अरुण कुमार नागपाल की रचनाएँ

कॉक्रोच 

जूतों और डिब्बों में छिप कर
जीने का चलन
तलुवों में रहने और डर-डर कर जीने की संस्कृति
कॉक्रोच का जीना भी कोई जीना है
उसका तो केवल अस्तित्व भर होता है

उसका जीवन मरण
सिर्फ़ अपने तक सीमित है
कॉक्रोच के जीवन मूल्य नहीं होते
वह कोई आदर्श नहीं पालता
उसे तो बस पेट भरना
और छुप-छुप जीना आता है

कॉक्रोच पालता है
सुरक्षित होने का भ्रम
पर दरसल जान उसकी
हरपल दाँव पर लगी रहती है
हर वक्त ख़तरा बना रहता है
कॉक्रोच रेंगता है डर की अजान राहों पर

रसोईघर के फ़र्श पर रेंगता हुआ
कभी भी कुचला जा सकता है कॉक्रोच

बाथरुम की नाली से
घर में प्रवेश कर रहे
कॉक्रोच पर फ़िनिट की बारिश कर
उसका ख़ात्मा किया जा सकता है
कॉक्रोच जीते- जी
चलते-चलते
मरता है
लड़ते-लड़ते नहीं
वीरगति को प्राप्त नहीं होता
शहीद नहीं होता
अमर नहीं होता
शिकार हो जाता है
कभी भी
छिपकली का
कॉक्रोच.

कुरुक्षेत्र 

जीवन से लड़ते-लड़ते
बीत चुके हैं
कई रोज़, महीने साल
थक हार गया हूँ मैं
ख़त्म हो चुके हैं
मेरे तरकश के सारे तीर
टूट चुकी है तलवार
अपना अंतिम भाला भी फेंक चुका हूँ
जीवन की ओर

अभिमन्यु के मानिंद
उठा लिया है
रथ का पहिया
चुनौतियों से लड़ने के लिए

क्षत-विक्षत हो चुका है
मेरा कवच
और लहू के धारे बह रहे हैं
मेरे बदन के घावों से

ऐसे में सोच रहा हूँ
कहाँ है वो कृष्ण
जिसने मेरी पीठ को थपथपाकर
जीवन के कुरुक्षेत्र में कूद जाने का उपदेश दिया था।

बूढ़े लोग

धूप की आशा में
कुर्सी पर वैठ
रोज़ मैं सूरज़ की प्रतीक्षा करता हूँ
’गुड मार्निंग ’कहने के लिए

सर्द ऋतु में
सूरज़ मेरी बूढ़ी हडिड्यों को गर्माता है

किसी रोज़
सूरज़ तो निकलेगा
पर मैं उसे नहीं मिलूंगा शायद

बूढ़े लोगों का क्या भरोसा
सोच कर
मेरी आँखें डबडबा-सी जाती हैं।

छोटी-छोटी ख़ुशियाँ 

क्यारियों को पानी देते बाबू जी
चूल्हा चौका सँभालती माँ
शर्ट का बटन टाँकती पत्नी
टीचर के लिए लाल गुलाब ले जा रही
नन्ही-सी लड़की
कॉलबेल बजाता पोस्टमैन
कुछ लोग हैं हमारे इर्द-गिर्द
जो करते रहते हैं हमारे लिए
छोटे-छोटे काम
मुँह से बिना कुछ कहे
अपने छोटे-छोटे कामों से
वे लगे हैं हमारे जीवन को सुंदर बनाने में
छोटी-छोटी खुशियाँ बाँटने में
हालाँकि हम भूल चुके हैं
आभार प्रकट करना
न जाने हम क्यों ले लेते हैं उन्हें इतनी सहजता से?

आम आदमी बनाम कच्चा आदमी

आम आदमी
को गिराया जा सकता है
पत्थर मार कर
कच्चे आम की तरह
पर भूलना यह भी नहीं चाहिए
कि आम आदमी
यदि चाहे तो
पूँजीपति के पेट में मरोड़ पैदा कर सकता है
हाज़मा बिगाड़ सकता है
और कारण वन सकता है दस्त का
कच्चे आम की तरह

चीख़ें 

एक सौ चीख़ो को
अपने अंदर दबाए रखने
और उनका गला घोंटते रहने से
कहीं अच्छा है
एक बार पूरी ताक़त से चीख़ लेना
ऐसी चीख़ मारना
जो दिल दहला दे सभी के
हिला कर रख दे सब जड़-चेतन को

रोज़-रोज़ चीखों को दबाने का अर्थ है
धीमी-धीमी
रूक-रूक कर की गई आत्महत्या
रोज़-रोज़ एक शराबी पति के हाथों पिटने
से कहीं अच्छा है
एक चीख़ मार देना
और उसे बता देना
कि चीख़ किसी संबंध का अंत हो सकती है
हमें चीख़े जमा करते रहने की
आदत सी क्यों हो जाती है
हम क्यों उठाए रह्ते हैं
अपनें दिमाग़ में
चीखों का बेइतहा बोझ
उसे फेंक क्यों नहीं देते
उस कचरा पेटी में
जिसके बाहर बड़े-बड़े अक्षरों में लिख रहता है
कि ’कृप्या कूड़ा-कर्कट यहाँ फेंकें’

आओ हम एक चीख़ मारें
इसके दो फायदें होंगे
एक तो हम दोनों हल्के हो जायेंगे
दूसरा तुम्हें यह पता चल जायेगा
कि तुम बक़्त आने पर चीख़ भी सकते हो

विश्वास का रबाब

सहज नहीं हूँ मैं
बहुत कुछ घट रहा है मेरे भीतर
बन रहा है बहुत कुछ
तो कुछ टूट भी रहा है

जैसे चल रही है कोई वर्कशॉप बराबर
क्या निर्माण औ’ विघटन
दो समानांतर प्रक्रियाएँ हैं?
टूट रहा है जो, उसे बचाना है

आस्थाओं ,आशाओं, मानवीय मूल्यों, परंपराओं को
संभालना है, सहेजना है.
देना भी तो है कुछ आने वाली पीढ़ियों को
विश्वास का रबाब बजेगा
यह विश्वास है अटल
जैसे मेरी कविता है प्रतीक विश्वास का.

सौंदर्यबोध

लॉन में ख़ुश्बू बिखराते
सफ़ेद ,गुलाबी, पीले फूल
लगते हैं उसे
अपने बच्चों की तरह
पर उसी लॉन में
घास पर बैठे हुए
माली के बच्चे
चुभते हैं उसे शूल की तरह
कितना अजीब है
उसका सौंदर्यबोध.

गुलमोहर

मुझसे कहीं अधिक व्यथित है
यह गुलमोहर
तुम्हारे वियोग में
अपने अनुभव से
मैंने यह जाना है
कि अक्सर निशि के तमस में
सिसकते हुए
यह तलाशा करता है
तुम्हारी परछाइयाँ
जानता हूँ
तुम नहीं लौटोगी
लेकिन याद रखना
तुम्हारी वापसी तक
क्षोभ में सिर झुकाए
हवा के थपेड़े सहता
यूँ ही
अनवरत
झरता रहेगा
हमारा गुलमोहर

मेरी कविताओं की डायरी

मेरी कविताओं की डायरी में
बंद पड़े हैं
कुछ पुराने फूल
कालेज के ज़माने के

एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है
मेरी कविताओं की डायरी

पिंडोरा बाक्स है

एक ख़ज़ाना है
कविताओं की कानें है‍ इस डायरी में
जिसे खोदने पर मिलते हैं
बहुमूल्य हीरे-जवाहरात
रत्न-पन्ने
मोती माणिक्य
जिसमे‍ क़ैद हैं बहुत से अनुभव
अनुभूतियाँ, भावनाएँ
भीगी कोमल यादें

एक निशानी है
अपनों की
एक याद है
गु़ज़रे हुए ज़माने की
बीते हुए दिनों की
अतीत है यह मेरा
अल्लादीन का चिराग है
बर-बार पढ़ने से जिसे
मिलते है‍ नये अर्थ

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