अरुण आदित्य की रचनाएँ

अम्मा की चिट्ठी 

गाँवों की पगडण्डी जैसे
टेढ़े अक्षर डोल रहे हैं
अम्मा की ही है यह चिट्ठी
एक-एक कर बोल रहे हैं

अड़तालीस घंटे से छोटी
अब तो कोई रात नहीं है
पर आगे लिखती है अम्मा
घबराने की बात नहीं है

दीया बत्ती माचिस सब है
बस थोड़ा सा तेल नहीं है
मुखिया जी कहते इस जुग में
दिया जलाना खेल नहीं है

गाँव देश का हाल लिखूँ क्या
ऐसा तो कुछ खास नहीं है
चारों ओर खिली है सरसों
पर जाने क्यों वास नहीं है

केवल धड़कन ही गायब है
बाकी सारा गाँव वही है
नोन तेल सब कुछ महंगा है
इन्सानों का भाव वही है

रिश्तों की गर्माहट गायब
जलता हुआ अलाव वही है
शीतलता ही नहीं मिलेगी
आम नीम की छाँव वही है

टूट गया पुल गंगा जी का
लेकिन अभी बहाव वही है
मल्लाहा तो बदल गया पर
छेदों वाली नाव वही है

बेटा सुना शहर में तेरे
मार-काट का दौर चल रहा
कैसे लिखूँ यहाँ आ जाओ
उसी आग में गाँव जल रहा

कर्फ्यू यहाँ नहीं लगता
पर कर्फ्यू जैसा लग जाता है
रामू का वह जिगरी जुम्मन
मिलने से अब कतराता है

चौराहों पर वहाँ, यहाँ
रिश्तों पर कर्फ्यू लगा हुआ है
इसकी नज़रों से बच जाओ
यही प्रार्थना, यही दुआ है

पूजा-पाठ बंद है सब कुछ
तेरी माला जपती हूँ
तेरे सारे पत्र पुराने
रामायण सा पढ़ती हूँ

तेरे पास चाहती आना
पर न छूटती है यह मिटटी
आगे कुछ भी लिखा न जाए
जल्दी से तुम देना चिट्ठी।

आवाहन

शब्द आओ मेरे पास
जैसे मानसून में आते हैं बादल
जैसे बादलों में आता है पानी

जैसे पगहा तुड़ाकर गाय के थनों की ओर दौड़ता है बछड़ा
जैसे थनों में आता है दूध

इस तरह मत आओ जैसे
रथों पर सवार आते हैं महारथी
बस्तियों को रौंदते हुए
किसी रौंदी हुई बस्ती से आओ मेरे शब्द
धूल से सने और लहलुहान
कि तुम्हारा उपचार करेगी मेरी कविता
और तुम्हारे लहू से उपचारित होगी वह स्वयं

याचक की तरह मत मांगो किसी कविता में पनाह
आओ तो ऐसे, जैसे चोट लगते ही आती है कराह

संतों महंतों की बोली बोलते हुए नहीं
तुतलाते हुए आओ मेरे शब्द
वस्त्राभूषणों से लदे-फंदे नहीं
नंग-धड़ंग आओ मेरे शब्द

किसी किताब से नहीं
गरीबदास के ख्वाब से निकलकर आओ मेरे शब्द

कि मैं सिर्फ एक अच्छी कविता लिखना चाहता हूँ
और उसे जीना चाहता हूँ तमाम उम्र ।

रोज़ ही होता था यह सब

रोज़ ही गुजरना होता था उस सड़क से
पर कभी नहीं लगा आज से पहले
कि कितने सुंदर-सुंदर वृक्ष हैं सड़क के दोनों ओर

रोज़ ही उड़ती होंगी तितलियाँ फूलों के आसपास
पर कभी नहीं लगा आज से पहले
कि उपवन में उड़ती हुई तितलियाँ
किस तरह उडऩे लगती हैं हमारे मन में

रोज़ ही मिलाते हैं किसी न किसी से हाथ
पर आज से पहले किसी से हाथ मिलाते हुए
कभी नहीं याद आईं केदार काका की पंक्तियाँ
कि दुनिया को हाथ की तरह
गर्म और सुंदर होना चाहिए

रोज़ ही इसी तरह बात करती है वह लड़की
पर कभी नहीं लगा आज से पहले
कि मिश्री घुली हुई है उसकी जबान में।

रोज़ ही मुस्कराकर स्वागत करता है दफ़्तर का चौकीदार
पर आज से पहले
कभी इतनी दिव्य नहीं लगी उसकी मुस्कराहट

रोज़ ही होता था यह सब
पर कभी नहीं लगा आज से पहले
कि इतना अच्छा भी हो सकता है यह सब
कितना अच्छा हो
कि हर दिन हो जाए आज की तरह।

नींद

वो दिन भर लिखती है आपकी गोपनीय चरित्रावली
और उसी के आधार पर करती है फैसला
कि रात, कैसा सुलूक करना है आपके साथ

वो रात भर आपके साथ रही
तो इसका मतलब है, दिन में
बिलकुल सही थे आपके खाता-बही

अगर वह नहीं आई रात भर
तो झाँकिए अपने मन में
ज़रूर दिखेगा वहाँ कोई खोट
या कोई गहरी कचोट

यानी आप खुद हैं अपनी नींद के नियामक
पर कुछ ऐसे भी लोग हैं जिन्हें मुगालता है
कि वे ही हैं सबके नींद-नियंता

समय के माथे पर निशाना साधने के लिए
कुछ सिरफिरे एक खंडहर से निकालते हैं चंद ईंटें
और भरभरा कर ढह जाता है एक ढाँचा
जिसके मलबे में सदियों तक
छटपटाती है कौम की लहू-लुहान नींद

लाखों की नींद चुराकर एक सिरफिरा सोचता है
कि उसके हुक्म की गुलाम है नींद
और ऐसे नाजुक वक़्त में भी
उसके सोच पर हँस पड़ती है वह
कि वही जानती है सबसे बेहतर
कि दूसरों की नींद चुराने वाला
सबसे पहले खोता है अपनी नींद
बेचैनी में रात-रात भर बदलता है करवट
उसके दिमाग पर हथौड़े की तरह बजती है
चौकीदार के डंडे की खट-खट

खट-खट के संगीत पर थिरकती नींद
रात भर गिनती है सिरफिरों के सिर
करती है चौकीदार की सुबह का इंतज़ार

लोटे 

देवताओं को जल चढ़ाने के काम आते रहे कुछ
कुछ ने वजू कराने में ढूंढ़ी अपनी सार्थकता
प्यासे होंठों का स्पर्श पाकर ही खुश रहे कुछ
कुछ को मनुष्यों ने नहाने या नित्यकर्म का पात्र बना लिया
बहुत समय तक अपनी अपनी भूमिका में सुपात्र बने रहे सब

पर आजकल बदल गई हैं इनकी भूमिकाएँ
जल चढ़ाने और वजू कराने वाले लोटे
अब अकसर लड़ते-झगड़ते हैं
और बाद में शांति अपीलें जारी करते हैं
काफी सुखी हैं ये लोटे
पर सबसे ज़्यादा सुखी हैं वे, जो बिना पेंदी के हैं
परेशान और दुखी हैं वे, जो किसी की प्यास बुझाना चाहते हैं
आजकल पात्रों की सूची से गायब होता जा रहा है उनका नाम
जग -मग के इस दौर में लोटों का क्या काम?

राष्ट्रीय लुढ़कन के इस दौर में
जब गेंद की तरह इस पाले से उस पाले में
लुढ़क रही हैं अंतरात्माएँ
कितना आसान है वोटों का लोटों में तब्दील हो जाना
ये जो आसानी है
कितनी बड़ी परेशानी है ।

चाँदनी रात में लांग ड्राइव

तुम्हारे साथ लांग ड्राइव पर न जाता
तो पता ही न चलता
कि तुम कितने प्यारे दोस्त हो, चाँद भाऊ !

गजब का है तुम्हारा सहकार
कि जिस गति से चलती है मेरी कार
उसी के मुताबिक घटती बढ़ती है तुम्हारी रफ़्तार

एक्सीलरेटर पर थके पैर ने जब भी सोचा
कि रुककर ले लूँ थोड़ा दम
तुमने भी तुरन्त रोक लिए अपने क़दम ।

गति अवरोधक पर
या सड़क के किसी गड्ढे में
जब भी लगा मुझे झटका
तुम्हें भी हिचकोले खाते देखा मैंने ।

नहीं, ये छोटी मोटी बातें नहीं हैं, चाँद भाऊ !
तुम्हें क्या पता कि हमारी दुनिया में
हमेशा इस फ़िराक मैं रहते हैं दोस्त
कि कब आपके पाँव थकें
और वे आपको पछाड़ सकें

आपदा-विपदा तक को
अवसर में बदलने को छटपटाते लोग
ताड़ते रहते हैं कि कब आप खाएँ झटके
और वे आपकी तमाम सम्भावनाएँ लपकें

इसीलिए मैं अक्सर इस दुनिया को ठेंगा दिखा
तुम्हारे साथ निकल जाता था लांग ड्राइव पर
लेकिन आजकल पेट्रोल बहुत महँगा है, चाँद भाऊ !
और लांग ड्राइव एक सपना

क्या ऐसा नहीं हो सकता
कि किसी दिन मेरी कार को अपनी किरणों से बान्धकर
झूले की तरह झुलाते हुए लांग ड्राइव पर पर ले चलो
और झूलते-झूलते, झूलते-झूलते
किसी बच्चे की तरह थोड़ी देर सो जाऊँ मैं ।

संदर्भ 

एक दिन सपने में
जब नानी के किस्सों में भ्रमण कर रहा था मैं
गंगा घाट की सीढिय़ों पर मिला एक दोना
चमक रहा था जिसमें एक सुनहरा बाल

मैं ढूंढ़ता हूं इसका संदर्भ

फिलहाल मेरे लिए इसका संदर्भ महज इतना
कि घाट की सीढिय़ों में अटका मिला है यह
पर सीढिय़ों के लिए इसका संदर्भ वे लहरें हैं
जिनके साथ बहता हिचकोले सहता आया है यह
और लहरों के लिए इसका संदर्भ
उन हाथों में रचा है, जिन्होंने रोमांच से कांपते हुए
पानी में उतारी होगी पत्तों की यह नाव

हाथों के लिए क्या है इसका संदर्भ
वह पेड़, जहां से तोड़े गए थे हरे-हरे पत्ते?

पर यह सब तो उस दोने का संदर्भ हुआ
असल तत्व यानी बाल का नहीं

बाल का हाल जानना है
तो उस पानी से पूछिए
जिसकी हलचल में छिपा है
उस सुमुखि का संदर्भ
जिसका अक्स अब भी
कांप रहा है जल की स्मृति में

दूसरे पक्ष को भी अगर देखें
तो इसका संदर्भ उस राजकुमार से भी है
जिसके लिए सुरसरि में तैराया गया है यह

पर अब तो इसका संदर्भ मुझसे भी है
जिसे मिला है यह
और यह मिलना संभव हुआ स्वप्न में
सो इसका एक संदर्भ मेरे सपने से भी है

इस तरह दूसरों की चर्चा करते हुए
अपने को
और अपने सपने को संदर्भ बना देना
कला है या विज्ञान?

डायरी 

पंक्ति-दर-पंक्ति तुम मुझे लिखते हो
पर जिन्हें नहीं लिखते, उन पंक्तियों में
तुम्हें लिखती हूं मैं

रोज-रोज देखती हूं कि लिखते-लिखते
कहां ठिठक गई तुम्हारी कलम
कौन सा वाक्य लिखा और फिर काट दिया
किस शब्द पर फेरी इस तरह स्याही
कि बहुत चाह कर भी कोई पढ़ न सके उसे
और किस वाक्य को काटा इस तरह
कि काट दी गई इबारत ही पढ़ी जाए सबसे पहले

रोज तुम्हें लिखते और काटते देखते हुए
एक दिन चकित हो जाती हूं
कि लिखने और काटने की कला में
किस तरह माहिर होते जा रहे हो तुम

कि अब तुम कागज से पहले
मन में ही लिखते और काट लेते हो
मुझे देते हो सिर्फ संपादित पंक्तियां
सधी हुई और चुस्त

इन सधी हुई और चुस्त पंक्तियों में
तुम्हें ढूंढ़ते हैं लोग
पर तुम खुद कहां ढूंढ़ोगे खुद को
कि तुमसे बेहतर जान सकता है कौन
कि जो तस्वीर तुम कागज पर बनाते हो
खुद को उसके कितना करीब पाते हो?

मैं भी अन्ना 

गलियाँ बोलीं मैं भी अन्ना, कूचा बोला मैं भी अन्ना !
सचमुच देश समूचा बोला मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना !

भ्रष्ट तंत्र का मारा बोला, महंगाई से हारा बोला !
बेबस और बेचार बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना !

साधु बोला मैं भी अन्ना, योगी बोला मैं भी अन्ना !
रोगी बोला, भोगी बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना !

गायक बोला मैं भी अन्ना, नायक बोला मैं भी अन्ना
दंगों का खलनायक बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना !

कर्मनिष्ठ कर्मचारी बोला, लेखपाल पटवारी बोला !
घूसखोर अधिकारी बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना !

मुंबई बोली मैं भी अन्ना, दिल्ली बोली मैं भी अन्ना !
नौ सौ चूहे खाने वाली बिल्ली बोली मैं भी अन्ना !

डमरु बजा मदारी बोला, नेता खद्दरधारी बोला !
जमाखोर व्यापारी बोला, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना !

दायाँ बोला मैं भी अन्ना, बायाँ बोला मैं भी अन्ना !
खाया-पीया अघाया बोला मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना !

निर्धन जन की तंगी बोली, जनता भूखी-नंगी बोली !
हीरोइन अधनंगी बोली, मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना !

नफ़रत बोली मैं भी अन्ना, प्यार बोला मैं भी अन्ना !
हँसकर भ्रष्टाचार बोला मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना !

अन्वर्थ

चित्र बना रही है वह
या चित्र बना रहा है उसे

अभी-अभी भरा है उसने
एक पत्ती में हरा रंग
और एक हरा-भरा उपवन
लहलहाने लगा है उसके मन में

एक तितली के पंख में
भरा है उसने चटख पीला रंग
और पीले फूलों वाली स्वप्न-उपत्यका में
उड़ने लगी है वह स्वयं
उसे उड़ते देख खिल उठा है कैनवास

अब वह भर रही है आसमान में नीला रंग
और कुछ नीले धब्बे
उभर आए हैं उसकी स्मृति में

अब जबकि भरने जा रही है वह
बादल में पानी का रंग
आप समझ सकते हैं
कि उसकी आँखों को देख
सहम-सा क्यों गया है कैनवास

चुप रहना, बहुत कुछ कहना

चुप हूँ इसका मतलब यह नहीं है
कि बोलने को कुछ है ही नहीं मेरे पास
या कि बोलने से लगता है डर
चुप हूँ कि किसके सामने गाऊँ या चिल्लाऊँ
किस तबेले में जाकर बीन बजाऊँ

जिन्हें नहीं सुनाई देती
पेड़ से पत्ते के टूटकर गिरने की आवाज़
जिनके कानों तक नहीं पहुंच पा रही
नदियों की डूबती लहरों से आती
बचाओ-बचाओ की कातर पुकार
जिन्हें नहीं चकित करती
अभी-अभी जन्मे गौरैया के बच्चे की चींची-चूँचूँ

भूख से बिलख रहे किसी बच्चे की आवाज़
जिनके हृदय को नहीं कर जाती तार-तार
उनके लिए क्या राग भैरव और क्या मेघ मल्हार

जहाँ सहमति में हो इतना शोर
कि असहमति में चिल्लाना
सबको मनोरंजक गाना लगे
वहाँ चुप रहना, बहुत कुछ कहना है ।

पसीने का गाना 

खेत में बहता हूँ
चुपके से धरती के कान में कहता हूँ
हरा-भरा कर दो किसान का मन

फैक्ट्री में बहता हूँ
मशीन से कहता हूँ
पैदा करो थोड़ी सी हँसी-खुशी

पौरुष के माथे पर गर्व से चमकता हूँ
संगिनी समीरा के आंचल से कहता हूँ
मेहनत का मोती हूँ प्यार से सहेज लो

धूप से करियाये रूप पर दमकता हूँ
कवि की क़लम काग़ज़ से कहती है
देखो-देखो श्रम और सौंदर्य का अद्भुत बिम्ब

पसीने का रोना

तरह-तरह के सेंट
तरह-तरह के परफ्यूम
भाँति-भाँति के डियो की धूम

अनगिनत रंग-बिरंगी पत्रिकाएँ
रेडियो-टीवी-इंटरनेट-अख़बार
हर जगह मेरे खिलाफ़ इश्तहार

अपनी गंध के लिए लड़ता मैं अकेला
मेरे खिलाफ़ इतना बड़ा मेला

एक फूल का आत्मवृत्त 

अपने बारे में बात करना बिलकुल अच्छा नहीं लगता
पर लोगों की राय है कि मैं एक विशिष्ट फूल हूं
85 प्रतिशत मधुमक्खियों का मानना है
कि सबसे अलहदा है मेरी खुशबू
और 87 प्रतिशत भौंरों की राय है
कि औरों से अलग है मेरा रंग

टहनी से तोड़ लिए जाने के बाद भी
बहुत देर तक बना रह सकता हूं तरो-ताजा
किसी भी रंग के फूल के साथ
किसी भी गुलदस्ते की शोभा में
लगा सकता हूं चार चांद

मुझे चढ़ाने से प्रसन्न हो जाते हैं देवता
और मेरी माला पहनते ही वशीभूत हो जाते हैं नेता
मेरी एक छोटी सी कली
खोल देती है प्रेम की संकरी गली

यहां तक आते-आते लडख़ड़ा गई है मेरी जुबान
जानता हूं कि बोल गया हूं जरूरत से कुछ ज्यादा
पर क्या करूं यह ऐसी ही भाषा का समय है
कि बोलकर ऐसे ही बड़े-बड़े बोल
महंगे दामों पर बिक गए मेरे बहुत से दोस्त
पर जबान ने लडख़ड़ाकर बिगाड़ दिया मेरा काम

ऐसे वक्त पर जो लडख़ड़ा जाती है यह जुबान
दुनिया की दुकान में क्या इसका भी कोई मूल्य है श्रीमान?

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