मेरी आँखों में डाल
मचलती-सी बोलती है
कितने अच्छे हो आप

मैं
और अच्छा ?
(मेरी तोते सी लाल नाक पकड़
हिलाता…)
अच्छे की बच्ची
कुछ बड़ी हो जा
तो तू उससे भी अच्छी हो जावेगी
और… और सच्ची
और… और नेक
ला दे अपना हाथ
क्या
आज नही करेगी
हैंडशेक…

(ये मेरे काबुलीवाले के लिए कि जिसका वादा है एक रोज़ आने का…)

प्‍यार में पसरता बाजार 

सारे आत्मीय संबोधन
कर चुके हम
पर जाने क्यों चाहते हैं
कि वह मेरा नाम
संगमरमर पर खुदवाकर
भेंट कर दे

सबसे सफ्फाक और हौला स्पर्श
दे चुके हम
फिर भी चाहते हैं
कि उसके गले से झूलते
तस्वीर हो जाए एक

जिंदगी के
सबसे भारहीन पल
हम गुजार चुके
साथ-साथ
अब क्या चाहते हैं
कि पत्थर बन
लटक जाएं गले से
और साथ ले डूबें

छिह यह प्यार में

कैसे पसर आता है बाजार
जो मौत के बाद के दिन भी
तय कर जाना चाहता है …

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